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Saturday, October 17, 2020

वेताल कथा (चान मामूँ) - 5. योग्य वर

 वेताल कथा (चान मामूँ) - 5. योग्य वर (The eligible suitor)

(चंदामामा- फरवरी 1956, पृ॰29-32; वेतालपञ्चविंशति, कथा सं॰2; बैताल पचीसी, कहानी सं॰ 2)

[29] विक्रम पेड़ पर से फेर से लाश के उतारके आउ कन्हा पर डालके श्मशान में संन्यासी तरफ चल पड़लइ। तब लाश में स्थित बेताल राजा से कहलकइ - "राजा, तोहर कइसन खराब हालत होल हको! तोर मन बहलावे खातिर हम तोरा एगो कहानी सुनावऽ हकियो। सुन्नऽ।"

यमुना नदी के किनारे ब्रह्मस्थल नामक ब्राह्मण-ग्राम में अग्निस्वामी नाम के एगो वेदपाठी रहऽ हलइ। ओकर एगो लड़की हलइ, नाम हलइ मन्दारवती। ऊ एतना सुन्दर हलइ कि अप्सरा सब के भी सौन्दर्य में मात करऽ हलइ। ऊ ओकर विवाह करे के बारे सोचिए रहले हल कि कहीं से तीन ब्राह्मण युवक अइलइ आउ तीनों ओकरा से [30] मन्दारवती के हाथ माँगे लगलइ। तीनों में से हरेक युवक कहलकइ कि अगर ऊ विवाह नञ् कर पइतइ, त आत्महत्या कर लेतइ।  

तीनों युवक शिक्षा-दीक्षा में, सौन्दर्य, चरित्र, वगैरह में एक समान हलइ। ओहे से अग्निस्वामी निर्णय नञ् कर पइलकइ कि अपन पुत्री के विवाह केकरा से करे। अगर निर्णय करियो लेते हल, त बाकी दू युवक आत्महत्या कर लेते हल। ओहे से ऊ चुप रहलइ।

एन्ने, मन्दारवती के एकाएक भयंकर ज्वर होलइ आउ ऊ थोड़हीं दिन में मर गेलइ। तीनों युवक ओकर मौत से दुखी हो गेलइ आउ ओकर लाश के श्मशान ले जाके, तीनों ओकर लाश के अन्त्येष्टि संस्कार कइलकइ। ओकन्हीं में से एगो श्मशान से वापिस नञ् अइलइ। जाहाँ परी मन्दारवती के लाश के जलावल गेले हल, हुएँ परी ऊ एगो झोपड़ी बना लेलकइ आउ ओकरे चिता के भस्म पर ऊ रहे लगलइ। कोय कुछ लाके दे दे हलइ, त ओहे खाके तसल्ली कर ले हलइ, नञ् तो ऊ हुएँ परी भुखले-पियासले पड़ल रहऽ हलइ।

दोसरा युवक, मन्दारवती के अस्थि जमा करके गंगा में परवह करे लगी निकस पड़लइ।

तेसरा युवक पूरा तरह से बैरागी बन गेलइ आउ देश-देशान्तर घुम्मे-फिरे लगलइ। ऊ घूमते-घूमते एक दिन वक्रोलक नामक गाम पहुँचलइ। हुआँ परी एगो ब्राह्मण ओकर अतिथि सत्कार कइलकइ। जब ओकन्हीं भोजन पर बैठलइ, त घर के छोटका बुतरू रोवे लगलइ। ओकर मइया भोजन परसते-परसते ओकरा बहुत मनइलकइ-समझइलकइ। लेकिन ऊ रोना बन्द नञ् कइलकइ। ओहे से ओकर मइया गोस्सा में ओकरा जलता चूल्हा में झोंक देलकइ। ऊ छोटका बुतरू देखते-देखते चूल्हा में राख हो गेलइ।

[31] ब्राह्मण युवक ई सब देख रहले हल। ऊ चिल्लइलइ - "छी! तूँ मनुष्य नञ् हकऽ, बल्कि राक्षस हकऽ। तोहर आतिथ्य स्वीकार करके हमहूँ नरक में जाम।" कहते-कहते, ऊ पत्तल छोड़के उठ गेलइ।

लेकिन मेजबान कहलकइ - "बेटा! जल्दी मत करऽ। हम राक्षस नञ् ही। अइसन बात नञ् हइ कि हम सब के अपन बुतरू पर प्रेम नञ् हइ, काहेकि ओकरा फेर से जिला देवे खातिर हम मृत संजीवनी मन्त्र जानऽ हिअइ; ओहे से हमर घरवली ओकरा चूल्हा में डाल देलकइ।"

ब्राह्मण युवक के विश्वास नञ् होलइ। ओहे से ऊ ब्राह्मण थोड़े-सुन धूरी लेलकइ, खूँटी पर टँगल एगो पुस्तक के निकासके ओकरा में से एगो मन्त्र पढ़लकइ। ऊ धूरी के चूल्हा के राख में छिड़कतहीं ऊ बुतरू फेन से जिन्दा हो गेलइ।

ब्राह्मण युवक सन्तुष्ट होके भोजन कइलकइ। लेकिन ओकर मन खूँटी पर लटकल पुस्तक पर लगल रहलइ। जब रात के सब सुत्तल हलइ, तब ऊ, ऊ पुस्तक लेलकइ, आउ बिन केकरो कुछ कहले-सुनले, ब्रह्मस्थल पहुँच गेलइ।

ऊ ब्राह्मण युवक भी, जे मन्दारवती के अस्थि के गंगा में परवह करे गेले हल, वापिस आ गेले हल। दुन्नु मिलके तेसरा युवक के पास गेलइ, जे श्मशान में रह रहले हल।

ऊ ब्राह्मण युवक, जे मृत संजीवनी मन्त्र लइलके हल, ओकरा बारे दुन्नु युवक के बतइलकइ। ऊ फेनुँ चुटकी भर धूरी लेलकइ, पुस्तक में से मन्त्र पढ़लकइ, आउ ऊ धूरी के ऊ भस्म (राख) पर डाल देलकइ, जेकरा तेसरा युवक शय्या बना लेलके हल।

तुरते मन्दारवती जिन्दा हो गेलइ, मानुँ नीन से जगले हल।

[32] तीनों ब्रह्मचारी ओकरा साथ लेके अग्निस्वामी के घर जाके कहे लगलइ - "एकर विवाह हमरा से कर दऽ। एकर विवाह हमरा से कर दऽ।" ओकन्हीं ई तरह से ओकरा तंग करे लगलइ।

"हम मृत संजीवनी मन्त्र लइलिए हल, ओहे से मन्दारवती से विवाह करे के अधिकार हम्मर बन्नऽ हइ।" एक युवक बोललइ।

"हम ओकर अस्थि ले जाके गंगा में परवह कइलिअइ, ओकर जी उठे के कारण एहो हइ। हमरे ओकरा से विवाह करे के चाही।" दोसरा युवक बोललइ।

"हमहीं ओकर राख सुरक्षित रखलिअइ, हमहीं ओकरा पर सुत्तऽ हलिअइ, ओहे से हम विवाह करबइ।" तेसरा युवक बोललइ।

अग्निस्वामी फेर दुविधा में पड़ गेलइ कि केकरा साथ लड़की के विवाह करे। ओकरा कोय रस्ता नञ् देखाय देलकइ।

वेताल ई कहानी सुनाके राजा से पुछलकइ - "राजन्! ऊ तीनों में कउन मन्दारवती के योग्य वर हलइ? ऊ, जे मृत संजीवनी मन्त्र लइलके हल? कि ऊ, जे अस्थि के गंगा में परवह कइलके हल? कि ऊ, जे ओकर चिता के राख पर सुत्तऽ हलइ? अगर तूँ जान-बूझके नञ् बतइलऽ त तोहर सिर फोड़ देबो।"

राजा उत्तर देलकइ - "मृत संजीवनी मन्त्र लावे वला युवक मन्दारवती के प्राण वापिस लइलकइ, ओहे से ऊ पिता के समान होलइ आउ अस्थि के गंगा में परवह करे वला भाय के समान। जे युवक मन्दारवती के चिता के राख पर सुत्तऽ हलइ आउ पहिले नियन ओकरा से प्रेम करऽ हलइ, ओहे ओकर पति होवे लायक हलइ।"

ई तरह राजा के मौनभंग होतहीं वेताल लाश के साथ उड़के ओहे पेड़ पर जाके फेर से लटक गेलइ।



 

Saturday, October 03, 2020

वेताल कथा (चान मामूँ) - 4. आत्म-बलिदान

 वेताल कथा (चान मामूँ) - 4. आत्म-बलिदान

(चंदामामा- जनवरी 1956, पृ॰18-24; वेतालपञ्चविंशति, कथा सं॰15; बैताल पचीसी, कहानी संख्या 16)


[18] विक्रम फेर पेड़ पर से लाश के उतारके, कन्हा पर डालके श्मशान तरफ चललइ। लाश में स्थित वेताल अट्टहास करते कहलकइ - "राजा! तोहरा देखके हमरा जीमूतवाहन के कथा आद आ रहलो ह। समय काटे लगी ई कहानी सुनावऽ हियो। सुन्नऽ।" ऊ ई कथा सुनइलकइ -

हिमालय पर्वत पर, कांचननगर के परिपालन करते जीमूतकेतु नाम के राजा हलइ। ऊ राजा के महल के आँगन में एगो कल्प-वृक्ष हलइ। ऊ वृक्ष के कृपा से राजवंश के लोग के सम्पूर्ण इच्छा पूरा हो जा हलइ।

जीमूतकेतु के लड़का के नाम हलइ जीमूतवाहन। जब ऊ बड़गो होलइ त राजा वैभव के साथ ओकरा युवराज [19] बनइलकइ। ओहे बखत मन्त्री सब जीमूतवाहन से कहलकइ - "युवराज! अपने के वंश खातिर कल्प-वृक्ष के होना कल्याणकारी हइ। ई अपने के पूर्वज लोग के सहायता करते अइले ह! अपनहूँ ऊ कल्प-वृक्ष के प्रार्थना करके अपन सब इच्छा के पूरा कर सकऽ हथिन।"

एतना सुनतहीं जीमूतवाहन के प्रसन्न होवे के बात अलगे, ऊ चिन्तित होके सोचे लगलइ - "अफसोस हइ, हमर पूर्वज सब, कल्प-वृक्ष के होतहूँ, हमेशे अपन स्वार्थ के परवाह करते गेलथिन, परोपकार कभियो नञ् कइलथिन। ई जीवन में परोपकार के अलावा सब कुछ क्षणभंगुर ही तो हइ। ऊ सब, जे कल्प-वृक्ष के अप्पन समझऽ हलथिन, अब काहाँ हथिन? कम से कम हम तो ई कल्प-वृक्ष के स्वार्थ लगी उपयोग नञ् करबइ।"

ई तरह सोचके, जीमूतवाहन कल्प-वृक्ष बिजुन जाके प्रार्थना कइलकइ - "देव! नञ् मालुम, केतना पीढ़ी से, जे कुछ हमर पूर्वज लोग मँगलथिन, अपने उनकन्हीं के देते अइलथिन हँऽ। कभियो अपने नञ् नञ् कइलथिन। हमर अपने से एक्के प्रार्थना हइ। ई संसार में जेतना अनाथ आउ अभागल हइ, ऊ सब के इच्छा पूरा करथिन, आउ ओकन्हीं के कोय चीज के कमी नञ् होवे देथिन।"

तुरते कल्प-वृक्ष अदृश्य हो गेलइ। भूमि पर निम्मन बारिश होलइ, खूब फसल होलइ आउ संसार में कोय दरिद्र नञ् रहलइ।

जब रिश्तेदार लोग के मालुम होलइ कि जीमूतकेतु आउ जीमूतवाहन के पास कल्प-वृक्ष नञ् हइ, त ऊ सब अइन सेना लेके कांचननगर पर आक्रमण करे लगी निकस पड़लइ। जीमूतकेतु ओकन्हीं के मुकाबला करे खातिर प्रयास करे लगलइ। लेकिन जीमूतवाहन अपन पिता से निवेदन कइलकइ - "पिता जी! [20] ई युद्ध से कीऽ लाभ? कीऽ ई राज्य खातिर रिश्तेदार लोग के हत्या करना उचित हइ? थोड़े दिन ओकन्हिंएँ के राज्य करे देथिन। हम सब कहीं आउ जाके इह आउ पारलौकिक सुख प्राप्त करे के प्रयास करिअइ।"

"जइसन तोर मर्जी। जब तोहरे राज्य के इच्छा नञ् हको त भला हम काहे लगी युद्ध करके लोग के खून-खराबा करू?"

जीमूतवाहन रिश्तेदार लोग के राज्य सौंप देलकइ। अपन माता-पिता के साथ लेके, ऊ दक्षिण समुद्र के किनारे स्थित मलय पर्वत पर चल गेलइ। हुआँ ऊ एगो आश्रम भी बना लेलकइ। ऊ पर्वत पर सिद्ध जाति के लोग रहल करऽ हलइ। ऊ जाति के राजा के पुत्र मित्रावसु से जीमूतवाहन के स्नेह हो गेलइ।"

एक दिन जीमूतवाहन घूमते-घूमते, पार्वती मन्दिर बिजुन पहुँचलइ। मन्दिर में वीणा के साथ केकरो पार्वती-पाठ करे के ध्वनि सुनाय पड़लइ। अन्दर जाके देखला पर एगो सुन्दर युवती देखाय देलकइ। ऊ ओकर सहेली से मालुम कर लेलकइ कि ऊ मित्रावसु के बहिन हइ, आउ ओकर नाम मलयवती हइ। सहेली [21] मलयवती के जीमूतवाहन के परिचय देलकइ। मलयवती कुछ संकोच में पड़ गेलइ। ओकरा समझ में नञ् अइलइ कि जीमूतवाहन के कइसे स्वागत कइल जाय। ओहे से पूजा लगी लावल फूल में से एगो ले लेलकइ आउ ओकरा जीमूतवाहन के गला में डाल देलकइ। लेकिन तुरते जीमूतवाहन अपन गला से निकासके ओक्कर गला में डाल देलकइ। मित्रावसु दिल खोलके हँसलइ, जब ओकरा ई घटना के बारे पता चललइ। ओकरा मालुम हो गेलइ कि नवयुवक आउ मलयवती एक दोसरा के प्रेम करऽ हइ, त ऊ ओकन्हीं के विवाह कर देलकइ।

कुछ समय गुजर गेला के बाद, एक दिन जीमूतवाहन आउ मित्रावसु पर्वत से नीचे उतरके समुद्र तरफ जा रहले हल। जब ओकन्हीं जा रहले हल, त जीमूतवाहन हड्डी के कइए गो ढेर देखलकइ आउ अपन मित्र के एकरा बारे पुछलकइ।

"तोरा गरुड़ आउ नाग के बीच घोर दुश्मनी के बारे पता हको", मित्रावसु उत्तर देलकइ। "घृणा से अन्धा होके गरुड़ नाग लोग के एतना बरबाद करे लगलइ कि वासुकि, नाग लोग के राजा, गरुड़ के साथ सन्धि करे पड़लइ जेकरा अनुसार एक नाग रोज गरुड़ के पास खाय लगी भेजल जा हलइ। ई सब ढेर ऊ अभागल नाग के हइ जेकरा गरुड़ सन्धि के अनुसार रोज दिन खइलके ह।"

[22] जब ऊ ई बात सुनलकइ, त जीमूतवाहन के नाग लोग पर दया आ गेलइ। "ई गरीब जाति पर कइसन विपत्ति हइ! ऊ सोचलकइ। "ई वासुकि कायर होतइ, नञ् तो ऊ अपन दुश्मन के अपन लोग के दिन पर खाय नञ् देते हल। ऊ अइसन वहशी समझौता करे के पहिले खुद के गरुड़ के सामने खाय लगी समर्पित कर देते हल! कीऽ गरुड़ खुद एगो निर्दय कमीना नञ् हइ, जे एक नाग रोज खा हइ आउ एगो नाग जाति के दुर्गति कर देलके ह?"

"अब वापिस चल्लल जाय?" मित्रावसु आखिर बोललइ। "घर से अइला बहुत देर हे गेलइ।"

"तूँ पहिले जा", जीमूतवाहन बोललइ। "हम जल्दीए आ जइबो। हम ई जगह के आउ निम्मन से देखे लगी चाहऽ हिअइ।"

वस्तुतः जीमूतवाहन वापिस जाय लगी नञ् चाहऽ हलइ। ऊ आझ लगी गरुड़ के भोजन बन्ने के फैसला कर लेलकइ, आउ ई तरह कम से कम एक अभागल नाग के जान बचावे के। अपन साला के भेजला के बाद, ऊ, ऊ शिला तरफ बढ़लइ जेकरा पर गरुड़ नाग लोग के खा हलइ।

तुरते ओकरा विलाप सुनाय देलकइ आउ एगो नाग औरत आउ ओकर बेटवा के शिला तरफ अइते देखलकइ। "आह, बेटा शंखचूड़! हमर कीऽ हालत होत जब तूँ चल जइमँऽ?" बुढ़िया अम्मोढेकार कन रहले हल।

"मत रो, माय", युवक नाग ओकरा सलाह देलकइ। "एकरा से कोय फयदा नञ्! अब घर लौट जो। हमर समय समाप्त हो गेलउ आउ अगर तूँ हियाँ परी ठहरमँऽ, त तोरा हमरा जान मारल आउ खाल जाय देखे पड़तउ।"

"निम्मन माय", जीमूतवाहन आगू बढ़के बुढ़िया के कहलकइ, "तूँ अपन लड़का खातिर मत रोवऽ। आझ हम तोर लड़का के जगह पर [23] गरुड़ के आहार बनके जइबो। तूँ अपन लड़का के लेके अराम से अपन घर चल जा।"

बुढ़िया एकाएक आनन्दाश्रु बहइते कहे लगलइ - "बेटा! तूँ केतना निम्मन बात कह रहलऽ ह! लेकिन जे अइसन बात कह सकऽ हइ, ऊ कीऽ हमर बेटा के बराबर नञ् हइ? कीऽ तोरा मर गेला पर हमरा दुख नञ् होतइ? अइसन मत करऽ बेटा, मत करऽ। ई तो बड़गो अन्याय होतइ।"

शंखचूड़ अपन माय के हुआँ से जल्दी से चल जाय लगी कहलकइ। आउ ऊ गरुड़ के आवे से पहिले, गोकर्ण के प्रार्थना करे चल गेलइ। शंखचूड़ के वापिस आवे के पहिलहीं मँड़रइते आ पहुँचलइ। ओकरा अइते देखके जीमूतवाहन शिला के पास खड़ी हो गेलइ। गरुड़ ओकरे नाग समझके खाय लगलइ। लेकिन गरुड़ के एक बात के अचरज होलइ। ऊ बात ई हलइ कि ऊ नाग बाकी नाग नियन मरे से नञ् डर रहले हल। ओकर मुख पर सिवाय शान्त भावना के आउ कुछ नञ् हलइ। एकरा में कीऽ रहस्य हइ, ई गरुड़ के बिलकुल समझ में नञ् अइलइ।

जल्दीए शंखचूड़ दौड़ल-दौड़ल अइलइ आउ कहे लगलइ - "गरुड़! ठहरऽ, ठहरऽ! ऊ नाग नञ् हको। हम नाग हियो। ओकरा मत खाहो। तूँ हमरे खा। ठहरऽ, ठहरऽ।" ऊ अइसीं चिल्लाब करऽ हलइ।

गरुड़ हैरान होल जीमूतवाहन दने तकलकइ आउ पुछलकइ - "अगर तूँ नाग नञ् हीं, त तूँ हियाँ परी काहे लगी अइल्हीं आउ हमर आहार बन रहल्हीं हँऽ?"

"तोर हृदय पत्थर के हउ। ओहे से बिन कुछ सोचले-विचारले एक नाग रोज अपन पेट में रख ले हीं। लेकिन हम जानऽ [24] ही कि जीवन के केतना मूल्य हकइ। ओहे से, एक नाग के प्राण-दान करे के उद्देश्य से हम ई काम कइलिए ह। एकरा में आउ कोय बात नञ् हइ।" जीमूतवाहन कहलकइ।

गरुड़ के पश्चात्ताप होलइ। ऊ कहलकइ - "महात्मा! हम अनजान में बड़गो अपराध कइलिए ह। हमरा क्षमा कर देथिन।"

"रोज जान-बूझके अपराध करे वला के कइसे क्षमा कइल जा सकऽ हइ? रोज जे नाग के खा हीं, कीऽ ऊ सब हमरा नियन प्राणी नञ् हइ?" जीमूतवाहन पुछलकइ।

"हम अब कभी नाग लोग के पीछा नञ् करबइ। हमरा क्षमा कर देथिन।" गरुड़ कहलकइ। शंखचूड़ के प्राण बच गेलइ। जीमूतवाहन घर चल गेलइ।

ई कथा सुनइला पर वेताल पुछलकइ - "राजा! ई दुन्नु में कउन बड़ा हइ? शंखचूड़ के बदले अपन प्राण के आहुति देवे वला जीमूतवाहन, या जीमूतवाहन के मरे से बचावे वला शंखचूड़? अगर तूँ एकर उत्तर जानतहूँ नञ् बतइलइ, त हम तोर सिर फोड़ देबो।"

विक्रम उत्तर देलकइ - "जीमूतवाहन प्राणीमात्र पर दया करऽ हलइ। ऊ प्राण-दाण खातिर, आत्म-बलि के अपन कर्तव्य समझऽ हलइ। शंखचूड़ लगी नञ् त ऊ कोय आउ खातिर अपन बलि दे देते हल। ऊ स्वेच्छापूर्वक मरते हल। लेकिन शंखचूड़ के मरना स्वेच्छानुसार नञ् हलइ। ऊ जबरदस्ती मारल जइते हल। अगर ऊ तहिया बच जइते हल त ऊ मृत्यु से भी बच जइते हल। ई जानतहूँ ऊ जीमूतवाहन के प्राण-रक्षा कइलकइ। ओहे से निस्सन्देह शंखचूड़ बड़ा हइ।"

ई तरह राजा के मौनभंग होतहीं वेताल लाश के साथ उड़के ओहे पेड़ पर जाके फेर से लटक गेलइ।




Sunday, November 10, 2019

वेताल कथा (चान मामूँ) - 3. सेठ के बेटी रत्नवती द्वारा अनोखा वर चयन


वेताल कथा (चान मामूँ) - 3. सेठ के बेटी रत्नवती द्वारा अनोखा वर चयन
(चंदामामा- दिसम्बर 1955, पृ॰17-22; वेतालपञ्चविंशति, कथा सं॰14; बैताल पचीसी, कहानी सं॰13)
[बड़गो धनगर सेठ रत्नदत्त के अत्यन्त सुन्दर बेटी रत्नवती, जेकरा विवाह लगी एक्को वर पसीन नञ् पड़ऽ हलइ, आखिर चोरी के सजा के रूप में फाँसी पर चढ़ावल जा रहल एगो चोर पसीन पड़लइ, त ऊ चोरवा एक तुरी तो रो पड़लइ, लेकिन फेर हँस्से लगलइ, तब बैताल विक्रम के पुच्छऽ हइ कि चोरवा पहिले कनलइ काहे आउ फेर हँस्से काहे लगलइ?]
[17] विक्रम हार नञ् मनलकइ। जिद करके ऊ फेर से पेड़ बिजुन गेलइ। लाश के पेड़ पर से उतारके, कन्हा पर डालके जब ऊ चलल जाब करऽ हलइ, त लाश के अन्दर के बैताल कहलकइ, "राजा! तोहरा तो आउ लोग से काम करवावे के हक हको; तोरा रात में, ई तरह बोझा ढोते देखके हमरा अफसोस होवऽ हको। कहीं तूँ ढोते-ढोते थक नञ् जा, ओहे से ई अजीब कहानी सुनावऽ हियो, सुन्नऽ!"
ऊ अयोध्या नगरी, जेकरा पर कभी पुरुषोत्तम रामचन्द्र के राज्य हलइ, ऊ जमाना में वीरकेतु राजा के राजधानी हलइ। ऊ समय हर दिन अयोध्या में विचित्र-विचित्र चोरी होवऽ करऽ हलइ। चोरी से [18] तंग आके जनता राजा के सम्मुख निवेदन कइलकइ - "महाराज! हमन्हीं के जइसन-तइसन चोर के खतरा से बचाथिन। लाख प्रयास कइलो पर चोर के ठेकाना हमन्हीं के मालुम नञ् हो रहल ह। ओकन्हीं के पकड़ल जाय के तो बात अलगे, ओकन्हीं देखाइयो नञ् दे हइ, लेकिन दिन-दहाड़े चोरी करते रहऽ हइ!"
वीरकेतु जनता के आश्वासन देके भेज देलकइ आउ अपन कुछ सिपाही के भेस बदलके, नगर में रात के गश्ती लगावे लगी भेजलकइ। ओकर खबरदारी के बावजूद, चोरी पहिलहीं नियन होते रहलइ आउ एक्को चोर सिपाही लोग के हाथ नञ् लगलइ।
वीरकेतु जान गेलइ कि चोरी करे वलन बहुत अकलमन्द आउ चलाँक हइ आउ ओकन्हीं सिपहियन के हाथ नञ् अइतइ। खुद ऊ चोरवन के पकड़े खातिर निकस पड़लइ। जब भेस बदलके ऊ रात में कहीं चलल जाब करऽ हलइ त ओकरा एगो अदमी अजीब हरक्कत करते देखाय देलकइ।
 राजा ओकरा दने गेलइ। रजवा के पास अइते देखके पुछलकइ - "तूँ केऽ हँ?"
"चोर!" - राजा कहलकइ।
"त तूँ हमर साथी हँ न! आ, घर चलल जाय, तोर निम्मन से स्वागत करबउ।" ऊ अदमिया कहलकइ।
राजा ओकरा साथ ओकर घर गेलइ। ओकर घर जंगल में, जमीन के निच्चे हलइ। हुआँ जाय के रस्तो खुफिया हलइ। डाकू, राजा के एगो कमरा में बैठाके अन्दर चल गेलइ। तब एगो दासी आके राजा से कहलकइ - "तूँ केऽ हकऽ? अगर तोहरा ई चोर के पता-ठेकाना मालुम हो गेलो त जान लऽ कि तोहर जिनगी खतम हो गेलो। तुरन्त हियाँ से तूँ भाग जा ...!"
[19] राजा तुरन्त हुआँ से चल पड़लइ। जल्दी-जल्दी राजधानी में जाके हथीयारबन्द सिपहियन के लेके हुआँ परी पहुँच गेलइ।
डाकू आउ सिपहियन के बीच घमासान युद्ध होलइ। हलाँकि डाकू अकेल्ले हलइ, तइयो ऊ सिपहियन से काफी देर तक बहादुरी से लड़ते रहलइ, ऊ कइएक सिपाही के ढेर भी कर देलकइ। आखिर ओकरा राजा के सामने हार माने पड़लइ। ऊ पकड़ल गेलइ।
वीरकेतु, डाकू के हाथ-गोड़ बन्हवाके ले गेलइ। ओकरा पर मोकदमा चलावल गेलइ। ई साबित होलइ कि एहे डाकू बहुत दिन से अयोध्या में डकैती कर रहले हल। चोरी कइल गेल मालो बरामद होलइ। राजा, डाकू के सजा देलकइ।
जब डाकू के राज-सैनिक दण्ड देवे खातिर नगर से बाहर ले जाब करऽ हलइ, त अयोध्या के सबसे बड़गो सेठ, रत्नदत्त के लड़की रत्नवती डाकू के देखके अपन पिता के बोलाके कहलकइ - "पिताजी! हमरा ऊ डाकू से विवाह कर दऽ!" रत्नदत्त ई सुनके मूर्छित नियन हो गेलइ।
रत्नवती ओकर एकलौती लड़की हलइ आउ बहुत दिन के बाद पैदा होले हल। ओकरा बड़ी लाड़-प्यार से पललके-पोसलके हल। रत्नवती के सौन्दर्य देखके, कइएक करोड़पति सेठ के पुत्र ओकरा से विवाह करे लगी अइते गेले हल। लेकिन रत्नवती ओकन्हीं से विवाह नञ् कइलकइ। ऊ विवाह करे लगी नञ् चाहऽ हलइ।
"काहे बेटी! तूँ तो बड़गर-बड़गर करोड़पति से शादी करे से इनकार कर देलहीं हल! अब काहे ई दुष्ट धूर्त डकू से विवाह करे लगी चाहऽ हीं?" रत्नदत्त पुछलकइ।
रत्नवती पिता के एक्को बात नञ् सुनलकइ। जब कइएक राजकुमार, रईस, उमराव ओकरा से विवाह करे लगी अइते गेले हल, त पिता [20] ओकरा शादी करे के सलाह देलके हल। लेकिन तइयो ऊ अपन पिता के सलाह नञ् मनलके हल। ऊ अपन बात के पक्की हलइ।
"चाहे ऊ चोर रहे, चाहे ओकरा सजा मिल रहल होवे, हम ओकरे से शादी करम। हम ओकरे अपन पति चुनलूँ हँ। अगर तूँ चाहऽ ह कि हमर विवाह होवे, त हमरा ओकरे से विवाह कर दऽ। अगर तूँ ई नञ् कर सकऽ ह, त हमहूँ ओकरे साथ मर जाम!" रत्नवती बोललइ।
ई सुनके रत्नदत्त बड़ी दुखी होलइ। ओकरा मालुम हलइ कि ओकर लड़की अपन निश्चय के कउनो हालत में बदले वली नञ् हइ। ऊ महाराज वीरकेतु के पास जाके कहलकइ - "महाराज! डाकू के हमरा सौंप देथिन। हम अपने के समुच्चा धन दे देबइ।" लेकिन राजा नञ् मनलकइ। ऊ हरगिज नञ् चाहऽ हलइ कि खामखाह ऊ डाकू के छोड़ देइ, जे लोग के नाक में दम करके रखलके हल। हताश होके रत्नदत्त घर वापिस आ गेलइ। ओकर लड़की साज-शृंगार करके दुलहिन बन्नल बैठल हलइ।
"बेटी! हम कामयाब नञ् हो सकलिअउ। डाकू के छोड़े लगी राजा नञ् मनलथुन। हम [21] एहो कहलिअइ कि हम अपन सर्वस्व दे देबइ; लेकिन ऊ नञ् मनलथिन। तोर ई शादी नामुमकिन हउ!" - रत्नदत्त अपन लड़की से कहलकइ।
"विवाह नहिंयों होलइ तइयो हम सती हो जाम!" - रत्नवती कहलकइ।
रत्नवती पालकी में चढ़के सजा के स्थान पर गेलइ। ओकरा साथ रोते-धोते ओकर मइयो-बाप गेलइ। ओकन्हीं के पहुँचते-पहुँचते जल्लाद लोग डाकू के फाँसी पर लटका चुकले हल। ऊ मरते-जीते कराह रहले हल।
रत्नदत्त अपन लड़की के डाकू बिजुन ले जाके कहलकइ - "देख बेटा! हमर लड़की तोरे से शादी करे के जिद कइले बैठल हको।" ई सुनके रत्नवती दने देखते-देखते डाकू के आँख में आँसू छलक अइलइ। फेर ऊ एक पल मुसकइलइ आउ बाद में ओकर प्राण-पखेरू उड़ गेलइ।
रत्नवती, अपन "पति" के शरीर लेके श्मशान गेलइ, हुआँ चिता बनाके ओकरा साथ खुद भी बैठ गेलइ।
केवल मन में पति स्वीकार करे के कारण रत्नवती के सती होते देख, कालभैरव खुद प्रत्यक्ष होके कहलथिन - "बेटी! तोर पति-भक्ति असाधारण हको। तूँ जे वर चाहऽ, माँग लऽ!"
[22] "देव! हम अपन माय-बाप के एकलौती लड़की हकूँ। बड़ी लाड़-प्यार से पाल-पोसके हमरा बड़गो कइलथन हँ, ओहे से हमरा चल गेला पर उनकन्हीं फूट-फूटके रोथिन। अपने उनकन्हीं के सन्तान देवे के अनुग्रह करथिन। सन्तान के पाके ऊ हमरा भूल जइथिन!" - रत्नवती कहलकइ।
कालभैरव हँसके कहलथिन - "तोर इच्छा पूरा कर देबो। लेकिन कीऽ तूँ अपना लगी कुच्छो नञ् चाहऽ हऽ?"
"हमरा सिवाय अपन पति के साथ रहे के आउ कुछ नञ् चाही! ओहे हमरा लगी सब कुछ हका।" - रत्नवती कहलकइ।
"हम तोर एहो इच्छा के पूरा कर देबो।" कहते-कहते कालभैरव मरलका डाकू के जिन्दा कर देलथिन आउ स्वयं अन्तर्धान हो गेलथिन।
ओकर दोसरे पल ऊ डाकू उठ बैठलइ। रत्नदत्त डाकू के घर ले जाके, ओकरा साथ अपन लड़की के विवाह बड़ी धूमधाम के साथ कर देलकइ।
बेताल ई कहानी सुनाके पुछलकइ - "राजन्! फाँसी पर लटकल डाकू, ई जानके कि रत्नवती ओकरा साथ विवाह करे लगी चाहऽ हइ, काहे कनलइ आउ फेर काहे लगी हँसलइ?" अगर जानलो पर एकर उत्तर नञ् देबऽ त तोर सिर टुकड़ा-टुकड़ा हो जइतो!"
"ई अकारण बन्धु लोग के ऋण चुकइले बेगर चलल जाब करऽ हूँ" - ई सोचके डाकू पहिले तो कनलइ, लेकिन ई लड़की के, जे बड़गर-बड़गर अदमी से विवाह करे से इनकार कर देलके हल, ओकरा पति चुनते देखके हँसी आ गेलइ!" - विक्रम उत्तर देलकइ।
ई तरह राजा के मौनभंग होतहीं वेताल लाश के साथ उड़के ओहे पेड़ पर जाके फेर से लटक गेलइ।

Friday, November 01, 2019

वेताल कथा (चान मामूँ) - 2. अदला-बदली कइल सिर


वेताल कथा (चान मामूँ) - 2. अदला-बदली कइल सिर
(चंदामामा- नवम्बर 1955, पृ॰23-26; वेतालपञ्चविंशति, कथा सं॰6)
[बहनोय आउ साला जब देवी मन्दिर में अपन-अपन सिर काटके खुद के देवी के बलिदान कर देते गेलइ आउ बाद में पत्नी मदनसुन्दरी आके दुन्नु के मरल देखके ऊ आत्महत्या करे पर उतारू हो गेलइ त देवी खुश होके ओकरा कहलथिन कि दुन्नु के सिर के धड़ से जोड़के रखला पर दुन्नु फेर से जीवित हो जइतउ, लेकिन पत्नी जल्दीबाजी में बहनोय आउ साला दुन्नु के सिर के धड़ से जोड़े बखत अदला-बदली कर देलकइ, त वेताल विक्रम के पुच्छऽ हइ कि अब ऊ लड़की के सचमुच के पति कउन हइ आउ भाय कउन?]


[23] विक्रम बहुत जिद्दी हलइ। प्रश्न के उत्तर देवे के कारण ओकर मौन-व्रत भंग हो गेले हल, आउ लाश के साथ वेताल फेर से ओहे पेड़ के डाढ़ से लटक गेले हल, ई विक्रमार्क जान गेले हल। ऊ वापिस गेलइ, पेड़ पर से लाश के उतरलकइ आउ कन्हा पर डालके श्मशान दने जाय लगलइ।
"राजा! तूँ बहुत ज्ञानी हकऽ। तोरा से पुछके अपन एक आउ संदेह दूर करे लगी चाहऽ हियो। पहिले ई कहानी सुन्नऽ।" एतना कहके वेताल ई कहानी सुनइलकइ -
"शोभावती नगर में काली के एगो मन्दिर हइ। हर साल आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी के दिन हियाँ परी एगो बड़गर मेला लगऽ हइ। दूर-दूर से लोग हियाँ अइते जा हइ, तलाब में स्नान करके काली माय के दर्शन करते जा हइ।
[24] एक साल ब्रह्मस्थल नामक गाम से धवल नाम के धोबी काली माय के दर्शन करे अइलइ। ऊ तलाब में नहइते बखत मदनसुन्दरी नाम के एगो धोबी-कन्या के देखलकइ। ओहो काली दर्शन खातिर आल हलइ। ऊ ओकर नाम, गाम, पिता के नाम आदि के बारे में भी पता लगइलकइ। ऊ सोचलकइ कि जब तक ऊ कन्या से विवाह नञ् कर लेतइ, तब तक भोजन के एगो कोर तक नञ् ग्रहण करतइ।
मेला के बाद धवल के दिन-दिन कमजोर होते देखके ओकर पिता ओकर कमजोरी के कारण पुछलकइ। धवल मदनसुन्दरी के बारे सब कुछ कह सुनइलकइ।
"अरे बेटा! ई छोटके बात लगी तूँ खान-पीना छोड़ बैठलँऽ हल? ओकर पिता हमर दोस्त हइ। अभी जाके विवाह निश्चित कर दे हिअउ। तूँ उठ, भोजन कर।" - ओकर पिता कहलकइ।
शुभ मुहूर्त में धवल आउ मदनसुन्दरी के विवाह हो गेलइ। धवल पत्नी के घर लाके अराम से रहे लगलइ।
ई दौरान धवल ओकर घर आके कहलकइ - "हम अपन घर में गौरी व्रत कर रहलिए ह। तोहरा आउ अपन बहिन के ले जाय लगी अइलिए ह।"
अगलहीं दिन धवल, अपन पत्नी आउ साला के साथ, ससुराल लगी निकस पड़लइ। रस्ता में शोभावती नगर पड़ऽ हलइ। धवल के काली माय के दर्शन करे के इच्छा होलइ। जब ऊ साला आउ पत्नी के बोलइलकइ त ओकन्हीं खाली हाथ काली माय के देखना अच्छा नञ् समझलकइ, त धवल अकेल्ले मन्दिर गेलइ।
मन्दिर में, काली माय के देखतहीं धवल भक्ति के कारण मूर्छित नियन हो गेलइ। अठारह भुजा वली काली माय, महिषासुर [25] के पैर के तले रौंदते एगो विजेता नियन देखाय देलथिन। काली माय के मूर्ति के पासे में एगो गँड़ासा हलइ।
"ई देवी के हर कोय बलि देके पुण्य कमा हइ, हम खुद के हीं बलि देके मोक्ष पाम।" ई सोचके धवल गँड़ासा उठइलकइ आउ अपन सिर खुद काटके मूर्ति के अर्पित कर देलकइ।
पति के नञ् अइते देखके पत्नी अपन भाय के भेजलकइ। जब ऊ मन्दिर में गेलइ त ऊ देखलकइ कि बहनोय अपन हाथ से मूर्ति के सामने खुद के बलि दे देलक ह। ओकरा में एक प्रकार के भक्ति-आवेश पैदा होलइ। ओहो गँड़ासा से अपन गला काटके काली माय के अर्पित कर देलकइ।
मदनसुन्दरी ऊ दुन्नु के बहुत इंतजार कइलकइ। जब ओकन्हीं नञ् अइते गेलइ, तब ऊ खुद हैरान होके मन्दिर में गेलइ। हुआँ अपन भाय आउ पति के सिर पड़ल देखके ऊ दुखी होके कहलकइ - "माय! कीऽ तूँ हमर भाय आउ पति के एक्के साथ बलि ले लेलऽ? अब हमरो जीए से कीऽ फयदा? हम तोर सामनहीं फाँसी लगाके [26] मर जइबो।" ऊ आत्महत्या करे के प्रयास कइलकइ। तब ओकरा देवी के मुख से ई शब्द सुनाय देलकइ -
"अरे पगली! आत्महत्या मत कर। हम तो न तोर पति के बलि मँगलियो हल, न तोर भाइए के। ओकन्हीं अपन भक्ति में खुद के बलि दे देते गेलो ह। ओकन्हीं के धड़ बिजुन सिर रख, हम ओकन्हीं के जिला दे हिअउ।"
काली माय के शब्द सुनतहीं मदनसुन्दरी बहुत्ते खुश होलइ। ओकर आँख से आँसू झरे लगलइ। ऊ आँसू पोछते-पोंछते मन्दिर के अन्हेरा में, दुन्नु सिर के धड़ बिजुन रखलकइ। ओकन्हीं तुरम्मे जीवित हो गेते गेलइ। लेकिन एगो गलती हो गेले हल। मदनसुन्दरी अपन पति के सिर भाय के धड़ पर रख देलके हल आउ भाय के सिर के पति के धड़ पर। ओकन्हीं अइसीं जीवित हो गेते गेले हल।
ई कहानी सुनाके वेताल पुछलकइ - "राजा! हमर संदेह ई हइ कि मदन सुन्दरी के सचमुच के पति कउन हइ? आउ भाय कउन हइ? अगर तूँ एकर उत्तर जानतहूँ नञ् देलऽ त तोर सिर के टुकड़ा-टुकड़ा हो जइतो।"
"एकरा में कइसनो संदेह के गुंजाइशे नञ् हइ। पूरे शरीर में सिर हीं प्रधान होवऽ हइ। ओहे से पति के सिर वला हीं पति हइ। भाय के सिर वला भाय।" - विक्रम उत्तर देलकइ।
ई तरह राजा के मौनभंग होतहीं वेताल लाश के साथ उड़के ओहे पेड़ पर जाके फेर से लटक गेलइ।


Saturday, October 26, 2019

वेताल कथा (चान मामूँ) - 1. मंत्री के मौत


वेताल कथा (चान मामूँ) - 1. मंत्री के मौत
(चंदामामा-अक्टूबर 1955, पृ॰17-23)


[17] कोय जमाना में गोदावरी नदी के किनारे बस्सल प्रतिष्ठान राज्य पर विक्रम राज्य करऽ हलइ। एक दिन ओकर दरबार में शान्तिशील नाम के एगो भिक्षु अइलइ। ऊ ओकरा एगो फल भेंट में देलकइ। राजा ऊ फल के अपन पालतू वानर के देलकइ। वनरवा जइसीं ऊ फलवा के कटलकइ त ओकरा में से एगो रत्न बाहर निकसके अइलइ।
ई देखके विक्रम चकित होलइ। "अपने हमरा से कीऽ सहायता चाहऽ हथिन?" राजा भिक्षु से पुछलकइ।
"राजन्! हम मन्त्र-तन्त्र सिक्खे के साधना कर रहलिए ह। ऊ साधना के पूरा करे लगी एगो महावीर के सहायता चाही। ई संसार में अपने से बढ़के केऽ महावीर हो सकऽ हइ?"
[18] "अपने कइसन सहायता चाहऽ हथिन?" राजा पुछलकइ।
"अगर अगला कृष्ण चतुर्दशी के दिन श्मशान में आ सकथिन त हुआँ परी एगो बर (बरगद) के पेड़ के निच्चे हम अपने के इंतजार में रहबइ। तब हम बतइबइ कि हमरा कइसन सहायता चाही।" भिक्षु कहलकइ।
राजा मान गेलइ। कृष्ण चतुर्दशी के दिन आधी रात के, कार कपड़ा पेन्हके, तलवार लेके, ऊ श्मशान में जाके भिक्षु से मिललइ।
"राजन्! अगर दक्खिन तरफ जइथिन त हुआँ परी अपने के एगो पीपर के पेड़ देखाय देतइ। ओकरा पर एगो लाश लटकल देखाय देतइ। अपने चुपचाप ऊ लाश के पेड़ पर से उतारके हियाँ ले आथिन।" - भिक्षु कहलकइ।
विक्रम दक्खिन तरफ गेलइ आउ पीपर के पेड़ पर एगो लाश लटकल देखलकइ। पेड़ पर चढ़के लशवा जे रस्सी से बन्हल हलइ ऊ रस्सी के अपन तलवार से काट देलकइ। लशवा धड़ाम से निच्चे गिरलइ आउ निच्चे गिरतहीं ऊ लशवा कन्ने लगलइ। राजा के अचरज होलइ। ऊ पेड़ पर से उतर अइलइ आउ लशवा के गौर से देखे लगलइ। तुरतम्मे लशवा हँस्से लगलइ।
राजा समझ गेलइ कि लशवा में कोय बेताल हइ। "काहे लगी हँस्सऽ हँऽ? चल, चलल जाय।" राजा के मुँह से ई बात निकसलइ कि लशवा झट फेर से पेड़ पर चढ़ गेलइ आउ डाढ़ से पहिलहीं नियन लटके लगलइ।
राजा फेर पेड़ पर चढ़लइ, लशवा के उतरलकइ आउ ओकरा कन्हा पर रखके चुपचाप श्मशान दने चल पड़लइ।
तब लाश के वेताल राजा विक्रम के ई कहानी सुनावे लगलइ - "राजा! अफसोस हको कि तोरा बोझ ढोवे पड़ [19] रहलो ह। हम तोरा एगो छोटगर कहानी सुनावऽ हियो, सुन्नऽ।"
यशकेतु नाम के राजा अंगदेश के राज्य करऽ हलइ। ओकर एगो मंत्री हलइ, जेकर नाम दीर्घदर्शी हलइ। चूँकि यशकेतु हमेशे अन्तःपुर में भोग-विलास में मस्त रहऽ हलइ, ओहे से राज्य के समुच्चा भार मंत्री दीर्घदर्शी पर आके पड़ गेले हल आउ हलाँकि दीर्घदर्शी बहुत सवधानी आउ न्यायपूर्ण पद्धति से राज्य कर रहले हल, तइयो बुरा-भला कहे वला लोग ओकरा बुरा-भला कहवे करऽ हलइ। ओकन्हीं कहते रहऽ हलइ कि राजा के भोग-विलास में डालके ऊ खुद राजा बन बैठले ह। ई बात सुनके दीर्घदर्शी के बहुत दुख होवइ। ऊ राजा बिजुन जाके कहलकइ - "महाराज, हम तीर्थ-यात्रा पर जा रहलिए ह। अपने अब अपन राज्य खुद्दे देख लेथिन।" राजा ओकरा बहुत कहलकइ कि ऊ तीर्थ-यात्रा पर नञ् जाय, लेकिन दीर्घदर्शी नञ् मनलकइ आउ ऊ अपन यात्रा पर चल गेलइ।
कुछ दिन सफर कइला के बाद ऊ एगो गाम में पहुँचलइ। हुआँ परी ओकरा एगो व्यापारी से जान-पछान हो गेलइ। ऊ व्यापारी सामुद्र पार देश से व्यापार करऽ हलइ।
[20] "हम आझ जहाज में माल लादके स्वर्ण-द्वीप जा रहलियो ह। तूहूँ हमरा साथ चलऽ।" - व्यापारी दीर्घदर्शी के सामने अपन इच्छा प्रकट कइलकइ। ऊ मान गेलइ।
जब ओकन्हीं स्वर्ण-द्वीप से वापिस आब करऽ हलइ, त एक दिन दीर्घदर्शी के समुद्र में एगो आश्चर्यजनक दृश्य देखाय देलकइ। समुद्र के लहर में से एगो बड़का गो पेड़ उपरे निकसलइ। ओकरा पर एगो बहुत्ते सुन्दर स्त्री वीणा बजइते देखाय देलकइ। देखते-देखते ऊ दृश्य गायबो हो गेलइ। नाविक लोग दीर्घदर्शी के चकित देखके कहलकइ - ई दृश्य ई प्रान्त में हमन्हीं के हर तुरी देखाय दे हइ, महाराज!"
कुछ दिन बाद दीर्घदर्शी अंगदेश वापिस पहुँचलइ। मंत्री के देखके राजा बड़ी खुश होलइ। मंत्री के जाय के बाद राजा ई भूल गेलइ कि मन के शान्ति केकरा कहऽ हइ। ओकरा न अराम हलइ न चैन। "खैर, मंत्री! तूँ संसार में कइसन-कइसन अजीब चीज देखलऽ?" - राजा पुछलकइ।
"महाराज! जब हम एगो व्यापारी के साथ स्वर्ण-द्वीप जाके वापिस आब करऽ हलिअइ त समुद्र में हम एगो बहुत्ते सुन्दर, अद्भुत युवती के देखलिअइ। ई कोय अप्सरा होतइ। हमरा देखते-देखते ऊ अदृश्य हो गेलइ।" - दीर्घदर्शी कहलकइ।
ई सुनतहीं राजा ऊ स्त्री के देखे लगी उताहुल (उतावला) हो गेलइ। मंत्री बहुत समझइलकइ-बुझइलकइ, लेकिन राजा राज्य-भार मंत्री पर डालके खुद यात्रा पर निकस पड़लइ। समुद्र के किनारा पर पहुँचला के कुछ दिन बादे ओकरा स्वर्ण-द्वीप तरफ जाय वला एगो जहाज मिल गेलइ। राजा ऊ जहाज के व्यापारी से दोस्ती कर लेलकइ आउ जहाज में यात्रा करे लगलइ।
[21] कुछ दिन के बाद, समुद्र में राजा के भी एगो पेड़ देखाय देलकइ, जेकरा पर एगो स्त्री वीणा बजा रहले हल। ई देखतहीं, राजा न आव देखलकइ न ताव, ऊ समुद्र में कूद पड़लइ।
समुद्र के तह में राजा के एगो महानगर देखाय देलकइ। ओकरा कधरो कोय प्राणी नञ् देखाय देलकइ। लेकिन, ऊ अपन जिद में घूमते गेलइ। आखिर ऊ एगो विशाल भवन में पहुँचलइ। ओकरा एक कमरा में हंस के पंख के गद्दी पर एगो बहुत्ते सुन्दर स्त्री देखाय देलकइ। राजा ओकरा देखतहीं पुछलकइ - "तूँ केऽ हकऽ? आउ ई निर्जन जगह पर तूँ अकेल्ले कीऽ कर रहलऽ ह?"
"राजा, हम एगो गन्धर्व स्त्री ही। हमर नाम मृगांकवती। हमर पिताजी हमरा बहुत मानऽ हला। अगर हम साथ नञ् होवऽ हलिअइ, त ऊ कभी भोजन नञ् करऽ हलथिन। हम हरेक अष्टमी आउ चतुर्दशी के दिन गौरी पूजा करे जाब करऽ हलिअइ। एक तुरी पूजा में मग्न होके हम साँझ तलक घर नञ् अइलिअइ। तब तक पिताजी भोजन नञ् कइलथिन। एकरा पर उनका गोस्सा आ गेलइ आउ हमरा शाप देलथिन कि हम निर्जन नगर में रहूँ।" - ऊ स्त्री कहलकइ।
[22] "जे गुजर गेलो, ओकर फिकिर नञ् करऽ। हम तोरा से बिन विवाह कइले जिन्दा नञ् रह सकऽ ही। हम दुन्नु विवाह करके हिएँ रहते जइबइ।" - राजा कहलकइ।
"तोरा से शादी करे में हमरा कोय एतराज नञ् हको। लेकिन एक बात के खियाल रक्खऽ। हमरा हमर पिताजी गोस्सा में शाप तो दे देलथिन हल, लेकिन हमरा मनावे पर ऊ शाप से मुक्त होवे के मार्ग भी बता देलथिन हल कि अगर हमरा से विवाह करके कोय सात दिन हमरा साथ रहे त हम शाप से मुक्त हो जइबइ। आउ हम गन्धर्व लोक में अपन पिता से फिर मिल सकबइ। कोय न कोय तो हमरा शाप से मुक्त करतइ, ई सोचके हम समुद्र पर देखाय दे हलिअइ। एतना दिन के बाद, आझ सौभाग्य से तूँ आके मिललऽ।" - मृगांकवती कहलकइ।
राजा बड़ी प्रेम से कहलकइ - "अगर तूँ हमर पत्नी एक्को पल खातिर बन जइबऽ त हम धन्य हो जाम।"
मृगांकवती के राजा पर अत्यधिक प्रेम होवे लगलइ। आँगन में एगो कुआँ देखके ऊ कहलकइ - "ई सप्ताह भर में तूँ भूलियोके ई कुआँ में नञ् उतरिहऽ। अगर कहीं उतर गेलऽ, त दोसरे पल तूँ भूलोक (मृत्युलोक) में होबऽ। तोहरा बिना हम ई निर्जन नगर में एक्को पल नञ् रह सकऽ ही।"
समुद्र के तह में बस्सल ऊ निर्जन नगर में मृगांकवती के साथ हुआँ के अजीब चीज देखते-देखते यशकेतु मजे में एक सप्ताह काट देलकइ।
"राजा! अब हमरा अपन लोक में जाय के समय आ गेलो ह। हम तोहर प्रेम, स्नेह कभियो नञ् भूल पइबो, हमेशे आद रखबो। अब हमरा जाय दऽ।" कहते मृगांकवती राजा के कुआँ बिजुन लइलकइ।
[23] राजा जाय लगी नञ् चाहऽ हलइ। ऊ मृगांकवती से कहलकइ - "कुछ दिन, हमरा साथ, हमर नगर में काहे नञ् रह जाहऽ?"
"राजा, अगर हम भूलोक में गेलियो त हम मानव-कन्या हो जइबो।" - मृगांकवती कहलकइ।
राजा ओकरा दने अइसे गेलइ, जइसे ओकरा से बिदाई लेवे जा रहल होवे, लेकिन ओकरा जोर से पकड़के ओकरा साथ ऊ कूमा में कूद पड़लइ। दोसरे पल दुन्नु भूलोक पहुँच गेते गेलइ। मृगांकवती मानव-कन्या हो गेलइ। राजा ओकरा अंगदेश ले गेलइ आउ एक दिन बड़ी धूमधाम से ओकरा साथ विवाह कर लेलकइ। ओहे दिन अंगदेश के मन्त्री दीर्घदर्शी हृदय के धड़कन बन्द हो जाय से मर गेलइ।
एतना कहानी सुनाके वेताल पुछलकइ - "राजा! ई बतावऽ, मन्त्री दीर्घदर्शी काहे मर गेलइ? कीऽ ई लगी कि चल गेल राजा वापिस आके ओकर राज्य में विघ्न डाल रहले हल? कि ई लगी कि जे सुन्दर स्त्री के ऊ देखलके हल, ऊ सुन्दर स्त्री से राजा विवाह कर लेलकइ? अगर ई प्रश्न के सही उत्तर जानतहूँ उत्तर नञ् देलऽ, त तोर सिर के टुकड़ा-टुकड़ा हो जइतो।"
"दीर्घदर्शी तोर बतावल कोय कारण से नञ् मरलइ। जब राजा भोग-विलास में मस्त हलइ, तभिए ऊ दीर्घदर्शी के राज सौंप देलके हल। ई कारण से दीर्घदर्शी के निन्दा होले हल, आउ अब ऊ एगो अप्सरा के साथ शादी करके आ गेलइ। अतः अब ऊ फेर से ओकरा पर राज्य-भार डाल देतइ, दीर्घदर्शी के लोग के बीच आउ निन्दा होतइ - ई सोचके दीर्घदर्शी के हृदय के धड़कन रुक गेलइ।।" - विक्रम वेताल के प्रश्न के उत्तर देलकइ।
ई तरह राजा के मौनभंग होतहीं वेताल लाश के साथ उड़के ओहे पेड़ पर जाके फेर से लटक गेलइ।