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Wednesday, June 22, 2016

रूसी उपन्यास "आझकल के हीरो" ; भाग-1 ; बेला - अध्याय-2



रूसी उपन्यास "आझकल के हीरो"
भाग-1
1. बेला - अध्याय-2

"अइकी देखथिन, हम तेरेक के पार एगो किला में कंपनी के साथ हलिअइ - लगभग पाँच साल पहिले । एक तुरी, शरत्काल में रसद के साथ एगो गाड़ी अइलइ; गाड़ी में एगो अफसर हलइ, पचीस साल के एगो नौजवान । ऊ हमरा सामने पूरा वरदी में प्रस्तुत होलइ आउ बतइलकइ, कि ओकरा हमरा हीं किला में रहे के औडर मिलले ह । ऊ एतना पतरा, गोरा हलइ, ओकर वरदी एतना नावा हलइ, कि हम तुरतम्मे अंदाज लगा लेलिअइ, कि ऊ काकेशिया में हमन्हीं हीं हाले में अइले ह । "तोहर, शायद", हम ओकरा पुछलिअइ, "रूस से हियाँ बदली होलो ह?" - "बिलकुल सही, मिस्टर स्टाफ-कप्तान", ऊ उत्तर देलकइ । हम ओकरा हाथ से पकड़ लेलिअइ आउ कहलिअइ - "बहुत खुशी के बात हको, बहुत खुशी के बात हको । तोहरा जरी बोर होतो ... लेकिन तइयो हमन्हीं दुन्नु मित्रतापूर्वक रहबइ ... आउ, किरपा करके, हमरा खाली, माक्सीम माक्सीमिच पुकारऽ, आउ, काहे लगी एतना पूरा वरदी ? हमेशे हमरा भिर छज्जेदार टोपी (forage cap) में आवऽ ।" ओकरा क्वाटर ले जाल गेलइ, आउ ऊ किला में टिक गेलइ ।
"आउ ओकर नाम की हलइ ?" हम माक्सीम माक्सीमिच के पुछलिअइ ।
"ओकर नाम हलइ ... ग्रिगोरी अलिक्सांद्रविच पिचोरिन । निम्मन छोकरा हलइ, हम अपने के विश्वास देला सकऽ हिअइ; खाली जरी विचित्र । जइसे, उदाहरण के तौर पे, बारिश में, ठंढी में दिन भर शिकार पर; सब कोय ठिठुर जइतइ, थक जइतइ - लेकिन ओकरा लगी कुछ नयँ । आउ दोसरा तुरी ऊ अपन कमरा में बइठल रहइ, हावा के एगो झोंका आवइ, आउ ऊ विश्वास देलावइ, कि ओकरा सरदी पकड़ लेलकइ; शटर पर दस्तक होवइ, त ऊ चौंक जाय आउ ओकर चेहरा पीयर पड़ जाय; आउ हम देखिअइ कि जंगली सूअर के अकेल्ले पीछा करइ; अइसनो होवइ, कि पूरे घंटा के घंटा ओकरा से एगो शब्द नयँ निकास पाहो, लेकिन जइसीं कभी-कभी कहानी सुनावे लगो, त हँसते-हँसते पेट में दरद होवे लगो ... जी हाँ, ओकरा में बड़गो विचित्रता हलइ, आउ शायद, धनगर व्यक्ति हलइ - ओकरा पास केतना तरह-तरह के बेशकीमती नुमाइशी चीज हलइ ! ..."
"आउ लम्मा समय तक अपने के साथ रहलइ ?" हम फेर पुछलिअइ ।
"हाँ, लगभग एक साल । लेकिन ई साल हमरा स्मृति में हइ; ऊ हमरा बहुत परेशान कइलकइ, त काहे नयँ आद रहतइ ! ई सच हइ, कि अइसन लोग हइ, जेकर जन्मे से (भागे में) लिक्खल रहऽ हइ, कि ओकरा साथ तरह-तरह के असाधारण बात होहीं के चाही !"
"असाधारण ?" उत्सुकता के मुद्रा में हम उद्गार प्रकट कइलिअइ, ओकरा लगी चाय ढारते ।


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