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Tuesday, June 07, 2016

मगही दूरा-दलान - मार्च 2016 में प्रकाशित लेख



मगही
[25] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
मौसम के हिसाब से हर कोई बसंत के बहार लूट रहलन हे । जन्ने नजर घुमावऽ बसंत के बहार साफ-साफ लौकऽ हे । गांव तो गांव भीड़-भाड़ से भरल शहर में भी बसंत अप्पन छाप छोड़ले हे । ठूंठ पीपर तक पर हरिअरी छा गेलक हे । शहरी भले अप्पन काम-धंधा के फेरा में भाग-दउड़ में मशगुल हथ, बाकि बसंत अप्पन छाप उकरे ऊपरे भी छोड़ले हे । देश-दुनिया लेल भले मथपीरी वाला महीना फरवरी-मार्च होवे, जेकरा में सभे तरह के बजट बच्छर भर लेल पेश करल जाहे, बाकि हिन्दी महीना के हिसाब से सबला मस्त महीना फागुन चल रहल हे । फागुन माने हंसी-खुशी, रंग-गुलाल, गीत-गौनई, प्यार-दुलार के मदमस्त महीना, जेकर असर अइसन कि बूढ़ो जवान हो जा हथन । समूले मगध में भर महीना लोग टोली में जात-पात से ऊपरे उठ के ढोल-मंजीरा, झाल-करताल के धुन पर होली गीत गावऽ हथन । भगवान के नाम राम-कृष्ण-भोले शंकर से शुरू होवे वाला होली गीत उहां तक पहुंच जाहे, जहां सभे एक रंग में रंगा जा हथ । का बूढ़, का जवान, का लइकन सब होली के धून में मस्त हो जा हथन । आउ तब भर फागुन बुढ़वा देवर लागे, भर फागुन । माने एक तो बसंत के बहार आउ दोसर फागुन महीना के मस्ती, लोग-बाग अप्पन सभे दुख-दरद भूला के मस्ती में जीअ हथन ।
बाकि दोसरा दन्ने इहे घड़ी देश के दिशा तय करल जा हे । आवे वाला साल लेल बजट बनऽ हे आउ ओकरे मोताबिक देश के गाड़ी आगे बढ़ऽ हे । भारतीय रेल देश के सबला बड़का उपक्रम हे । दुनिया में एकर अप्पन एगो अलगे पहचान हे । लाखो लाख लोग रोजे रेल से सफर करऽ हथन तऽ साथे-साथे माल ढोवाई के भी काम रेल से होवऽ हे । मुम्बई आउ कोलकत्ता लेल तो रेल लाइफ लाईन हे । जउन मुम्बई-कोलकत्ता में रेल के चक्का फेल तऽ पूरा महानगर फेल । अप्पन देश में आम बजट के साथे रेल बजट भी पेश करल जाहे । रेल बजट में रेल मंत्री बासंती बयार बहावे के पूरा कोरशिश करलन हे । न तो यात्री किराया बढ़ावल गेल आउ न माल किराया । चारगो नया ट्रेन अंतोदय, हमसफर, उदय आउ तेजस एक्सप्रेस चलावे के सपना देखावल गेल हे । मेहरारू, बूढ़ आउ नौजवान सभे लेल ट्रेन में सुविधा बढ़ावल गेल हे । अलहेला लइकन लेल गरम दूध आउ गरम पानी ट्रेन में भेंटाएत । बिहार के गयाजी आउ बिहारशरीफ स्टेशन चकाचक होएत । बिना फाटक वाला रेलवे क्रांसिंग खत्म होएत, तऽ 2020 तक रिजर्वेशन में वेटिंग टिकट के झंझट खत्म हो जाएत । माने रेल बजट एकदम से बसंत नियन सुहावन ।
            एने अप्पन बिहार में भी आम बजट पेश करल गेल, जेकरा में कृषि, शिक्षा, ऊर्जा आउ स्वास्थ्य पर बेसी करके जोर देवल गेल हे । राज्य के विकास लेल मुख्यमंत्री के सातो निश्चय पर अमल करे लेल ठोस कदम उठावल जाएत । एकरा लेल बजट राशि के आधा हिस्सा विकास योजना पर खरच होएत । मेडिकल आउ इंजिनियरिंग कालेज के साथे पारा मेडिकल, पालटेकनिक, महिला आइटीआइ खोलल जाएत । माने राज्य के बजट पर भी बसंत के बहार हे । केन्द्र के आम बजट से भी सभे के बड़ी उम्मीद हे, उहां भी बासंती बेयार के कुछ न कुछ असर जरूर रहत । माने इ खुशगवार मौसम में सभे खुश रहऽ । अभी एतने...
प्रकाशित प्रभात खबर-01-03-2016

मगही
[26] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
अपना हिआं कहल गेल हे कि जहां मेहरारू सभे के पूजा होवऽ हे, उहां देओता के वास होवऽ हे । बाकि आज समाज में मेहरारू के हालत केकरो से छिप्पल नऽ हे । देवी-दुर्गा कहाय वाली मेहरारू सभे बेसी करके बेचारी बन के जी रहलन हे । अपढ़वा तो अनपढ़वा हई हथन, पढ़ल-लिखल के भी हालत समाज में बरोबरी वाला नऽ हे । मेहरारू सभे के ई हालत खाली अपने देश में नऽ दुनिया के दोसरो देश में लगभग इहे हेऽ । शाइद इहे कारण हे कि विश्व स्तर पर 08 मार्च के अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनावल जा हे । इ अवसर पर लम्हर भाषण, सेमिनार आउ बड़ी कुछ के आयोजन भी करल जाहे । बाकि एक दिन के बाद हालत जस के तस, फिन चुहिया के चुहिया कहानी नियन । मेहरारू सभे के उचित मान आउ सम्मान भेंटाय, एकरा लेल सबला जरूरी हे कि इनकरा पढ़ाई के साथे-साथे दोसरो क्षेत्र में विशेष आरक्षण के लाभ देवल जाए, जेकरा से आगे बढ़े के मौका भेंटाय । आज भी केतने लड़की बीचे में अप्पन पढ़ाई-लिखाई छोड़ के घर-गृहस्ती के काम में लग जा हथन । उनकरा में प्रतिभा के कउनो कमी नऽ रहऽ हे । इ बात मैट्रिक-आईए-बीए से लेके दोसर प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम देखला से पता चलऽ हे । एकर बाबजूद इ पछूआ जा हथन । एकरा लेल प्रयास करल जा रहल हे आउ उमें सफलता भी भेंटा रहल हे ।
            अप्पन राज्य बिहार में मेहरारू सभे के आगे बढ़ावे लेल सराहे जुकुर प्रयास करल गेल हे । इ कउनो हम मुंह देखौअल बात न कर रहली हे । अरे हाथ कंगन के आरसी का आउ पढ़ल-लिखल लेल फारसी का इ तो देखे-सुने आउ निहारे के बात हे । झुण्ड बना के एक ड्रेस में लड़की सभे के स्कूल जाना, एक तरह से बिहार के पहचान समूले देश में बनल हे । प्राथमिक शिक्षक बहाली में मेहरारू सभे लेल पच्चास फिसदी आरक्षण, सिपाही बहाली में आरक्षण आउ पंचायत चुनाव में पच्चास फिसदी आरक्षण देके सरकार एगो साहसिक कदम उठौलक हे । जेकर परिणाम हेऽ कि आज सभे स्कूल में मास्टर जी के साथे आधा आधी मास्टरनी जी भी लइकन के लिखा-पढा रहलन हे । मेहरारू सिपाही आज हाथ में बंदूक आउ लाठी-डंडा लेले ड्यूटी कर रहलन हे, जे कभी सपनो में नऽ अदमी सोंचल हल । सिपाही माने मोछ वाला । पंचायत चुनाव लेल नामांकन अपना हिआं चल रहल हे । एकरा में आधा सीट मेहरारू लेल हे । पंचायत चुनाव में केतने अदमी बिना मुखिया के चुनाव लड़ले मेहरारू के नाम पर मुखिया जी बन गेलन । कुछ लाजे-शरमे अपना के मुखिया जी न कहा के सौटकट में एमपी माने मुखिया पति कहा हथन । अब इ सब होवे से मेहरारू सभे घर में मान-सम्मान बढ़ल हे । साथे-साथे उ घर के चहारदिवारी से बाहरे निकले के साहस भी जुटौलन हे । कुछ लोग महिला आरक्षण के ऊपरे अप्पन अंगुरी उठावऽ हथन, जउन कुछ हद तक अपना के सही भी साबित करऽ हथन । बाकि एकरा से मेहरारू सभे के परिवार आउ समाज में मान-सम्मान बढ़ल हे, इ बात से इन्कार न करल जा सकऽ हे । परिवार, समाज, देश आउ दुनिया में मेहरारू सभे के मरद के बरोबर मान-सम्मान मिले के चाही, इ बड़ जरूरी बात हे । अभी एतने बात ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-08-03-2016

मगही
[27] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
इ बात हमरो खुदे अप्पन कान के विश्वास नऽ हो रहल हे, बाकि एकदम से चौबीस कैरेट सोना लेखा सच हे कि आजकल खाली अप्पन मगधे में नऽ समूले बिहार में होली से पहिलहीं जम के मन रहल हे-होली । बात रंग-गुलाल के होवे, कि खाय-पीए के, इया फिन गाजा-बाजा के साथे नाचे-गावे के सभे कुछ मौज-मस्ती में हो रहल हे । हम्मर बात समझलथिन कि एकदम से फारे-फार बतलावे पड़त । जी, हम बात कर रहली हे-पंचायत चुनाव लेल होवे वाला नामांकन के । जइसन कि अपनन्हीं सभे के भी मालूम हेऽ कि बिहार में पंचायत चुनाव दस चरण में होवे वाला हे, जेकरा लेल अधिसूचना दूए मार्च के जारी कर देवल गेलक हे । दसो चरण लेल नामांकन से लेके चुनाव के तारीख निर्धारित कर देवल गेल हे । अइसे पहिला चरण के पंचायत चुनाव 24 अप्रैल के माने होली से ठीक एक महीना बाद हे आउ अंतिम चरण के चुनाव 30 मई के हे । नामांकन के काम तीने मार्च से चल रहल हे । नामांकन आउ चुनाव के बीचे में 24 मार्च के होली परब पड़ रहल हे । होली खास करके अप्पन मगध क्षेत्र के एगो अइसन परब हे, जेकर तैयारी एक तरह से बसंत पंचमी के सरस्वती पूजे से शुरू हो जाहे । खास करके गांव में इ घड़ी खेती-बारी के काम से किसान-मजूर निश्चिंत रहऽ हथन । रबी, दलहन, तेलहन के साथे सर-सब्जी के फसिल इ घड़ी एकदम से अप्पन जवानी के दहलिज पर खाड़ खेत-बधार में बउराएल रहऽ हे । अइसन में किसान-मजूर भी भर फागुन मारे खुशी के बउराएल रहऽ हथ । एक तो बसंत रितु आउ दोसरे में फागुन के मद मस्त महीना, काम-धंधा बेसी कुछ हईए नऽ, अइसन में पूरा महीना सभे के लहालोट कटऽ हे ।  एगो कहउत बड़ प्रचलित हे कि एक तो करैला, ऊपरे से नीम चढ़ल, एकर ठीक उल्टी बात, एक तो धमधम चमेली आउ ऊपरे से चंदन चढ़ल । ठीक इहे बात हो गेल । एक तो मस्त महीना फागुन आउ मद मातल महीना चईत, ऊपरे से पंचायत चुनाव । एकदम से चकाचक । चुनाव आयोग के सख्ती के बादो नामांकन घड़ी उम्मीदवार से लेके आम जन में जउन तरह के उत्साह आउ उमंग लौक रहल हे, चुनाव जीतला के बाद का करतन, कहल हम्मर बस के बात नऽ हे । पंचायत चुनाव भी अजबे हे । एक्के साथे जिला परिषद, पंचायत समिति, मुखिया, ग्राम पंचायत सदस्य, सरपंच आउ ग्राम कचहरी पंच के चुनाव होवऽ हे । जउन मतदाता के एक वोट देवे में नानी मूअ हे, एक्के बेर उनकरा छौगो के वोट करे लेल छौगो बैलेट भेंटाएत, तऽ ढेर के कपारे चकरी लेखा घुम जाएत । गलिमत इ रहऽ हे कि ढेर जगह पर वार्ड सदस्य आउ पंच के साथे आउरो दोसर उम्मीदवार निर्विरोध चुना जा हथन । आउ न तऽ एक बेर छौगो बैलेट पर वोट देवे में पढ़ल-लिखल तक के पसेना छूट जाहे । पंचायत चुनाव के प्रति अइसन उत्साह कि मरद-मेहरारू नामांकन घड़ी एकदम से भेड़िया धसान जुट रहल हे । गाड़ी-छक्कड़ा, गाजा-बाजा, रंग-अबीर, मुर्ग-मोस्सलम से लेके नस्ता-पानी के पोख्ता इंतजाम हो रहल हे । रंग-गुलाल उड़ावित, बाजा बजावित, नाचईत-गावईत झुण्ड के देखला पर सहज बुझा हे कि होली से पहिलहीं जम के मन रहल हे-होली ।
प्रकाशित प्रभात खबर-15-03-2016

मगही
[28] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
हमनी सभे के भारतवासी होवे पर जेतना गुमान हेऽ, ओकरा से एक्को रती कम इ बात लेल भी गुमान  हे कि हमनी बिहार के रहवईया सभे भाई-बहिन चाहे देश-विदेश जहां भी रही बिहारी हे । अपना के बिहारी कहला इया कहौला से जउन खुशी के एहसास मन के भीतर होवऽ हे, ओकरा इ कागज के पन्ना पर लिखल न जा सकऽ हे । अपना हिआं तो हठुआ से नौ मन परब-त्योहार हे, ओकरे में कुछ उन्नईस तऽ कुछ बीस । निमन से चित्रगुप्त भगवान नियन जउन परब-त्योहार के लेखा-जोखा तैयार करल जाए तऽ मुंह जब्बडी़ बात नऽ कह रहली हे-रोजे कोई न कोई परब होवे के गारंटी हे । बाकि आम के भीड़ में कुछ खास होवऽ हथन, जिनकर महात्तम बेसी होवऽ हे । ई बात परब-त्योहारो पर लागू होवऽ हे । आवेवाला हंसी-खुशी, रंग-गुलाल के परब होली भी एगो अइसने खास परब हे, जेकरा में सभे के मन तरसऽ हे कि होली पर-परिवार के साथे अप्पन घर में मनावल जाए । संस्कृत में कहल गेल हे कि प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् । माने जउन आंख के आगू हे, ओकरा लेल प्रमाण के का जरूरत ? होली परब से पहिले रेल के आरक्षित सभे डिब्बा फुल । बिना आरक्षित रेल के डिब्बा में अइसन कचमाकूट भीड़ की गोड़-हाथ पसारे के बात तो दूर, गलती से चुटियो घुस जाए तऽ ओकरा ससरे के मौका न भेंटाएत । गाड़ी-छक्कड़ा में लोग चुटा-माटा लेखा लटक-फटक के जा हथ ।
            परब-त्योहार नियन आजकल दिवस मनावे के भी परम्परा दिन पर दिन जोर पकड़ले जा रहल हे । लइकाई के बात इयाद कर रहली हे पहिले हमनी राष्ट्रीय परब के रूप में 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस, 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस, 02 अक्टूबर के गांधी दिवस आउ 14 नबम्वर के बाल दिवस, 05 सितम्बर के शिक्षक दिवस मनावऽ हली । अब तो बेलेनटाईन डे, मदर डे, फादर डे, फुल डे आउ राम जाने ई गाड़ी जाके कहां रूकत ? 22 मार्च के बिहार दिवस मनावे के परम्परा बेसी पुरान नऽ हे, बाकि आज के तारीख में जउन खुशी आउ उत्साह के साथे ई समूले सूबा में मनावल जा हे, दोसर कउनो परब से ई कम नऽ हे । भोरे से लेके पहर रात तक एक पर बढ़ के एक कार्यक्रम राजधानी से लेके जिला-जेवार स्तर पर आयोजित करल जा हे । अंग्रेज अप्पन सुविधा लेल 1912 में बिहार के बंगाल से अलगे कर देलन हल । बाद में 01 अप्रैल 1936 में उड़िसा आउ 15 नबम्बर 2000 के बिहार से झारखण्ड राज्य अलगे हो गेलक । खास करके बिहार से झारखण्ड राज्य के अलगे होला पर लोग के बुझाएल की अब बिहार में बाढ-बालू आउ सुखाड छोड़ के कुछो न बचल । बाकि बिहार अप्पन मेहनत के बल उ कारनामा कर देखौलक कि आज बिहार पाछे नऽ हे । बिहार दिवस के अवसर पर हमनी अपना के गौरवांवित महशूस करऽ ही कि हम बिहारी ही । उ राज्य के रहबईया ही जहां भगवान बुद्ध के ज्ञान भेंटाएल, सिक्ख गुरू गोविन्द सिंह के जलम होएल, बाबू वीर कुंवर सिंह अस्सी बच्छर के उमर में अंग्रेज सभे के नाक में दम करलन, गांधी जी चम्पारण से सत्याग्रह के शुरूआत करलन, जहां नालन्दा के खण्डहर ई बात के गोवाही दे रहल हे कि कभी उ दुनिया के नामी विश्वविद्यालय हल, जहां सम्राट अशोक, चन्द्रगुप्त, शेरशाह शासन के बागडोर सम्हारलन, जहां महान खगोल विद् आर्यभट्ट,  गुरू चाणक्य, चिकित्सक जीवक, कवि विद्यापति, भीखारी ठाकुर होएलन । उहां के वासी होवे के नाते बिहार दिवस पर हमरा बिहारी होवे के गर्व हे ।
प्रकाशित प्रभात खबर-22-03-2016  

मगही
[29] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
फगुआ तो एकदम से निके-सुखे कट गेल । शासन-प्रशासन के इ बात लेल ओड़िया-खंचिया से धन्यवाद देल चाहऽ ही जिनकर प्रयास से होली के नाम पर हुड़दंग फैलावे वालन के इ बेर दाल नऽ गलल । जहां-तहां लोग हुड़दंग करे के सुरसार भी करलन तऽ पहिले से मुस्तैद प्रशासन हुड़दंगी के एक नऽ चले देलन । इ बच्छर अगजा भोर में फूंकाएल, इ चलते दोसरका दिन आंतर के बाद सग्गर होली एक दिन बाद मनावल गेल । कादो-माटी के नाम पर गाँव-शहर, टोला-टाटी में पहिले जउन तरह के हुड़दंग करल जा हल, इ बेर कहूं देखे-सुने ला नऽ भेंटाएल । कुर्त्ता फार होली इ बच्छर इतिहास लेखा बन के रह गेल । लोग मिलजुल के रंग-गुलाल के परब होली खुशी आउ उत्साह से मनौलन । परिवार के साथे बिना डर बिना भय के लोग एक दोसरा के घरे होली के बधाई देवे गेलन । देर रात तक आवा-जाही बनल रहल । कहूं कोई तरह के अप्रिय घटना नऽ घटल । गयाजी के होली दोसर जगह के होली से एकदमे अलग तरह के होवऽ हे । होली के एक दिन बाद झुमटा निकालल जा हल । जेकर रूप आज बदल गेलक हे आउ ओकर जगह पर मटका फोड़े के परम्परा जोर पकड़ले हे । मटका फोड़े में रंग के जगह एक दोसरा के पानी पोरावल जा हे । माने होली के दोसरा दिन बाद भी निके-सुखे घर से निकलना गयाजी में मोस्किल हे । जहां मटका फूटऽ हे, उहां दू-चार घंटा पानी के बौछार इ तरह से करल जाहे कि उहां से गुजरइत लोग के बचना मोस्किल हे । एतने नऽ गयाजी में बूढ़-पुरनिया लेल बुढ़वा मंगल भी मनावे के परम्परा कभी हल, जउन होली के बाद आवेवाला मंगल के मनावल जा हल । अब धीरे-धीरे बुढ़वा मंगल खत्म होवे पर हे । जहां-तहां अभिओ मंदिर में बइठ के बूढ़ा लोग दम तोड़इत बुढ़वा मंगल मनावऽ हथन । काशी अइसन खास जगह पर आझो बुढ़वा मंगल मनावल जा हे । होवे कुछो बाकि इ बेर होली पर हुड़दंगी सभे के हुड़दंग मचावे के मौका नऽ भेंटाएल । अइसे गुड फ्राइडे आउ ओकरे बाद दिन चौथा शनिचर होवे से बैंक के साथे ढेरे ऑफिस, स्कूल-कॉलेज के बंद रहला से होली के सुरूर एतवार तक सभे पर सवार रहल । अब जाके सोमवार से सभे सामान्य होलन । प्रशासन के मुस्तैदी से होली के रंग कहूं बदरंग नऽ होएल । अब तो फागुन के बाद फागुन से भी बेसी रसगर आउ लासा सन लसलस महीना चइत जेकरा हिन्दी के नया साल संवत् के पहिला महीना मानल जा हे, चढ़ल हे । चइत महीना फागुन से भी बेसी आग लगावन हे । चइत के महीना में विरहीन के विरह वेदना आउरो बढ़ जा हे । इ चइत के महीना में कोयली के बोली विरहीन के करेजा गोली नियन बेधऽ हे । जेकर जिकीर मगही के पारम्परिक चइती गीत में केतना निमन से करल गेल हे-
कोयली मीठी बोलिया हो, कोयली मीठी बोलिया ।
आज काहे बोले आधी रतिया हो रामा, कोयली....
रोजे-रोजे बोले कोयली, भोर-भिनसरवा
आज काहे बोले आधी रतिया हो रामा, कोयली...
होवे दे बिहान कोयली, खोंतवा उजाड़वऊं
जड़ी से कटइवौ धानी बगिया हो रामा, कोयली...
            माने बसंत पंचमी के दिन से बसंत अप्पन जादू जउन सग्गर बिखेरले हे, उ फागुन के बादो भर चइत कपार चढ़ के बोलइत रहत । परकीरति के साथे हर कोई मगन हथ । आम के बउराएल मंजर में लगल टिकोरा सनासन बढ़ रहल हे, खेत में गेहूंम के बूढ़ाएल बाली झूम रहल हे, डाली पर बइठल कोयली दिने-राते कूहूंक रहल हे, महुआ से रसगर फूल टपक रहल हे, पछूआ हावा धधा रहल हे, अइसन में अदमी के मन बेकाबू न होवे, इ तो न्याय नऽ हे । इ लेल ढोलक-छाल-मंजीरा के ताल पर लोग-बाग अब फगुआ के जगह पर चइती गीत गा रहलन हे-चइत मासे होवऽ नऽ सहइया हो रामा........ ।
प्रकाशित प्रभात खबर-29-03-2016    

Monday, May 23, 2016

मगही दूरा-दलान - फरवरी 2016 में प्रकाशित लेख



मगही
[21] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
देश में स्मार्ट सिटी बनावे के जब बात चलल हल तऽ हमनी मगहिया भाई-बहिन के मन में अइसन लगल कि इ बेर अप्पन गयाजी के बेड़ा पार हो जाएत । बिहार में स्मार्ट सिटी जउन एगो से दूगो शहर बनत, तऽ उ दूगो में अप्पन राज्य के राजधानी पटना के बाद अप्पन गयाजी के नाम जरूर से रहत, जेकरा ब्रह्मा जी भी नऽ काट सकलन हे । बाकि अइसन होएल कहां ? मन के सोंचल सपना बालू के भीत्ती लेखा भरभरा के रह गेल । बिहार से स्मार्ट सिटी बनें खातीर दूगो शहर के नाम गेल-उ हल भागलपुर आउ बिहारशरीफ । एतनो पर मन के संतोख होएल कि चलऽ गयाजी न सही कम से कम एगो मगहिया शहर बिहारशरीफ तो स्मार्ट सिटी बनत ? अब जब स्मार्ट सिटी बनावे के सुरसार शुरू भेल तऽ हाय राम! बिहार, उत्तरप्रदेश आउ पं० बंगाल के एक्को शहर के स्मार्ट सिटी में नामें नऽ हे । मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली सहीत दोसर कम बेसी सभे राज्य के शहर स्मार्ट सिटी बनत, अप्पन बिहार कहूं एहू में नऽ पछूआ जाए । अब केन्द्र सरकार के मन में का हे, इ बात कहल बड़ मोस्किल हे । हम तो बिना पार्टी पालटिक्स वाला साहित्य के अदमी हिअ । इ लेल अप्पन बात साहित्य के चहारदिवारी से बाहरे निकल के कहे में डर लगऽ हे । हिन्दी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के नामी-गिरामी कवि बिहारीलाल हलन, जउन बिहारी सतसई में कुलम सात सौ दोहा लिखके हिन्दी साहित्य के बड़कन कवियन में अप्पन गिनती करवैलन । उ राजदरबारी कवि हलन आउ कहल जाहे कि उनकर एक दोहा पर राजा खुश होके सातगो अशरफी दान देवऽ हलन । बिहारीलाल के लिखल एगो दोहा हम अपने सभे के बीच रखल चाहऽ ही-अपने अंग के जानिकै, जोवन-नृपति प्रवीन । स्तन, मन, नैन, नितंब कौ, बड़ इजाफा कीन ॥ मदकल छंद में लिखल इ सिंगार के रचना हे, जेकरा में कवि कहऽ हथन कि यौवन के राजा अप्पन अंग जान के नायिका के स्तन, मन, नैन आउ नितंब में बेसी इजाफा करलन, दोसर अंग के नऽ, काहे से कि देह के दोसर अंग से यौवन नृप के का लेना देना । स्मार्ट सिटी बनावे में भी यौवन राजा नियन केन्द्र सरकार भी भेदभाव कर रहल हे, तऽ इमें बेसी हरज के बात नऽ हे । अब वसंत के ऐला पर सरसो फूलाएत नऽ, आम बउराएत नऽ, बूट-मटर-खेंसाड़ी गदराएत नऽ, गेहूंम खेत में झूमत नऽ, हावा इतराएत नऽ, तऽ इ तो परकीरति के विरूध हो जाएत । इ लेल हम अप्पन मन के इहे बात समझावऽ ही-रह रे जीउ खईंहे घीउ, बाकि समय पर । आज न कल स्मार्ट सिटी अप्पन प्रदेश के भी शहर बनत । अइसे इ बात पर हमरा गुमान हे कि नेम धरम के हिसाब से अप्पन गयाजी देश के दोसर शहर से बेसी स्मार्ट हे, जहां कमोबेस सालोभर देश-दुनिया से घुमताहर आवऽ हथन आउ कपार टेक के सुख-शान्ति के मन में कामना कर हथन । हम्मर गयाजी स्मार्ट सिटी बनें नऽ बनें । अपने कभीओ इहां आथिन, दावा करऽ ही अपने के मन के उ संतोख भेंटाएत, जउन दोसर स्मार्ट सिटी घुमला से नऽ भेंटाएत । निहोरा हे-एक बेर गयाजी आवे के..... ।
प्रकाशित प्रभात खबर-02-02-2016

मगही
[22] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
आखिर अप्पन समय पर रितुअन के राजा वसंत आ हीं गेलन । मारे डेरा के जाड़ा-पाला अप्पन बोरिया-बिस्तरा समेट लेल । बाग-बगइचा, खेत-बधार जन्ने नजर घुमा के देखऽ वसंत के नजारा साफ लौक जाएत । मोंजर से लदल आम के बगइचा होवे कि पीअर फूल से भरल सरसों के खेत, बूट-मटर-खेंसाड़ी-तीसी के खेत में फूलाएल रगन-विरगन के फूल इया हावा के झोंका के साथे झुमइत अरहर आउ गेहूंम के खेत सभे वसंत के रंग में रंगा गेलन हे । न बेसी जाड़ा आउ न बेसी गरमी के इ वासंती मौसम में अदमी-जन के साथे गोरू-जनावर, चिड़ईं-चुरगुन भी खुशमिजाज हो गेलन हे । अप्पन देश भारत के दुनिया भर के दोसर देश से एगो अलगे पहचान हे । इ पहचान रंग-रूप, पेन्हावा-ओढ़ावा, खान-पीअन, रहन-सहन से लेके आउ कैकन रूप में भेंटा हे । इहे में एगो रूप हे-अप्पन देश परब-त्योहार के देश हे, जहां हर मौसम में मनावे जाएवाला अलगे-अलगे परब-त्योहार हे । वसंत में भी इहां केतने परब मनावल जाहे । बाकि एकर शुरूआत होवऽ हे वसंती पंचमी माने सरस्वती पूजा से । माता सरस्वती विद्या के देवी हथन, जिनकर पूजा खास करके पढ़ाई-लिखाई करेवालन लइका-लइकी धूमधाम से करऽ हथन । कमोबेस सभे शिक्षण संस्थान में सरसवती पूजा मनावल जाहे । एकर अलावे एन्ने कुछ बच्छर से गांव-शहर के हर गल्ली-मुहल्ला में सरस्वती पूजा मनावे के प्रचलन हो गेलक हे । पूजा के नाम पर महीना दिन पहिले से चंदा वसुली के धंधा में न पढ़े-लिखे वाला लइकन लग जा हलन आउ टोला-मोहल्ला के अलावे गाड़ी-छक्कड़ा वालन के चंदा वसुली के नाम पर नाक में दम करके रखले रहऽ हलन । महंगाई के दुहाई देके पांच-दस न सौ-पच्चास तक के रसीद थम्हा दे हलन । न देला पर लाठी-डंटा लेके तैयार । केतने गाड़ी के शीशा फूटऽ हल, तऽ केतने ड्राइवर-खलासी बेमतलब के लाठी-डंटा खा हलन । आउ पूजा के दिन से लेके मूर्ति डूबावे तक खाली काने बहिर नऽ करले रहऽ हलन, परिवार के साथे बाहरे निकलना दूभर कर दे हलन । पूजा विद्या के देवी माता सरस्वती के आउ गाना अइसन जेकरा सुन के मारे शरम के मुड़ी नीचे झुक जा हल । मूर्ति डूबावे के नाम पर डीजे बजा के, भांग-धथूरा खाके, अबीर-गुलाल उड़ावइत एकदम से बिगड़ल लइकन सभे बउराएल कुछो करे पर उतारू हो जा हलन । इ बेर इ बात के मन में खुशी हे कि सरस्वती पूजा से पहिले प्रशासन के तरफ से नकेल कसल जा रहल हे । सरस्वती पूजा मनावे लेल प्रशासन के सहमति जरूरी हे । अइसन न करेवालन पर प्रशासन कारवाई लेल कमर कसले हे । कुछ लोग प्रशासन के इ काड़ा रूख से भीतरे-भीतरे कुंभला रहलन हे, बाकि बेसी करके आदमी-जन के मन में इ बात के खुशी हे कि इ बेर सरस्वती पूजा के नाम पर अश्लीलता न परोसल जाएत । लोग भक्तिभाव से सरस्वती जी के पूजा करतन आउ आम के मोंजर, गुड़, अरवा चाउर से बनल असली प्रसादी ग्रहण करतन । झूठ के देखावा से नेजात भेंटाएत । वसंत पंचमी में सरस्वती पूजा सभे कोई भक्तिभाव से मानाथिन आउ मन के अज्ञानता के दूर करेके वरदान मईया से मांगथिन । वसंत पंचमी में रंग-गुलाल उड़ावऽ, बाकि प्रेम आउ सौहाद्र के......अभी एतने बात ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-09 फरवरी 16

मगही
[23] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
प्यार आउ मनुहार के मौसम बसंत के आगमन का भेल सभे कुछ अपने आप बदल गेल । नरम सूरूज गरम हो गेलन, जेकरा से जाड़ा डेराएल अप्पन राह धर लेलक । खेत-बधार में लहलहाइत रबी फसल गेहूँम, जौ, बूट, मटर, सरसो, तीसी, अरहर फरे-फूलाय लगल । आम के बगइचा एकदम से बउराएल महमहाय लगल ।हावा तक बदल गेल । विद्या के देवी माता सरस्वती के परब बसंत पंचमी निके सुखे पार लग गेल । बसंत पंचमी में बैर भाव भूला के का लइका, का बूढ़ आउ का जवान मरद-मेहरारू सभे एक दोसरा के अबीर-गुलाल लगा के एक दोसरा लगे प्यार के इजहार कैलन । इ सिलसिला वैलेंटाइन डे नियल सप्ताह भर नऽ चलत । पूरा माघ, भर फागुन आउ पूरा चैत महीना मस्ती में बीतत । गीत-गौनई, खान-पीअन, आचार-व्यवहार सभे में प्यार के झलक भेंटाएत । प्यार आउ मनुहार के मौसम जउन बसंत पंचमी से शुरू होएल, फागुन में एकदम से जवान हो जाएत, मौका अइसनो आवत, जब भर फागुन बुढवा देवर लागे के गीत गुंजत आउ इ मदमातल चइत महीना तक टनाएत । पच्छिम से आएल परब वैलेंनटाइन डे जउन एकदम से बजारू हे-सप्तार भर में दम तोड़ देवऽ हे । तइयो ढेर शहरी युवा इ परब के पाछे पगलाएल रहऽ हथ । देख-सुन के मन में हंसी आवऽ हे । वैलेंटाइन बाबा के गढल इ प्यार के परब बजारू कइसे हे, एकरा बिना माथा के अदमी भी समझ सकऽ हथन । प्यार के इ परब सप्ताह भर रोजे अप्पन रंग बदलऽ हे । पहिला दिन रोज डे, दोसरा दिन प्रपोज डे, फिन हग डे, चाकलेट डे, टेडिवियार डे, प्रॉमिस डे आउ फिन वैलेंटाइन डे । अब इ सातो दिन में दू-तीन दिन छोड़ के बाकि  के दिन प्यार के नऽ बजार के दिन हे, जेकरा में बिना पोकिट ढिला करले प्यार के इजहार करले नऽ जा सकऽ हे । वैलेंटाइन डे आवे से पहिले बजार सज-धज के तैयार रहऽ हे, तइयो ओतना कहां जेतना बसंत आवे पर प्रकृति सज-धज के तैयार रहऽ हे । अब वैलेंटाइन सप्ताह में इ महंगी के जमाना में गुलाब, चाकलेट, टेडिवियर, वैलेंटाइन डे कार्ड खरीदे में प्रेमी जोड़ी के पसेना छूट जाहे । बजार के खरीदल समान ले-दे के प्यार के गाड़ी केतना दूर खिंचायत इ बात अपने समझे के हे, समझावे के नऽ हे । तइयो युवा सभे के इ बात उनकर भेजा में कउन भरे कि प्यार खरीद-बिक्री करे के चीज नऽ हे । इ प्रकृति के अनमोल उपहार हे । अब उ प्यार चाहे माय-बाबूजी के होवे, चाहे भाई-बहिन के, चाहे पत्नी-पति के, चाहे प्रेमी-प्रेमिका के । प्यार तो पवित्र बंधन के नाम हे, जेकार खरीद-बिक्री बजारू समान ले दे के नऽ करल जा सकऽ हे । बसंत में कोई बनावटीपन नऽ हे । बसंत के आहट पाते प्रकृति अप्पन मादक रंग-रूप बदल लेवऽ हे आउ प्यार के गगरी छलके लगऽ हे । बसंत अभी चढ़ल हे, जेकर असर प्रकृति के कण-कण में होवे लगल हे । बोलता से लेके अनबोलता तक बसंत के वासंती रंग में रंगाएल हथ । रूख-बिरिच्छ पर पुरान पत्ता के जगह कोमल नया पत्ता उग रहलक हे, चिड़ई-चुरगुन मस्ती के गीत गावे में मसगुल हथ, खेत-बधार में लगल फसिल पर जवानी अंगड़ाई ले रहलक हे, अइसन में अदमी, अदमी के बीच प्यार के बीआ नऽ बुनाय, भला इ कइसे हो सकऽ हे । प्यार आउ मनुहार के मौसम बसंत में गिला-शिकवा, बैर-भाव भूला के आवऽ एक-दोसरा से प्यार करऽ । जइसे-जइसे बसंत आगे बढ़त प्यार आउ गहराएत, मन में इहे आशा आउ विश्वास के साथे युवा सभे से हाथ जोड़ के निहोरा एतने कर रहली हे कि बसंत हेऽ प्यार आउ मनुहार के असली मौसम, वैलेंटाइन एकर आगू बजारू आउ झूठ के देखावा हे । चलते-चलते कबीर बाबा के कहल बात-घर की वस्तु धरी नहीं सूझै, बाहर खोजन जासि । पानी बीच मीन प्यासी, मोहि सुनि-सुनि आवत हांसी ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-16 फरवरी 2016  

मगही
[24] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
हम खाली अपना हिआं के बात नऽ कर रहली हे, समूले दुनिया में बेमौसम बदलाव हो रहल हे, जे सभे लेल खतरा के घंटी हेऽ । समय रहते एकरा पर समूले दुनिया के एकजूट होवे के जरूरत हे । इ बेमौसम के बदलाव आवेवाला दिन में समूले धरती के लील सकऽ हे । कहूं बाढ, तऽ कहूं सूखाड़ । कहूं बरफबारी तऽ कहूं देह जरावे वाला गरमी, आज आम हो गेलक हे । अप्पन देश के मौसम, दोसर देश के मौसम से अलगे शुरूमे से रहल हे । अपना हिआं जाड़ा-गरमी-बरसात तीनों फेर फार आवइत रहऽ हे । अभी जउन मौसम हिआं चल रहल हे, इ जाड़ा आउ गरमी के बीच वाला हे, जेकरा में न बेसी ठंढा आउ न बेसी गरमी के एहसास होवऽ हे । एकरा रितुअन के राजा बसंत भी कहल गेल हे । बाकि मौसम में बदलाव के असर बसंत पर भी पड़ल हे । दिन में रउदा उगला पर पसेना छोड़ावे वाला गरमी आउ रात के कम्बल-नेहाली ओढ़े वाला जाड़ा, इ निमन नऽ हे । इ भी बेमौसम बदलाव के असर हे । समूले दुनिया के इ बात के चिन्ता तो हेऽ, बाकि एकरा लेल कोई ठोस उपाय नऽ करल जा रहल हे, उल्टे परकीरति के दिन-रात दोहन हो रहल हे । परकीरति के देल अनमोल उपहार के तहस-नहस करल जा रहल हे । अप्पन स्वार्थ में जंगल-पहाड़ काटल जा रहल हे, नदी के बालू राते-दिने ढोवा रहल हे, पेड़-पौधा कटा रहल हे, अपना के ताकतवर देखावे लेल परमाणु परीक्षण करल जा रहल हे, गाड़ी-छक्कड़ा आठो पहर जहर उगिल रहल हे, धरती के माट्टी में रासायनिक खाद आउ कीटनाशी दवाई देके ओकर ताकत छिनल जा रहल हे, जंगली जीव-जन्तु के बेबजह मारल जा रहल हे आउ का-का । एकरे असर हेऽ कि मौसम दगा दे रहल हे । अदमी इ बात के जान भी रहलन हे, तइयो अप्पन स्वार्थ में इ सब काम कर रहलन हे । नियम-कानून बनऽ हे, बाकि ओकर पालन सख्ती से हो कहां पावऽ हे ? जेकर भोगना आज सभे भोग रहलन हे । एगो बानगी दे रहली हे । अब रोड-पुल-मकान बनावे लेल पहाड़ न टूटत तऽ गट्टी-छर्री आवत कहां से ? बिना बालू के काम चलत कइसे ? बात सही हे, बाकि दोसरा दन्ने इहो बात सोंचे के जरूरत हे कि पहाड़ के काट-काट के खतम करला के बाद पहाड़ बनत कइसे, नदी के बालू ढो-ढो के खत्म कर देला पर नदी में बालू आवत कहां से ? एकर जबाब केकरो भीर नऽ हे । फिन परकीरति कोई नऽ कोई उपाय तो करवे करत । बेमौसम बदलाव ओकरे असर हे । आजकल दुनिया के सबला जब्बड़ देश अमेरिका बरफबारी से हरान-परेशान हे । सड़क-बिजुली-पानी सब पर आफत । नाक में दम करले हे-बरफबारी । जब जब्बड़ के इ हाल हेऽ तऽ अब्बर-दुब्बर के हाल का होएत, इ सोंच के देह के रोआं खाड़ हो जाहे । इ बच्छर निमन बरसात न होवे से दोसरा जगह के साथे-साथे समूले अप्पन मगहिया क्षेत्र में पीए के पानी पर आफत आ सकऽ हे, जेकरा लेल अभीए से उपाय-पतर न करल गेल तऽ मोसिबत खाड़ हो सकऽ हे । बेमौसम बदलाव खतरा के घंटी न बनें, एकरा लेल आवऽ सभे मिलजुल के सोंचऽ-विचारऽ आउ ठोस उपाय करऽ । अभी एतने!
प्रकाशित, प्रभात खबर-23 फरवरी 2016

Friday, May 20, 2016

मगही दूरा-दलान - जनवरी 2016 में प्रकाशित लेख



मगही
[17] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
अइसे तो दुनिया में आष्ट्रेलिया महादेश के विचित्रताओं के महादेश कहल जाहे, जहां कंगारू अप्पन बच्चा के अप्पन पेट में बनल थैली में लेके घुमऽ हे, यूकिलिप्टस एगो अइसन पेड़ हे जेकर पता कभीओ नऽ झरऽ हे, बाकि छाल साल में एक बेर झर जाहे, आर्टिजन बेल से पानी अपने आप ऊपरे फेंकइत रहऽ हे, आस्टिज नाम के पक्षी जनावर से भी तेज दउड़ लगावऽ हे.... इहे तरह से आउरो बड़ी कुछ हेऽ । अप्पन देश भी अजीबो गरीब हे । दू-दू महीना के छौगो अलगे-अलगे ऋतु हे आउ जाड़ा, गरमी, बरसात के तीन गो अलगे-अलगे मौसम । जाड़ा तऽ खूब जाड़ा, गरमी तऽ खूब गरमी आउ बरसात तऽ एकदम से दहा-बही । माने अइसन अजगुत कि खुद अपने पर विश्वास नऽ होवऽ हे । जाड़ा-पाला में जब नेहाली-कम्बल में घुंस के रात कटऽ हे, तब लगबे नऽ करे कि थोड़े दिन बाद एतने गरमी भी गिरत कि देह से तड़ातड़ पसेना छूटे लगत । पहाड़ी से घिरल अप्पन मगहिया क्षेत्र के तो बाते आउर हेऽ । ठंढा में पारा 3-4 डिग्री तक नीचे गिर जा हे तऽ गरमी में पारा 42-43 के आसपास चढ़ जाहे । माने इ कम अजगुत के बात नऽ हे कि हिआं के रहबईया इ जाड़ा-गरमी में सामंजस्य कइसे बइठावऽ हथन । गरमी तो खैर जइसे-तइसे पार लग जा हे, बाकि जाड़ा, जेकर नामे सुनते हाड़ कांपे लगऽ हे । अभी जाड़ा के मौसम एकदम से उठान पर हे । जाड़ा आगू सूरूज भगवान तक के घूठना टेक देवे पड़ऽ हे । शीतलहरी चलला पर सूरूज भगवान कन्ने लपता हो जा हथ थाह-पता नऽ चले ? जाड़ा में केतने दिन तो सूरूज के दर्शन दुर्लभ हो जाहे । सूरूज नऽ उगला पर लहरी लगा के ठंढाएल गोड़-हाथ के गरमावे पड़ऽ हे । गांव-देहात में तो पोरा-पतई के कउनो कमी नऽ रहऽ हे, बाकि शहर में ? हाड़ कपावेवाला ठंढा में शासन-प्रशासन के तरफ से जगह-जगह अलाव जरावल जा हे आउ लोग ठिठुरइत गोड़-हाथ के सेंक-सांक के दुरूस्त करऽ हथन । लइकन-जवान लेल जाड़ा बेसी फजिहतवाला नऽ हे, बाकि बूढ़ा-बूढ़ी आउ गोरू-जनावर लेल जाड़ा एकदम से जनमार हेऽ । इमें गोरू-जनावर तो अनबोलता हे आउ बूढ़ा-बूढ़ी बोलता होके भी आजकल अनबोलता बनल रहऽ हथन । इनकर सुनेवाला घर में अब कोई कहां हथ ? कुछो बोललन कि बेटा-पुतोह एक्के डांट में बोलती बंद कर देवऽ हथन । पहिले भर जाड़ा बूढ़ा-बूढ़ी लेल बोरसी सहारा रहऽ हल, अब कहां ? धूआं-धक्कड़ से घर खराब होवे के डर जे हे । ढेर घर में अब खटिया भी रहल कहां, जेकर नीचे बोरसी रखल जाए । पक्का के घर हे, तब तो आउरो फजेहत हे । बोरसी लेला से पक्का फूटे के डर हे । अब तो बड़कन घर में पथल लग रहलन हे, जेकरा चलते ठंढा आउरो बढ़ जाहे । बेसी करके बूढ़ा-बूढ़ी अब घर के भार हो गेलन हे आउ ऊपरे से जनमार जाड़ा, माने खाज में खुजली । जेते जल्दी जाड़ा भागे, ओतने निमन । जेतना जाड़ा में बूढ़ा-बूढ़ी के परेशानी ओकरा से बेसी गोरू-जनावर के । जाड़ा में जनावर के देह उतर जाहे । अब उनखरा लेल जूट के बोरा पर भी आफत टूटल हे । हर चीज लेल आजकल सस्ता-सुविस्ता प्लास्टिक के बोरा जे बजार में आ गेलक हे । अब जाड़ा गिरे चाहे पाला गिरे काटे तो पड़वे करत, अब किकुरी लगा के काटऽ कि दांत खटखटा के । अभी एतने पर दम धरऽ ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-05-01-2016 

मगही
[18] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
सच कहिओ! जब गांव के लड़की सभे एक जौरे साइकिल से पढ़े जा हथन, तऽ एकदम से हम्मर जीउ जुड़ा जा हे । अभिओ अप्पन आंख पर विश्वास नऽ होवऽ हे कि इ सच हे कि निंन में देखल कोई सपना । इ सही हे कि अप्पन बिहार अभीओ शिक्षा के ममला में पछूआएल हे आउ मरद से मेहरारू तो आउरो पाछे हथन । बाकि जब से लड़की सभे के पढ़े खातीर सरकार तरफ से साइकिल भेंटाए लगल हे, लड़की सभे पढ़ाई में कउनो तरह के कोताही नऽ कर रहलन हे । लड़की सभे साइकिल से इस्कूल आउ कोचिंग तो जाहीं रहलन हे, साथे-साथे बजार से जरूरत के सर-समान भी साईकिल पर लाद के ला रहलन हे । एक जौरे लड़की सभे के साईकिल चलावित देखला पर इहे बुझा हे कि लड़की अब लड़का सभे से कउनो तरह से कम नऽ हे । कभी लड़की सभे के साइकिल चलावे के एकदम से मनाही हल, तब हाथ पर गिनल-गोथल कोई लड़की साईकिल चलावऽ भी हल, तऽ देखवईया दांत से अंगुरी काट ले हलन । सांझ पहर दूरा-दलान में चरचा के विषय हो जा हल कि आज फलन बाबू के बेटी साइकिल चला रहल हल । आउ आज एक जौरे साइकिल चलावित लड़की अप्पन राज्य बिहार के जइसे खास पहचान बन गेलन हे । कहल जाहे कि एगो लड़की के पढ़ला से पूरा परिवार पढ़ जाहे । अब तो अपना हिआं झुण्ड में लड़की पढ़ रहलन हे । अइसन में उ दिन दूर नऽ रहे वाला हे, जब बिहार में सभे पढ़ लिख जैतन । लड़की सभे के उत्साह देख के ढेर लोग तो इहां तक कहे लगलन हे कि पढ़ाई-लिखाई के ममला में लड़का सभे लड़की से पछूआ रहलन हे । अब लड़की के माय-बाप भी उनकरा पढ़े से रोक नऽ रहलन हे । समझदार माय-बाप लड़की के मैट्रिक छोड़ आईए-बीए तक करवा रहलन हे । लड़का पढ़े कि न पढ़े, बाकि लड़की जउन पढ़ेला चाह रहल हे, ओकर गार्जियन रोक नऽ रहलन हे । एकर पाछे कारण आउरो हेऽ, बाकि लड़की सभे के पढ़ाई जारी रखे में साइकिल के भूमिका अहम  हे, जेकरा सिरे से नकारल नऽ जा सकऽ हे । पहिले गांव के इस्कूल में पढ़ला के बाद लड़की सभे के सामने दोसरा इस्कूल में पढ़े में जउन सबला भारी मोसिबत हल, उ हल आवे जाए के । लड़की सभे के साइकिल इ मोसिबत के दूर कर देल । अब उनकरा लेल दू-चार किलोमीटर कुछ रहहीं नऽ गेल । साइकिल उठौलन आउ दू-चार सखी-सहेली मिलके सोझ हो गेलन । माय-बाप भी निफिकीर । कउनो तरह के चिन्ता नऽ । काहे से कि बेटी अकेले तो हे नऽ । सरकार के देल साइकिल लड़की सभे लेल खाली साईकिल नऽ वरदान साबित हो गेल, जेकर फल आज नऽ कल जरूर भेंटाएत । जरूरत इ बात के हे कि इ तरह के सरकारी योजना के कउनो हाल में खत्म नऽ करल जाए । अब तो लड़की सभे लेल साइकिल वाला इ परयोग दोसर राज्य में भी अपनावल जा रहल हे । सचो एगो खाली हमरे नऽ ढेरे के जीउ जुड़ा जाहे, जब गांव के लड़की सभे एक जौरे साइकिल से पढ़े जा हथन ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-12 जनवरी 2016  

मगही
[19] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
हिन्दी के महीना में कनकनी लेल बदनाम पूस महीना बस अंगुरी पर गिनल-गोथल चार-पांच दिन आउ बचल हे । अब ले पूस पीठा खैलऽ कि नऽ । हमरा तो पूस पीठा के नाम सुनते मुंह पनिया जाहे । नया चाउर के आंटा में किसिम-किसिम के चीज डाल के पीठा बनावल जाहे । आलूवाला पीठा, दालवाला पीठा, खोवावाला पीठा, बेदामवाला पीठा, नारियलवाला पीठा, तीसीवाला पीठा, गुड़वाला पीठा, चीनीवाला पीठा आउ कउन-कउन तरह के पीठा बनावल जाहे, इ तो बनावेवाला पर निर्भर करऽ हे । एतना तरह के पीठा जब एक बेर एक साथे भर थरिया परसा हे, तब मन बहके लगऽ हे कि इ खाउं कि उ खाउं कि सभे एक्के बेर सपेट जाउं । आज बजार में एक पर एक खाय-पीए के समान आएल हे-फास्ट फूड, चाइनिज फूड, बरर्गर, पीजा, मैगी-टैगी आउ केतना चीज जेकर नाम तक हमरा नऽ ओरिया  हे, बाकि खाय के जउन मजा पूस पीठा में मिलऽ हे, दोसरा चीज में उ मजा कहां ? बजारू सामान खाए-पीए से पेट के बेमारी के शिकायत आम हो गेलक हे । अब तो गैष्टिक चीनिया बेमारी से साइदे कउनो घर बचल होएत जहां इ दून्नों में से कोई एगो बेमारी दस्तक नऽ देले होएत । बेसी तेल-मसाला से बनल सामान खैला से मुंह कुछ देरी लेल चटपटा तो जरूर हेऽ बाकि बाद में भोगऽ भोगना । पूस पीठा जेतना मन होवे खा लऽ । सबेरे उठ के बसिऔड़ा भी चढ़ा लऽ, एगो ढेकार तक नऽ ऐतो ? अब पूछबऽ काहे, तब एकर एकदम से सीधा-सीधी जबाब हे । पीठा कउनो घीउ-तेल-डलडा-रिफाइन में थोड़े न छना हे, ई तो पानी में छना हे । एकरे पर एगो खिस्सा इयाद आ गेल । अप्पन मगहिया क्षेत्र के एगो नामी बाबा हलन-झुनुकिया बाबा, जे अयोध्या में रहऽ हलन । एक बेर भंडारा करल । झुनुकिया बाबा के भंडारा में साधु-संत के साथे भक्तन के जुटान एतना न हो गेल कि खाय-पीए के इंतजाम डोले लगल । बाबा के चेला कहलक घीउ खतम हो गेल । झुनुकिया बाबा चेला के सरयू नदी के पानी लावे ला कहलन । आउ कहल जाहे, बाकि के समान सरयू नदी के पानी में बनल । थोड़े देरी लेल अंधविश्वास लगऽ हे, बाकि पूस पीठा जउन बिधि बनावल जाहे, बात सच लगऽ हे ।
            अप्पन मगहिया माटी के भीतर सोना-चांदी-कोयला-लोहा......के भंडार तो भरल नऽ हे, बाकि मगहिया माटी में जउन फसल उपजऽ हे, उ सोना-चांदी से कम नऽ हे । इहे चलते इहां के रहवईया मौसम के अनुसार खाय-पीए के चीज बनावऽ हथन । पूस महीना में पूस पीठा तो बनवे करऽ हे, साथे-साथे चाउर के आंटा में गुड़-तिल-सोंठ-मेथी के साथे बेदाम-गड़ी-छूहाड़ा डाल के लड़ूआ भी बनावल जा हे । इहां पीठा के साथे लड़ूआ के बात न करल बेइमानी होतक । एगो लड़ूआ खैला के बाद का मजाल जे कनकनी बूढ़ा-बूढ़ी के भी जरा मरो सतावे आउ जवान तो जवान हथन । लड़ूआ में भी घीउ-तेल-मसाला कुछो नऽ, एकदम से पूस पीठा नियन निछूक्का । अब तो पीठा आउ लड़ूआ के नाम से मुंह अइसन पनिया रहल हे कि आगे कुछो भी लिखना हमरा लेल मोस्किल हो रहल हे । से अभी एतने बात कहके अपने सभे के पूस पीठा लेल नेओत रहली हे ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-19 जनवरी 2016  

मगही
[20] दूरा-दलान
सुमंत (मगही लेखक)
अइसे लत कउनो चीज के भी होवे, ओकर परिणाम आझ नऽ कल बुरा होवऽ हे । एतने नऽ लत लग गेला के बाद ओकरा छोड़ाना बड़ मोस्किल  बात हे । अब ओकरा लतिआव चाहे गरिआबऽ कोई फरक नऽ पड़ऽ हे ।  लत भी केतने तरह के होवऽ हे । जउन हम गिनावल भी चाहि तऽ सभे लत गिनावल पार नऽ लगत । इ लेल हम दोसर-तेसर लत के छोड़ के निशा के लत पर अपनन्हीं से चर्चा करल चाहऽ ही । पास-पड़ोस, गांव-घर, गल्ली-मोहल्ला साइते कोई अइसन होएत, जहां निशेबाज न होएतन । अब निशा भी रगन-विरगन के होवऽ हे । बाकि अपना हिंआं दारू-ताड़ी-गांजा आउ भांग के पान करे वाला बेसी करके हथन । बीड़ी-सिगरेट-खैनी आउ गुटका तो आज सोहाग भाग हो गेलक हे । अइसे देखल जाए तऽ इहो सब जानलेवा हे । बेसी करके मुंह के कैन्सर बीड़ी-सिगरेट-खैनी आउ गुटका के सेवन से होवऽ हे, बाकी पीताहर इ बात के मानथन तब तो । जिनकरा बीड़ी-सिगरेट फूकफूकावे, खैनी दबाबे आउ गुटका चिबाबे के लत लग गेल, बिना कोई बड़का बेमारी होले छोड़े के नाम न लेवऽ हथ । सिगरेट के डिब्बा पर तो बशर्ते चेतावनी लिखल रहऽ हे-सिगरेट पीना स्वस्थ्य लेल हानिकारक हे । अपना हिआं गुटका पर प्रतिबंधों लगल, बाकी काहे ला तो कोई मानतन । चोरी-छिप्पे हरमेसे चलते रहल । आझो गुटका के पिलकी आउ पाउच सग्गर भेंटा जाएत । अब का हे कि दारू-ताड़ी-गांजा-भांग नियन बीड़ी-सिगरेट-खैनी आउ गुटका घर उजाड़न नऽ हे ।
            दारू-ताड़ी-गांजा-भांग के लत केतने घर उजाड़ के रख देलक । इ सब निशा के अइसन लत हे कि बिना पीले निंन तक हराम हो जा हे । पहली अप्रील से बिहार सरकार देशी दारू के बिक्री पर रोक लगावे जा रहल हे, जेकर जेतना भी तारीफ करल जाए, कम होएत । अगिला बच्छर से देशी के साथे-साथे विदेशी दारू पर भी रोक लगावे के सरकार मन बनौले हे । अब ढेर लोग के मन में इ बात के शका होवऽ हे कि रोक लगौला से का होएत, लुक्का-छिप्पी सब भेंटाएत । बाकी ओखनी के इ बात सोंचल हमरा जानिस्ते निमन नऽ हे । दारू केतने परिवार के उजाड़ के रख देलक हे । ढेर लोग मानऽ हथन कि ताड़ी ताड़-खजूर के रस हे, जेकरा पी ला से फैदा छोड़ नुकसान नऽ हे । बाकी मुंहलुकउनिए पीअल जाए, तब । इहां तो जिनकरा ताड़ी के लत लग गेल पीतारह दिन-दुपहरिया कुछो न देखऽ हथन । भूखले तऽ भूखले पेट निमक-मिचाई चाटईत लवनी खाली कर देवऽ हथन । अब पीला के बाद उनकरा हाथ के घड़ी रखे पड़े कि साइकिल, कोई फिकीर न । केतने बेर दारू नियन ताड़ी पीए से केतने के मौत हो चुकल हे । गंजेड़ी आउ भंगेड़ी के तो बाते मत पूछऽ । एकरा लोग शंकर भगवान के बूटी मानऽ हथन आउ हरहर भोले, बमबम भोले के नाम लेवईत गांजा सूटकाव हथ आउ भांग गटकाव हथ । जब रोग पटकऽ हे, तब बाबा भोले नऽ डाक्टर साहेब के सूई-दवाई काम देवऽ हे । निशा के लत सबला बुरा हे । एकरा से दूर रहे के चाही । सरकार-शासन आउ प्रशासन के भी  एकरा तरफ ध्यान देवे के जरूरत हे, जेकरा लेल एगो कदम तो सरकार तरफ से उठावल गेल हे । निशा नाश के जड़ी हे । इ लेल एकरा से बचल जरूरी हे । हम अपन्न्हीं सभे से हाथ जोड़ के निहोरा करऽ ही कि निशा के लत बुरा हे, एकरा छोड़ऽ ।
प्रकाशित, प्रभात खबर-26-01-2016