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Friday, September 19, 2014

2.11 इंसान के किस्मत



इंसान के किस्मत
(मूल लघु उपन्यास के संक्षिप्त रूपान्तर)

मूल रूसी - मिखाइल शोलोखोव (1905-1984) 
 मगही अनुवाद - नारायण प्रसाद
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मिखाइल अलेक्सान्द्रोविच शोलोखोव (उच्चारित "मिख़ऽइल अलिक्सान्द्र शोलाख़फ़") (24 मई 1905 - 21 फरवरी 1984) - साहित्य में 1965 के नोबेल पुरस्कार विजेता । चार खंड में रचित प्रसिद्ध उपन्यास “Тихий Дон” (“शांत दोन”, अंग्रेज़ी में "And Quiet Flows the Don") के लेखक । 1956-1957 में लिक्खल उनकर लघु उपन्यास “Судьба Человека” (इंसान के किस्मत) पर 1959 में फिल्मो बनले हल । एहे शीर्षक से संक्षिप्त रूपान्तरित रूसी कहानी हमन्हीं के 'डिप्लोमा इन रशियन लैंग्वेज' के कोर्स में पढ़ावल गेले हल । प्रस्तुत हइ संक्षिप्त रूसी रूपान्तर के मगही अनुवाद ।
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1

युद्ध के बाद दोन नदी पर के पहिला वसंत जरी जोर पर हलइ । मार्च के अंत में गरम हवा बह रहले हल, आउ दुइए दिन के बाद दोन के किछार पे बरफ पिघले लगलइ । रस्ता पे गाड़ी से आना-जाना मोसकिल हो गेलइ ।

एहे बखत हमरा बुकानोव्स्काय स्तनित्सा (बड़गर कज़ाक गाँव) जाय पड़ल । हम अपन साथी के साथ सूर्योदय के पहिलहीं निकस पड़लूँ । रस्ता बहुत खराब हल । जाहाँ पर घोड़ा से जाना मोसकिल हलइ, हुआँ हमन्हीं पैदल गेलूँ । करीब छो घंटा के बादे हमन्हीं एगो नाला येलानका के पारक (crossing) तक पहुँच पइलूँ । नाला उफान पे हलइ, आउ छोटगर नल्ला एगो चौड़गर नद्दी में बदल गेलइ । ई नद्दी के पार कोय छोटगर नावे से जाल जा सकऽ हलइ । हम नदिया के दोसर किनारा पे अपन साथी से पहिले पहुँच गेलूँ, ओज्जा एगो गिरल-पड़ल पेड़ पर बइठ गेलूँ, आउ ओकर इंतजार करे लगलूँ ।

थोड़हीं देर बाद हमरा रस्तावा पर एगो अदमी अइते देखाय देलक । ऊ करीब पाँच बरिस के एगो बुतरू के हथवा से पकड़ले लेले आब करऽ हलइ । ओकन्हीं रसे-रसे पारक के पास आ रहले हल । हमर नगीच अइला पर ऊ अदमिया बोललइ - "नमस्कार, भाय जी !"

"नमस्कार !" हम ओकर बढ़ावल बड़का कमासुत हाथ के दबइलिअइ ।
"बेटे, चाचा जी के नमस्कार कर !" अदमिया बुतरुआ से बोललइ ।

अकास नियन साफ आँख से ऊ बुतरुआ हमर चेहरा तरफ सीधे देखते, मुसकइते, अपन छोटगर ठंढा-ठंढा हाथ बढ़इलकइ । हम हलके से ओकरा दबइलिअइ आउ पुछलिअइ - "की बुड्ढे, तोर हथवा एतना ठंढगर कइसे हको ? रस्ता पर तो गरमी हको, तइयो तूँ ठिठुर गेलऽ ।"

बुतरुआ हमरा तरफ अचरज से देखलकइ ।

"हम कइसन बुड्ढा हकिअइ, चचा ? हम तो एगो बुतरू हकूँ, हम ठिठुरलूँ हँ बिलकुल नयँ, आउ हथवा ठंढा-ठंढा लगब करऽ हइ, काहे कि हम बरफ के गोला बनाब करऽ हलूँ ।"

"की तोहरा मालूम हको भाय साहब, कि नाय कखने हियाँ पहुँचतइ ?" बप्पा पुछलकइ ।
"करीब दू घंटा में । पानी बहुत जादा हकइ । लहर हकइ । नाय खेवे में दिक्कत हकइ ।"
"खैर, कोय बात नयँ । थोड़े बइठ के जिरा लेते जाम, हमन्हीं के कोय जल्दी नयँ हइ । धूम्रपान करे के मन हको ?"

हमन्हीं धूम्रपान करे लगलिअइ, आउ देर तक चुप्पी साधले रहलिअइ । हम बाप आउ बेटा के ध्यान से देखलिअइ । बुतरुआ सीधा-सादा पोशाक में हलइ, लेकिन पोशाक साफ-सुथरा, गरम हलइ, आउ पेन्हावे में सवधानी बरतल गेले हल । बप्पा के आँख से गहरा चिंता झलक रहले हल ।

"तूँ मोर्चा पर गेलऽ हल ?" ऊ अदमी हमरा अचानक पूछ बइठल ।
"हाँ, गेलियो हल ।"
"हमरा तो बहुत कुछ भुगते पड़लो ।", ऊ धीरे से बोलल, "अइका कभी-कभी रात के नीन नयँ आवऽ हके, अन्हरवे में नंगे आँख देखाय दे हके आउ सोचऽ हूँ - ए जिनगी, तूँ हमरा एतना काहे सतइलँऽ ?"
अचानक ऊ बेटवा तरफ देखलकइ आउ दुलार से कहलकइ - "जो बेटा, पनिया भिर खेल गन !"

बेटवा के जइते अपन नजर से देखते ऊ कुछ देर चुप रहलइ आउ फेर बोललइ –
"शुरुआत में हमर जिनगी सामान्य तरह से चल रहल हल । हमर जन्म वोरोनेझ के पास के एगो गाँव में सन् 1900 में होल हल । गृहयुद्ध के दौरान हम लाल सेना में हलूँ । सन् 1922 के भुखमरी के बखत हम कुबान चल गेलूँ, हुएँ काम करे लगलूँ, ओहे से जिन्दा बच गेलूँ, लेकिन माय-बाप भुखमरी के कारण परलोक सिधार गेला । एक बरस के बाद हम कुबान से वापस अइलूँ आउ वोरोनेझ गेलूँ । हम एगो कारखाना में काम करे ल चल गेलूँ । जल्दीए शादी कर लेलूँ । हमर घरवली एगो अनाथालय से हल, ऊ एगो अनाथ हल । ऊ केतना अच्छा हलइ ! बुद्धिमान, प्रसन्न चेहरा, प्यारी । अइसे तिरछे देखे से ऊ ओतना सुन्दर नयँ दिखऽ हलइ, लेकिन हमरा लगी दुनिया में ओकरा से जादे सुन्दर न कोय हल, आउ न कोय होत ।

जल्दीए हमन्हीं के घर बाल-बुतरू पैदा होल । सबसे पहिले एगो लड़का होल, फेर बाद में आउ दू गो लड़की । सन् 1929 में हम मोटरगाड़ी चलाना सीखलूँ । हम डलेवर बनलूँ । अइसहीं दस साल बिता देलूँ, आउ हमरा पतो नयँ चलल कि कइसे ई समय गुजर गेल । हम बहुत काम कइलूँ । हमर जीविका अच्छा से चल रहल हल, आउ हमर जिनगी केकरो दोसरा से खराब नयँ हल । सब बाल-बुतरून भी निम्मन हल । सब्भे बुतरून पढ़े में अच्छा हल । आउ बड़का, अनतोली, तो गणित में एतना सक्षम हल कि राष्ट्रीय समचारपत्र में भी ओकरा बारे लिखल जा हलइ ।

युद्ध के पहिले हम अपना लगी एगो नयका घर बनइलूँ । खाली घर बनइवो कइलूँ त गलत जगह पर, धातुनिष्कर्षण वला प्लांट के पास । अगर हमर घर कहीं आउ जगह होत हल त हमर जिनगी शायद कुछ आउ होत हल ।

युद्ध चालू हो गेलइ । हमरा मोर्चा पर ले जाल गेल । हमरा अपन परिवार के सब लोग अलविदा कइलक - इरिना, अनतोली, आउ बेटियन - नास्तेनका आउ ओल्यूश्का । सब बुतरूअन धीरज धइले हल, कनलइ नयँ, लेकिन इरिना ... ओकरा कहिनो हम अइसन नयँ देखलिअइ । दिन-रात ऊ लोर बहइते रहल ... स्टेशन अइते गेलिअइ, आ ओकरा तरफ देखना असंभव हल - आँख लाल, सारा देह काँप रहल हल, आउ दोहराब करऽ हल, "प्यारे हमर ... अन्द्रूशा ... अब हमन्हीं के फेर कभी भेंट नयँ होत" ...

"तोरा की हो गेलो ह इरिना ?! अइसहीं बिदा कइल जा हइ कि समय के पहिलहीं हमरा दफनाब करऽ हँ ?" हम चिल्लइलूँ । आउ इरिना के तो जनु कुछ नयँ सुनाय देब करऽ हल ... लेकिन हम ओकरा आलिंगन कर लेलिअइ आउ चुम्बन लेलिअइ, बुतरून से बिदा होलूँ, आउ हम गाड़ी के डिब्बा में ... हम ओकरा डिब्बा से देखऽ हूँ, ओकर ठोर उज्जर होल हल, आउ पूरा खुल्लल चौड़गर आँख में आँसू । ओकर ई रूप जिनगी भर हमर याददाश्त में रह गेल ... हम सब यूक्रेन पहुँचलूँ । हमरा गाड़ी देल गेल । ओकरे में हम मोर्चा पर गेलूँ ।

हम कुच्छे समय तक युद्ध कर पइलूँ । सन् 1942 के मई महिन्ना में हम कैद हो गेलूँ, ऊ बखत तेजी से आक्रमण चल रहल हल, आउ अइसन लगल कि हमन्हीं के एगो तोपची इकाई (आर्टिलरी यूनिट) बिन गोला के हके । हमर गाड़ी के लोड कइल गेलइ ... कमांडर पुच्छऽ हका, "जा सकमहीं सोकोलोव ?" एकरा में पुच्छे के की बात हइ ? ... हुआँ सथियन सब मर रहला ह, आउ हम की सोचते बइठम ? "ई कइसन प्रश्न हइ !", हम जवाब देलिअइ, "हमरा जाय के चाही, बस !"

जिनगी में हम कभियो पहिले ई तरह ड्राइव नयँ कइलूँ हल जइसन ई तुरी ! हमरा मालूम हल कि हम आलू नयँ ले जा रहलूँ हँ ... हमरा थोड़हीं दूर आउ जाय के रहल हल । हम ओज्जा मुड़लूँ, जाहाँ पर हमर तोपची इकाई हल । आउ सगरो गोला फट रहल हल ... हम अपन टोली के पास नयँ पहुँच पइलूँ ... विस्फोट ... आउ ओकर बाद की होल, हमरा कुछ आद नयँ । ऊ बखत हम जिन्दा कइसे बच गेलूँ, हमरा समझ में नयँ आवऽ हके । आउ केतना देर तक ऊ रस्ता पर हम पड़ल रहलूँ, हमरा नयँ मालूम ।

जब हम होश में अइलूँ, त हमरा उट्ठे में नयँ बन रहल हल । बहुत देर तक हम पेट के बल सरकलूँ, आउ फेन धीरे-धीरे करके उठलूँ । हमरा कुछ आद नयँ कि हमरा साथ की होल हल । आउ फेर हमरा लेटे में डर लगे कि हम मर जाम, हम उठ नयँ सकम ! फेर हम बेहोश हो गेलूँ, आउ गिर पड़लूँ । जब दोबारा होश में अइलूँ, त हमरा समझ में आल कि हम घिर चुकलूँ हँ । बगल से होके फासिस्ती टैंक गुजर रहल हल । ओकर बाद गोलंदाज फौज (आर्टिलरी) गुजरलइ । अचानक हम देखऽ ही कि हमरा तरफ छो गो सैनिक आ रहल ह । ओकरा में से एगो सब-मशीन-गन छोड़लकइ । "अब की, हमरा मार देलक !", हमर दिमाग में ई बात कौंधल । लेकिन नयँ, ऊ बखत हमरा नयँ मारते गेल । हमर गोड़ से बूट निकाल लेते गेल आउ हथवा से पच्छिम तरफ इशारा करते बोलल, "चल, चल रे काम करे वला जानवर, हमन्हीं हियाँ काम करे खातिर ।" हूँ, त अब की कइल जाय ?! हम निकस के रस्तावा पर अइलूँ, आउ ... पच्छिम तरफ चललूँ, कैदी के रूप में ! हम तो बिलकुल कमजोर हो गेलूँ हल, बहुत धीरे-धीरे चल रहलूँ हल । थोड़े दूर गेलूँ, त हमरा साथे साथ हमन्हीं के एगो बड़गर कैदी के दल के हाँकले जा रहल हल । सबके दस गो सब-मशीन-गन धारी लेले जाब करऽ हल । ओकरा में से एगो हमरा भिर आल आउ हमर मथवा पर मारलक, लेकिन हम नयँ गिरलूँ । अगर हम गिर जइतूँ हल त हमरा तुरते ओकन्हीं जान मार देत हल । आधा घंटा तक हमरा रूसी कैदी लोग मदत करते गेला, हाथ से सहारा देते गेला । बाद में हम खुद चल्ले लायक हो गेलूँ तब हमरा कहते गेला, "चलऽ, लेकिन निच्चे नयँ गिरऽ, नयँ तो ओकन्हीं सीधे जान मार देतो !" हमन्हीं सब देर तक चलते रहलूँ । अगर घायल आउ कमजोर लोग गिर जा हला तो ओकन्हीं मारल जा हला । रात के हमन्हीं एगो छोटगर गाँव पहुँचते गेलूँ । रात गुजारे लगी हमन्हीं के एगो आधा टुट्टल-फुट्टल घर में लावल गेलइ । अइसहीं पत्थल के फर्श पर हमन्हीं रात भर पड़ल रहलिअइ । रतिए के कोय हमरा पुच्छऽ हइ, "साथी, तूँ घायल तो नयँ हकऽ ?" हम ओकरा जवाब दे ही, "भाय, तोरा की चाही ?" ऊ बोलऽ हके, "हम एगो डाक्टर हकियो, शायद हम कुछ मदत कर सकियो ।" हम बतइलिअइ कि हमर कन्हवा में दरद हके । ऊ हमर कन्हवा के टोके जाँच कइलका, मालूम पड़लइ कि हडिया घिसक गेले हल । ऊ एकरा जगह पे बइठा देलका । हम उनका धन्यवाद देलिअइ । फेर ऊ अन्हरवे में आगे बढ़ऽ हका आउ पुच्छऽ हका, "कोय घायलो हकऽ ?" एकरा कहल जा हइ वास्तविक डाक्टर ! ऊ खुद्दे कैदी हके आउ अन्हरवे में अपन बड़का काम कर रहल ह ।

ई रात हमन्हीं लगी बड़ी कष्टकारी हल ।

सुबह में हमन्हीं सब के घरवा के सामने एक लाइन में खड़ी कइल गेलइ । हमन्हीं से पुच्छल गेलइ कि केऽ-केऽ कमनिस हकँऽ, आउ केऽ-केऽ कमांडर । अइसन कोय नयँ हलइ । देशद्रोही तो नयँ कोय हलइ, काहेकि हमन्हीं में से आधा लोग तो कमनिस आउ कमांडर हलइ । लेकिन एकरा बारे कोय नयँ मुँह खोललकइ । खाली चार गो के लेल गेलइ - एगो यहूदी आउ तीन गो रूसी के । रूसी लोग के ई अधार पर लेल गेलइ कि ओकन्हीं के केश कार हलइ आउ यहूदी जइसन दिखऽ हलइ । ओकन्हीं के गोली मार देल गेलइ । आउ हमन्हीं के हाँक के आगे ले जाल गेलइ । हमन्हीं के पोज़्नान लावल गेलइ, जाहाँ कैंप हलइ ।

देखऽ भाय, हम पहिलहीं दिन से निकस भागे के फैसला कर लेलूँ हल, मगर हमरा जोक्खा नयँ मिलल । आउ एक तुरी, मई के अन्त में, मरलकन कैदियन खातिर हमन्हीं के जंगल के पास में कबर खोदे लगी भेजल गेलइ । हम कबर खोद रहलूँ हल, खोदते बखत देखऽ हूँ कि दू सैनिक खाय लगी बइठ गेल, आउ तेसर रौदा में झुक्कब करऽ हइ । हम चपड़ा फेंक देलूँ आउ चुपके से पेड़ के पीछू चल गेलूँ ... आ बाद में तेजी से सीधे पुरुब तरफ । हमरा काहाँ से शक्ति मिल्लल कि करीब चालीस किलोमीटर तक हम भाग के तय कर लेलूँ, हमरा नयँ मालूम ।  लेकिन हाँ, एकरा से हमरा कोय फयदा नयँ होल, काहेकि चौठा दिन जब हम कैंप से ढेर दूर हलूँ, हम पकड़ा गेलूँ । कइए गो कुत्ता हमर पीछू लग्गल हल, जे हमरा खोज लेलक । दू मोटरसाइकिल पर जर्मन लोग हमरा तरफ आ रहल हल । शुरुआत में तो खुद्दे ओकन्हीं हमरा पिटलक, फेनुँ कुतवन के हमरा तरफ छोड़ देलक । आउ हमर देह से खाली मांस टुकड़े-टुकड़े निकसे लगल । खून से लथपथ हमरा वापस कैंप में लावल गेल । ई सब आद आवऽ हके त हम काँप उठऽ हूँ, .. लेकिन फेर हम जिन्दा बच गेलूँ ।

2

कैद के दौरान हमरा काहाँ-काहाँ हाँकके नयँ ले जाल गेल ! आधा जर्मनी हम तय कइलूँ - हम सैक्सोनी में रासायनिक फैक्टरी में काम कइलूँ, रूर में खदान में, बवारिया में जमीन के खुदाई के काम में, त्यूरिंगेन में भी काम कइलूँ । मौसम तो हुआँ, भाय, सगरो अलग-अलग तरह के हकइ, लेकिन सगरो हमन्हीं के पिटाई एक्के रंगन होल । पिटाय ई चलते होल कि हम सब रूसी हलूँ, कि हम सब ई दुनिया में अभी तक जिन्दा हलूँ, कि हम सब ओकन्हीं लगी काम करऽ हलूँ । आउ खिलइवो करऽ हल सगरो एक्के रंगन - डेढ़ सो ग्राम एरज़ात्स-ब्रेड (कृत्रिम पावरोटी), आउ पनगर शोरबा (सूप) । कहीं-कहीं गरम पानी मिल्लऽ हल, त कहीं-कहीं नयँ । युद्ध चालू होवे के पहिले हमर वजन हले छियासी किलो, आ सन् 1944 में पचास किलो से जादे नयँ रहल - हमर देहिया में खाली हड्डी पर चमड़ी रह गेल हल !

सितम्बर के शुरू में हमन्हीं के ड्रेसडेन के पास के कैंप में ले जाल गेल । ऊ बखत कैंप में हमन्हीं करीब दू हजार लोग हलिअइ । सब्भे सुबह से साँझ तक पत्थर के खुला खान में काम करते जा हलिअइ । काम बहुत कठिन हलइ, आउ लोग कमजोर । दू महिन्ना के बाद हमन्हीं के दल में के एक सो बियालिस लोगन में खाली सनतामन गो बचलिअइ ।

एक दिन साँझ के जब हम काम से वापिस अइलिअइ, त दुभाषिया के साथ दूगो सैनिक अइलइ । "तोहन्हीं में सोकोलेव अन्द्रेय के हकँऽ ?" - "हम ।" - "चल, तोरा हेर कमाण्डेंट (Herr Commandant) बोला रहलथुन ह ।" साथी सब के अलविदा कहलूँ - सब कोय जानऽ हला कि हम तो पक्का मौत के सामना करे जा रहलूँ हँ, आउ हम चल पड़लूँ । कैंप तरफ जा रहलूँ हँ आउ सोच रहलूँ हँ - "त ई तोर अन्त हकउ अन्द्रेय सोकोलोव, कैदी नम्बर 331" । हमरा तरस आल - इरिना पर, बुतरुअन पर ...

कमाण्डेंट के कोठरी में पाँच अदमी बइठल हलइ - वोदका पीयब करऽ हलइ आउ चरबी खाब करऽ हलइ । देखऽ हूँ कि ठीक हमरा सामने कमाण्डेंट म्यूलर बइठल हके, आउ हमरा तरफ साँप नियन देखब करऽ हके ।

हम बोलऽ हूँ, "युद्धबन्दी (prisoner-of-war) अन्द्रेय सोकोलोव अपने के आदेश के अनुसार उपस्थित !" म्यूलर हमरा पुच्छऽ हइ, "तूँ बोललँऽ हल कि तोहन्हीं के मानदंड (standard) बड़गर हकउ ?" - "हाँ, बिलकुल एहे बात बोललिए हल, हेर कमाण्डेंट !"

ऊ उठ गेलइ आउ बोलऽ हइ, "तोरा हम अइसन शब्द बोले खातिर अभिये शूट कर देबउ । चलते चल आँगन में !"

फेर ऊ थोड़े देर खड़ी रहके सोचलक, पिस्तौल रख देलक आउ एक गिलास में वोदका ढारलक, पावरोटी के एगो टुकड़ा लेलक आउ ओकरा पर चरबी के एगो टुकड़ा डाललक आउ ई सब हमरा देते बोलल, "अपन मौत के पहिले ले एकरा पी, हमर जीत के खुशी में !"

हम तो पहिले ले लेलिअइ, लेकिन बाद में अपना बारे सोचऽ हिअइ, "कीऽ हम रूसी सैनिक होके ओकन्हीं के जीत के खुशी में पीऊँ ?! आउ कुछ नयँ चाही, हेर कमाण्डेंट ?!"

हम गिलास, आउ चरबी सहित पावरोटी के टेबुल पर रख देलिअइ, आउ बोललिअइ, "धन्यवाद, लेकिन हम नयँ पीयम ।" ऊ मुस्कइलइ आउ बोललइ, "हमन्हीं के जीत के खुशी में नयँ पीये ल चाहऽ हँ ? त अपन मौत खातिर पी !" - "ठीक हइ, हम अपन मौत के खातिर पीयम !" आउ हम गिलसवा ले लेलिअइ, आउ पी गेलिअइ ।

ऊ हमरा तरफ थोड़े देर ध्यान से देखलकइ आउ बोलऽ हइ, "अपन मौत के पहिले कुछ खा ले !" आउ हम ओकरा जवाब दे हिअइ, "पहिला गिलास के बाद हम कुछ नयँ खाहूँ ।" त ई तरह से हम तीन गिलास पीलूँ । लेकिन हम कुछ खइलूँ नयँ - अपन गौरव के सुरक्षित जे रक्खे ल चाहऽ हलूँ । एकर बाद कमाण्डेंट टेबुल के पीछे से बाहर निकसलइ आउ बोलऽ हइ, "सोकोलोव, तूँ एगो सच्चा सैनिक हकँऽ । हमहूँ सैनिक हकूँ आउ योग्य शत्रु के भी हम आदर करऽ ही । हम तोरा शूट नयँ करबउ । कल्हे हमन्हीं के सेना के वोल्गा पर विजय प्राप्त होलइ । ई हमन्हीं लगी बड़गो खुशी के बात हइ, ओहे से हम तोरा जीवनदान दे हिअउ । जो !" आउ ऊ हमरा पावरोटी आउ चरबी भी देलक । हम चरबी सहित पावरोटी लेलूँ आउ बाहर निकसके आँगन में चल अइलूँ । धीरे-धीरे हम बैरक में पहुँच गेलूँ । हम बिलकुल कमजोर हलूँ, बहुत भुक्खल, आउ तीन गिलास वोदका पी लेलूँ हल । ... हम बैरक में घुसलूँ आउ फर्श पर गिर पड़लूँ । जब हम होश में अइलूँ, तब अपन लोग के सब कुछ बतइलूँ । पावरोटी आउ चरबी सब्भे में बराबर-बराबर बाँटल गेलइ । हरेक के थोड़े-थोड़े सन मिललइ, लेकिन मिललइ सब्भे के ।

बाद में हमन्हीं के रूसी प्रान्त में ही खदान में काम करे खातिर ले जाल गेल । हुआँ हम सन् 1944 तक रहलूँ । एक दिन हमन्हीं के एक लाइन में खड़ी कर देल गेल, आउ चीफ-लेफ्टेनेंट एगो दुभाषिया के मदत से बोलऽ हइ, "तोहन्हीं बीच जे कोय सेना में, चाहे युद्ध के पहिले ड्राइवर के काम कइल होवे - एक कदम आगू !"

अइसन सात अदमी हलइ । हमन्हीं सब के पोत्सदाम (Potsdam) ले जाल गेल । हम गाड़ी में इंजीनियर-मेजर के घुमावऽ हलूँ । दू सप्ताह तक तो हम अपन मेजर के पोत्सदाम से बेर्लिन तक ले जा हलूँ आउ फेर वापस । आउ एक दिन ओकरा मोर्चाबन्दी के निर्माण के काम खातिर फ्रोंट-लाइन (सेना के ऊ टुकड़ी जे युद्ध में सबसे आगू यानी शत्रु के सबसे नगीच होवऽ हइ) पे भेज देवल गेलइ । आउ हिएँ हम दोबारा निकस भागे के फैसला कर लेलूँ । हमन्हीं पोलोत्स्क (Polotsk) शहर अइते गेलूँ । सुबह में हम पहिले तुरी सुनलूँ कि हमन्हीं के गोलन्दाज फौज (आर्टिलरी) कइसन धमाका कर रहल ह । हमर दिल तो तेजी से धड़के लगल । आउ तब हम अपना तरफ, यानी अपन देश तरफ, भाग निकसे के फैसला कर लेलूँ, लेकिन अकेल्ले नयँ, बल्कि ई इंजीनियर के साथ लेके ।

29 जून के सुबहे हमर मेजर देहात में ले चले के हुकुम देलक । हुआँ ऊ मोर्चाबन्दी के निर्माण के संचालन कर रहले हल । हमन्हीं निकसलिअइ । जर्मन पीछू में झुक्के लगलइ । शुरू में हम गाड़ी तेजी से चला रहलूँ हल, लेकिन शहर के बाहर हम गाड़ी के रोकलूँ । छोटका दरवजवा खोललूँ, मेजर के सिर पर प्रहार कइलूँ, लेकिन मर जाय जेतना नयँ, हम ओकरा जिन्दा अपना तरफ ले जाय ल चाहऽ हलूँ । ओकर पिस्तौल ले लेलिअइ, जर्मन वरदी पेन्ह लेलिअइ, जेकरा पहिलहीं से अइसन परिस्थिति खातिर तैयार करके रख लेलूँ हल, आउ गाड़ी मोर्चा से होके दौड़इलूँ । हमरा कोय रोकलकइ नयँ, काहेकि देखते गेलइ कि हम जर्मन मेजर के लेले जा रहलिए ह, आउ खुद हम जर्मन वरदी में हकिअइ । बाद में हमरा पर दुनहूँ तरफ से (मतलब पीछू से जर्मन आउ आगू से रूसी सैनिक) गोली चलावे लगलइ, लेकिन हम गाड़ी भगइतहीं चल जा रहलूँ हल । हमरा तरफ स्वदेशी लोग दौड़के अइते गेला, हम ओकन्हीं के सब कुछ बित्तल बात बतइलिअइ ... बाद में साँझ के हमरा रेजिमेंट के कमांडर के पास लावल गेलइ । कमांडर टेबुल के पीछे उठ खड़ा होला, हमरा तरफ अइला, हमरा आलिंगनबद्ध कर लेलका, आउ बोलऽ हका, "धन्यवाद सैनिक ! तूँ तो हमन्हीं खातिर बहुत सुन्दर उपहार लइलऽ ह । तोहर मेजर आउ ओकर बेग - बेशकीमती उपहार हकइ । आउ तूँ, सैनिक, आझे अस्पताल जइबऽ । तोहर इलाज होतो, जरी अराम करिहऽ, आउ फेर अपन परिवार से मिल्ले जइबऽ, ओकर बाद फेर हमन्हीं हीं वापस अइबऽ ।"

अस्पताल से तुरते हम इरिना के चिट्ठी लिखलूँ । दू सप्ताह तक हम सुतलूँ आउ खइलूँ । आउ दू सप्ताह के बाद हमरा अनाज नयँ धँसे । घर से कोय जवाब नयँ, आउ तब हमर मन भारी हो गेल । तीन सप्ताह के बाद वोरोनेझ से चिट्ठी मिलल । लेकिन हमरा इरिना नयँ लिखलक हल, बल्कि हमर पड़ोसी इवान तिमोफ़ेयेविच । भगमान केकरो अइसन चिट्टी मिल्ले के मौका नयँ दे ! ऊ हमरा सूचित कइलक हल कि "सन् 1942 के जूने में फासिस्ती लोग धातुनिष्कर्षण के प्लांट पर बमबारी कइलक हल । आउ एक बम सीधे हमर घर पर गिरल हल । इरिना आउ दुन्नु लड़कियन ऊ बखत घरवे पर हल । ऊ सब्भे मर गेल । आउ अनतोली बमबारी के बखत शहर गेल हलइ । ऊ साँझ के घर अइलइ, आउ सब कुछ देखलकइ । आ रतिया के फेर शहर चल गेलइ । जाय के पहिले ऊ पड़ोसी के सूचित कइलके हल कि ऊ अर्जी देतइ कि मेहरबानी करके ओकरा मोर्चा पर भेज देवल जाय । बस !"

एतना कहके अदमी चुप हो गेल । ऊ बोल नयँ पा रहले हल । ओकर दम घुट रहले हल । लेकिन चुप रहना मोसकिल हलइ । ऊ फेर बोलना चालू कइलकइ - "तब हमरा छुट्टी मिल गेल । एक सप्ताह के बाद हम वोरोनेझ में हलूँ । पैदल हम ऊ जगह गेलूँ जाहाँ हमर घर हल, जाहाँ हमर प्यारा लोग रहऽ हल । थोड़े देर हम हुआँ ठहरलूँ आउ वापस टीसन तरफ रवाना हो गेलूँ । हम हुआँ ठहर नयँ पइलूँ, ओहे दिन हम वापस रेजिमेंट चल गेलूँ । 

“लेकिन करीब तीन महिन्ना बाद फेर सौभाग्य मुस्कुराल । हमर अनतोली मिल गेल । हमरा मोर्चा पर एक दोसर मोर्चा से चिट्ठी भेजलक हल । हमर पता ओकरा पड़ोसी से मिलले हल । हमरा लिखलक हल कि ऊ आर्टिलरी स्कूल के पढ़ाय पूरा करके मोर्चा पर चल गेल हल, आउ अभी ऊ कप्तान हकइ, ओकरा छो-छो पदक (ऑर्डर) मिल चुकले ह ।

“आउ हम सपनाय लगलूँ - युद्ध समाप्त होत, बेटा शादी करत, आउ हम ओकरा साथ रहम, पोतवन-पोतियन के देखभाल करम ...
“लेकिन अइसन कुछ वास्तव में नयँ होल ।
“नो मई के सुबह में, विजय दिवस के, फासिस्ती सब-मशीन-गन धारी हमर अनतोली के मार देलक ।

“अब हम एगो सपना नियन आद करऽ हूँ कि कइसे हम ऊ रेजिमेंट गेलूँ, जाहाँ हमर अनतोली सेवा में कार्यरत हल । हमरा आद आवऽ हके कि हम कबर तक गेलूँ । हमर बेटा हुआँ लेटल हल, लेकिन हम्मर नयँ । हम्मर तो हँसमुख चेहरा वला बुतरू हल, लेकिन हियाँ तो लेटल हलइ एगो युवक, सुन्दर अदमी । हम ओकरा चुम्बन लेलूँ आउ हुआँ से हट गेलूँ । रेजिमेंट के कमांडर भाषण देलकइ । साथीगण - हमर अनतोली के दोस्त लोग - लोर पोंछ रहला हल, लेकिन हमर आँख में तो लोरे नयँ हल । हमर लोर तो दिले में रह गेल । शायद ओहे से ऊ अभियो तकलीफ दे हके ।

“ऊ अनजान जगह पे हम अपन अन्तिम खुशी आउ आशा के दफना देलूँ ...

“सेना से हमरा जल्दीए निवृत्त कर देल गेल । अब हम काहाँ जइतूँ हल ? वोरोनेझ - बिलकुल नयँ जा सकऽ हलूँ ! हमरा आद आल - उर्युपिंस्क में हमर दोस्त रहऽ हके । ऊ कभी हमरा अपना हीं आवे लगी कय तुरी कहलक हल । हम उर्युपिंस्क चल गेलूँ । हमर दोस्त आउ उनकर घरवली हमर स्वागत कइलका । हम उनकन्हीं साथे रहे लगलूँ । हम ड्राइवर के काम करे लगलूँ । आउ एक दिन हम अपन नयका बेटा से परिचित होलूँ, मतलब एकरा से ।” एतना कहके ऊ प्यार भरल नजर से बुतरुआ के तरफ देखलकइ ।

"एक दिन ई उष्णगृह (ग्रीन-हाउस) के भोजन-कक्ष में एकरा पर हमर नजर पड़लइ - बिलकुल लेटल-पेटल आउ दुबराल हलइ । हम गाड़ी से ओकरा तरफ चिल्लइलिअइ - 'ए वन्यूश्का ! बइठ जल्दी से गाड़ी में, हम दुन्नु टीसन जाम आउ हियाँ फेर वापस आम, साथे में खाना खाम !' ऊ दौड़के अइलइ - 'लेकिन चाचा, तोरा कइसे मालूम पड़लो कि हमर नाम वान्या हकइ ?' आउ अँखिया फाड़के हमरा तरफ देखलकइ, इंतजार कइलकइ कि हम की जवाब दे हिअइ । हम ओकरा जवाब देलिअइ कि ‘हमरा सब कुछ मालूम हके ।’

“ओकरा हम अपन पास में बइठइलूँ आउ चल पड़लूँ । उ उदास बइठल हल, हमरा तरफ एकटक देख रहल हल, आउ उच्छ्वास ले रहल हल । ‘ई छोट्टे गो चिरईं - आउ उच्छ्वास लेवे ल सीख गेल ह ! की ई काम ओकरा जइसन बुतरू के हइ ?!’ हम सोचऽ ही ।

"तोर बाऊ काहाँ हथुन, वान्या ?" हम पुछलिअइ ।
"मोर्चा पर मर गेलथन ।"
"आ मइया ?"
"मइयो मर गेल, जब हमन्हीं रेलगाड़ी में सफर कर रहलिए हल ।"
"आ तोहन्हीं काहाँ जा रहलऽ हल ?"
"मालूम नयँ, हमरा आद नयँ ।"
"आउ तोर कोय रिश्तेदार हकउ ?"
"नयँ ।"

“हम ओकरा तरफ देखलूँ । हमर दिल सिकुड़ गेल । आउ तुरते हम फैसला कर लेलूँ कि एकरा हम बेटा बनाके रक्खम ! आ तुरते हमर दिल में शांति आउ एक प्रकार के चमक अनुभव होल ।
"वन्यूश्का, आ तोरा मालूम हउ कि हम केऽ ही ?" हम ओकरा पुच्छऽ ही ।
“ऊ धीरे से जवाब दे हइ – ‘केऽ ?’
“आउ हमहूँ ओकरा धीरे से जवाब दे हिअइ – ‘हम तोर बाऊ हकिअउ ।’
“हे भगमान ! ई बात के की असर होलइ ?!

“हमर कन्हवा से लिपट गेलइ, हमरा चूम रहल ह, आउ खुद चिल्लाके बोलऽ हके – ‘बाऊ ! हम जानऽ हलूँ, हम जानऽ हलूँ कि तूँ हमरा खोज लेबऽ ! हम बहुत इंतजार कर रहलूँ हल कि तूँ हमरा जरूर खोज लेबऽ !’

“ऊ कन रहल ह, आउ हमरो आँख में अन्हेरा छाल ...
“त ई तरह से हम अपन नयका बेटवा के घर लइलूँ । ओकरा हम नहलइलूँ-धोलूँ, आउ टेबुल के पीछू बइठइलूँ । हमर दोस्त के घरवली खड़ी रहल, खड़ी रहल, वन्यूश्का तरफ देखते रहल आउ रो पड़ल ।

“आ ऊ देखलक कि ऊ कन्नब करऽ हका, त ऊ दौड़के उनका भिर गेल आउ बोलऽ हइ – ‘चाची, तूँ काहे लगी कन्नऽ ह ? बाऊ हमरा खोज लेलका । ई तो सबके खुशी मनावे के बात हकइ, आउ तूँ कन रहलऽ ह !’

“खाना खइला के बाद हम ओकरा सैलून लेके गेलूँ, ओकर बाल कटवइलूँ, आउ फेर ओकरा सुता देलूँ । आ खुद तेजी से बजार गेलूँ, ओकरा लगी खरीदलूँ कमीज, पयजामा, ओवरकोट ... ओकरे साथे हम सुत गेलूँ आउ पहिले तुरी शान्ति से सुतलूँ । हमरा ओकरा साथ रहे के आदत पड़ गेल, ओकरा बगैर हम बोर हो जा हलूँ । रतिया के ओकरा तरफ एकटक देखूँ, त हमर दिल थोड़े हलका हो जाय, जे दुख के मारे पत्थल हो गेल हल । एक तुरी हम ओकरा साथे सुत्ते खातिर पड़लूँ, त ऊ गंभीरतापूर्वक हमरा तरफ देखके पुच्छऽ हके – ‘बाऊ, आ चमड़वा वला तोर कोटवा की होलो ?’ आ हमरा पास तो जिनगी में कभी चमड़ा के कोट हइए नयँ हल ! लेकिन ओकरा से कहलिअइ – ‘वोरोनेझ में रह गेलइ ।’ – ‘आ हमरा खोजे में एतना लम्मा समय काहे लगलो ?’ हम ओकरा जवाब देहूँ – ‘बेटा, हम तोरा जर्मनी में खोजलूँ, पोलैंड में खोजलूँ, आउ पूरा बेलारूसिया में पैदल चलके आउ गाड़ी से घूम-घूम के तोरा खोजलूँ, आ तूँ मिललँऽ उर्युपिंस्क में !’

"आ उर्युपिंस्क जर्मनी से नगीच हकइ ? आ पोलैंड हमन्हीं के घरवा से बहुत दूर हकइ ?" त सुत्ते के पहिले हमन्हीं अइसहीं गपशप करते रहलूँ । आउ कोटवा के बारे पुच्छे के कोय अधार हलइ । एकर मतलब हइ कि ओकर  असली बाप वास्तव में चमड़ा के कोट पेन्हऽ हलइ ।

"अइसीं हम एक बरस तक उर्युपिंस्क में रहलूँ । आउ अब हम ओकरा साथ कशारी जा रहलूँ हँ, अपन दोसर दोस्त के पास । ऊ बहुत बार हमरा अपना हीं आवे लगी बोला रहला ह, हुआँ कुछ समय हम अपन बेटा के साथ रहम । एक्के जगह पर हमरा जादे देर तक ठहरना अच्छा नयँ लगऽ हके । लेकिन जब वन्यूश्का इस्कूल जाय लगत, त हमरा एक जगह स्थिर से रहीं पड़त ।"

एहे समय नाय पहुँच गेलइ । ऊ अनजान अदमी, जे अब हमर बहुत नगीच बुझा रहल हल, उठ गेल आउ लकड़ी जइसन कठोर अपन बड़का हाथ हमरा तरफ बढ़इलक ।
"अलविदा, भाय साहेब ! शुभकामना !"
"आउ तोहर कशारी के शुभ यात्रा !"
"धन्यवाद ! … ए बेटे, चल नाय में बइठल जाय !"

बुतरू अपन बाप भिर दौड़के आल, आउ साथ-साथ जाय लगल । देर तक हम ओकन्हीं के निहारते रहलूँ ।
दू व्यक्ति, युद्ध में सब कुछ गँवावल, बिन घर आउ परिवार के ।
ओकन्हीं के भविष्य में कीऽ इंतजार कर रहले ह ?

हमर विचार हइ कि ई बहादुर रूसी अदमी सहनशील होतइ, आउ अपन बाप के कन्हा के बल से एगो नयका अदमी बनतइ, जे बड़ा होके सब कुछ सहन करे में सक्षम होतइ, अपन रस्ता में आल सब कठिनाई पर जीत हासिल करतइ, अगर मातृभूमि ओकरा पुकारतइ ।