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Sunday, December 21, 2014

3. मगही फिल्म "अजगुत जोधा" के 2 जनवरी 2015 के उद्घाटन

मगही फिल्म "अजगुत जोधा" के 2 जनवरी 2015 के उद्घाटन

पोस्टर में ई मगही फिल्म के "पहिला मगही फिल्म" घोषित कइल गेले ह । लेकिन मगही के पहिला फिल्म हइ "भइया" (1964) आउ दोसर फिल्म के नाम हइ "मोरे मन मितवा" (1965) । ओकर बाद अभी तक कोय मगही फिल्म नयँ बनले ह ।

फिल्म "भइया" के बारे कुछ आउ सूचना हियाँ हकइ -


 



Saturday, December 25, 2010

बिहार के प्रथम फिल्मकार और मगही फिल्म के निर्माता गिरिश रंजन

dated: 16-09-2010
[ इसी साक्षात्कार के कुछ उद्धृत अंश -

प्रश्न. आपकी पहली फिल्म कौन सी थी ?

उत्तर. मैंने पहली फिल्म बनाई मगही में जिसका नाम था “मोरे मन मितवा” l कुल मिला कर मगही में दो ही फिल्म बनी है l

प्रश्न. बिहार के सामान्य ज्ञान की किताबों में आपकी चर्चा बिहार के प्रथम फिल्मकार के रूप में है l क्या इससे आपको गर्व महसूस नहीं होता है?

उत्तर. जी, मैंने तो किताब ही नहीं देखी है, आप बता रहे हैं तो मुझे अभी पता चला l बिहार में फिल्म का इतिहास बहुत पुराना है, मैं ये क्रेडिट लेना नहीं चाहता l ऐसी बात नहीं है l राजा द्रोण ने 1934 में फिल्म बनाई, उसके बाद मैंने फिल्म बनायी l ये अलग बात है कि उनकी फिल्म और मेरी फिल्मों में आसमान जमीन का अंतर है l
..................

प्रश्न. इन दिनों बिहार में भोजपुरी फिल्में काफी बन रही हैं l उन फिल्मों की गुणवत्ता के बारे में आपकी क्या राय है ?

उत्तर. बोगस है l भोजपुरी फिल्में लोग पंजाब में, हरियाणा में देखते हैं क्योंकि उनका अपना लगाव है लेकिन इनको standardise नहीं किया जा रहा l मैंने कहीं पढ़ा है कि लगभग 200 फिल्में बनती हैं भोजपुरी भाषा में एक साल में l लेकिन अगर यही फिल्में बिहार में बने तो बिहार के कलाकार, बिहार के टेक्नीशियन सारे लोग अपनी पहचान बनाने में सक्षम होंगे l लेकिन उनका स्तर अभी बहुत ही घटिया है l अभी क्षेत्रीय फिल्मों, जैसे बांग्ला, तमिल, तेलगु का स्तर ग्रहण करने में बहुत वक्त लगेगा l]

करियर और अपनी संस्कृति को अलग नहीं कर सकता: गिरीश रंजन

Interviewer: राजेश कुमार
Interviewee: गिरीश रंजन

(15 जून, 1934 ई. को पंछी, शेखपुरा में स्व. अलख नंदन प्रसाद जी के घर बालक गिरीश रंजन का जन्म हुआ l छ: भाई-बहनों में सबसे बड़े गिरीश रंजन ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद ही फिल्मों की दुनिया को अपना कैरियर चुना l प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे, मृणाल सेन, तरुण मजूमदार, तपन सिन्हा आदि के साथ काम करते हुए उन्होंने सफलता की बुलंदियों को छुआ l सन् 1975 में गिरीश रंजन ने ‘डाक बंगला’ फिल्म का निर्माण एवं निर्देशन किया जिसे ‘बेलग्रेड फिल्म फेस्टिवल’ में आधिकारिक प्रविष्टि मिली l 1978 में इनकी फिल्म आई ‘कल हमारा है’ जो पूरी तरह बिहार के कलाकारों एवं तकनीशियनों के सहयोग से बनी फिल्म थी l मूलतः डाक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाने वाले गिरीश रंजन बिहार की भूमि एवं संस्कृति को पूर्णत: समर्पित हैं l ‘वि रासत’ एवं ‘बिहार इतिहास के पन्नों में’ इनकी चर्चित डाक्यूमेंट्री फ़िल्में हैं l बिहार के प्रति इनका लगाव इस कदर है कि पैसा और ग्लैमर भी इन्हें मुंबई नहीं खींच पाया l सुधि पाठकों के समक्ष गिरीश रंजन जी से राजेश कुमार की बात-चीत प्रस्तुत हैl)

प्रश्न. आपका फ़िल्मी जीवन काफी लंबा है l जीवन के इस पड़ाव पर आप कैसा महसूस करते हैं ?

उत्तर. एक लंबे दौर से फिल्म निर्माण से मैं जुड़ा हुआ हूँ और उसके बाद जिन्दगी की बात जब सोचता हूँ, खाता हूँ, पीता हूँ, तो फिल्म की ही बात सोचता हूँ, सोता हूँ तो फिल्म में ही सोता हूँ और भगवान ने अगर शक्ति दी तो और भी फ़िल्में बनाऊंगा l

प्रश्न. क्या आप अपने जीवन, अपनी फ़िल्मी कैरियर से संतुष्ट हैं ?

उत्तर. हाँ बिल्कुल, इसमें कोई दो मत नहीं है l

प्रश्न. क्या वजह थी फिल्मों के प्रति आकर्षण का ? क्या आपने ग्लैमर और पैसे की ललक में फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश किया ?

उत्तर. नहीं ऐसी बात नहीं है l देखिये, जिस जमाने में मैंने फिल्म ज्वाइन किया था, फिल्म से मैं जुड़ा था, उस जमाने में फिल्म दो लाख की बनती थी और अच्छी फ़िल्में बनती थी l पैसे की ललक ने हमको बहुत ज्यादा आकर्षित नहीं किया l उसका कारण यह है कि देखिए मै एक अत्यंत ही भावुक किस्म का आदमी हूँ l शायद इसका कारण, मेरा पारिवारिक परिवेश भी हो सकता है; हमने अपने पिताजी को मात्र 16 वर्ष की उम्र में खो दिया l बड़ी कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई-लिखाई हुई l अगर एक संवेदनहीन व्यक्ति है तो वो रचनाकार हो ही नहीं सकता है l मेरे पास यही साधन है कि मैं बहुत ही संवेदनशील इंसान हूँ l और मैं एक–एक फिल्म को देख करके अत्यंत ही द्रवित होता था, रोता था सिनेमा हॉल में बैठकर के आंसू पोंछता था और तब मुझे लगता था कि मेरे अंदर की जो संवेदनाएं हैं उन्हें अंतत: अगर अभिव्यक्ति मिल सकती है तो उसका एकमात्र माध्यम सिनेमा ही है l

प्रश्न. क्या हम आपके इस तर्क से यह स्थापना दे सकते हैं कि भावना एवं कला में अन्योन्याश्रय संबंध है ?

उत्तर. जैसा कि मैंने कहा कि एक संवेदनहीन व्यक्ति है तो वह कभी कलाकार नहीं बन सकता, दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं l अब इस पर निर्भर करता है कि आप किन विधाओं में अपनी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं l

प्रश्न. आपने सत्यजीत रे के साथ काम किया है, जो बड़े महान फिल्मकार है, उनको ऑस्कर अवार्ड से भी नवाजा गया है l इनके अलावा आपने और किन-किन फिल्मकारों के साथ काम किया है ?

उत्तर. मेरा यह सौभाग्य रहा है कि उन दिनों के गिने- चुने topmost फिल्मकार थे उनके साथ काम किया है l सत्यजीत रे के अलावा मृणाल सेन, तपन सिन्हा, ऋषिकेश मुखर्जी, तरुण मजुमदार, राजेन्द्र दा इत्यादि महान फिल्मकारों के साथ काम करने का अवसर मिला है l

प्रश्न. आपने बहुत सारे अच्छे-अच्छे फिल्मकारों के साथ काम किया जैसे सत्यजीत रे, मृणाल सेन आदि l उस जमाने के फिल्मकार और आज के फिल्मकारों में क्या अंतर महसूस करते हैं ?

उत्तर. दृष्टीकोण का फर्क है l बांग्ला फिल्मों को छोड़े हुए एक अरसा गुजर गया लेकिन मेरी अपनी अनुभूति यह कहती है कि आज जब मैं बांग्ला फिल्मों को देखता हूँ तो बहुत ही स्तरहीन फ़िल्में दिखाई पड़ती हैं l और वह अच्छा नहीं है l क्यूँ ऐसा हो गया ? फिल्म की एक सबसे बड़ी बात यह है कि फिल्म एक बहुत ही costly मीडिया है l यह कथाकारों की तरह या चित्रकारों की तरह नहीं कि कैनवास लाया और उसे रंगों में सजा दिया l फिल्म में तो लाखों-लाख रुपया लगता है l और जब तक कि आपकी पटकथा बहुत तगड़ी और अच्छी न हो तब तक फिल्म के चलने और न चलने के बीच की जो दुविधा है वह दुविधा बरक़रार रहती है और आदमी compromise करता है और compromise करके हल्की फ़िल्में बनाता है ताकि गंभीर चिंतन की आवश्यकता दर्शकों को न हो l यही कारण है कि फिल्म का स्तर गिरता चला जाता है l

प्रश्न. साठ-सत्तर के दशक में अधिकतर कलात्मक फिल्में बना करती थीं लेकिन आज इक्कीसवी सदी में जो फिल्मे बन रही हैं उन पर तकनीक काफी हावी होता जा रहा है l आप क्या ये महसूस करते हैं कि तकनीकी विकास ने कलात्मक पक्ष को कहीं पीछे छोड़ा हैं ?

उत्तर. नहीं, मैं तो उल्टा ही कहूँगा कि तकनीकी विकास एक कलाकार की पूरी जो दृष्टि है उसे अच्छी तरह जागृत करती है l उसका कारण है l अगर तकनीक की बात करें तो आप महाभारत सीरियल को ही ले लीजिए l आज आप भले ही उसे DVD पर देख लें लेकिन जिस समय यह धारावाहिक छोटे परदे पर आ रहा था पूरा शहर वीरान हो जाता था l आज भी अच्छी फिल्में बन रही हैं जैसे अभी मैंने परसों ही देखा है ‘पीपली लाइव’ लगा कि एकदम ही सामाजिक फिल्म है l अगर आपने नहीं देखा है तो देख लीजिए कि कैसे ग्रामीण कलाकार, नए-नए लोग हैं और अच्छी फिल्म बनी है l तो विषयों का जो चुनाव है, यह दुर्भाग्य है हमारा कि हम ग्लैमरस फ़िल्में ज्यादा बनाते हैं, बनाते रहेंगे लेकिन कुछ फ़िल्में अभी भी हैं जो बढ़िया, अच्छी बन कर के आ रही हैं l तो जहाँ तक तकनीक का जो प्रश्न है, यह तकनीक अच्छी तरह से इस्तेमाल करने के बाद वह फिल्म में चार-चाँद लगा देता है l

प्रश्न. आज के फिल्मकारों में कौन फिल्मकार या कौन कौन सी फिल्मों से आप बहुत प्रभावित महसूस करते हैं ?

उत्तर. देखिए, ऐसा है कि नाम तो मै बहुत भूलता हूँ लेकिन जैसे WEDNESDAY फिल्म आई थी, आप उस फिल्म को देखें, बहुत ही अच्छी फिल्म बनाई है l इसी तरह से “रंग दे बसंती”, फिर हॉकी पर जो फिल्म बनी “चक दे इंडिया” ये सब कितनी अच्छी फिल्में हैं l इस तरह से और भी हैं l अंत में “पीपली लाइव” को देख लीजिए आप, बहुत अच्छी फिल्म बनाई है l

प्रश्न. आपकी पहली फिल्म कौन सी थी ?

उत्तर. मैंने पहली फिल्म बनाई मगही में जिसका नाम था “मोरे मन मितवा” l कुल मिला कर मगही में दो ही फिल्म बनी है l

प्रश्न. बिहार के सामान्य ज्ञान की किताबों में आपकी चर्चा बिहार के प्रथम फिल्मकार के रूप में है l क्या इससे आपको गर्व महसूस नहीं होता है?

उत्तर. जी, मैंने तो किताब ही नहीं देखी है, आप बता रहे हैं तो मुझे अभी पता चला l बिहार में फिल्म का इतिहास बहुत पुराना है, मैं ये क्रेडिट लेना नहीं चाहता l ऐसी बात नहीं है l राजा द्रोण ने 1934 में फिल्म बनाई, उसके बाद मैंने फिल्म बनायी l ये अलग बात है कि उनकी फिल्म और मेरी फिल्मों में आसमान जमीन का अंतर है l

प्रश्न. आपने डाक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाई हैं जैसे विरासत, बिहार इतिहास के पन्नों में, आदि l इन सब में बिहार की संस्कृति पर काफी जोर दिया गया है, कोई खास वजह ?

उत्तर. बिहार मेरी जन्मभूमि है और बिहार के प्रति मेरे मन में असीम श्रद्धा है l बिहार को जानने की और सम्पूर्ण रूप से समझने की इच्छा रही है मेरी l मैं बहुत जानना चाहता हूँ लेकिन मैं फिल्मकार हूँ l मैं फिल्में बनाता हूँ ताकि अपनी भावनाओं को उसमें सामाहित कर सकूँ और दूसरे के ह्रदय में उसे प्रविष्ट करूँ l यही मेरा उद्देश्य रहा है l आज का युवा, आज का नौजवान कितना है जो बिहार की संस्कृति को जानता है l बिहार की ऐसी बहुत सारी बातें हैं, संस्कृति है जो बिहार के विद्वानों ने किताबों में लिख दी लेकिन कुछ ही लोग उस तरह की किताबें पढ़ते हैं जिनसे कि उन्हें बिहार की थोड़ी-बहुत जानकारी हो l जैसे कि दिनकर जी ने संस्कृति के ऊपर जो किताब लिखी है आप अगर उनकी इस किताब के कुछ पन्नों को रोज पढ़ें तो आप भारतीय संस्कृति को जान पायेंगे l मैंने यही प्रयास अपनी फिल्मों के माध्यम से किया है ताकि आप कम से कम समय में अपनी संस्कृति को जान सकें l

प्रश्न. आज के युवा जो मध्यमवर्गीय परिवार या जो निम्नवर्गीय परिवार से आते हैं, वो अपने करियर की समस्या से जूझ रहे हैं l ऐसे में इतिहास की, संस्कृति की क्या प्रासंगिकता है उनके लिए ?

उत्तर. देखिए करियर अपनी जगह है l अगर सिर्फ करियर है तो फिर आप शादी-ब्याह में लोक-गीत क्यों गाते हैं ? फिर आप शादी-ब्याह या कोई भी तीज-त्यौहार हो तो आप क्यों नाक से लेकर मांग तक सिंदूर लगा करके उत्सव मनाते हैं l ये कब कहा गया कि आप अपनी संस्कृति को मत जानिए l तो कल को आप ये कहेंगे कि मैं सिर्फ मैं ही हूँ, मैं अपने बाप को क्यों जानूँ, अपने दादा को क्यों जानूँ, अपने परदादा को क्यों जानूँ ? ये तो कोई बात ही नहीं हुई l ऐसी स्थिति में अपनी संस्कृति संरक्षित करने की जरुरत है l जैसे संस्कृत लुप्तप्राय है वैसे ही संस्कृति भी लुप्त हो जायेगी l ऐसे में आज के युवा का यह दायित्व है कि वो इस बारे में जाने l हम क्या कर सकते है, हमने फिल्म बना दिया, आपके सामने रख दिया, लो देखो और जानो l

प्रश्न. आपने बिहार को ही अपनी कर्मभूमि के रूप में क्यों चुना ?

उत्तर. क्यों भाई, हर आदमी मुंबई ही चला जाये, कोई जरुरी है l मुंबई में जो करोड़ों-करोड़ की फिल्में बन रही हैं उन फिल्मों में मैं कहाँ हूँ ? मैं तो विडियो पर फिल्में बनाता हूँ जिसे लोग देखते हैं l सरकार के लिए फिल्में बनाता हूँ, सरकार जिसे PRO के माध्यम से कॉलेजो में, पंचायतों में दिखाते रहते हैं l अब इससे कौन कितना ग्रहण करता है यह तो हरेक व्यक्ति की अपनी बौद्धिकता पर निर्भर करता है l

प्रश्न. कहा जाता है कि किसी भी उद्द्योग का विकास बाजार के आस-पास होता है l फिर हिंदी फिल्मों के लिए तो बाजार बिहार और यूपी जैसे क्षेत्र हैं, किन्तु फिर भी हिंदी फिल्मों का विकास मुंबई में क्यों हुआ वह तो हिंदी-भाषी क्षेत्र भी नहीं है ?

उत्तर. दादा साहेब फाल्के ने जो फिल्म बनाई थी उन्होंने मराठी में क्यों नहीं बनाई थी, पहली फिल्म भी उन्होंने “राजा हरिश्चंद्र” हिंदी में ही बनाई थी l यह बिहार का दुर्भाग्य है, उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहाँ के लोग जो भी हुआ बम्बई भाग गए और सरकार ने भी कभी भी film development corporation की स्थापना की कोशिश नहीं की l

प्रश्न. इन दिनों बिहार में भोजपुरी फिल्में काफी बन रही हैं l उन फिल्मों की गुणवत्ता के बारे में आपकी क्या राय है ?

उत्तर. बोगस है l भोजपुरी फिल्में लोग पंजाब में, हरियाणा में देखते हैं क्योंकि उनका अपना लगाव है लेकिन इनको standardise नहीं किया जा रहा l मैंने कहीं पढ़ा है कि लगभग 200 फिल्में बनती हैं भोजपुरी भाषा में एक साल में l लेकिन अगर यही फिल्में बिहार में बने तो बिहार के कलाकार, बिहार के टेक्नीशियन सारे लोग अपनी पहचान बनाने में सक्षम होंगे l लेकिन उनका स्तर अभी बहुत ही घटिया है l अभी क्षेत्रीय फिल्मों, जैसे बांग्ला, तमिल, तेलगु का स्तर ग्रहण करने में बहुत वक्त लगेगा l

प्रश्न. नब्बे के दशक में ग्लोब्लाइजेशन का दौर आया इसका बिहार की अर्थवयवस्था के साथ-साथ समाज और संस्कृति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा, इसे किस रूप में आप देखते हैं ? क्या ये अच्छा प्रभाव है या बुरा प्रभाव है ?

उत्तर. बिहार का जहाँ तक सवाल है- आप पर दूसरी संस्कृति का प्रभाव क्यों पड़ता है ? दूसरी संस्कृति का प्रभाव तभी आप पर पड़ता है जब आप, आपकी संस्कृति, कमजोर होती है l आज आप बांग्ला संस्कृति पर पंजाबी संस्कृति का प्रभाव नहीं देखते लेकिन बिहार में सबसे पहले देखते हैं l यहाँ शादी में भी भांगड़ा टाइप का नाच करते हैं l मुझे ये लगता है कि चुकि हम अपनी संस्कृति को नहीं जानते हैं और उसकी गहराई में पहुंचना नहीं चाहते हैं इसलिए हम छिछले हैं; हम पर दूसरी संस्कृतियाँ जो इतनी हल्की होती हैं हम पर हावी हो जाती हैं l

प्रश्न. आप हमें अपनी भावी योजनाओं के विषय में कुछ बताइए ?

उत्तर. बिहार से तो जुड़ा हुआ हूँ मैं और मेरी सारी योजनाएं भी, चाहे वो डाक्यूमेंट्री हो या फीचर फिल्म सब बिहार से जुड़ीं होती है l एक फिचर फिल्म की भी योजना मैं बना रहा हूँ l राजा राधिका रमन की कहानी पर आधारित फिल्म की पटकथा तैयार है, बस फाइंनेसर की तलाश है, मिल जाये तो काम शुरू करूँगा और उसमें यही मेरी शर्त है कि सारे कलाकार और तकनीशियन बिहार के ही हों और यह पूरी फिल्म बिहार की हो l

प्रश्न. जो युवा आज फिल्म की दुनिया में प्रवेश करना चाहते हैं उन्हें आप क्या मार्गदर्शन देना चाहेंगे ?

उत्तर. बिहार के युवा को अपनी संस्कृति का ज्ञान होना चाहिए l जब तक आप अपनी संस्कृति को नहीं जानेंगे, उसकी मर्यादा नहीं जानेंगे तब तक आप भटकते रहेंगे l इसलिए आवश्यक है कि आप अपनी संस्कृति अपने इतिहास का अध्ययन करें, आपके पास किताबें है पढ़ने के लिए, जानने-समझने के लिए l नहीं तो फिर वही होगा की दो-चार फिल्मों के बाद आपकी उर्जा समाप्त l

Thursday, February 26, 2009

1. मगही फिल्म "मोरे मन मितवा" (1965)


मोरे मन मितवा
MOREY MAN MITWA

Produced by: R. D. Bansal

Story, Scenario & Direction: Girish Ranjan

Music: Dattaram Dance: Satyanarayan

Controller of Production: Bimal Dey

Camera: Bishu Chakraborty
Art Direction: Rabi Chatterjee

Audiography: Soumen Chatterjee, Atul Chatterjee,
Sujit Sarkar

Editing: Baidyanath Chatterjee Make-up: Anant Deo

Lyrics: Harishchandra Priyadarshi, Lalan

Associate Music Director: Lalan


Recording:
Minoo Katrak, B.N. Sharma, Rabin Chatterjee(Bombay)


Background Music & Re-recording: Shyam Sundar Ghose
Production Manager: Sudip Mazumdar
Processed at: India Film Laboratories Private Ltd.


Laboratory Asst.:
Abani Roy, Tarapada Chowdhury, Mohan Chatterji,
Abani Mazumdar


Produced at:
Technicians Studi, New Theatres, R.K.Studio(Bombay)



Supervision: R. B. Mehta
Stills: Pics Studio
Publicity: Sailesh Mukherjee



ASSISTANTS


Direction: Bishu Brahma, Pradip Niyogi,
Hridesh Kumar Panda



Camera: K. A. Reza, Nirmal Mallik, Ashok Das
Sound: Rathin Ghose, Dhiren Naskar, Babaji



Editing: Rabin Sen
Art Direction: Somenath Chakraborty



Make-up: Bhim Naskar Music: Sunil
Dance: Khopkar
Management: Madan Das, Arun Das





CAST:



KUMARI NAAZ, SUDHIR, SUJIT KUMAR
Anuva Gupta, Bela Bose, Sabita Chatterjee,
Chhaya Devi, HELEN, Pahari Sanyal, Bepin Gupta,
Rabi Ghose, Biren Chatterjee, Harbans, Pranita,
Kajal, Jayanti, Ruby, Namita, Asha, Bakul, Sandhya,
Shikha, Sipra, Bina, Swapna, Alpana, Jayashree,
Lila, Dipti, Sunilesh, Sidhulal, Bhanu, Satyaban,
Debansu, Paresh, Mukundalal, Nikhil, Kanai, Mani,
Kamal, Anup, Smriti Kumar, Sambhu, Ramananda (Sr.)




PLAYBACK
MD. RAFI, MANNA DEY, MUKESH, ASHA BHONSLE,
SUMAN KALYANPUR, MUBARAK BEGUM




Acknowledgements:
The Superintendent, Patna Medical College,
Dr.H.N.Singh


Dr.Purnendu Narayan Singh, M.I.C. Grand Hotel, Patna,
Rajesh Verma, Rajen Tarafdar




World Right Controller
R.D.B. & Co.








मोरे मन मितवा
(कथासार)






जमीन्दार रायबहादुर अम्बिका प्रसाद और सरोजिनी देवी का एकलौता बेटा रमेश जितना ही सुन्दर, प्रतिभावान था, उतना ही मधुकर गायक भी । वह पटना मेडिकल कॉलेज का एक सर्वथा सम्पन्न विद्यार्थी था । उसी गाँव के एक छोर पर सरजू महतो अपने दो पुत्रों लछमन और पल्टू, पत्नी धनियाँ और लाड़ली बेटी कमली के साथ रहता था । लक्ष्मण, महतो की प्रथम विवाहिता पत्नी का पुत्र था तथा पल्टू और कमली धनियाँ के । रमेश और कमली, बचपन से ही एक आत्मा और दो शरीर की तरह खेलते खाते आ रहे थे । रमेश के प्यार का अंकुर कमली की भरपूर जवानी का आलम पाकर एक हरे-भरे वृक्ष के रूप में लहलहा उठा, लेकिन रमेश के दिल में कमली के प्रेम का अंकुर एक पौधा ही बनकर रह गया । रमेश अवकाश के पश्चात् पुनः कॉलेज चला गया जैसे जाता था ।

काल इसी प्रकार चलता रहा । एक दिन सरजू को अपने काल ने ले ही लिया । लक्ष्मण की पत्नी पार्वती परिवार के साथ अपना निर्वाह न कर सकी ।

इसी बीच कमली के हाथ पीले हो गए । अपने श्वसुर के घर जाते हुए कमली को मार्ग में रमेश ने एक बनारसी साड़ी भेंट की । कमली कुछ कह न सकी और उसकी आँखों से आँसू का सागर फूट पड़ा । कमली की सखी फुलिया ने वह चित्र लौटा दिया जिसको उसने बहुत दिनों से बचाकर रखा था । रमेश आँसुओं के साथ चित्र लौटाने क भाव न समझ सका और कुछ अधिक ही समझ लिया ।

दुर्दिन का एक वर्ष जिसमें महामारी ने सारे गाँव को क्रीडा क्षेत्र बना लिया रमेश अपने मित्र डाक्टरों और नर्सों के साथ सेवार्थ चल पड़ा । अचानक सास और पति से विहीन कमली मिली । असहाय ! कमली रमेश की छाती से लिपट गई । रमेश का दिल पश्चात्ताप से भर गया ।

बदकिस्मत कमली ने रमेश को बड़ी पीड़ा पहुँचाई । उसने उसको पत्नी बनाने का संकल्प किया । पहले तो कमली भय से काँप गई और घर भाग आई । बाद में उसने भी रमेश के मशविरे को मंजूर करने की प्रतिज्ञा की । बाबू अम्बिका प्रसाद इस खबर से अत्यन्त क्रोधित हो गए और अपने पुत्र को इस अधर्म से बचाने के लिए लक्ष्मण तथा उसके परिवार को गाँव से निकाल दिए ।

इसके बाद ? क्या अम्बिका प्रसाद की उसफल (?) कुलीनता उनके अन्तःकरण में संचित पुत्र स्नेह पर शासन कर सकी ?


मोरे मन मितवा
(ख़ुलासा कहानी)

वजीहा, मिहनती और सुरीला गवकार जवाँसाल रमेश पटना मेडिकल कालेज का तालिबे इल्म और सरोजिनी देवी और गाँव के ज़मीन्दार बाबू अम्बिका प्रसाद का एकलौता बेटा था । उसी गाँव के दूसरे हिस्से में सरजू महतो अपनी पहली बीवी के बेटे लछमन, दूसरी बीवी धनिया और उसके बेटे पल्टू और बेटी कमली के साथ रहता था । कमली और रमेश बचपन ही से एक दूसरे के साथ खेलते कूदते रहे थे । जवान होने पर कमली के दिल में बचपन की यादें गहरी मुहब्बत में बदल गई । लेकिन रमेश के दिल में मुहब्बत की कोई लगन नहीं थी । चुनांचे छुट्टियाँ गुज़ार कर वो पटना वापस चला गया ।

वक़्त गुज़रता गया । यहाँ तक कि एक दिन सरजू ने आख़री साँसें लीं । लछमन की बीवी पार्वती अपने ख़ानदान के साथ निबाह न कर सकी । इसी दौरान कमली की भी शादी हो गई । रमेश ने ससुराल जाते हुए कमली को एक बनारसी साड़ी तोहफ़े में दी । कमली जवाब में कुछ न कह सकी और आँसुओं में डूब गई । कमली की सहेली फुलिया ने रमेश को वो तस्वीरें लौटा दीं जो अब तक कमली ने महफ़ूज़ कर रखी थीं । रमेश इन तस्वीरों को कमली से रोने के ताल्लुक़ से जोड़ न सका ।

उस साल बड़ी तबाही मची । गाँव में वबा फूट पड़ी । रमेश डाक्टरों की एक टीम के साथ मदद को पहुँचा । यहाँ रमेश ने देखा कि कमली अपने मर्दे शौहर और सास की लाश के पास खड़ी है । कमली बतौर ग़म में रमेश के बाज़ू से जा लगी ।

बदनसीब कमली की मुसीबत रमेश से देखी न गई । चुनांचे उसने उसके साथ शादी करने का फ़ैसला कर लिया । पहले तो कमली उस तज्वीज़ पर हैरान हो उठी और अपने घर भाग खड़ी हुई । लेकिन बाद में वो शादी करने के लिए राज़ी हो गई । बाबू अम्बिका प्रसाद को जब ये मालूम हुआ तो वो अज़ा में भूत हो गये और लछमन और उसके ख़ानदान को अपने बेटे के इरादे को रोकने के लिए गाँव से बाहर निकाल दिया ।

उसके बाद क्या हुआ ?

क्या अम्बिका प्रसाद की झूठी रियासत बेटे रमेश को पिदराना शफ़क़त से मरहूम कर सकी ? वो पिदराना मुहब्बत .... मजबूर हो कर उसे कबूल करने पर मजबूर हो गये ?

इसका जवाब पर्दए सीमीं पर देखिये !



       
MOREY MAN MITWA
(Synopsis)


The handsome meritorious and sweet singer youth Ramesh, a student of Patna Medical College, is the only son of Village Zamindar, Ambika Prasad and Sarojini Devi. In another part of the same village, there lived Saraju Mahato with his son from his first wife, Lachhman, second wife Dhaniya and her son Paltu and daughter Kamli. Both Ramesh and Kamli had been each other's companion since their boyhood days. The ties of this friendship had grown into a deep love in the heart of Kamli at the full brim of her youth. But Ramesh could feel no impulse from within. He went back to Patna after holidays.


Time rolls on. One day Saraju breathed his last. Parvati, Lachhman's wife, couldn't adjust herself with the family.

Meanwhile Kamli got married. Ramesh offered her a 'Banarashi' saree on her way to her father-in-law's house. Kamli could say nothing but burst into a sea of tears. Fulia, Kamli's friend, returned to Ramesh his photograph which Kamli preserved so long with her. Ramesh could not link this photograph with her bursting out of tears and realised something more of it.

It was a foul year. Epidemic had spread over the village. Ramesh set out with his group of doctors and nurses for relief work when all of a sudden he discovered helpless Kamli with her dead husband. She threw herself to the embrace of Ramesh. His heart filled with repentance.

The unfortunate Kamli pained him much. He decided to marry her. Kamli at first became frightened at the proposal and ran home but afterwards she made up her mind to accept. Ambika Prasad got angry at the news and drove Lachhman and his family out of the village to resist his son.

Then ? Will the false aristocracy of Ambika Prasad reign over the fatherly affection towards his son Ramesh ?