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Monday, July 09, 2018

"त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?" - अध्याय-02


2.

जब हम ई शहरी गरीबी के बारे शहर के लोग से बात कइलिअइ त हमरा हमेशे कहल गेलइ - "ओ ! जे अपने देखलथिन ई सब तो कुच्छो नयँ हइ । अपने ख़ित्रोव बजार आउ हुआँ के लोकल रैनबसेरा (doss-houses) में घुमके देखथिन । हुआँ परी अपने के वास्तविक "सुनहरा कंपनी" (अर्थात् बिलकुल कंगाल लोग के जमघट) देखे लगी मिलतइ । एगो विदूषक हमरा से बोललइ कि ई तो अभी कंपनी नयँ रह गेले ह, बल्कि एगो सुनहरा रेजिमेंट बन चुकले ह - काहेकि ओकन्हीं के संख्या एतना जादे हइ । विदूषक के कहना सच हलइ, लेकिन ऊ आउ अधिक सच होते हल अगर ऊ कहते हल कि अइसनकन लोग के मास्को में अभी न कंपनी हइ, न रेजिमेंट, बल्कि एकन्हीं के पूरा सेना हइ, हमरा लगऽ हइ कि लगभग 50 हजार होतइ । शहर के पुरनकन वाशिंदा लोग जब हमरा शहरी गरीबी के बारे बतइते जा हलथिन, त हमेशे ई बात के कुछ खुशी के साथ बतवऽ हलथिन, मानूँ हमरा सामने गौरव महसूस करऽ हलथिन कि उनकन्हीं के ई बात के जनकारी हइ । हमरा आद पड़ऽ हइ जब हम लंदन गेलिए हल त हुआँ के बूढ़ा-पुरनियाँ लंदन के गरीबी के बारे बोलते बखत मानूँ गौरव अनुभव करऽ हलथिन । जइसे उनकन्हीं कहे लगी चाहऽ हलथिन, देखहो, हमरा हीं कइसन हालत हइ ।
आउ हमरा ई सब गरीबी के देखे के मन कइलकइ, जेकरा बारे हमरा बतावल गेलइ । कइएक तुरी हम ख़ित्रोव मार्केट दने जाय लगी रवानो होलिअइ, लेकिन हरेक तुरी हमरा भयंकर आउ शरमनाक अनुभव होलइ । "काहे लगी हम लोग के दुख-दर्द देखे लगी जइअइ, जेकन्हीं के हम मदत नयँ कर सकऽ हिअइ ?" एक अवाज कहलकइ। "नयँ, अगर तूँ हियाँ रहऽ हीं आउ शहरी जीवन के सब सुख-सुविधा देखऽ हीं, त जाहीं, आउ एहो देखहीं", दोसर अवाज कहलकइ ।
आउ अइकी तेसरा साल के दिसंबर महिन्ना में, कनकन्नी आउ तूफानी दिन में, हम शहरी गरीबी के ई केन्द्र, ख़ित्रोव मार्केट, दने चल पड़लिअइ । ई कामकाजी दिन हलइ, चार बजे के लगभग । जब सोल्यान्का स्ट्रीट से गुजरब करऽ हलिअइ, त हम अधिकाधिक लोग के विचित्र बस्तर में, जे ओकन्हीं के अप्पन बस्तर नयँ हलइ, आउ आउ अधिक विचित्र जुत्ता में, विशेष ढंग के रोगियाहा रूप-रंग आउ मुख्य रूप से, पूरे वातावरण के तरफ ओकन्हीं सब्भे के सामान्य रूप से उदासीनता (indifference)  नोटिस करे लगलिअइ । सबसे विचित्र, कउनो से नयँ मेल खाय वला बस्तर में एगो अदमी बिलकुल निफिक्किर होल जाब करऽ हलइ, स्पष्टतः ई बात के ओकरा कोय विचार दिमाग में नयँ हलइ कि ऊ दोसरा लोग के देखे में कइसन लगतइ । अइसनकन सब्भे लोग एक्के दिशा में जाब करऽ हलइ । रस्ता के बारे बिन पुछले, जे हम नयँ जानऽ हलिअइ, हम ओकन्हीं के पीछू-पीछू चल पड़लिअइ आउ बाहर ख़ित्रोव मार्केट में अइलिअइ । मार्केट में ओइसने औरतियन छेदे-छेद होल कपोत (house-coat), सलोप (women's coat), जैकेट, जुत्ता आउ गलोश (रबर के जलसह लमगर जुत्ता) आउ अपन पोशाक के भद्दापन के बावजूद ओतने स्वच्छंद, बूढ़ी आउ जवान, बैठल हलइ, कुछ तो बेचब करऽ हलइ, एन्ने-ओन्ने घुम्मब करऽ हलइ आउ गरियाब करऽ हलइ । मार्केट में बहुत कम लोग हलइ । स्पष्टतः मार्केट के समय खतम हो चुकले हल, आउ अधिकतर लोग मार्केट से होके पहाड़ी पर चढ़के जाब करऽ हलइ, सब कोय एक्के दिशा में । हम ओकन्हीं के पीछू-पीछू गेलिअइ । जेतने दूर आगू हम जइअइ, ओतने जादे ओइसनकन लोग एक्के रस्ता पर चलते नजर आवइ । मार्केट से होके गुजरते आउ स्ट्रीट से उपरे जइते, हम दू गो औरतियन तक पहुँच गेलिअइः एगो बूढ़ी आउ एगो जवान । दुन्नु कइसनो फट्टल-फुट्टल आउ हलका भूरा रंग के बस्तर में। ओकन्हीं चलते-चलते कुछ तो काम के बारे बतिआब करऽ हलइ ।
हरेक आवश्यक शब्द के बाद एगो चाहे दू गो अनावश्यक, अत्यंत अनुचित शब्द बोलल जा रहले हल । ओकन्हीं पीयल तो नयँ हलइ, कोय बात से चिंतित हलइ, आउ ओकन्हीं से भेंट हो जाय वलन, आउ ओकन्हीं से पीछू आउ आगू के मरद लोग, हमरा लगी ओकन्हीं के ई विचित्र बात दने कोय ध्यान नयँ देब करऽ हलइ । ई सब जगह में स्पष्टतः हमेशे अइसन बात करते जा हलइ । बामा करगी प्राइवेट रैनबसेरा हलइ, आउ कुछ लोग हियाँ रुक गेते गेलइ, जबकि दोसर लोग आगू बढ़ गेते गेलइ । पहाड़ी पर चढ़ते जइते बखत हमन्हीं कोना पर के एगो बड़गो घर भिर पहुँचते गेलिअइ । हमरा साथ जाय वला लोग में से अधिकतर ई घर भिर रुक गेते गेलइ । ई घर के समुच्चे फुटपाथ पर आउ स्ट्रीट के बरफ पर सब्भे ओइसनके लोग खड़ी आउ बैठल हलइ । प्रवेश-द्वार के दहिना दने - औरतानी, बामा दने - मरदानी । हम औरतियन भिर से गुजरलिअइ, मरद लोग भिर से गुजरलिअइ (कुल ओकन्हीं कइएक सो हलइ) आउ हुआँ रुक गेलिअइ, जाहाँ परी ओकन्हीं के कतार खतम होवऽ हलइ । ऊ घर, जाहाँ परी ई सब लोग इंतजार करब करऽ हलइ, हलइ ल्यापिन निःशुल्क रैनबसेरा। लोग के भीड़ रैनबसेरा में रात गुजारे वला हलइ आउ अंदर जाय देवे के इंतजार में हलइ । 5 बजे साँझ के दरवाजा खुल्लऽ हइ आउ लोग के अंदर जाय देवल जा हइ । लगभग ऊ सब्भे लोग, जेकन्हीं तक पीछू-पीछू अइलिए हल, हिएँ परी आब करऽ हलइ ।
हम हुआँ रुकलिअइ, जाहाँ परी मरद लोग के कतार खतम होवऽ हलइ । हमर सबसे नगीच वला लोग हमरा दने तक्के लगलइ आउ अपन नजर से हमरा घिंच्चे लगलइ । ई सब के देह के ढँक्के वला फट्टल-फुट्टल बस्तर कइएक तरह के हलइ । लेकिन ई सब लोग के हमरा दने निर्दिष्ट नजर के अभिव्यक्ति बिलकुल एक्के नियन हलइ । सब्भे नजर में ई प्रश्न के अभिव्यक्ति हलइ - "काहे लगी, दोसर दुनियाँ वला अदमी, तूँ हियाँ हमन्हीं भिर आके रुकलहीं? तूँ केऽ हकहीं? कहीं तूँ ऊ स्वयं-संतुष्ट धनी व्यक्ति तो नयँ, जे हमन्हीं के गरीबी पर खुशी मनावे लगी चाहऽ हइ, जे अपन उकताहट से ध्यान हटावे लगी चाहऽ हइ आउ हमन्हीं के सतावे लगी चाहऽ हइ ? चाहे कहीं तूँ ऊ हीं, जेकर न तो अस्तित्व हइ आउ न हो सकऽ हइ - अदमी जेकरा हमन्हीं पर तरस आवऽ हइ?" सब के चेहरा पर ई सवाल हलइ। हमरा दने तक्कइ, नजर मिलावइ आउ मुड़ जाय। हमरा केकरो साथ बतियाय के मन कर रहले हल, आउ हम देर तक निर्णय नयँ कर पा रहलिए हल। लेकिन जबकि हमन्हीं चुप हलिअइ, हमन्हीं के नजर हमन्हीं के नगीच ला चुकले हल। जिनगी हमन्हीं के चाहे केतनो अलगे कइले रहइ, दू-तीन नजर मिलला पर हमन्हीं अनुभव कइलिअइ कि हमन्हीं दुन्नु अदमी हिअइ आउ एक दोसरा से डरना भूल गेते गेलिअइ। हमर सबसे नगीच खड़ी हलइ सुज्जल चेहरा आउ लाल दाढ़ी वला एगो मुझीक, जे फट्टल-फुट्टल कफ्तान में आउ अपन नंगा गोड़ में फट्टल गलोश (galoshes) पेन्हले हलइ। तापमान -80 रोमर (-100 सेंटीग्रेड) हलइ । हमर ओकरा साथ तेसर या चौठा बेरी नजर मिललइ आउ हम ओकरा साथ अइसन नगीची अनुभव कइलिअइ कि ओकरा साथ बातचीत शुरू करे में शरम के बात नयँ हलइ, बल्कि ओकरा साथ कुछ नयँ बोलना शरम के बात हलइ । हम पुछलिअइ कि ऊ काहाँ से अइले ह । ऊ खुशी से जवाब देलकइ आउ बातचीत करे लगलइ; दोसर लोग आउ नगीच चल अइते गेलइ । ऊ स्मोलेन्स्क के हलइ, काम के खोज में अइले हल ताकि अपन रोजी-रोटी कमा सकइ आउ टैक्स चुका सकइ । "कोय रोजगार नयँ", ऊ बोलऽ हइ, "सैनिक लोग आझकल सब्भे काम ले लेते गेलइ । ओहे से अइकी हम मारल-फिरल बुलऽ हिअइ । भगमान कसम, दू दिन से हम कुछ नयँ खइलिए ह", ऊ सतर्कतापूर्वक बोललइ, मुसकाय के प्रयास करते । स्बितेन (sbiten - पानी, मध आउ मसाला से बन्नल एगो गरम पेय) के बिक्रेता, एगो पुरनका सैनिक हिएँ परी खड़ी हलइ । हम ओकरा बोलइलिअइ। ऊ एक गिलास स्बितेन ढरलकइ । मुझीक गरम गिलास अपन हाथ में लेलकइ आउ पीए के पहिले, एकर गरमी कहीं बेकार में बरबाद नयँ हो जाय, एकरा से अपन हाथ गरम कइलकइ । हाथ गरम करते-करते ऊ अपन साहसिक कार्य के बारे बतइलकइ । साहसिक कार्य या साहसिक कार्य से संबंधित कहानी लगभग सब्भे एक्के ढंग के होवऽ हलइ - एगो छोटगर काम हलइ, फेर समाप्त हो गेलइ, आउ हियाँ रैनबसेरा में पैसा आउ टिकट (पासपोर्ट) सहित बटुआ चोरी हो गेलइ । अब मास्को से बाहर जाल नयँ जा सकऽ हलइ । ऊ कहलकइ कि दिन में ऊ कलाली में खुद के गरम करऽ हइ, कलाली में जे कुछ ब्रेड के टुकड़ा मिल जा हइ ओहे खाके रहऽ हइ; कभी दे देते जा हइ, कभी भगा देते जा हइ । हियाँ ल्यापिन रैनबसेरा में फोकट में रात गुजारऽ हइ । इंतजार करब करऽ हइ पुलिस के छापा के, जे पासपोर्ट नयँ रहे के कारण ओकरा पकड़के जेल में डाल देतइ आउ एताप पर (etape - मार्गरक्षक के अधीन बाकी लोग के साथ पैदल) ओकरा अपन गाँव भेज देतइ। "लोग के कहना हइ कि छापा बेहस्पत के होतइ", ऊ कहलकइ, "तखने पुलिस पकड़ लेतइ । त खाली बेहस्पत के पहिले तक हियाँ रहना हो सकतइ ।" [जेल आउ एताप ओकरा लगी प्रतिज्ञात भूमि (Promised Land) हइ ।]
जब ऊ ई बात बता रहले हल, त भीड़ में से तीन अदमी ओकर बात के पुष्टि कइलकइ आउ कहलकइ कि ओकन्हिंयों के हालत बिलकुल एहे हइ ।
एगो दुब्बर-पातर युवक, पीयर, लमगर नाक वला, शरीर के बाहरी हिस्सा पर खाली एगो कमीज में, जे कन्हा पर फट्टल हलइ, आउ बिन छज्जा वला टोपी में, भीड़ के चीरते हमरा दने अइलइ । ऊ ठंढी के चलते लगातार जोर-जोर से काँप रहले हल, लेकिन मुझीक के बात पर घृणापूर्वक मुसकाय के प्रयास कइलकइ, ई तरह से हमर टोन में आवे के आशा करते आउ हमरा दने तकते रहलइ । हम ओकरो एक गिलास स्बितेन पेश कइलिअइ। ओहो गिलास लेके ओकरा से हाथ सेंकलकइ आउ कुछ बोलहीं लगी शुरू कइलकइ कि ओकरा बगल में ढकेल देलकइ एगो लमछड़, कार, हुकदार नाक वला अदमी, जे छींट के कमीज आउ वेस्टकोट में, लेकिन बिन टोपी के हलइ । हुकदार नाक वला अदमी भी स्बितेन मँगलकइ । फेनु अइलइ कमर बिजुन रस्सी से बान्हल ओवरकोट में, छाल के जुत्ता पेन्हले, नीसा में धुत्त, फानाकार (wedge-shaped) दाढ़ी वला एगो लमछड़ बुढ़उ । फेनु अइलइ सुज्जल चेहरा आउ पनियाल आँख वला एगो छोटगर अदमी, जे भूरा रंग के नानकीन जैकेट में हलइ आउ ओकर ग्रीष्मकालीन पतलून के भुड़वन से देखाय देब कर रहल दुन्नु टेहुना ठंढी से दलदलइते एक दोसरा से टकरा रहले हल । कँपकँपाहट के चलते ऊ गिलास के स्थिर नयँ रख पइलकइ आउ खुद पर छलका लेलकइ। लोग ओकरा बुरा-भला कहे लगलइ । ऊ खाली करुणापूर्वक मुसकइलइ आउ कँपते रहलइ । फेर अइलइ टुट्टल-फुट्टल जुत्ता पेन्हले चिथड़ा में एगो कुबड़ा अपाहिज, फेनु अइसन अदमी जे देखे में अफसर नियन लगऽ हलइ, फेनु अइसन अदमी जे पादरी नियन हलइ, फेनु एगो विचित्र नकटा अदमी - ई सब्भे भुक्खल आउ ठंठी से ठिठुरल, मिन्नत करते नम्रतापूर्वक हमरा चारो दने से घेर लेलकइ आउ स्बितेन लगी हमर आउ नगीच आ गेते गेलइ । ओकन्हीं स्बितेन पीके ओरिया देते गेलइ । एक अदमी पैसा मँगलकइ, हम दे देलिअइ । फेर दोसरा मँगलकइ, तेसरा आउ पूरा भीड़ हमरा घेर लेलकइ । अव्यवस्था आउ धक्कामुक्की चालू हो गेलइ । पड़ोस के घर के दरबान भीड़ पर चिल्लइलइ कि ओकर घर के सामने के फुटपाथ खाली कर देते जाय आउ भीड़ ओकर औडर के तुरते मान लेते गेलइ । भीड़ में से संचालक लोग आगू अइते गेलइ आउ हमरा अपन संरक्षण में ले लेते गेलइ - हमरा धक्कामुक्की से बाहर लावे लगी चहलकइ, लेकिन भीड़, जे पहिले फुटपाथ के किनारे-किनारे फैल गेते गेले हल, अब पूरा अव्यवस्थित हो गेलइ आउ हमरा दने जौर होवे लगलइ । सब कोय हमरा दने तक्के लगलइ आउ भीख माँगे लगलइ; आउ एक चेहरा दोसरा से अधिक दयनीय, निढाल आउ दीन-हीन हलइ । हमरा हीं जे कुछ हलइ ऊ सब दे देलिअइ । हमरा हीं पैसा थोड़हीं हलइ - एहे लगभग 20 रूबल, आउ हम भीड़ के साथ रैनबसेरा में प्रवेश कइलिअइ । रैनबसेरा अच्छा बड़गर हइ । एकरा में चार भाग हइ । उपरौका तल्ला पर मरदानी, आउ निचलौका पर औरतानी के । सबसे पहिले हम औरतानी वला भाग में प्रवेश कइलिअइ; बड़गर कमरा हइ जे पूरा बिछौना से भरल हइ, तेसरा दर्जा के रेलगाड़ी के डिब्बा नियन । बिछौना सब दू तल्ला करके सजावल हइ - उपरे आउ निच्चे । विचित्र, एक्के चिथड़ा बस्तर में, बूढ़ी आउ नौजवान औरतियन अंदर प्रवेश करते गेलइ आउ अपन-अपन जगह पर गेते गेलइ, कुछ निच्चे आउ कुछ उपरे । कुछ बुढ़ियन क्रॉस के चिह्न बनइते गेलइ आउ ई अनाथाश्रम बनावे वला लगी प्रार्थना करते गेलइ, जबकि कुछ लोग हँसलइ आउ बुरा-भला कहलकइ । हम उपरौला तल्ला पर गेलिअइ । हुओं परी मरद लोग अपन-अपन जगह पर गेते गेलइ; ओकन्हीं बीच एगो ओकरो देखलिअइ जेकरा हम पैसा देलिए हल । ओकरा देखके हमरा अचानक बहुत शरमिंदगी महसूस होलइ, आउ हम बाहर निकस जाय लगी जल्दीबाजी कइलिअइ । आउ एगो पक्का अपराध के अनुभव करते हम ई घर से बाहर निकस गेलिअइ आउ घर रवाना हो गेलिअइ । घर पर दरी लग्गल जीना से होके ड्योढ़ी में प्रवेश कइलिअइ, जेकर फर्श कपड़ा से आच्छादित हलइ, आउ फ़र-कोट उतारके पाँच कोर्स वला डिनर लगी बैठ गेलिअइ, जेकरा में दू गो नौकर ड्रेस कोट, उज्जर टाई आउ उज्जर दस्ताना में भोजन परोसे वला हलइ ।
तीस साल पहिले हम पेरिस में देखलिअइ कि कइसे हजारो दर्शक के बीच एगो अदमी के सिर गिलटिन (guillotine) से काट देवल गेलइ । हम जानऽ हलिअइ कि ई अदमी एगो भयंकर अपराधी हइ; हम ऊ सब तर्क के बारे जानऽ हलिअइ जे एतना शताब्दी से अइसन अपराध लगी ई तरह के कार्रवाई करे के पक्ष में लोग लिख रहते गेले ह; हम जानऽ हलिअइ कि ई जानबूझके आउ सोद्देश्य कइल जा रहले ह; लेकिन ऊ पल, जब सिर आउ शरीर अलगे हो गेलइ आउ बक्सा में गिर गेलइ, तब हमरा आह निकस गेलइ आउ विवेक से चाहे हृदय से नयँ, बल्कि अपन पूरे अस्तित्व (being) से अनुभव कइलिअइ कि ऊ सब्भे तर्क, जे हम मृत्यु दंड के बारे सुन रहलिए हल, निर्दय बकवास हइ; कि ई हत्या करे खातिर चाहे केतनो लोग एक जगुन जामा होते गेले होत, चाहे खुद के कुच्छो कहते जाय, हत्या संसार में सबसे घोर अपराध हइ; कि ई पाप हमर आँख के सामने कइल गेलइ । हम अपन उपस्थिति से आउ दखल नयँ देवे के चलते हम ई पाप के अनुमोदन कइलिअइ आउ एकरा में भाग लेलिअइ । ओइसीं अभी, ई भूख, ठंढी आउ हजारो लोग के अपमान के सामने, हम विवेक से चाहे हृदय से नयँ, बल्कि अपन पूरे अस्तित्व से अनुभव कइलिअइ कि मास्को में दसो हजार अइसन लोग के अस्तित्व - तब जबकि अन्य हजारो लोग के साथ हम फ़िलेट आउ स्टर्जन (fillet and sturgeon) के मांस रज-रजके खइते जा हिअइ आउ अपन घोड़वन के आउ फर्श के कपड़ा से चाहे दरी से आच्छादित करते जा हिअइ, तब चाहे दुनियाँ के सब्भे विद्वान लोग हमरा एकर अनिवार्यता के बारे कुच्छो बोलइ - एगो अपराध हइ, एक तुरी कइल नयँ, बल्कि लगातार कइल जा रहल अपराध, कि हम अपन ठाट-बाट के साथ एकर अनदेखी करते जा हिअइ बल्कि एकरा में सीधे भागीदार हकिअइ । हमरा लगी मस्तिष्क पर पड़ल ई दुन्नु छाप में भेद बस एतने हलइ कि हुआँ परी हम खाली एतने कर सकऽ हलिअइ कि हत्या के प्रबंध कइले गिलटिन भिर खड़ी ऊ हत्यारा लोग के तरफ चिल्लइतिए हल कि ओकन्हीं गलत काम करब करऽ हइ आउ यथासंभव दखल देवे के प्रयास करतिए हल । लेकिन अइसन करतहूँ हमरा पहिलहीं से ई पता होते हल कि हमर ई हरक्कत से हत्या रुक नयँ सकतइ । आउ हियाँ परी हम खाली स्बितेन आउ खाली ऊ नगण्य पैसा नयँ दे सकऽ हलिअइ, जे हमरा पास हलइ, बल्कि अपन ओढ़ले ओवरकोट आउ ऊ सब कुछ जे हमर घर में हइ  । लेकिन हम अइसन नयँ कइलिअइ आउ ओहे से अनुभव कइलिअइ, अनुभव करऽ हिअइ, आउ तब तक लगातार कइल जा रहल अपराध के भागीदारी अनुभव करना नयँ बंद करबइ, जब तक हमरा पास अतिरिक्त भोजन रहतइ आउ दोसरा के पास बिलकुल कुछ नयँ रहतइ, हमरा हीं दू पोशाक रहतइ आउ केकरो पास एक्को नयँ रहतइ ।


Monday, June 04, 2018

"त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?" - अध्याय-01


त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?
आउ लोग ओकरा पुछलकइ, त हमन्हीं के कीऽ करे के चाही ? आउ ऊ जवाब में कहलकइ - जेकरा पास दू पोशाक हइ, ऊ ओकरा देइ जेकरा पास नयँ हइ; आउ जेकरा पास भोजन हइ, ओहो ओहे करइ । (ल्यूक, 3.10-11)
अपना लगी पृथ्वी पर खजाना जामा नयँ करऽ, जाहाँ परी फटिंगा आउ जंग बरबाद कर दे हइ आउ जाहाँ परी चोर सब सेंध लगाके चोरा लेते जा हइ ।
बल्कि अपना लगी स्वर्ग में खजाना जामा करऽ, जाहाँ परी न फटिंगा आउ न जंग बरबाद करऽ हइ आउ जाहाँ परी चोर सब सेंध लगाके चोरा नयँ पावऽ हइ । काहेकि जाहाँ परी तोहर खजाना हको, हुएँ परी तोहर मन रहतो ।
शरीर के दीपक आँख होवऽ हइ । ओहे से अगर तोहर आँख साफ रहतो, त तोहर पूरा शरीर प्रकाशित रहतो ।
लेकिन अगर तोहर आँख खराब होतो, त पूरा शरीर अन्हार रहतो । ओहे से, अगर प्रकाश जे तोहरा में हको, अगर अन्हार होतो त कइसन अन्हार ?
(एक्के साथ) दू मालिक के कोय नयँ सेवा कर सकऽ हइ; काहेकि या तो एगो से नफरत करतइ, आउ दोसरा के प्यार, चाहे एगो लगी समर्पित रहतइ, आउ दोसरा के खियाल नयँ कर पइतइ ।  भगमान आउ धन दुन्नु के एक साथ सेवा नयँ कर सकऽ हो ।
ओहे से हम तोहरा से कहऽ हियो - अपन आत्मा के चिंतन छोड़ऽ कि तोहरा कीऽ खाय के हको आउ कीऽ पीए के, आउ न अपन देह के फिकिर करऽ कि कीऽ पेन्हे के चाही । कीऽ आत्मा भोजन से अधिक महत्त्वपूर्ण नयँ हइ आउ शरीर पोशाक से?
ओहे से चिंता मत करऽ आउ ई मत बोलऽ - हम कीऽ खाम ? चाहे हम कीऽ पीयम ? चाहे हम कीऽ पेन्हम ?
काहेकि विधर्मी लोग ई सब खोजऽ हइ; आउ काहेकि स्वर्ग में रहे वला तोहर पिता जानऽ हथुन कि तोहरा ई सब के जरूरत हको ।
ओहे से सबसे पहिले भगमान के राज्य आउ उनकर सत्य के खोज करऽ, आउ ई सब चीज तो तोरा अइसीं दे देल जइतो । (मैथ्यू, 6.19-25, 31-34)
काहेकि एगो ऊँट के सूई के छेद से होके गुजर जाना कहीं अधिक असान हइ, बनिस्पत एगो धनमान के भगमान के राज्य में प्रवेश करे के । (मैथ्यू, 19.24; ल्यूक, 18.25; मार्क, 10.25)


1.

हम जिनगी भर शहर में नयँ रहलूँ हल । जब हम सन् 1881 में मास्को में रहे लगी अइलूँ, त हमरा शहर के गरीबी अचरज में डाल देलक । गाँव के गरीबी से हम परिचित हकूँ; लेकिन  शहर के गरीबी हमरा लगी नावा आउ अनजान हल । मास्को में अइसन कोय रोड से नयँ गुजरल जा सकऽ हइ, जेकरा पर भिखारी से भेंट नयँ होवइ, आउ खास करके ऊ भिखारी, जे ग्रामीण भिखारी नियन नयँ रहइ । ई सब भिखारी - झोला के साथ आउ क्राइस्ट के नाम पर भीख माँगे वला भिखारी नयँ हइ, जइसन कि ग्रामीण भिखारी लोग खुद के बतइते जा हइ, बल्कि बिन झोला आउ बिन क्राइस्ट के नाम वला भिखारी हइ । मास्को के भिखारी सब न तो झोला रक्खऽ हइ आउ न भीख माँगऽ हइ । अधिकांश में ओकन्हीं, भेंट होवे बखत चाहे खुद भिर से अपने के गुजरे देवे बखत, खाली अपने के साथ आँख से आँख मिलाके भेंट करे के प्रयास करऽ हइ । आउ अपने के नजर के आधार पर ओकन्हीं माँगतइ चाहे नयँ । भद्रजन (gentry) में से अइसन एगो भिखारी के बारे हमरा मालुम हइ । बुढ़उ धीरे-धीरे चल्लऽ हइ, हरेक कदम पर झुकते । जब ओकरा अपने साथ भेंट होतइ, त ऊ अपन एक गोड़ पर झुक जइतइ आउ लगतइ कि ऊ अपने के सलाम कर रहले ह । अगर अपने रुक जा हथिन, त ऊ कॉकेड टोपी (cockaded cap) उतार लेतइ, सलाम करतइ आउ भीख माँगतइ; आउ अगर अपने नयँ रुक्कऽ हथिन, त ऊ अइसन ढोंग करतइ कि अइसन ओकर चाले हइ, आउ ऊ आगू बढ़ जइतइ, ओइसीं दोसरा कदम पर झुकते। ई मास्को के एगो पढ़ल-लिक्खल वास्तविक भिखारी हइ । पहिले हमरा नयँ मालुम हलइ कि भिखरियन सब सीधे भीख काहे नयँ माँगऽ हइ, लेकिन बाद में समझ में अइलइ कि काहे ओकन्हीं नयँ माँगऽ हइ, लेकिन तइयो ओकन्हीं के परिस्थिति के बारे हम समझ नयँ पइलिअइ ।
एक तुरी, अफ़नास्येव गली से जइते बखत हम देखलिअइ कि एगो पुलिस के सिपाही, जलोदर से सुज्जल आउ चिथड़ा पेन्हले एगो मुझीक (देहाती/ किसान) के गाड़ी में बैठाब करऽ हइ ।  हम पुछलिअइ - "काहे लगी ?"
सिपाही हमरा उत्तर देलकइ - "भीख माँगे के कारण ।"
"की वास्तव में एकर निषेध हइ ?"
"लगऽ तो हइ कि निषेध हइ", सिपाही उत्तर देलकइ ।
जलोदर पीड़ित के गाड़ी में लेके चल गेते गेलइ । हम दोसर गाड़ी कइलिअइ आउ ओकन्हीं के पिछुअइलिअइ। हमरा जाने के मन कर रहले हल कि कीऽ ई बात सच हइ कि भीख माँगना वर्जित हइ, आउ हइ त कइसे ? हम कइसूँ समझ नयँ पइलिअइ कि एगो अदमी के दोसरा से कुछ माँगे के निषेध कइसे कइल जा सकऽ हइ, आउ एकरा अलावे, ई बात के विश्वास नयँ हो रहले हल कि भीख माँगे के निषेध हलइ, ओइसन हालत में जबकि मास्को भिखारी से भरल हइ ।
हम थाना में प्रवेश कइलिअइ, जाहाँ भिखरिया के ले जाल गेले हल । थाना में तलवार आउ पिस्तौल के साथ एगो अदमी टेबुल के पीछू बैठल हलइ । हम पुछलिअइ - "ई मुझीक के काहे लगी गिरफ्तार कइल गेलइ ?"
तलवार आउ पिस्तौल वला अदमी हमरा दने कठोरतापूर्वक देखलकइ आउ बोललइ - "अपने के एकरा से कीऽ मतलब हइ ?" तइयो, ई अनुभव करते कि हमरा कुछ न कुछ स्पष्टीकरण देहीं के चाही, ऊ आगू बोललइ - "प्राधिकारी अइसन लोग के गिरफ्तार करे के ऑडर दे हथिन; मतलब, अइसन करना जरूरी हइ ।"
हम चल गेलिअइ । ऊ सिपाही, जे भिखरिया के लइलके हल, प्रवेश-कक्ष के खिड़की के तलशिला (windowsill) पर बैठल उदास मुद्रा में एगो नोटबुक देखब करऽ हलइ । हम ओकरा पुछलिअइ - "कीऽ ई बात सच हइ कि क्राइस्ट के नाम पर भिखमंगवन के भीख माँगे के निषेध कइल हइ ?"
सिपाही होश में अइलइ, हमरा दने तकलकइ, फेर नाक-भौं त नयँ सिकुड़लइकइ, लेकिन फेर से निनारू होवे के ढोंग कइलकइ, आउ खिड़की के तलशिला पर बैठल-बैठल कहलकइ - "प्राधिकारी के ऑडर हइ - मतलब कि ई जरूरी हइ ।" आउ ऊ फेर से अपन नोटबुक में लीन हो गेलइ ।
हम बाहर ड्योढ़ी में कोचवान के पास गेलिअइ ।
"अच्छऽ, कीऽ होलइ ? की ओकरा गिरफ्तार कइल गेलइ ?" कोचवान के भी, लगऽ हइ, ई बात में रुचि हलइ।
"हाँ, गिरफ्तार कइल गेलइ", हम जवाब देलिअइ ।
कोचवान सिर हिलइलकइ ।
"कइसे ई तोहन्हीं हीं, मास्को में, क्राइस्ट के नाम पे भीख माँगना निषेध हइ ?" हम पुछलिअइ ।
"केऽ ओकन्हीं के जानऽ हइ !" कोचवान कहलकइ ।
"ई कइसन बात हइ", हम कहलिअइ, "कंगाल तो क्राइस्ट के लोग होवऽ हइ, आउ ओकरा थाना ले जाल जा हइ ?"
"अभी तो ई बात के रोक देवल गेले ह, इजाजत नयँ देल जा हइ", कोचवान कहलकइ ।
एकर बाद हम आउ कइएक बेरी देखलिअइ कि कइसे पुलिस भिखारी सब के थाना ले जा हइ आउ बाद में यूसुपोव दरिद्रालय (workhouse) । एक तुरी म्यास्नित्स्की स्ट्रीट पर अइसन भिखारी सब के भीड़ देखलिअइ, कोय तीस लोग के । आगू आउ पीछू पुलिस जा रहले हल । हम पुछलिअइ - "काहे लगी ?"
"भीख माँगे के चलते ।"
पता चललइ कि कानून के मोताबिक मास्को में ऊ सब्भे भिखारी लगी भीख माँगना निषिद्ध हइ, जेकन्हीं में से मास्को के हरेक स्ट्रीट में कइएक लोग से भेंट होवऽ हइ आउ हरेक चर्च के पास जेकन्हीं के कतार के कतार धार्मिक कृत्य (सर्विस) के दौरान आउ खास करके दफन के दौरान खड़ी रहऽ हइ ।
लेकिन काहे कुछ लोग के पकड़ल जा हइ आउ कहीं परी बंद कर देल जा हइ, जबकि दोसर लोग के छोड़ देल जा हइ? ई बात हम समझ नयँ पइलिअइ । या तो ओकन्हीं बीच कानूनी आउ गैरकानूनी भिखारी हइ, चाहे ओकन्हीं के संख्या एतना जादे हइ कि सबके पकड़ना असंभव हइ, चाहे जइसीं कुछ लोग के पकड़ल जा हइ कि दोसर सब फेर से पैदा हो जा हइ ? मास्को में भिखारी के कइएक प्रकार हइ - अइसनो हइ जे एकरे पर जीयऽ हइ; अइसनो वास्तविक भिखारी हइ, जे कोय कारण से मास्को चल अइलइ आउ वास्तव में कंगाल हइ।
ई सब भिखारी में से अकसर सरल किसान होते जा हइ, औरत आउ मरद दुन्नु, कृषक पोशाक में । अइसन लोग से हमरा अकसर भेंट होले ह ।  ओकन्हीं में से कुछ लोग हियाँ परी बेमार पड़ गेते गेलइ आउ अस्पताल से बाहर अइला पर न तो अपन पेट पाल सकऽ हइ आउ न मास्को से निकसके बाहर जा सकऽ हइ । एकरा अलावे, ओकन्हीं में से कुछ लोग रंगरेली मनावे लगलइ (अइसने हलइ शायद ऊ जलोदर पीड़ित अदमी) । कुछ लोग बेमार तो नयँ हलइ, लेकिन जेकर सब कुछ आग में जल गेलइ, चाहे बुढ़वन हइ, या बुतरू सब के साथ में औरतियन; जबकि कुछ लोग बिलकुल स्वस्थ हलइ, काम करे में सक्षम । ई सब बिलकुल स्वस्थ मुझीक, जे भीख माँगे वला हलइ, खास करके हमर ध्यान आकृष्ट कइलकइ । ई सब स्वस्थ, काम में सक्षम मुझीक-भिखारी हमर ध्यान आउ एहो कारण से आकृष्ट कइलकइ कि मास्को आवे के बखत से कसरत खातिर गोरैया पहाड़ी (Sparrow Hills) पर ऊ दू कृषक के साथ काम करे लगी जाय के हम आदत बना लेलिअइ, जे हुआँ परी आरा से लकड़ी चीरऽ हलइ । ई दुन्नु मुझीक बिलकुल ओइसने कंगाल हलइ, जइसन कि ओकन्हीं, जेकन्हीं से स्ट्रीट सब में हमरा भेंट होवऽ हलइ । एगो तो हलइ प्योत्र, सैनिक, कलुगा से, आउ दोसरा - मुझीक, सिम्योन, व्लादिमिर से । ओकन्हीं के पास कुछ नयँ हलइ, सिवाय तन पर कपड़ा आउ हाथ के । आउ ई हाथ से ओकन्हीं बहुत कठिन काम करके रोज 40 से 45 कोपेक अर्जित करऽ हलइ, जेकरा में से दुन्नु कुछ बचा लेते जा हलइ - कलुगा के प्योत्र भेड़ के खाल के कोट खातिर बचावऽ हलइ, आउ व्लादिमिर के सिम्योन ई लगी कि गाँव वापिस जाय खातिर पैसा जामा हो जाय । ओहे से अइसनकन लोग से स्ट्रीट में भेंट होला पर हम खास करके दिलचस्पी ले हलिअइ ।
काहे ओकन्हीं काम करते जा हइ, जबकि एकन्हीं भीख माँगऽ हइ ?
अइसन मुझीक से भेंट होला पर हम साधारणतः पुच्छऽ हलिअइ कि ऊ कइसे अइसन हालत में आ गेलइ । एक तुरी हमरा एगो स्वस्थ मुझीक से भेंट होवऽ हइ जेकर दाढ़ी उज्जर होवे लगले ह । ऊ भीख माँगऽ हइ; ओकरा पुच्छऽ हिअइ कि ऊ केऽ हइ, काहाँ से हइ । ऊ बोलऽ हइ कि ऊ कलुगा से काम लगी अइलइ । शुरू में काम मिललइ - पुराना लकड़ी के जलावन खातिर चीरे के काम । एक मालिक हीं एगो साथी के साथ लकड़ी चीरे के काम पूरा कर लेलकइ; फेर दोसर काम खोजलकइ, नयँ मिललइ, साथी ओकरा छोड़ देलकइ, आउ अब अइसीं दोसरा सप्ताह संघर्ष करब करऽ हइ, जे कुछ हलइ ऊ सब खा चुकले ह - अब न तो आरा आउ न कुल्हाड़ी खरदे लगी कुछ हइ । हम आरा खरदे लगी ओकरा पैसा दे हिअइ आउ ओकरा ऊ जगह के इशारा से बतावऽ हिअइ, जाहाँ परी काम पर आवे के चाही । हम पहिलहीं प्योत्र आउ सिम्योन के साथ बात पक्का कर लेलिए हल कि ओकन्हीं एगो आउ साथी के काम पर ले लेइ आउ ओकरा लगी एगो जोड़ी खोज देइ ।
"देखिहँऽ, आ जइहँऽ । हुआँ परी बहुत काम हउ ।"
"आ जइबइ, कइसे नयँ अइबइ ! की हमरा मन करतइ कि भीख माँगिअइ । हम काम कर सकऽ हिअइ ।" ऊ बोलऽ हइ।
मुझीक कसम खा हइ कि अइतइ, आउ हमरा लगऽ हइ कि ऊ धोखा नयँ देतइ आउ आवे के ओकर इरादा हइ।
दोसरा दिन हम दुन्नु परिचित मुझीक भिर आवऽ हिअइ । पुच्छऽ हिअइ, कीऽ ऊ मुझीक अइलइ । नयँ अइलइ। आउ ई तरह से कइएक लोग हमरा धोखा देलकइ । हमरा ओइसनो लोग धोखा दे हलइ, जे बोलऽ हलइ कि ओकरा खाली टिकट लगी पैसा के जरूरत हइ ताकि घर वापिस जा सकइ, आउ एक सप्ताह के बाद फेर से स्ट्रीट में मिल जा हलइ । ओकन्हीं में से कइए गो के हम पछान लेलिअइ आउ ओकन्हिंयों हमरा पछनलकइ आउ कभी-कभी, हमरा भुला चुकला पर, ओहे धोखा फेर दोहरइलकइ, आउ कभी-कभी हमरा देखके मुड़के चल गेलइ । त हम देखलिअइ कि एहो प्रकार के कइएक धोखेबाज हइ; लेकिन एहो सब धोखेबाज पर हमरा तरस आवऽ हलइ; ई सब हलइ - अर्द्धनग्न, निर्धन, दुब्बर-पातर, रोगियाहा लोग; ई ठीक ओहे सब हलइ जे वास्तव में ठिठुरके मर जा हइ चाहे फाँसी लगा ले हइ, जइसन कि हमन्हीं के अखबार से मालुम पड़ऽ हइ ।

"त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?" - अनुवादक के भूमिका


त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?




अनुवादक के भूमिका

"युद्ध आउ शान्ति" (1863-1868) आउ "आन्ना करेनिना" (1873-1877) जइसन विश्वप्रसिद्ध उपन्यास आउ अनेक लोकप्रिय कहानी के लेखक लेव तल्सतोय (1828-1910) के कथेतर रचना "Так что же нам делать ?" (1886) ["ताक श्त्वो झे नाम जेलच्" अर्थात् "त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?"] के अंग्रेजी अनुवाद "What then must we do?" (1935) में अपन सम्पादकीय में ऐलिमर मोड (Aylmer Maude) कहलथिन हँ - "It was the first of Tolstoy's works to grip my attention, and it caused me to seek his acquaintance, which in turn led to the work I have now been engaged on for many years, namely, the preparation of the 'World's Classics' series and the Centenary Edition of his works."

त प्रस्तुत हइ कुल 40 अध्याय के उनकर ई कथेतर रचना के मगही अनुवाद "त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही?"

5.1 रूसी कथेतर रचना: “त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?”

सूची

5.1 रूसी कथेतर रचना (non-fiction): “त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?”
मूल रूसी शीर्षकः Так что же нам делать ?
मूल रूसी लेखक: लेव तल्सतोय (28.8.1828 – 9.11.1910)
प्रथम प्रकाशन वर्षः 1886
मगही अनुवाद: नारायण प्रसाद


त हमन्हीं के आखिर कीऽ करे के चाही ?

            अध्याय-01
            अध्याय-02
            अध्याय-03
            अध्याय-04
            अध्याय-05
            अध्याय-06
            अध्याय-07
            अध्याय-08
            अध्याय-09
            अध्याय-10
            अध्याय-11
            अध्याय-12
            अध्याय-13
            अध्याय-14
            अध्याय-15
            अध्याय-16
            अध्याय-17
            अध्याय-18
            अध्याय-19
            अध्याय-20
            अध्याय-21
            अध्याय-22
            अध्याय-23
            अध्याय-24
            अध्याय-25
            अध्याय-26
            अध्याय-27
            अध्याय-28
            अध्याय-29
            अध्याय-30
            अध्याय-31
            अध्याय-32
            अध्याय-33
            अध्याय-34
            अध्याय-35
            अध्याय-36
            अध्याय-37
            अध्याय-38
            अध्याय-39
            अध्याय-40

क्रमांकानुसार टिप्पणी

Thursday, April 05, 2018

मगही के चाही मगहिये के व्याकरण


मगही के चाही मगहिये के व्याकरण
लेखक - नारायण प्रसाद, पुणे

सारांश
मगही आउ मैथिली में दुनिया के सब्भे भाषा के अपेक्षा सबसे जटिल क्रियारूप पावल जा हइ। हिन्दी के एक-एक क्रियारूप लगी मगही (आउ मैथिली) में कइएक रूप होवऽ हइ। जैसे, हिन्दी के है लगी बिहारशरीफ (नालन्दा) के मगही में नौ-नौ रूप के प्रयोग देखल जा हइ। अब तक के जेतना भी मगही व्याकरण लिक्खल गेले ह ऊ सब या तो अंगरेज़ी के आधार पर लिक्खल गेले ह चाहे हिन्दी के आधार पर, मगही के आधार पर बिलकुल नञ्। एहे कारण हइ कि अब तक के कउनो मगही व्याकरण में मगही के क्रियारूप के क्लिष्टता के कोय स्पष्ट विवेचन नञ् मिलऽ हइ। ई आलेख में मैथिली व्याकरण मिथिला-भाषा-विद्योतन के माध्यम से मगही क्रियारूप के क्लिष्टता के व्याख्या कइल गेले ह आउ मगही के आधार पर मगही व्याकरण के रचना के आवश्यकता पर बल देल गेले ह।

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आचार्य किशोरीदास वाजपेयी राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण के पंचम अध्याय क़्रियाप्रकरणमें क्रिया-विवेचना के उलझन के कारण स्पष्ट करते लिखलका हल (1949:81-82/ 2007:243-244) –

किसी भी भाषा में क्रिया-प्रकरण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। क्रिया-पद ही अन्य भाषा-भाषियों के लिए उलझन के रूप में सामने आते हैं; क्योंकि यही प्रत्येक भाषा विशेषता रखती है। यह विशेषता ही अन्य भाषा-भाषियों को उलझन के रूप में तंग करती है। ... हिन्दी व्याकरणदेखो, तो उसमें लिखा है कि सकर्मक क्रियाएँ हिन्दी में भाववाच्य होती नहीं हैं ! तब, व्याकरण की आज्ञा मानकर यदि लिखते हैं -
हमने तुम देखे
तुमने हम देखे

तो, हिन्दीवाले गलत बतलाते हैं ! कहते हैं -
हमने तुम को देखा
तुमने हम को देखा

यों शुद्ध-सही लिखो ! परन्तु ये प्रयोग (हमने तुम को देखाऔर तुमने हम को देखा’) भाववाच्य हैं, सकर्मक क्रिया के। क्रिया देखाएकवचन है, जबकि कर्ता और कर्म बहुवचन हैं ! व्याकरण के अनुसार लिखो, तो हिन्दीवाले गलत बताते हैं और गलती ठीक करने के लिए व्याकरणदेखो, तो वहाँ वही सब है ! हम करें, तो क्या करें ! राष्ट्रभाषा की यह बड़ी उलझन है !

निःसन्देह हमारे बन्धुओं का उपालम्भ अर्थ रखता है।

अवश्य ही हिन्दी-क्रियाओं की उलझन उनके सामने है, जिसे व्याकरण-ग्रन्थों ने और भी उलझा दिया है ! कारण, कोई व्याकरण अंग्रेजी के आधार पर लिखा गया है और कोई संस्कृत के आधार पर। हिन्दी के आधार पर हिन्दी का व्याकरण बना ही नहीं। तब उलझन तो होगी ही।

डॉ॰ डी॰एन॰ शंकर भट कन्नडक्कॆ बेकु कन्नडद्दे व्याकरण (कन्नड के चाही कन्नडे के व्याकरण) में अनुच्छेद 1.3 के अन्तर्गत कन्नडवल्लद कन्नड व्याकरणगळु (कन्नड से असम्बन्धित कन्नड व्याकरण) प्रकरण में लिखलका ह (2001:15.5-14) –

कन्नड पर लिक्खल व्याकरण सब में संस्कृत, लैटिन चाहे इंग्लिश भाषा के व्याकरण के नियम सब अइसहीं कन्नड में ग्रहण करे के प्रयत्न के सिवा कन्नडे के व्याकरण के नियम सोच-विचार के अपनावे के प्रयत्न नञ् हइ। संस्कृत चाहे इंग्लिश भाषा के व्याकरण के नियम कन्नड में अपनाना बिलकुल सम्भव नञ् रहले पर कन्नड में एकरे व्याकरण के नियम कुच्छो हइ कि नञ् ई देख के अपनावे के ई व्याकरण सब के प्रयत्न रहऽ हइ। ओहे से अधिकतर प्रसंग में ई सब व्याकरण कन्नड भाषा के रचना के विवरण देवे में बिलकुल असमर्थ देखाय दे हइ।

मगही आउ मैथिली में दुनिया के सब्भे भाषा के अपेक्षा सबसे जटिल क्रियारूप पावल जा हइ। हिन्दी के एक-एक क्रियारूप लगी मगही (आउ मैथिली) में कइएक रूप होवऽ हइ। जैसे, हिन्दी के है लगी बिहारशरीफ (नालन्दा) के मगही में नौ-नौ रूप के प्रयोग देखल जा हइ। दोसर-दोसर भाषा सबके धातु में साधारणतः एक या दू ठो प्रत्यय एक साथ लगऽ हइ, लेकिन ई दूनू भाषा में एक पर एक तीन-चार ठो प्रत्यय लगावल जा सकऽ हइ। जैसे - मैथिली में देख धातु से "देखलकइक" - एकरा में "देख-ल-क-इ-क"; "देखलिअइन्ह" - एकरा में "देख-ल-इअ-इ-न्ह"। मगही में संगत (corresponding) क्रियारूप क्रमशः  "देखलकइ" - एकरा में "देख-ल-क-इ"; "देखलिअइन" - एकरा में "देख-ल-इअ-इ-न"। क्रियारूप में सब्भे प्रत्यय के अप्पन-अप्पन अर्थ आउ भाव हकइ (झा 2011:1) ई रीति के क्रियापद-व्यवस्था विश्व के बहुत विरले भाषा में पावल जा हइ। ई प्रसंग में मगही आउ मैथिली के तुलना तुर्की भाषा से कइल जा सकऽ हइ। ई भाषा के वर्णन करते डॉ॰ सेयेस के उक्ति देखल जाय (सेयेस 1880:199-200):

तुर्की क्रिया, फ़िनिक के जइसन, रूप में अत्यन्त धनी हइ; प्रत्यय के ऊपर प्रत्यय जोड़ल जा सकऽ हइ ताकि सूक्ष्म से सूक्ष्म आउ रंग-बिरंग के अर्थ में भेद के चित्रित कइल जा सकइ। फिर भी धातु आउ प्रत्यय - दूनहुँ स्पष्ट आउ चिह्नित रहऽ हइ। ओहे से एकरा में हइ पारदर्शिता जे क्रिया रूपावली के विशेषता बतावऽ हइ आउ एकरा तार्किक विचार खातिर एतना परिपूर्ण साधन बनावऽ हइ।

ग्रियर्सन ऊ पहिला भाषाशास्त्री हला जे मैथिली के क्रियारूप पर सूक्ष्म अध्ययन कइलका हल। लेकिन ऊ क्रिया रूपावली के जटिलता के व्याख्या नयँ कर पइलका आउ न तो ई भाषा के क्रिया के श्रेणीबद्ध प्रत्यय सब के विश्लेषण करे के कोय प्रयास कइलका (झा 2001:159) ऊ अपनहीं स्वीकार कइलका  (ग्रियर्सन 1881:50) -
मैथिली क्रियारूप के बाहुल्य में आनन्द के अनुभव करऽ हइ। आंशिक रूप से विकसित सब्भे भाषा जइसन एकरा में बहुत कम्मे भाग हइ जेक्कर दू या तीन वैकल्पिक रूप नयँ होवे। ई वैकल्पिक रूप क्षेत्रीय विशेषता नयँ हइ, बल्कि ऊ सब्भे के प्रयोग एक्के वक्ता अप्पन कल्पना (fancy) या वाक्य में लय के जरूरत के मुताबिक प्रयोग करऽ हइ। हमरा नयँ लगऽ हइ कि उ सब में अर्थ सम्बन्धी कोय भेद हकइ।
ग्रियर्सन मैथिली व्याकरण के अगला पूर्णतः संशोधित संस्करण में उपर्युक्त उद्धृत वक्तव्य में से खाली पहिला वाक्य के बदल के लिखलका (ग्रियर्सन 1909:108) -
क्रिया के रूपावली मैथिली व्याकरण के सबसे जटिल अंश हकइ। आंशिक रूप से विकसित सब्भे भाषा जइसन एकरा में बहुत कम्मे भाग हइ जेक्कर दू या तीन वैकल्पिक रूप नयँ होवे। ….. हमरा नयँ लगऽ हइ कि उ सब में अर्थ सम्बन्धी कोय भेद हकइ ।
आगे अपन बिहारी भाषा के बोली आउ उपबोली के सात व्याकरण (ग्रियर्सन 1883:I:27) में लिखलका -
एक तरह से क्रिया के रूप बहुत असान हइ। कोई विशेष काल के क्रिया के मूल रूप देल रहला पर असानी से सब्भे क्रियारूप बनावल जा सकऽ हइ, काहे कि सब्भे काल के पुरुष प्रत्यय लगभग समान होवऽ हइ।  लेकिन बिहारी भाषा के क्रिया में एक कठिनाई हइ, जे हिन्दी भाषा के छात्र सब लगी अनजान हइ - ई हइ प्रत्येक पुरुष लगी पुरुष प्रत्यय के विविधता। कभी-कभी तो एक्के पुरुष में छो-छो प्रत्यय तक होवऽ हइ, जेकरा में से विकल्प के रूप में केकरो प्रयोग कइल जा सकऽ हइ

महावैयाकरण पं॰ दीनबन्धु झा ऊ पहिला विद्वान् हला जे मैथिली के जटिल क्रियारूप के सम्पूर्ण व्याख्या कइलका आउ सिद्ध कइलका कि मैथिली क्रिया रूपावली बिलकुल क्रमबद्ध (systematic) हइ, जेकरा से ऊ ग्रियर्सन जइसन कते भाषाशास्त्री के भ्रान्ति तोड़े में सफल होला।

अभी तक मगही के जे कुछ व्याकरण निकलले ह, ऊ सब या तो अंग्रेज़ी व्याकरण या हिन्दी व्याकरण के आधार पर रचल गेले ह। मगही-व्याकरण के क्षेत्र में डॉ॰सम्पत्ति अर्याणी के योगदान में प्रो॰ रामनाथ शर्मा लिखलथिन ह (2001:11) -  

यौधेय जी के मगही भासा के बेआकरन, पहिला भाग प्रकाशित तो ३० अगस्त १९५६ के भेल, बाकि ओकरा हम ग्रियर्सन साहेब के ढंग पर लिखल मानऽ ही। ५६ पेज के रचना में १९१ नियम आयल हे। ईमानदार लेखक के सराहना ई लेल करे लाइक हे कि ऊ निवेदन में स्पष्ट कर देलन हे - हम डाक्टर ग्रियर्सन साहेब के रिनी ही। उनकर बेआकरन के केतना बात हम लेली हे। नियम २२, २४, २५, २६, ३३, ३९, ४०, ६८, ६९, ८१, ८८, ९२ से ९७ तक आउ १२९ से १३८ तक में देल विचार करीब-करीब बिल्कुले उनकरे गिरामर के विचार हे।

डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी के बारे में ऊ लिखलथिन ह (2001:18) -
इनकर व्याकरण मगही के सब व्याकरण के अपेक्षा जादे सर्वांगपूर्ण, व्यापक, प्रामाणिक आउ शुद्ध हे।

लेकिन ई व्याकरण के सर्वांगपूर्ण व्याकरण नञ् मानल जा सकऽ हइ, काहे कि मैथिली के जइसने मगहियो के जे क्रियारूप में क्लिष्टता हकइ ओकरा बारे में कुच्छो विवेचन नञ् मिलऽ हइ - केलॉग (1938) के हिन्दी व्याकरण (जेकरा में अन्य भाषा के अलावे मगही आउ मैथिली के भी कुछ चर्चा कइल गेले ह) जइसन ही  पुरुष आउ काल के अन्तर्गत क्रिया के विविध रूप के खाली सूची देके काम चला लेवल गेले ह। केक्कर काहाँ प्रयोग कइल जा हइ, एकरा बारे कुच्छो उल्लेख नञ् हइ। मगही के जउन व्याकरण में मगही क्रियारूप के क्लिष्टता के पूर्ण व्याख्या नञ् मिले ओकरा वास्तव में मगही व्याकरण कहले नञ् जा सकऽ हइ, काहे कि क्रियारूप के क्लिष्टता ही मगही (आउ मैथिली) के विशेषता हइ जे संसार के आउ कउनो भाषा में नञ् पावल जा हइ। भोजपुरी में भी क्रियारूप के क्लिष्टता नञ् हइ - "भोजपुरी क्रियाओं के रूप में मैथिली तथा मगही क्रियाओं के रूप की जटिलता का सापेक्षिक अभाव है।" (तिवारी 1936:3)

अब पं॰ दीनबन्धु झा के मैथिली व्याकरण मिथिला-भाषा-विद्योतन (1946; पुनर्मुद्रण 1993) के पं॰ गोविन्द झा के अंग्रेज़ी भूमिका से मैथिली क्रियारूप के विविधता के कुछ अन्दाज प्रस्तुत कइल जा रहले ह जेकरा में अर्थ के सूक्ष्म अन्तर भी देखावल गेले ह (1993:xvi-xvii) -

सामान्य भूतकाल में हिन्दी क्रिया के चारे रूप होवऽ हइ (देखा, देखे, देखी, देखीं), जबकि मैथिली में कम से कम उनइस रूप। प्रत्येक रूप के अपन-अपन पृथक् अर्थ होवऽ हइ। प्रत्येक अर्थ लगी पृथक् प्रत्यय होवऽ हइ, आउ कइएक संयुक्त अर्थ लगी कइएक प्रत्यय के जोड़ल जा सकऽ हइ। ई तरह, प्रसंग के अनुसार, अंग्रेज़ी के सरल वाक्य “he went” के अनुवाद मैथिली में निम्नलिखित आठ तरह से कइल जा सकऽ हइ

(1) ओ गेल he (of lower grade) went (for himself).
(2) ओ गेलैक – he (of lower grade) went (for a third person of lower grade).
(3) ओ गेलहु – he (of lower grade) went (for you, i.e. for a second person of higher grade).
(4) ओ गेलौक – he (of lower grade) went (for you, i.e. for a second person of lower grade).
(5) ओ गेलैन्हि – he (of lower grade) went (for a third person of higher grade).
(6) ओ गेलाह – he (of higher grade) went (for himself).
(7) ओ गेलथीन्ह – he (of higher grade) went (for a third person of either of higher or of lower grade).
(8) ओ गेलथून्ह – he (of higher grade) went (for you, i.e. for a second person either of higher or of lower grade).

दिनांक 15 सितम्बर 2011 के पं॰ गोविन्द झा जी से होल फोन पर बातचीत से ई पता चलल कि मैथिली में उपर्युक्त वाक्य सब के क्रियारूप में के उच्चारण बहुत लघु अर्थात् पाणिनि के तकनीकी शब्द के अनुसार लघु प्रयत्नतरहोवऽ हइ, विशेष करके वक्ता जब धारा प्रवाह बोलऽ हई तब तो एकर ध्वनि लगभग अश्रव्य (inaudible) होवऽ हइ। ई बात भी ध्यातव्य हइ कि मैथिली ’ ‘के उच्चारण मगहिये नियन अइ’, ‘अउकइल जा हइ। ई तरह गेलहु’, ‘गेलैन्हि’, ‘गेलाह’, ‘गेलथीन्ह’, ‘गेलथून्ह’  के उच्चारण लगभग गेलउ’, ‘गेलइनि’, ‘गेला’, ‘गेलथीन’, ‘गेलथूनहोवऽ हइ। गेलइनिके उच्चारण कुछ लोग गेलनया गेलइनभी करऽ हथिन।

अतः मैथिली के उपर्युक्त आठ वाक्य के मगही में समानान्तर वाक्य के क्रमशः ई तरह लिक्खल जा सकऽ हइ – “ऊ गेल / गेलइ / गेलो / गेलउ / गेलन / गेला / गेलथिन / गेलथुन

एतने नञ्, मगही में एक रूप आउ होवऽ हइ - ऊ गेलथन”, जेकर समानान्तर रूप लगऽ हइ कि मैथिली में नञ् पावल जा हइ। "गेलथन, गेलथिन, गेलथुन" के स्थान पर क्रमशः "गेलखन, गेलखिन, गेलखुन" के प्रयोग भी होवऽ हइ। "गेलथिन, गेलथुन"  के स्थान पर नकार के लोप के साथ आउ अन्तिम स्वर के दीर्घ रूप होके "गेलथी, गेलथू"  के भी प्रयोग पावल जा हइ। ओहे तरह से "गेलखी, गेलखू" के भी। ई सब क्रियारूप सामान्यतः नालन्दा जिला के मुख्यालय बिहारशरीफ (250 11' 55" उ॰, 850 31' 8" पू॰) के क्षेत्र में आउ विशेष कर के प्रकृत लेखक के गाँव, डिहरा (250 16' 47" उ॰, 850 32' 45" पू॰) में प्रयुक्त मगही के देल गेले ह। ई गाँव, बिहारशरीफ से आठ कि॰मी॰ उत्तर स्थित रहुई रोड रेल्वे स्टेशन से दो कि॰मी॰ पूरब आउ रहुई से करीब डेढ़ कि॰मी॰ पच्छिम पड़ऽ हइ।

मगही आउ मैथिली क्रियारूप के तुलनात्मक अध्ययन (प्रसाद 2011) नामक आलेख में पं॰ दीनबन्धु झा लिखित मिथिलाभाषा-विद्योतन’ (1946) के आधार पर भूत, वर्तमान आउ भविष्य काल में कुछ धातु के मगही के प्रत्येक क्रियारूप के मैथिली क्रियारूप से तुलना करके सैद्धान्तिक रूप से अलग-अलग सन्दर्भ में उचित प्रयोग दर्शावे के प्रयास कइल गेले ह। मगही व्याकरण विशेषज्ञ के मैथिली के विविध क्रियारूप के सूक्ष्म अन्तर के परिशीलन करके मगही में अइसन सूक्ष्म अन्तर हो सकऽ हइ कि नञ् एकर निर्धारण करके मगही व्याकरण में नियम निश्चित करे के चाही।

मगही महोत्सव, राजगीर (17-18 जुलाई 2011) के दौरान एक विद्वान पेट में आउ पेटवा में - ई दूनू रूप के प्रयोग में की सूक्ष्म अन्तर हइ एकर समस्या रखलथिन। आउ केकरो कोय जवाब देते नञ् देखलिअइ त हम डॉ॰ शीला वर्मा (2003:506) के विचार सामने प्रस्तुत कइलिअइ आउ बतइलिअइ कि ई -आ (पूर्व में अकार या वकार आगम सहित) प्रत्ययान्त शब्द अंग्रेज़ी के दी (the) आदि अर्थ अर्थात् निश्चितता प्रकट करऽ हइ जबकि बिना एकरा के अनिश्चितता के। जइसे

(1)       ‘मोटरी में – in a bundle; लेकिन मोटरिया में in the bundle.

(2)        ई काम तो एगो लड़का भी कर सकऽ हइ – Even a boy can do this work.
            ई काम तो एगो लड़को कर सकऽ हइ – Even a boy can do this work.
ऊ लड़कावा के पूछहो न –  (Please) ask that boy.

(3)       अहो, लगऽ हइ कि रसीदिया के एगो किताब में रख देलिये हल, हमरा मिलिये नञ् रहल ह।
बाउ जी, ई कितब्बा में खोजलहो ह ?

‘- प्रत्यान्त व्यक्तिवाचक संज्ञा के प्रयोग अनादरार्थ सूचित करऽ हइ। जइसे -

(1)       कमेसर जी के पूछहो न। (आदरार्थ)
कमेसरा के पूछहो न। (अनादरार्थ)

सन्दर्भः
  1. आचार्य किशोरीदास वाजपेयी (1949): “राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण”, जनवाणी प्रकाशन, कलकत्ता; पुनर्मुद्रण - विष्णुदत्त राकेश द्वारा सम्पादित आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रन्थावली, भाग-1 (ब्रजभाषा व्याकरण, राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण, साहित्यिकों के पत्र)”, वाणी प्रकाशन, 2-, दरियागंज, नयी दिल्ली; 2008 ई॰; कुल - 399 पृष्ठ;  राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण”, पृ॰181-324।

  1. डॉ॰ डी॰एन॰ शंकर भट (2001): “कन्नडक्कॆ बेकु कन्नडद्दे व्याकरण (कन्नड के चाही कन्नडे के व्याकरण), द्वितीय परिष्कृत संस्करण, भाषा प्रकाशन, मैसूरु; वितरक - अत्रि बुक सेंटर, 4, अरावति कट्टड, बल्मठ, मंगळूरु-575001; कुल - 202 पृष्ठ। (कन्नड में)

  1. प्रो॰ रामनाथ शर्मा (2001): मगही-व्याकरण के क्षेत्र में डॉ॰सम्पत्ति अर्याणी के योगदान”, अलका मागधी, दिसम्बर, पृ॰11-12, 18.

  1. डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी (1993): “मगही व्याकरण प्रबोध”, प्रथम खण्डः व्याकरण-प्रभाग (कुल 16 अध्याय), द्वितीय खण्डः काव्यांग-विवेचन (कुल 6 अध्याय), तृतीय खण्डः मगही भाषा के कुछ समस्या (कुल 4 अध्याय); संदीप प्रकाशन, टेकारी रोड, पटना, 288+64+32+3 पृष्ठ।

  1. डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी (1992): “मगही व्याकरण आउर रचना”, संदीप प्रकाशन, टेकारी रोड, पटना; 263 पृष्ठ।

  1. Rev. S.H. Kellogg (1938): “A Grammar of the Hindi Language” (in which are treated the High Hindi, Braj, and the Eastern Hindi of the रामायण of तुलसीदास, Also the Colloquial Dialects of राजपुताना, कुमाऊँ, अवध, रीवा, भोजपुर, मगध, मिथिला etc.), Third Edition, London, Kelgan Paul, Trench, Trubner and Co. Limited; xxxiv+584 pp.
  2. Grierson, George A. (1881): “An Introduction to the Maithili Language of North Bihar”, Part I – Grammar. Calcutta: The Asiatic Society. Second Edition – 1909; Calcutta: The Asiatic Society, 57, Park Street.
  3. Grierson, George A. (1883): “Seven Grammars of the Dialects and Subdialects of the Bihari Language”, Part I. INTRODUCTORY. Calcutta: Bengal Secretariat Press. Reprint: Varanasi/ Delhi: Bhartiya Publishing House, 1980.
  4. Sheela Verma (2003): “Magahi” in: The Indo-Aryan Languages (Cardona, George and Jain, Dhanesh, Eds.; London and New York: Routledge.). Ch.13, pp.498-514.
  5. दीनबन्धु झा (1946): “मिथिला-भाषा-विद्योतन”, दरभंगा: मैथिली साहित्य परिषद्पुनर्मुद्रण 1993; प्रकाशक - गोविन्द झा, पटेलनगर, पटना; xxvii+270+vi पृष्ठ।
  6. नारायण प्रसाद (2011): “मगही आउ मैथिली क्रियारूप के तुलनात्मक अध्ययन”, अलका मागधी, फरवरी, पृ॰5-10.
  7. Sayce, Archibald Henry (1880): “Introduction to the Science of Language”, Vol.II;  C.K. Paul & Co.,  London.  vi+ 421 pp.+ list of books published by C.K. Paul & Co. (36 pp.).
  8.  पं॰ गोविन्द झा (2011): "मैथिलीक क्रियापद-रूपावली" (व्यक्तिगत ई-मेल से प्राप्त लेख, दिनांक 25 सितम्बर)।
  9. डॉ॰ उदयनारायण तिवारी (1936): “भोजपुरी भाषा और साहित्य”, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
[प्रकाशितः मगही पत्रिका, मार्च-अप्रैल 2012, पृ॰21-24]