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Monday, August 28, 2023

मगह के तीन टेढ़


 मगह के तीन टेढ़

प्राचार्य राम बुझावन सिंह

(ललित निबन्ध)

मगह के बारे में एगो कहावत प्रचलित हे कि मगह में तीन टेढ़ — राह टेढ़, आदमी टेढ़, आउ बोली टेढ़। ऊपर से देखे में लगे हे कि ई कहावत मगह ला अपमानजनक हे, काहे कि कोई के टेढ़ कह देवल अशिष्ट नियर बुझा हे। पर सच पूछीं तऽ कहावत ऐसही न बने, खूब सोच समझ के बने हे, जेकरा में बहुत कुछ सचाई रहऽ हे। ई कहावत एकर अपवाद न हे।

सबसे पहिले राह टेढ़ के बात लीं। कहीं के राह के भी घना सम्बन्ध उहाँ के धरती, पानी, यानी भूगोल के बनावट से रहे हे। जइसन जहाँ के हवा-पानी आ माटी रहत, वइसने उहाँ के सब कुछ बन जायत - राह-बाट, लोग-बाग, आ सभ्यता-संस्कृति। एकरे जयशंकर प्रसाद जी अपन नाटक ‘विशाख’ के ‘परिचय’ में कहलन हे कि —”हमें हमारी गिरी दशा से उठाने के लिए हमारे जलवायु के अनुकूल जो हमारी अतीत सभ्यता है, उससे बढ़कर उपयुक्त और कोई भी आदर्श हमारे अनुकूल होगा कि नहीं, इसमें मुझे पूर्ण सन्देह है।” ई कथन में ‘हमारे जलवायु के अनुकूल हमारी सभ्यता’ पर ध्यान देवे के हे। हमर सभ्यता हमर देश के जलवायु के अनुकूल ही बनत। तऽ राह-बाट अपन माटी-पानी से बचके कइसे रहत! ई मगह के भौगोलिक तथ्य हे कि एकर माटी धूसर, बलुआही आ मरल न हे, जे पानी के तुरत धरती सोख ले हे। बहुत जगह के माटी बलुआही पावल जाहे, जे बरखा के पानी के तुरत सोख ले हे। बरखा छुटला पर पांव झाड़ दीं, सब धूल झड़ जायत, आ चप्पल-जूता पहिन के तुरत चले लगीं। तनिको माटी न लगत। उहाँ के लोग अपन माटी के ई खूबी मानऽ हथ, कि बरसात में भी उहाँ जूता-चप्पल चले हे। उनकर ई खूबी उनका मुबारक! खूब जूता-चप्पल उहाँ चले, एकरा में हमरा का एतराज?

पर मगह के माटी के ई रिवाज न हे। इहाँ के माटी जादेतर काली माटी, केवाल माटी हे, जेकर खूबी हे कि पानी न पड़त, तऽ सूख के ऊ अइसन कड़ा हो जायत कि ओकरा आगे पत्थर भी मात खा जायत। ठेसे लगला पर ओकर कड़ाई बुझाऽत। पर अगर थोड़ा पानी के संसर्ग ओकरा भेंट जायत, तऽ ऊ एतना लसगर हो जायत कि अपने के गोड़ न छोड़त। ई धूरि न हे, जेकरा झार के अपने चल देब। ई हमर माटी के सनेह हे, जे गीला होला पर अइसन पकड़ ले हे कि छोड़ावल मुस्किल होवऽ हे। सनेह अइसने बरियार होवऽ हे। सनेह के आगे केकर जोर चलल हे भला?

एहिसे, जब मगह के धरती बरखा में डूब जाहे, तऽ बड़ा घूम-घुमाव के राह बने हे। लगत कि पावे भर पर जाय ला हे। पर जाय लगब, तऽ राह लम्बा हो जायत। कवि के बात याद आ जाहे — ‘चलता-चलता जुग गया, पाव कोस पर गाँव’। चलनिहार के मगहे से पाला पड़ल होत। लम्बा राह टेढ़ा हो ही जात। ओहू में सनेह से भींगल, चिक्कन, लथपथ।

जे गुन मगही राह के, ओही मगहियन आदमी के भी। इहाँ भी धरती-माटी के ही असर काम करऽ हे। पहिले आदमी के माने आदमी के देह से लीं। मगह के माटी में खेसाड़ी खूब उपजे हे, जेकर उपयोग जानवर से लेके आदमी तक खूब करऽ हथ। जहिया से खेसाड़ी में टूसा निकले हे, ओहिए से ओकर साग चले लगे हे। देहात तो देहात, सहर के लोग के भी ओकरा ला प्रान छछनइत रहे हे। अपन देहाती कुल-कुटुम्ब पहिले ही सनेस देतन कि गंगा नहाय अइहऽ तऽ खेसाड़ी के साग लावेला न भूलिहऽ। खेसाड़ी के साग में एतना स्वाद हे। मगर ओकर दाल? ओकरा बारे में डाक्टर लोग कहऽ हथ कि बहुत दिन तक लगातार ओकर दाल खाय से पांव में गठिया हो जाय के डर रहऽ हे। ई बात में सचाई हो सके हे। खेसाड़ी के दाल सबसे सस्ता होवे हे। गरीब-गुरबा ओकरा खूब खा हथ। खेतिहर मजदूर के भी खेसाड़िये मजूरी में देवल जा हे। ईसे अक्सर जन-मजूर के पाँव गठिया पकड़ के लांगड़ हो जाय, टेढ़ हो जाय, तो कउन अचरज?

अब टेढ़ के मतलब आदमी के देह से नऽ, सुभाव से लेल जाय। वहाँ फिर हम मगह के धरती-माटी के याद दिलाएब। ओकरा अगर सनेह से भिगाईं, तऽ ऊ एतना चिकना हो जायत, कि अपने फिसल जाएब। देह से, आ मन से भी। पर अगर ओकरा से सुखले बतियाएब, बिना सनेह दरसवले, त ऊ पत्थर नियर कठोर हो जायत। एकरे टेढ़ भी कह सकऽ ही। पर सच पूछीं त, एकरे आदमी के स्वाभिमान भी कहल जाहे, जे मगहियन में कूट-कूट के भरल हे। एही ओकर खूबी हे। इहाँ हम फिर पोथी-पुरान के याद दिलाएब। धनुहा-भंग के बाद जब परसुराम फरसा तानले जनकपुर पहुँचलन त सब कोई तो सटक सीताराम। पर लछुमन के त्योरी चढ़ गेल। उनकर नहला पर ई दहला कसे लगलन — अइसन-अइसन तीरकमान आ फरसा हम ढेर देखले ही। परशुराम के जरइत आग में घी पड़ गेल। ऊ फरसा के धार पर अँगुरी फेरे लगलन। एहि बीच राम आके उनका सांत कयलन  — महाराज, अगर अपने खाली मुनिवेश में अइतीं, त लछुमन अपने के पाँव पर गिर जायत हल। पर अपने के तीरकमान आ फरसा देखके ओकर छत्रियाँव भड़क उठल। एकरा में ओकर दोष नऽ।

[*22] अब इहाँ बुझीं, कि लछुमन में ई तेवर कहाँ से आयल? हमर बात के बकवास न मानल जाय, तऽ हम निवेदन करब कि लछुमन में ई तेवर उनकर ननिहाल के धरती-माटी से आयल हल, जे मगह के गया छेत्र में हल। आज भी उनकर ननिहाल के गाँव रामपुर चांई के नाम से मौजूद हे, जेकरे पास आज भी मसहूर सूर्य-मन्दिर देकुड़-देवकुण्ड हे। कहल जाहे कि राम जब पिता के पिण्डदान ला गया जाइत हलन, तऽ एक रात ओही ननिहाल में ठहर के विश्राम कएलन हल, जेकर याद में आज भी ऊ गाँव रामपुर कहला रहल हे।

तऽ जइसे लछुमन के स्वाभिमान कोई के ठोकर बर्दासत न कयलक, ओइसहीं मगहियन भी कड़ाई के साथ पेस आवेवाला के साथ कड़ा बन जा हथ। एहिसे लोग कह दे हथ कि मगह के आदमी टेढ़। लोग हमरा टेढ़ कहथ या सोझ, हम तो अपन धरती-माटी से लाचार ही। हाँ, जरा सनेह देखला के तो देखीं, कि हम केतना नरम हो जाही? केवाले माटी से तो आखिर हमर तनमन बनल हे। गोसाईं बाबा भी टेढ़ से काफी घबरा हलन – ‘टेढ़ जानि संका सब काहू’। लगे हे कि उनका कोई मगहिया से पाला पड़ गेल होयत। एहिसे ओहू भी मगह के गरियाबे में बाज न अयलन — गया मगह महँ तीरथ जैसे। हमरा से कोई के शंका — डर-भय — न होय, एहिसे हम पूर्नमासी के चाँद बन जाईं, जेकरा हर कोई राहू दबोच दे? हम वक्र चन्द्रमा रहब से कबूल पर कोई राहू के ग्रास न बनब, न बनब। बनब तऽ ‘नगद दमाद अभिमानी के’। 

रह गेल बोली टेढ़ के बात। ‘निज कवित्त केहि लाग न नीका’ न्याय से सोचीं, तऽ बात अपने आप खुलासा हो जाहे। पर अपना से तटस्थ होके जरा सोचऽ ही, तऽ ई मान लेबे पड़ऽ हे कि मगहियन के जुबान पर अड़ोस-पड़ोस के बोली जल्दी चढ़ जाहे। पर हमर पड़ोसी के जुबान पर मगही बहुत कम चढ़े हे। आमतौर पर मगहियन भोजपुरी आ मैथिली धड़ल्ले से बोल ले हथ। पर एही बात गैर-मगहियन के साथ न पावल जाहे। चाहे जउन कारन से हो, ऊ लोग के साथ स्वकीयापन जादे चले हे। अपन-अपन रीतरिवाज संस्कार हे। एकर अलावे, हमरा तो बुझा हे, कि ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल’ के मरम ऊ हमरा से पहिले आउ जादे समझ गेलन हे, ओकर स्वाद खूब बूझ गेलन हे। आज के दुनिया के दौड़ में आगे निकल जाय ला ई बहुत कारगर नुस्खा हे।

भाषा विज्ञान के नजर से देखला पर सचमुच अइसन परतीत हो हे कि मगही बोली आसानी से न साधल जा सके हे। ‘तीन कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी’ जेतना मगह में पावल जाहे, ओतना सायद ही कहीं दूसर जगह। पटना, गया, नालन्दा, औरंगाबाद, पलामू, हजारीबाग, राँची के मगही बोली सोझ न बुझाय, गैर-मगहियन ला ई बोली टेढ़ लगे, तो कउन अचरज? खूब ठेकाने से मगही बोली जुबान पर चढ़ जाय, एकरा ला कुछ साधना करे के जरूरत हे। गैर-मगही भाई एकरा टेढ़ कहथ या सोझ, पर हम तो एहि कहब कि - ‘आती है मगही जुबां आते आते’।

जे ई मगही के मरम समझ जैतन, ऊ बुद्ध बन जैतन। सिद्धार्थ के ढेर संगी-साथी अपना-अपना नियर उनका प्रबोध के हार गेलन, पर पार न पावलन। आखिर निरंजना के कगार पर से एगो बोल फूटल — बीना के तार नियर मन के साधऽ। न जादे तानऽ, न जादे ढीला छोड़ दऽ । के न जाने कि सिद्धार्थ ई मरम बोल के साधलन, त बुद्ध बन गेलन। आझ भी जे मगही के मरम बूझ लेतन, ऊ प्रबुद्ध बन जयतन। न बूझेवाला के तो ई टेढ़ा बुझएबे करत।

 

साभारः आचार्य केसरी कुमार (प्रधान संपा॰) - “निरंजना”, मगही अकादमी, बिहार, पटना-13; कुल x+106+ii पृष्ठ। उपर्युक्त निबन्ध पृ॰21-22 पर छपले ह।

Saturday, August 26, 2023

मगही साहित्य को प्रो॰ रामबुझावन सिंह की देन

 

मगही साहित्य को प्रो॰ रामबुझावन सिंह की देन

प्रो॰ सुखित वर्मा

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् एवं बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के पूर्व निदेशक प्रो॰ रामबुझावन सिंह हिन्दी और मगही के महान साहित्यकार रहे हैं। हिन्दी और मगही की पत्र-पत्रिकाओं के साथ इनका गहरा लगाव रहा है, जिनमें इनकी मौलिक एवं स्तरीय रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं।

प्रो॰ रामबुझावन सिंह ने मगही की अनेक संस्थाओं से जुड़कर मगही भाषा को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मगही के भारतेन्दु डा॰ रामप्रसाद सिंह के तूफानी मगही आन्दोलन में इनका कार्य महत्त्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय रहा है। प्रो॰ रामबुझावन सिंह के कार्य रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक दोनों तरह के रहे हैं। ये आजीवन हिन्दी और मगही साहित्य की सेवा में तत्पर रहे हैं। इसी कारण मगही साहित्य-जगत् में इन्हें ‘मगही का भीष्म पितामह’ कहा जाता है।

ऐसे महान साहित्यकार  प्रो॰ रामबुझावन सिंह का जन्म अप्रैल उन्नीस सौ बीस (01.04.1920) को पटना (बिहार) जिला के मसौढ़ी थाना (अब अनुमंडल भी) अन्तर्गत सतपरसा गाँव में एक किसान परिवार में हुआ। लौंगी देवी और बनवारी सिंह इनके माता-पिता थे। इनकी  प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में हुई। इन्होंने हजरत साईं (मसौढ़ी) से मिडिल स्कूल की और जहानाबाद से उच्च विद्यालय की शिक्षा पूरी की। इन्होंने 1936 ई॰ में मैट्रिक की परीक्षा द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद 1937 ई॰ में पटना स्थित बी॰एन॰ कॉलेज में इन्टरमीडिएट में नामांकन कराया। सन् 1939 ई॰ में इन्टर की परीक्षा द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण होने के बाद उसी कॉलेज से 1941 ई॰ में स्नातक की परीक्षा विशिष्टता (डिस्टिंक्शन) के साथ उत्तीर्ण की। पुनः 1943 ई॰ में पटना विश्वविद्यालय, पटना से एम॰ए॰ (हिन्दी में) प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। तब प्रबुद्ध लोगों का ध्यान इनकी ओर आकृष्ट हुआ। 

स्नातकोत्तर (एम॰ए॰) उत्तीर्ण करने के बाद 1945 ई॰ में चन्द्रधारी मिथिला (सी॰एम॰) कॉलेज, दरभंगा (बिहार) में हिन्दी के व्याख्याता के पद [*97] पर इनकी नियुक्ति हुई। लगभग तीन वर्षों तक यहाँ इन्होंने इस पद को सुशोभित करने के बाद सन् 1948 ई॰ में पटना के बी॰एन॰ कॉलेज में हिन्दी व्याख्याता के पद पर योगदान किया। यहीं रीडर बनकर इस महाविद्यालय का गौरव बढ़ाते रहे। सन् 1980 ई॰ में वहाँ से अवकाश ग्रहण करने के बाद अप्रैल 1980 से अप्रैल 1982 ई॰ तक वे द्वारिकानाथ महाविद्यालय मसौढ़ी (पटना) में प्रधानाचार्य रहे।

 

प्रो॰ सिंह के साहित्यिक अवदान:

प्रो॰ रामबुझावन सिंह को बी॰एन॰ कॉलेज, पटना की साहित्यिक पत्रिका ‘भारती’ का जन्मदाता सम्पादक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसका प्रथम प्रकाशन सन् 1948 ई॰ में हुआ था। समय-समय पर इस पत्रिका के कई विशेषांक प्रकाशित हुए। निराला विशेषांक की काफी चर्चा हुई थी। इस कॉलेज से ‘सूत्र’ पत्र का प्रकाशन हुआ था, जिसमें साप्ताहिक ‘शोषित’ (पटना), साप्ताहिक ‘अर्जक’ (लखनऊ), ‘शंबूक’ (पटना), ‘कूर्मांचल’ (पटना), ‘कूर्मोदय’ (पटना), ‘शोषित मुक्ति’ (पटना), ‘कूर्मी-क्षत्रिय जागरण’ (पटना) आदि से सम्बद्ध रहे। ‘नवशक्ति’ (पटना), दैनिक ‘राष्ट्रवाणी’ (पटना) में सह-सम्पादक का कार्य इन्होंने 1945 से 1948 तक किया। इनके अलावे ‘निराला: जीवन और साहित्य’, ‘रेणु: व्यक्तित्व और श्रद्धांजलि’, ‘गद्य विहार’ का सम्पादन भी इन्होंने किया था।

 

निबंध:

जब से मगही आन्दोलन की शुरुआत हुई, प्रो॰ रामबुझावन सिंह इस आन्दोलन में सक्रिय रहे। ढेर सारी संस्थाओं के सदस्य और अध्यक्ष बने। मगही की पत्र-पत्रिकाओं में इनके निबंध छपते रहे। इनके कुछ प्रमुख निबंध निम्नलिखित हैं -

(i)            कपिलदेव बाबू (मगही लोक, 1978)

(ii)          मगह के तीन टेढ़ (निरंजना स्मारिका, 1983)

(iii)         मगही उपन्यास आउ आम आदमी (मगही के मानक रूप, 1987)

(iv)         मगह आउ जरासंध (गौतम, 1987)

(v)          सबहिं नचावत राम गोसाईं (अलका मागधी, 1999)   

[*98]

(vi)         बैल के दूध (अलका मागधी, 1997)

(vii)        मंगलं पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीक स्मरण (अलका मागधी, 1999)

‘कपिलदेव बाबू’ नामक निबंध भूतपूर्व प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, बी॰एन॰ कॉलेज, पटना के स्मरण के रूप में लिखा गया हे। अपने परम प्रिय मित्र कपिलदेव बाबू की याद में लिखा गया यह निबंध/ स्मरण काफी मर्मस्पर्शी है।

मगही उपन्यास आउ आम आदमी’ में आम आदमी के जीवन का व्यापक चित्रण है।

मगह के तीन टेढ़’ एक सुप्रसिद्ध मगही कहावत है जिसमें मगह क्षेत्र की तीन वस्तुओं की वक्रता को दर्शाया गया है। ये तीन चीजें हैं – रास्ता, आदमी और बोली। इन तीन चीजों की वक्रता और उनकी विशेषता का मरम समझ जैतन, ऊ बुद्ध बन जैतन। सिद्धार्थ के ढेर संगी-साथी अपना-अपना नियर उनका प्रबोध के हार गेलन, पर पार न पावलन। आखिर निरंजना के कगार पर से एगो बोल फूटल - “वीणा के तार नियन मन के साधऽ। न जादे तानऽ, न जादे ढीला छोड़ दऽ। न जाने कि मगही के मरम बूझ लेतन ऊ प्रबुद्ध बन जैतन। न बुझे वाला के तो ई टेढ़ बुझयबे करत।”

मगह आउ जरासंध’ में पौराणिक पात्र जरासंध के मगध क्षेत्र में निभायी भूमिका का व्यापक वर्णन किया गया है।

सबहिं नचावत राम गोसाईं’ में प्रमुखता से संसार के संचालन की व्याख्या है।

बैल के दूध’ हास्य निबंध है जो काफी बेजोड़ है।

ठेठ मगही के ठाठ-बाठ प्रो॰ सिंह के निबंधों में देखने को मिलता है। जगह-जगह मगही की कहावतें इनके निबंधों में चार चाँद लगा देते हैं। प्रो॰ सिंह के गद्य की भाषा काव्यानन्द की अनुभूति से ओत-प्रोत है। विषयानुसार भावाभिव्यक्ति में काफी कुशल हैं।

 

कहानियाँ:

जयशंकर प्रसाद की तरह प्रो॰ रामबुझावन सिंह भी लोक-संस्कृति के ध्वजवाहक के रूप में मगही साहित्य में अमिट रहेंगे। डॉ॰ (प्रो॰) अभिमन्यु [*99] प्रसाद मौर्य और डॉ॰ (प्रो॰) दिलीप कुमार द्वारा सम्पादित ‘मगही कथा सरोवर’ में प्रो॰ रामबुझावन सिंह की एक सुप्रसिद्ध कहानी ‘एक पर चढ़ जा तीन-तीन’ प्रचलित कथा रूपक पर आधारित है। अपनी लेखनी से खाँटी मगही कहानी का रूप देने में प्रो॰ सिंह के प्रयत्न एकदम सफल एवं सराहनीय हैं। कहानी की भाषा भाव की अनुगामिनी है। कहानी में लय और ताल के मणि-कांचन संयोग से संगीत और संगीत के आराधक तत्त्व दोनों की रक्षा हुई है। ‘धिक-धिना’, ‘तिक-तिना’ और ‘धिक-धिन’ की बोल पर ‘एक पर चढ़ जा तीन-तीन’ की गुहार बिल्कुल सार्थक है। इस कहानी की समीक्षा करते हुए डॉ॰ दिलीप कुमार ने लिखा हे - “लयदार लेखन के तालदार तेवर रखने वाले प्रो॰ रामबुझावन सिंह शोषण की सीमा समाप्त करके जीवन की अनबुझ पहेली को बिल्कुल सुलझाकर रख देते हैं जिससे मुट्ठी भर शोषक समाज को हमेशा लूटते रहते हैं। भय रूपी भूत को भगाकर प्रो॰ सिंह ने सचमुच बहुत बड़ा सामाजिक कल्याण किया है।” इस कहानी को प्रतीकवादी कहानी की कोटि में यदि रखा जाय तो किसी को आपत्ति न होगी। शिल्प और भाव की दृष्टि से यह कहानी बिल्कुल सटीक और सफल है। इस कहानी में संवाद कम, मुद्दा, नाटकीयता, सजीवता और स्वाभाविकता अधिक है।

लोककथा का वैज्ञानिक अनुशीलन भारत में अभी बहुत कम हुआ है। लोककथा में लोक विश्वास की अभिव्यक्ति होती है। वह विश्वास को एक निश्चित और स्थिर रूप प्रदान करके समाज में उसका सम्मान बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है। अतः प्रो॰ रामबुझावन सिंह की यह कहानी लोककथा के वैज्ञानिक अध्ययन, अनुशीलन और चिन्तन-मनन में सहायक सिद्ध होगी।

 

शब्दचित्र मगही में:

प्रो॰ रामबुझावन सिंह ने कई शब्दचित्रों की भी रचना की है। यहाँ मैं उनके द्वारा लिखित एक सुप्रसिद्ध ‘सनिचरा’ की चर्चा करना चाहूँगा। यह शब्दचित्र डॉ॰ अभिमन्यु प्रसाद मौर्य द्वारा सम्पादित मासिक मगही पत्रिका ‘अलका मागधी’ के जुलाई 1999 के अंक में प्रकाशित हुआ था। तत्त्व, शैली और भाषा आदि की दृष्टि से ‘सनिचरा’ शब्दचित्र एकदम सही है। शैली कथात्मक, वर्णनात्मक और चित्रात्मक है। शब्द-चयन, छोटे-छोटे वाक्य, कहीं-कहीं स्वाभाविक संवाद और भावावेश के साथ सहज-सरल चित्रण है। [*100] इस शब्दचित्र की भाषा में चित्रात्मकता, सहजता, सरलता, कहावतों एवं मुहावरों के प्रयोग के साथ स्थानीय मगही भाषा के खाँटी शब्दों का प्रयोग सहज बोधगम्य है।

‘सनिचरा’ शब्दचित्र कल्पनाश्रित यथार्थ से जुड़ा हुआ है। इसमें वर्णनात्मकता भी है। शब्दचित्रकार जब बाहर से भीतर की ओर विषय में प्रवेश करता है तब वह गहराई में न जाकर अपने शब्दचित्र की स्थूलता को पुष्ट करने के लिए वर्णनात्मक ही अधिक रहता है। कहीं-कहीं दया, करुणा, ममता, प्रेम, अहिंसा जैसे रागात्मक पक्ष का उद्घाटन भी करता है तो वह उद्घाटन विषयगत न होकर स्थितिजन्य हो जाता है। वर्णनात्मक दृष्टिकोण से ‘सनिचरा’ शब्दचित्र एकदम सफल है।

प्रत्येक साहित्यिक विधा में साहित्यिकता के गुण उसके प्रारूप, शैली और उपादान पर निर्भर करते हैं। ठीक उसी प्रकार शब्दचित्र की साहित्यिकता भी उसकी तात्त्विक अन्विति और शैली विशेष पर निर्भर करती है। कल्पना और यथार्थ के संयोग से जिस स्थल को शब्दचित्रकार अधिक गम्भीरता में उतारना चाहता है, उस साहित्यिक उपादान में बिम्ब, अलंकार, अप्रस्तुत विधान आदि का सहारा ले सकता है। वह जन-जीवन में प्रचलित मुहावरों, कहावतों और प्रतीक के माध्यम से ज्यादा व्यंजक बना सकता है। कलात्मकता की दृष्टि से प्रो॰ रामबुझावन सिंह का शब्दचित्र ‘सनिचरा’ पूर्णतः सफल है। भाषा में चित्रात्मकता , सहजता, सरलता, साधारण जनता के चलन में आने वाले कहावतों-मुहावरों के प्रयोग और स्थानीय मगही भाषा के खाँटी शब्दों के प्रयोग से ‘सनिचरा’ शब्दचित्र कली की भाँति खिल उठता है।

 

संस्थाओं के सदस्य और अध्यक्ष के रूप में:

प्रो॰ रामबुझावन सिंह सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं से जुड़े रहे थे। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के तत्कालीन निदेशक डा॰ कुमार विमल के समय प्रो॰ सिंह परिषद् के संचालक समिति के सदस्य बनाये गये थे। हिन्दी प्रगति समिति, राजभाषा विभाग, बिहार सरकार, पटना के सदस्य भी रहे थे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग और रेलवे हिन्दी सलाहकार समिति, नयी दिल्ली के सदस्य भी रहे थे। मगही भाषा-साहित्य के विकास के लिए ये काफी प्रयत्नशील रहते थे। फलतः बिहार मगही अकादमी, पटना के अध्यक्ष भी नियुक्त किये गये थे। कई वर्षों तक ये इस पद पर रहकर मगही भाषा और [*101] साहित्य की सेवा करते रहे। उक्त अवधि में मगही अकादमी, पटना की ओर से प्रो॰ सिंह ने ‘निरंजना’ नामक स्मारिका का प्रकाशन किया। मगही के विकास के लिए ये काफी समर्पित थे।

सन् 2005 ई॰ में श्री नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हीं के निर्देश पर बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् और बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के निदेशक बनाये गये। छह वर्षों तक लगातार वे निदेशक पद पर रहते हुए हिन्दी की जो सेवा की, वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। विगत 31 मई 2013 ई॰ को उन्होंने अवकाश ग्रहण किया। मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने उनको सम्मानित कर उनके गुरु-ऋण से मुक्त होने का प्रयास किया। प्रो॰ रामबुझावन सिंह को ‘गुरुओं का गुरु’ कहा जाता है। उपर्युक्त दोनों संस्थाओं से अवकाश ग्रहण करने के 25वें दिन अर्थात् 25 जून 2013 ई॰ को उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छानुसार गंगा किनारे रहते हुए भी उनका दाह-संस्कार पैतृक गाँव सतपरसा (मसौढ़ी), पटना में हुआ।

पटना की साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय सहभागिता रहती। साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक समारोहों में विशिष्ट अतिथि या मुख्य अतिथि या लोकार्पणकर्त्ता के रूप में वे हमेशा आमंत्रित किये जाते थे।

8वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयार्क (अमेरिका) में वे प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के रूप में गये थे।

प्रो॰ रामबुझावन सिंह के साथ मेरी कई स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। यद्यपि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, फिर भी उनका सरल और अजातशत्रु वाले व्यवहार का मैं कायल हूँ। अंत में मैं उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ।

 

व्याख्याता, हिन्दी विभाग

पी॰एन॰के॰ महाविद्यालय

पालीगंज, पटना-801110 (बिहार)


स्थायी पता : 

ग्राम - वादीपुर, पत्रा॰ - चिरौरा 

नौबतपुर, जिला - पटना-801109


साभार: डा॰ गनौरी महतो (प्रधान संपा॰) एवं आलोक कुमार सिन्हा (संपा॰) - “हिन्दी साहित्य के अजातशत्रु - प्रो॰ रामबुझावन सिंह”, प्राञ्जलि प्रकाशन, पटना-3; 9 अगस्त 2014; कुल x+157 पृष्ठ। उपर्युक्त लेख इस पुस्तक के पृ॰ 96-101 में छपा है।

 


 

Thursday, April 05, 2018

मगही के चाही मगहिये के व्याकरण


मगही के चाही मगहिये के व्याकरण
लेखक - नारायण प्रसाद, पुणे

सारांश
मगही आउ मैथिली में दुनिया के सब्भे भाषा के अपेक्षा सबसे जटिल क्रियारूप पावल जा हइ। हिन्दी के एक-एक क्रियारूप लगी मगही (आउ मैथिली) में कइएक रूप होवऽ हइ। जैसे, हिन्दी के है लगी बिहारशरीफ (नालन्दा) के मगही में नौ-नौ रूप के प्रयोग देखल जा हइ। अब तक के जेतना भी मगही व्याकरण लिक्खल गेले ह ऊ सब या तो अंगरेज़ी के आधार पर लिक्खल गेले ह चाहे हिन्दी के आधार पर, मगही के आधार पर बिलकुल नञ्। एहे कारण हइ कि अब तक के कउनो मगही व्याकरण में मगही के क्रियारूप के क्लिष्टता के कोय स्पष्ट विवेचन नञ् मिलऽ हइ। ई आलेख में मैथिली व्याकरण मिथिला-भाषा-विद्योतन के माध्यम से मगही क्रियारूप के क्लिष्टता के व्याख्या कइल गेले ह आउ मगही के आधार पर मगही व्याकरण के रचना के आवश्यकता पर बल देल गेले ह।

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आचार्य किशोरीदास वाजपेयी राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण के पंचम अध्याय क़्रियाप्रकरणमें क्रिया-विवेचना के उलझन के कारण स्पष्ट करते लिखलका हल (1949:81-82/ 2007:243-244) –

किसी भी भाषा में क्रिया-प्रकरण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। क्रिया-पद ही अन्य भाषा-भाषियों के लिए उलझन के रूप में सामने आते हैं; क्योंकि यही प्रत्येक भाषा विशेषता रखती है। यह विशेषता ही अन्य भाषा-भाषियों को उलझन के रूप में तंग करती है। ... हिन्दी व्याकरणदेखो, तो उसमें लिखा है कि सकर्मक क्रियाएँ हिन्दी में भाववाच्य होती नहीं हैं ! तब, व्याकरण की आज्ञा मानकर यदि लिखते हैं -
हमने तुम देखे
तुमने हम देखे

तो, हिन्दीवाले गलत बतलाते हैं ! कहते हैं -
हमने तुम को देखा
तुमने हम को देखा

यों शुद्ध-सही लिखो ! परन्तु ये प्रयोग (हमने तुम को देखाऔर तुमने हम को देखा’) भाववाच्य हैं, सकर्मक क्रिया के। क्रिया देखाएकवचन है, जबकि कर्ता और कर्म बहुवचन हैं ! व्याकरण के अनुसार लिखो, तो हिन्दीवाले गलत बताते हैं और गलती ठीक करने के लिए व्याकरणदेखो, तो वहाँ वही सब है ! हम करें, तो क्या करें ! राष्ट्रभाषा की यह बड़ी उलझन है !

निःसन्देह हमारे बन्धुओं का उपालम्भ अर्थ रखता है।

अवश्य ही हिन्दी-क्रियाओं की उलझन उनके सामने है, जिसे व्याकरण-ग्रन्थों ने और भी उलझा दिया है ! कारण, कोई व्याकरण अंग्रेजी के आधार पर लिखा गया है और कोई संस्कृत के आधार पर। हिन्दी के आधार पर हिन्दी का व्याकरण बना ही नहीं। तब उलझन तो होगी ही।

डॉ॰ डी॰एन॰ शंकर भट कन्नडक्कॆ बेकु कन्नडद्दे व्याकरण (कन्नड के चाही कन्नडे के व्याकरण) में अनुच्छेद 1.3 के अन्तर्गत कन्नडवल्लद कन्नड व्याकरणगळु (कन्नड से असम्बन्धित कन्नड व्याकरण) प्रकरण में लिखलका ह (2001:15.5-14) –

कन्नड पर लिक्खल व्याकरण सब में संस्कृत, लैटिन चाहे इंग्लिश भाषा के व्याकरण के नियम सब अइसहीं कन्नड में ग्रहण करे के प्रयत्न के सिवा कन्नडे के व्याकरण के नियम सोच-विचार के अपनावे के प्रयत्न नञ् हइ। संस्कृत चाहे इंग्लिश भाषा के व्याकरण के नियम कन्नड में अपनाना बिलकुल सम्भव नञ् रहले पर कन्नड में एकरे व्याकरण के नियम कुच्छो हइ कि नञ् ई देख के अपनावे के ई व्याकरण सब के प्रयत्न रहऽ हइ। ओहे से अधिकतर प्रसंग में ई सब व्याकरण कन्नड भाषा के रचना के विवरण देवे में बिलकुल असमर्थ देखाय दे हइ।

मगही आउ मैथिली में दुनिया के सब्भे भाषा के अपेक्षा सबसे जटिल क्रियारूप पावल जा हइ। हिन्दी के एक-एक क्रियारूप लगी मगही (आउ मैथिली) में कइएक रूप होवऽ हइ। जैसे, हिन्दी के है लगी बिहारशरीफ (नालन्दा) के मगही में नौ-नौ रूप के प्रयोग देखल जा हइ। दोसर-दोसर भाषा सबके धातु में साधारणतः एक या दू ठो प्रत्यय एक साथ लगऽ हइ, लेकिन ई दूनू भाषा में एक पर एक तीन-चार ठो प्रत्यय लगावल जा सकऽ हइ। जैसे - मैथिली में देख धातु से "देखलकइक" - एकरा में "देख-ल-क-इ-क"; "देखलिअइन्ह" - एकरा में "देख-ल-इअ-इ-न्ह"। मगही में संगत (corresponding) क्रियारूप क्रमशः  "देखलकइ" - एकरा में "देख-ल-क-इ"; "देखलिअइन" - एकरा में "देख-ल-इअ-इ-न"। क्रियारूप में सब्भे प्रत्यय के अप्पन-अप्पन अर्थ आउ भाव हकइ (झा 2011:1) ई रीति के क्रियापद-व्यवस्था विश्व के बहुत विरले भाषा में पावल जा हइ। ई प्रसंग में मगही आउ मैथिली के तुलना तुर्की भाषा से कइल जा सकऽ हइ। ई भाषा के वर्णन करते डॉ॰ सेयेस के उक्ति देखल जाय (सेयेस 1880:199-200):

तुर्की क्रिया, फ़िनिक के जइसन, रूप में अत्यन्त धनी हइ; प्रत्यय के ऊपर प्रत्यय जोड़ल जा सकऽ हइ ताकि सूक्ष्म से सूक्ष्म आउ रंग-बिरंग के अर्थ में भेद के चित्रित कइल जा सकइ। फिर भी धातु आउ प्रत्यय - दूनहुँ स्पष्ट आउ चिह्नित रहऽ हइ। ओहे से एकरा में हइ पारदर्शिता जे क्रिया रूपावली के विशेषता बतावऽ हइ आउ एकरा तार्किक विचार खातिर एतना परिपूर्ण साधन बनावऽ हइ।

ग्रियर्सन ऊ पहिला भाषाशास्त्री हला जे मैथिली के क्रियारूप पर सूक्ष्म अध्ययन कइलका हल। लेकिन ऊ क्रिया रूपावली के जटिलता के व्याख्या नयँ कर पइलका आउ न तो ई भाषा के क्रिया के श्रेणीबद्ध प्रत्यय सब के विश्लेषण करे के कोय प्रयास कइलका (झा 2001:159) ऊ अपनहीं स्वीकार कइलका  (ग्रियर्सन 1881:50) -
मैथिली क्रियारूप के बाहुल्य में आनन्द के अनुभव करऽ हइ। आंशिक रूप से विकसित सब्भे भाषा जइसन एकरा में बहुत कम्मे भाग हइ जेक्कर दू या तीन वैकल्पिक रूप नयँ होवे। ई वैकल्पिक रूप क्षेत्रीय विशेषता नयँ हइ, बल्कि ऊ सब्भे के प्रयोग एक्के वक्ता अप्पन कल्पना (fancy) या वाक्य में लय के जरूरत के मुताबिक प्रयोग करऽ हइ। हमरा नयँ लगऽ हइ कि उ सब में अर्थ सम्बन्धी कोय भेद हकइ।
ग्रियर्सन मैथिली व्याकरण के अगला पूर्णतः संशोधित संस्करण में उपर्युक्त उद्धृत वक्तव्य में से खाली पहिला वाक्य के बदल के लिखलका (ग्रियर्सन 1909:108) -
क्रिया के रूपावली मैथिली व्याकरण के सबसे जटिल अंश हकइ। आंशिक रूप से विकसित सब्भे भाषा जइसन एकरा में बहुत कम्मे भाग हइ जेक्कर दू या तीन वैकल्पिक रूप नयँ होवे। ….. हमरा नयँ लगऽ हइ कि उ सब में अर्थ सम्बन्धी कोय भेद हकइ ।
आगे अपन बिहारी भाषा के बोली आउ उपबोली के सात व्याकरण (ग्रियर्सन 1883:I:27) में लिखलका -
एक तरह से क्रिया के रूप बहुत असान हइ। कोई विशेष काल के क्रिया के मूल रूप देल रहला पर असानी से सब्भे क्रियारूप बनावल जा सकऽ हइ, काहे कि सब्भे काल के पुरुष प्रत्यय लगभग समान होवऽ हइ।  लेकिन बिहारी भाषा के क्रिया में एक कठिनाई हइ, जे हिन्दी भाषा के छात्र सब लगी अनजान हइ - ई हइ प्रत्येक पुरुष लगी पुरुष प्रत्यय के विविधता। कभी-कभी तो एक्के पुरुष में छो-छो प्रत्यय तक होवऽ हइ, जेकरा में से विकल्प के रूप में केकरो प्रयोग कइल जा सकऽ हइ

महावैयाकरण पं॰ दीनबन्धु झा ऊ पहिला विद्वान् हला जे मैथिली के जटिल क्रियारूप के सम्पूर्ण व्याख्या कइलका आउ सिद्ध कइलका कि मैथिली क्रिया रूपावली बिलकुल क्रमबद्ध (systematic) हइ, जेकरा से ऊ ग्रियर्सन जइसन कते भाषाशास्त्री के भ्रान्ति तोड़े में सफल होला।

अभी तक मगही के जे कुछ व्याकरण निकलले ह, ऊ सब या तो अंग्रेज़ी व्याकरण या हिन्दी व्याकरण के आधार पर रचल गेले ह। मगही-व्याकरण के क्षेत्र में डॉ॰सम्पत्ति अर्याणी के योगदान में प्रो॰ रामनाथ शर्मा लिखलथिन ह (2001:11) -  

यौधेय जी के मगही भासा के बेआकरन, पहिला भाग प्रकाशित तो ३० अगस्त १९५६ के भेल, बाकि ओकरा हम ग्रियर्सन साहेब के ढंग पर लिखल मानऽ ही। ५६ पेज के रचना में १९१ नियम आयल हे। ईमानदार लेखक के सराहना ई लेल करे लाइक हे कि ऊ निवेदन में स्पष्ट कर देलन हे - हम डाक्टर ग्रियर्सन साहेब के रिनी ही। उनकर बेआकरन के केतना बात हम लेली हे। नियम २२, २४, २५, २६, ३३, ३९, ४०, ६८, ६९, ८१, ८८, ९२ से ९७ तक आउ १२९ से १३८ तक में देल विचार करीब-करीब बिल्कुले उनकरे गिरामर के विचार हे।

डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी के बारे में ऊ लिखलथिन ह (2001:18) -
इनकर व्याकरण मगही के सब व्याकरण के अपेक्षा जादे सर्वांगपूर्ण, व्यापक, प्रामाणिक आउ शुद्ध हे।

लेकिन ई व्याकरण के सर्वांगपूर्ण व्याकरण नञ् मानल जा सकऽ हइ, काहे कि मैथिली के जइसने मगहियो के जे क्रियारूप में क्लिष्टता हकइ ओकरा बारे में कुच्छो विवेचन नञ् मिलऽ हइ - केलॉग (1938) के हिन्दी व्याकरण (जेकरा में अन्य भाषा के अलावे मगही आउ मैथिली के भी कुछ चर्चा कइल गेले ह) जइसन ही  पुरुष आउ काल के अन्तर्गत क्रिया के विविध रूप के खाली सूची देके काम चला लेवल गेले ह। केक्कर काहाँ प्रयोग कइल जा हइ, एकरा बारे कुच्छो उल्लेख नञ् हइ। मगही के जउन व्याकरण में मगही क्रियारूप के क्लिष्टता के पूर्ण व्याख्या नञ् मिले ओकरा वास्तव में मगही व्याकरण कहले नञ् जा सकऽ हइ, काहे कि क्रियारूप के क्लिष्टता ही मगही (आउ मैथिली) के विशेषता हइ जे संसार के आउ कउनो भाषा में नञ् पावल जा हइ। भोजपुरी में भी क्रियारूप के क्लिष्टता नञ् हइ - "भोजपुरी क्रियाओं के रूप में मैथिली तथा मगही क्रियाओं के रूप की जटिलता का सापेक्षिक अभाव है।" (तिवारी 1936:3)

अब पं॰ दीनबन्धु झा के मैथिली व्याकरण मिथिला-भाषा-विद्योतन (1946; पुनर्मुद्रण 1993) के पं॰ गोविन्द झा के अंग्रेज़ी भूमिका से मैथिली क्रियारूप के विविधता के कुछ अन्दाज प्रस्तुत कइल जा रहले ह जेकरा में अर्थ के सूक्ष्म अन्तर भी देखावल गेले ह (1993:xvi-xvii) -

सामान्य भूतकाल में हिन्दी क्रिया के चारे रूप होवऽ हइ (देखा, देखे, देखी, देखीं), जबकि मैथिली में कम से कम उनइस रूप। प्रत्येक रूप के अपन-अपन पृथक् अर्थ होवऽ हइ। प्रत्येक अर्थ लगी पृथक् प्रत्यय होवऽ हइ, आउ कइएक संयुक्त अर्थ लगी कइएक प्रत्यय के जोड़ल जा सकऽ हइ। ई तरह, प्रसंग के अनुसार, अंग्रेज़ी के सरल वाक्य “he went” के अनुवाद मैथिली में निम्नलिखित आठ तरह से कइल जा सकऽ हइ

(1) ओ गेल he (of lower grade) went (for himself).
(2) ओ गेलैक – he (of lower grade) went (for a third person of lower grade).
(3) ओ गेलहु – he (of lower grade) went (for you, i.e. for a second person of higher grade).
(4) ओ गेलौक – he (of lower grade) went (for you, i.e. for a second person of lower grade).
(5) ओ गेलैन्हि – he (of lower grade) went (for a third person of higher grade).
(6) ओ गेलाह – he (of higher grade) went (for himself).
(7) ओ गेलथीन्ह – he (of higher grade) went (for a third person of either of higher or of lower grade).
(8) ओ गेलथून्ह – he (of higher grade) went (for you, i.e. for a second person either of higher or of lower grade).

दिनांक 15 सितम्बर 2011 के पं॰ गोविन्द झा जी से होल फोन पर बातचीत से ई पता चलल कि मैथिली में उपर्युक्त वाक्य सब के क्रियारूप में के उच्चारण बहुत लघु अर्थात् पाणिनि के तकनीकी शब्द के अनुसार लघु प्रयत्नतरहोवऽ हइ, विशेष करके वक्ता जब धारा प्रवाह बोलऽ हई तब तो एकर ध्वनि लगभग अश्रव्य (inaudible) होवऽ हइ। ई बात भी ध्यातव्य हइ कि मैथिली ’ ‘के उच्चारण मगहिये नियन अइ’, ‘अउकइल जा हइ। ई तरह गेलहु’, ‘गेलैन्हि’, ‘गेलाह’, ‘गेलथीन्ह’, ‘गेलथून्ह’  के उच्चारण लगभग गेलउ’, ‘गेलइनि’, ‘गेला’, ‘गेलथीन’, ‘गेलथूनहोवऽ हइ। गेलइनिके उच्चारण कुछ लोग गेलनया गेलइनभी करऽ हथिन।

अतः मैथिली के उपर्युक्त आठ वाक्य के मगही में समानान्तर वाक्य के क्रमशः ई तरह लिक्खल जा सकऽ हइ – “ऊ गेल / गेलइ / गेलो / गेलउ / गेलन / गेला / गेलथिन / गेलथुन

एतने नञ्, मगही में एक रूप आउ होवऽ हइ - ऊ गेलथन”, जेकर समानान्तर रूप लगऽ हइ कि मैथिली में नञ् पावल जा हइ। "गेलथन, गेलथिन, गेलथुन" के स्थान पर क्रमशः "गेलखन, गेलखिन, गेलखुन" के प्रयोग भी होवऽ हइ। "गेलथिन, गेलथुन"  के स्थान पर नकार के लोप के साथ आउ अन्तिम स्वर के दीर्घ रूप होके "गेलथी, गेलथू"  के भी प्रयोग पावल जा हइ। ओहे तरह से "गेलखी, गेलखू" के भी। ई सब क्रियारूप सामान्यतः नालन्दा जिला के मुख्यालय बिहारशरीफ (250 11' 55" उ॰, 850 31' 8" पू॰) के क्षेत्र में आउ विशेष कर के प्रकृत लेखक के गाँव, डिहरा (250 16' 47" उ॰, 850 32' 45" पू॰) में प्रयुक्त मगही के देल गेले ह। ई गाँव, बिहारशरीफ से आठ कि॰मी॰ उत्तर स्थित रहुई रोड रेल्वे स्टेशन से दो कि॰मी॰ पूरब आउ रहुई से करीब डेढ़ कि॰मी॰ पच्छिम पड़ऽ हइ।

मगही आउ मैथिली क्रियारूप के तुलनात्मक अध्ययन (प्रसाद 2011) नामक आलेख में पं॰ दीनबन्धु झा लिखित मिथिलाभाषा-विद्योतन’ (1946) के आधार पर भूत, वर्तमान आउ भविष्य काल में कुछ धातु के मगही के प्रत्येक क्रियारूप के मैथिली क्रियारूप से तुलना करके सैद्धान्तिक रूप से अलग-अलग सन्दर्भ में उचित प्रयोग दर्शावे के प्रयास कइल गेले ह। मगही व्याकरण विशेषज्ञ के मैथिली के विविध क्रियारूप के सूक्ष्म अन्तर के परिशीलन करके मगही में अइसन सूक्ष्म अन्तर हो सकऽ हइ कि नञ् एकर निर्धारण करके मगही व्याकरण में नियम निश्चित करे के चाही।

मगही महोत्सव, राजगीर (17-18 जुलाई 2011) के दौरान एक विद्वान पेट में आउ पेटवा में - ई दूनू रूप के प्रयोग में की सूक्ष्म अन्तर हइ एकर समस्या रखलथिन। आउ केकरो कोय जवाब देते नञ् देखलिअइ त हम डॉ॰ शीला वर्मा (2003:506) के विचार सामने प्रस्तुत कइलिअइ आउ बतइलिअइ कि ई -आ (पूर्व में अकार या वकार आगम सहित) प्रत्ययान्त शब्द अंग्रेज़ी के दी (the) आदि अर्थ अर्थात् निश्चितता प्रकट करऽ हइ जबकि बिना एकरा के अनिश्चितता के। जइसे

(1)       ‘मोटरी में – in a bundle; लेकिन मोटरिया में in the bundle.

(2)        ई काम तो एगो लड़का भी कर सकऽ हइ – Even a boy can do this work.
            ई काम तो एगो लड़को कर सकऽ हइ – Even a boy can do this work.
ऊ लड़कावा के पूछहो न –  (Please) ask that boy.

(3)       अहो, लगऽ हइ कि रसीदिया के एगो किताब में रख देलिये हल, हमरा मिलिये नञ् रहल ह।
बाउ जी, ई कितब्बा में खोजलहो ह ?

‘- प्रत्यान्त व्यक्तिवाचक संज्ञा के प्रयोग अनादरार्थ सूचित करऽ हइ। जइसे -

(1)       कमेसर जी के पूछहो न। (आदरार्थ)
कमेसरा के पूछहो न। (अनादरार्थ)

सन्दर्भः
  1. आचार्य किशोरीदास वाजपेयी (1949): “राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण”, जनवाणी प्रकाशन, कलकत्ता; पुनर्मुद्रण - विष्णुदत्त राकेश द्वारा सम्पादित आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रन्थावली, भाग-1 (ब्रजभाषा व्याकरण, राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण, साहित्यिकों के पत्र)”, वाणी प्रकाशन, 2-, दरियागंज, नयी दिल्ली; 2008 ई॰; कुल - 399 पृष्ठ;  राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण”, पृ॰181-324।

  1. डॉ॰ डी॰एन॰ शंकर भट (2001): “कन्नडक्कॆ बेकु कन्नडद्दे व्याकरण (कन्नड के चाही कन्नडे के व्याकरण), द्वितीय परिष्कृत संस्करण, भाषा प्रकाशन, मैसूरु; वितरक - अत्रि बुक सेंटर, 4, अरावति कट्टड, बल्मठ, मंगळूरु-575001; कुल - 202 पृष्ठ। (कन्नड में)

  1. प्रो॰ रामनाथ शर्मा (2001): मगही-व्याकरण के क्षेत्र में डॉ॰सम्पत्ति अर्याणी के योगदान”, अलका मागधी, दिसम्बर, पृ॰11-12, 18.

  1. डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी (1993): “मगही व्याकरण प्रबोध”, प्रथम खण्डः व्याकरण-प्रभाग (कुल 16 अध्याय), द्वितीय खण्डः काव्यांग-विवेचन (कुल 6 अध्याय), तृतीय खण्डः मगही भाषा के कुछ समस्या (कुल 4 अध्याय); संदीप प्रकाशन, टेकारी रोड, पटना, 288+64+32+3 पृष्ठ।

  1. डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी (1992): “मगही व्याकरण आउर रचना”, संदीप प्रकाशन, टेकारी रोड, पटना; 263 पृष्ठ।

  1. Rev. S.H. Kellogg (1938): “A Grammar of the Hindi Language” (in which are treated the High Hindi, Braj, and the Eastern Hindi of the रामायण of तुलसीदास, Also the Colloquial Dialects of राजपुताना, कुमाऊँ, अवध, रीवा, भोजपुर, मगध, मिथिला etc.), Third Edition, London, Kelgan Paul, Trench, Trubner and Co. Limited; xxxiv+584 pp.
  2. Grierson, George A. (1881): “An Introduction to the Maithili Language of North Bihar”, Part I – Grammar. Calcutta: The Asiatic Society. Second Edition – 1909; Calcutta: The Asiatic Society, 57, Park Street.
  3. Grierson, George A. (1883): “Seven Grammars of the Dialects and Subdialects of the Bihari Language”, Part I. INTRODUCTORY. Calcutta: Bengal Secretariat Press. Reprint: Varanasi/ Delhi: Bhartiya Publishing House, 1980.
  4. Sheela Verma (2003): “Magahi” in: The Indo-Aryan Languages (Cardona, George and Jain, Dhanesh, Eds.; London and New York: Routledge.). Ch.13, pp.498-514.
  5. दीनबन्धु झा (1946): “मिथिला-भाषा-विद्योतन”, दरभंगा: मैथिली साहित्य परिषद्पुनर्मुद्रण 1993; प्रकाशक - गोविन्द झा, पटेलनगर, पटना; xxvii+270+vi पृष्ठ।
  6. नारायण प्रसाद (2011): “मगही आउ मैथिली क्रियारूप के तुलनात्मक अध्ययन”, अलका मागधी, फरवरी, पृ॰5-10.
  7. Sayce, Archibald Henry (1880): “Introduction to the Science of Language”, Vol.II;  C.K. Paul & Co.,  London.  vi+ 421 pp.+ list of books published by C.K. Paul & Co. (36 pp.).
  8.  पं॰ गोविन्द झा (2011): "मैथिलीक क्रियापद-रूपावली" (व्यक्तिगत ई-मेल से प्राप्त लेख, दिनांक 25 सितम्बर)।
  9. डॉ॰ उदयनारायण तिवारी (1936): “भोजपुरी भाषा और साहित्य”, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
[प्रकाशितः मगही पत्रिका, मार्च-अप्रैल 2012, पृ॰21-24]