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Saturday, November 26, 2011

11. मगही के दधीचि - स्व॰ डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री



लेखक - श्री शिवप्रसाद लोहानी (जन्म - 1924 ई॰), नूरसराय, जिला - नालन्दा

बात करीब-करीब 1956-57 के हे । मगही के दधीचि स्व॰ डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री मगही में एक कविता 'माहुरी मयंक' में छपे ला हमरा हीं भेजलका । मगही में कोई रचना छपे के बात ऊ घड़ी उटपटांग लगऽ हल । सम्पादन के सिलसिला में जैसहीं हम्मर ध्यान ऊ कविता पर गेल हम भभा के हँस गेलूँ । ई हँसी सुन के निकट में बैठल हम्मर अनुज कहलक कि कौन ऐसन बात होल कि तू एतना जोर से हँसलऽ । हम कहलूँ कि देखऽ न, श्रीकान्त शास्त्री जैसन हिन्दी संस्कृत के विद्वान ई गँवारू बोली मगही में छप्पे ला कविता भेजलका ह । तुरते हम उनका ऊ कविता एही बात लिख के वापस कर देलूँ ।

उनका ई कविता जैसे ही वापस मिलल, हमरा हीं ऊ धममदाड़ा हो गेला । उनका देख के हम फेर हँसलूँ आउ कहलूँ कि ई गँवारू बोली में कविता काहे ला भेजलऽ । अइसन अच्छा भाव-विचार के कविता हिन्दी या संस्कृत में बनैतऽ हल तो हम जरूर छापतूँ हल । हम ई गँवारू बोली के कविता छाप के पाठक के बीच हँसी के पात्र बने ला नई चाहऽ ही । आउर हम्मर पत्रिका उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा औ बंगाल जाहे । जरा सोचऽ कि हम्मर केतना हँसी होवत, सामाजिक पत्रिका में हम्मर पत्रिका के अच्छा नाम हे औ ई 1914 ईस्वी से छप रहल ह जौन घड़ी बिहार में इनले-गिनले पत्रिका हिन्दी में छप्पऽ हल ।

शास्त्री जी हम्मर ई बात गौर से सुनलका औ समझलका कि लोहानी जी मामूली बात से आपा में नई अइता । तो ऊ भी अप्पन बात हँसिये से शुरू कैलका कि 'ई बात जरूर हो कि छापला पर हँसी के पात्र बनवऽ, मालवीय जी भी हँसी के पात्र बनला हल जब ऊ चौराहा पर नुक्कड़ सभा में हिन्दू विश्वविद्यालय के बात करऽ हला । मगर देखऽ न कि मालवीय जी की कैलका औ कहाँ पहुँच गेला । ओइसने अगर तू भी ई छाप के अप्पन मगही मइया के श्रद्धा जतैवऽ तो एक दिन तोर नाम तो होवे करतो, ई पत्रिका 'माहुरी मयंक' भी अमर हो जैतो । औ फेर जब तू नई छापवऽ जबकि तोहर पत्रिका कोई स्तरीय साहित्यिक पत्रिका नई हे तो की, ई विशाल भारत, सरस्वती, हंस में छप्पत । एक बात तू सुन ल, कि एकरा से तू औ तोहर पत्रिका 'माहुरी मयंक' अमर हो जैतो । जब कभी भी मगही भाषा के इतिहास लिखल जैतो, या कोई शोधार्थी मगही पर शोध करतो तो उनखा 'माहुरी मयंक' औ ओकर सम्पादक के चर्चा करे पड़त । औ एक बात तू आउर  सुन लऽ कि ई पत्रिका के पहिला सम्पादक हला बाबू गोपीचन्द लाल गुप्त जे एगो माहुरी मंडल नाटक भी लिखलका ह, ऊ नाटक में मगही भाषा के प्रधानता हे, उनके उत्तराधिकारी होके तू मगही के एतना नीच दृष्टि से देखऽ ह ।

हम चुप्प हली औ भीतरे-भीतरे सोच रहली हल कि शास्त्री जी के बात में दम लगऽ हे । हम्मर गम्भीर औ शोचनीय मुद्रा देख के उनका हिम्मत बढ़ल औ मगही के शब्द शक्ति के विशेषता पर दस पन्द्रह मिनट बोलला । इनकर ऊ बात के वर्णन एही किताब के 'स्वर्गीय मगही के साहित्यकार' आउर 'मगही शब्द शक्ति' में देखल जा सकऽ हे ।

अन्त में हम ई बात पर राजी होलूँ कि 'माहुरी मयंक' में कभी-कभार मगही के रचना छापम । उनकर ऊ कविता तो छपवे कैल । इनकर अलावे सर्व श्री योगेश सिंह योगेश, मृत्युंजय मिश्र करुणेश, हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, सुरेन्द्र प्रसाद तरुण, रामाश्रय झा, देवनन्दन प्रसाद, रामगोपाल आर्यगोप, सुदामादत्त शर्मा, तारकेश्वर भारती, रामहरी राम, लक्ष्मण प्रसाद अध्यापक आदि के सैकड़ो कविता कहानी आदि छप्पल ।

शास्त्री जी बगले के थाना एकंगरसराय के वासी हला औ हम्मर गाँव से सटले अस्ता गाँव में उनकर बहन ब्याहल हली से अकसर हमरा दर्शन दे जाइ हला । कुछ दिन बाद जब ऊ अइला तो पहिले हँसला औ कहलका कि देखऽ, तोहर मगही प्रेम केतना रंग लैलक । खरबुजा देख के खरबुजा रंग बदलऽ हे । तोरा देखा-देखी तोहर अइसन दोसर पत्रिका वालन भी मगही में रचना छापे लगला ह ।

मगही उत्थान शास्त्री जी के मिशनरी स्प्रिट हल औ ऊ मगही के मिशन के रूप में मान के चलऽ हला । एही कारण हे कि आज ऊ मगही के दधीचि के रूप में स्थापित हका ।

[श्री शिवप्रसाद लोहानी लिखित "गलबात" (मगही निबन्ध संग्रह) में निबन्ध "जब हमरो हँसी आ गेल सम्पादन करे घड़ी" (पृ॰24-32) से  चुनिन्दा अंश पृ॰25-27 ]

Sunday, March 15, 2009

10. स्मृति तर्पण

स्मृति तर्पण

[डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) सम्बन्धित संस्मरण]

लेखक - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी (जन्मः 1-10-1935)

मगही भासा आन्दोलन के पुरोधा डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के देन के आकलन मोसकिल काम हे । श्रीकान्त जी के बिना मगही के आउ मगही के बिना श्रीकान्त जी के अहसासो हमरा ला ओतने मोसकिल हे । हमरा जइसन हिन्दीवाला के मगही लेखन-आन्दोलन से जोड़े के अजगुत काम बस ओही कर सकलन हल, ओही कइलन ।

सन् 1955 के सितम्बर के कोई बरसाती दिन हल जब झमाझम बरसा में भींगत-भांगइत तीन मुरती हमर आशानगर (बिहारशरीफ) के घर में परगट होलन । मित्र रवीन्द्र कुमार बतउलन, एही डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री हथ आउ ऊ ठाकुर रामबालक सिंह । नालन्दा चले के हे । शास्त्री जी के कहनाम होल, मगही के दिशा-बोध आउ स्वर-बोध ला पटना से एगो मगही मासिक निकालम । समय के तकाजा हे । प्रधान सम्पादक बने ला भिक्षु जगदीश काश्यप जी के राजी करना हे । ऊ तोरा मानऽ हथू - मगही ला ई काम तोरा करे पड़तो । नालन्दा पहुँच के हम काश्यप जी से सबके मिला देली । बाकि शास्त्री जी के प्रस्ताव सुन के काश्यप जी नहकार देलन । "जवाहरलाल (भूतपूर्व प्रधान मंत्री) त्रिपिटक के छपावे के काम में लगा देलन हे । फुरसत न हे । सम्पादक छपल-छपाल अंक देखे, ई ठीक न हे । डॉ॰ शास्त्री निम्मन तरी से सम्पादन कर सकऽ हथ ।"

हमरा बोलना अब जरूरी पड़ गेल । कहली, अपने 'मगध संघ' के निर्देशक हथी । ई 'मगध संघ' के पत्रिका हे । एकरो निर्देशक अपने रहथी । निर्देशक के काम निर्देश देना भर हे, पालन करना तो हमनी के काम हे । मोहक मुसकान के साथ काश्यप जी 'मगही' ला पहला चन्दा शास्त्री जी के सौंप देलन । निर्देशक के रूप में भिक्षु जगदीश काश्यप के नाम ऊपर छपैत रहल ।

तय होल कि मासिक 'मगही' 'बिहार मगही मंडल' के तत्त्वावधान में 'मगध संघ' से प्रकाशित होत । एहू छपैत रहल । ठाकुर रामबालक सिंह हमरा से कहलन, सलाहकार मंडल में रवीन्द्र कुमार के नाम देवे ला चाहऽ ही । उनकर कहनाम हे, प्रियदर्शी के रक्खऽ । हम कहली - वाहे गुरु, जे एको लाइन मगही न लिखलक हे, ओकर नाम छापेवाला ई कइसन पत्रिका निकालबऽ । हमनी छात्र ही, हमरा छतरी न बनाबऽ । 'मगध संघ' के अध्यक्ष प्रो॰ सिद्धेश्वर प्रसाद के नाम छाप दऽ । शास्त्री जी बोललन, ऊ हिन्दीवाला हथ - मंजूर करतन ? हम बोलली - हमहूँ हिन्दीवाला ही । उनका तरफ से 'हाँ' कहे के हकदार मान के नाम छाप दऽ । एहू नाम बराबर छपैत रहल ।

मगही लेखन में निखार आउ साहित्यिक विधा के पहचान उकेरेवाला पत्र बन के 'मगही' महिन्ने-महिन्ने छपे लगल । प्रवेशांक में छपे लायक काफी मैटर (सामग्री) हम बटोर के देली (अप्पन कुछ नञ्) । प्रवेशांक के सम्पादकीय में शास्त्री जी हमरा बहुत अहसान जतयलन । मित्र रवीन्द्र कुमार आउ महेश्वर तिवारी के साथ मिल के हम नालन्दा कॉलेज आउ नालन्दा पालि प्रतिष्ठान, नालन्दा के बहुत्ते आचार्य आउ छात्र सब के ग्राहक बना लेली । हमरा हीं शास्त्री जी के आवा-जाही बढ़े लगल । हमरा कन्वर्ट करना जइसे उनकर जरूरत बन गेल । कहलन, छोड़े के बात कहाँ हे, हम तो जोड़े कहऽ ही । हिन्दी के दिमाग में रक्खऽ, मगही के दिल में रख लऽ । अधरतिया में उचटल नींद में कोय लोकधुन, मगही लोकगीत के कोय लाइन सुनाय में आवऽ हो त सब कविताई झूठा लगे लगऽ हो न ! मगही मन के ऊ गहराई में बसल हो, ओकरा झुठलावऽ नञ् ।

1957 में शास्त्री जी एकंगरसराय में पहिला मगही महासम्मेलन बोलइलन । बिहार के शिक्षा मंत्री आचार्य बदरीनाथ वर्मा उद्घाटन आउ भिक्षु जगदीश काश्यप ओकर अध्यक्षता कइलन । पूरा मगही समाज इकट्ठा हो गेल । मगही पर पहला शोध लेख के रूप में, जेकर उल्लेख सब जगह मिले हे, ऊ अवसर पर प्रकाशित भेल । लेखक प्रो॰ रमाशंकर शास्त्री खुलल अधिवेशन में एकर पाठ कइलन । जनपद आन्दोलन के रूप में मगही के विकास ला सब मगही संस्था के दू-दू प्रतिनिधि ले के केन्द्र गठन के हम्मर प्रस्ताव खुला अधिवेशन में पास हो गेल । प्रस्ताव रख के जब हम बैठ रहली हल तो रुद्र-वाणी सुनाय पड़ल, 'हमनी सब जे जोड़ रहली हल, तूँ ओकरा ढाह के बैठ गेलऽ' । मतलब 'बिहार मगही मंडल' के केन्द्रीय संगठन न मान के हम केन्द्र गठन के नया प्रस्ताव रख देली हल ।

ई अधिवेशन के अवसर पर जब हम एकंगरसराय पहुँचली तो मित्र मंडली से हमरा फरका के शास्त्री जी मिठाई के दोकान में ले गेलन । नाश्ता-पानी करा के पुछलन, काम हो गेलई ? (हमर रचना के बारे में) हम अपन टटका गीत उठाके हाँथ में धर देली - 'कहमा पिया केर गाँव हे ?' पढ़ के खुश हो गेलन । रात कवि सम्मेलन में हम पहले पहल मगही गीत सुनउली जे 'मगही' के अधिवेशन अंक में छपल । हलाँकि छापे ला ऊ गीत हम उनका नञ् देली हल ।

मगही लेखन-आन्दोलन से हमरा जोड़े के कोरसिस शास्त्री जी लगातार करइत रहलन । एकंगरसराय उत्सव के हमर बड़गर उपलब्धि हल महमादाय रामनरेश पाठक से परिचय । उनकर आग्रह भी हमरा मगही दने खींचे लगल । ऊ दुनों के सलाह होल कि बिहारशरीफ में दोसर मगही महासम्मेलन हमरा बोलाना चाही । मगध संघ के चौदहवाँ अधिवेशन पर 5 अप्रैल 1964 के दिन दोसर मगही महासम्मेलन सम्पन्न होल । अधिवेशन के अध्यक्षता डॉ॰ बी॰पी॰ सिन्हा कइलन । पूरा मगही समाज जुटल । डॉ॰ के॰पी॰ अम्बष्ठ, डॉ॰ राजाराम रस्तोगी, डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी, डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री, डॉ॰ श्यामनन्दन शास्त्री, रामगोपाल 'रुद्र', रामनरेश पाठक, गोवर्धन प्रसाद सदय, रामसिंहासन विद्यार्थी, गोपी बल्लभ सहाय, राम निरंजन, परिमलेन्दु, मृत्युंजय मिश्र 'करुणेश', सत्यदेव शांतिप्रिय आदि के अलावे अतिथि साहित्तकार ब्रजकिशोर नारायण आउ आचार्य महेन्द्र शास्त्री भी भाग लेलन । मगही के डी॰लिट्॰ प्राप्ति पर मगही जगत के तरफ से डॉ॰ सम्पत्ति अर्याणी जी के सार्वजनिक सम्मान कइल गेल । मगही के विकास ला हमर पाँच सूत्री प्रस्ताव स्वीकार कइल गेल । प्रस्ताव हल -

1. मगही के अकादमिक संस्था 'मगध शोध संस्थान' के स्थापना

2. मगही के पाठ्यक्रम आउ साहित्य अकादमी में स्थान

3. मगध क्षेत्र में स्थापित सब मगही संगठन के प्रतिनिधि ले के केन्द्रीय मगही संगठन के स्थापना

4. मगही में फिल्म निर्माण

5. आकाशवाणी से मगही में नियमित प्रसारण

डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के खुशी के ठेकाना नञ् हल । प्रस्ताव के कार्यान्वयन ला कमर कस के उतर गेलन ।

मगही में फिल्म निर्माण के प्रस्ताव के पूर्ति ला हम 1963 में पहल कइली । फिल्मकार गिरीश रंजन के साथ 'मगध फिल्म्स' के स्थापना कइली । ई यूनिट द्वारा 1964 से आर॰डी॰ बंसल प्रोडक्शन, कलकत्ता द्वारा मगही फिल्म 'मोरे मन मितवा' के निर्माण होल । मगही में दुइए फिल्म बन सकल हे । 'मोरे मन मितवा' के लेखक-निर्देशक गिरीश रंजन, गीतकार हम (हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी) आउ सहयोगी संगीतकार-गीतकार 'लल्लन' हलन । हमर लिखल, दत्ताराम द्वारा संगीतबद्ध तथा मुहम्मद रफी आउ आशा भोंसले द्वारा गायल 'कुसुम रंग लहँगा मँगा दे पियवा' मुकेश-सुमन कल्याणपुर के गावल 'मोरे मन मितवा, सुना दे ऊ गितवा' तथा मुबारक बेगम के गजल 'मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा' काफी लोकप्रिय होल ।

शास्त्री जी के प्रयास आउ शिक्षा मंत्री आचार्य बदरीनाथ वर्मा, डॉ॰ वी॰पी॰ सिन्हा, डॉ॰ के॰पी॰ अम्बष्ठ के सहयोग से बुद्ध पूर्णिमा 1964 के दिन 'मगध शोध संस्थान' के उद्घाटन इतिहासवेत्ता डॉ॰ के॰के॰ दत्त कइलन । संस्था के विकास के गति अवरुद्ध देख के शास्त्री जी के बेचैनी आउ चहलकदमी बढ़े लगल । उनकर इच्छानुसार संस्थान के पुनर्गठन ला सिद्धेश्वर प्रसाद, डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री, डॉ॰ सरयू प्रसाद आउ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी के नाम से एगो परिपत्र जारी होल । 1967 में संस्थान के पुनर्गठन ला नालन्दा में मगही के विद्वान सब के इकट्ठा कइल गेल । भिक्षु जगदीश काश्यप के अध्यक्षता में सम्पन्न समारोह में पुनर्गठन के प्रस्ताव साकार कइल गेल आउ संचालन समिति बनल । पदाधिकारी मंडल में अध्यक्ष भिक्षु जगदीश काश्यप, उपाध्यक्ष प्रो॰ सिद्धेश्वर प्रसाद आउ डॉ॰ वी॰पी॰ सिन्हा, मंत्री डॉ॰ सरयू प्रसाद, सहमंत्री हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी तथा निदेशक डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री बनलन ।

2-3 मार्च 1968 के दिन सुरेन्द्र प्रसाद तरुण के सौजन्य से राजगीर में संस्थान के पहला अधिवेशन समारोह सम्पन्न होल । मगही के नामचीन विद्वान सब उपस्थित हलन । अतिथि रूप में भुवनेश्वर मिश्र माधव आउ पं॰ रामदयाल पांडेय के आगमन होल । मगही के विकास यात्रा के पड़ाव पर गम्भीर शोधकार्य के उपयुक्त वातावरण बन गेल । संस्थान के मुख पत्रिका 'शोध' के प्रकाशन होल । सरकार के भाषा सर्वेक्षण के काम से आउ देश-विदेश के लोकभाषा विषयक सभे मंच से संस्थान जुड़ गेल । शास्त्री जी भर बउसाह जोर लगा के संस्थान के खड़ा कर देलन । बाकि उनकर ई उत्साह आउ ई ताकत बहुत दिन न चल सकऽ हल । संस्थान के पैड के जंपिंग पैड के रूप में उपयोग होवे लगल । शास्त्री जी के अन्त एगो हारल-टूटल अमदी के अन्त हल । एगो विपट स्वप्न के समाधि । ई प्रसंग जब-जब कौंधऽ हे, मन के कचोटे लगऽ हे ।

शास्त्री जी के अवसान 29 जुलाई 1973 के दिन होल । हमरा खबर देर से मिलल । नालन्दा जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन आउ साथ-साथ नालन्दा के पहिल जिलाधिकारी श्री विन्ध्यनाथ झा महोदय भी अप्पन शोक-श्रद्धांजलि अर्पित कइलन ।

डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री आउ ठाकुर रामबालक सिंह द्वारा 1955-58 में सम्पादित प्रकाशित मासिक 'मगही' के सिलसिला आगे बढ़ावे के ठाकुर रामबालक सिंह के आग्रह से साहस पाके हम 1986 में मगध संघ के तिमाही पत्रिका 'मगही' के सम्पादन-प्रकाशन कइली । पहला अंक शास्त्री जी पर केन्द्रित कर के अप्पन अपराध-बोध कम करे के कोरसिस कइली । कवर पर शास्त्री जी के फोटो के तलाश उनकर अप्पन लोग से पूरा न होल त योगेश्वर प्रसाद सिंह 'योगेश' के पास दू बार विक्रम जाके फोटू मिलल । किन्तु डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री भक्ति आउ साहित्यकार के मूल्यांकन छापली, व्यक्ति के मूल्यांकन ठाकुर रामबालक सिंह के आउ साहित्यकार के योगेश्वर प्रसाद सिंह 'योगेश' के ।

बिहार मगही अकादमी, पटना द्वारा पाठ्यग्रन्थ 'इंटरमीडिएट मगही गद्य-पद्य संग्रह' (मातृभाषा) के सम्पादक नियुक्त हो के हम शास्त्री जी के याद करली कि हमरा मगही से जोड़े के उनकर आग्रह के साथ इन्साफ करे ला दोसर लोकभाषा के पाठ्यग्रन्थ के मुकाबले अच्छा ग्रन्थ निकालना जरूरी हे । परिणाम सामने हे । ई पाठ्यग्रन्थ में हम डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री जी के कृष्णदेव प्रसाद से भेंट छापली हे । मगही के ई दू महानायक के इकट्ठा करे वाला ई आलेख मगही इतिहास के बड़गो 'स्कूप' हे । हम एकरा स्कूप काहे कह रहली हे, एकरा समझे ला शास्त्री जी द्वारा एकंगरसराय से सम्पादित प्रकाशित पहिल पत्रिका 'मागधी' के अंक देखे के जरूरत हे । फिनु, मगही के विविध विधा के मानक रचना के अप्पन संकलन 'मागधी विधा विविधा' में कृष्णदेव प्रसाद के 'खर बात खरदूलह के' आउ डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के 'बर, बुढ़वा वर' के एक साथ छाप के सन्तोष के अनुभव होल ।

'हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास', जे पं॰ राहुल सांकृत्यायन के सम्पादन में निकलल, के लोकभाषा खंड में ऊ गीत के उद्धरण देल गेल हे जेकरा में हम हिन्दी के छे प्रतिष्ठ कवि, जे मगही के अगला पाँत के कवि हथ, के रूप में मउजूद ही ।

हम देखऽ ही आउ शास्त्री जी के याद करऽ ही । बाद में मगही में अब तक बनल दू फिल्म में से एक 'मोरे मन मितवा' लगी दिसम्बर 1964 में बम्बई में हम मुहम्मद रफी, मुकेश, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर आउ मन्ना डे से अपन मगही गीत के रेकार्डिंग करा रहली हल, फिनु जब सूर्या मैग्नेटिक्स, पटना से मगही के पहिला कैसेट जारी करैली, जेकर दसो गीत हम्मर हे त शास्त्री जी के याद करे बिन नञ् रह सकली, जिनकर प्रेरणा से हम मगही में अयली हल ।

हम गवाह ही कि मगही पर श्रीकान्त शास्त्री के अनुराग अथाह हल आउ ओकर विकास ला उनकर उद्योग अपार । विकास के नींव में उनकर पुण्य बल हे । उनकर अनुयायी आउ सहयोगी लोग के बल पर मगही आगे बढ़ल हे । मगही के कामे श्रीकान्त शास्त्री के प्रति सही श्रद्धांजलि हे ।

['मगही पत्रिका', अंक-7, जुलाई 2002, पृ॰ 16-18; सम्पादकः धनंजय श्रोत्रिय]

Saturday, March 14, 2009

9. हाँ, हम रिश्तेदार ही श्रीकान्त शास्त्री के

हाँ, हम रिश्तेदार ही श्रीकान्त शास्त्री के

[डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) सम्बन्धित संस्मरण]

लेखक - धनंजय श्रोत्रिय

अपन बात के पुष्टि ले एगो घटना के चरचा जरूरी समझऽ ही । दिल्ली में 'वागार्थ' पत्रिका के करता-धरता एगो बड़गर कार्यक्रम कर रहलन हल, 'इंडिया इंटरनेशनल सेंटर' में । ऊ घड़ी तक 'वागार्थ' हिन्दी के साहित्यिक पत्रिका में अपन सेसर स्थान बना चुकल हल । से-से डॉ॰ प्रभाकर श्रोत्रिय लोग के चहेता बन चुकलन हल । खास करके मीडिया ले ।

ऊ घड़ी हमहूँ अखबारी संपादक हली । जन्ने-तन्ने सक्रिय रहे से थोड़े तेजी से पहचान बन रहल हल । हमर कुछ दोस-मोहिम, जे पत्रकारिता के काम से जुड़ल हलन, जाने चाहऽ हलन कि एकर मूल में की हे । एगो पत्रकार मित्र पूछ बइठल - "धनंजय, प्रभाकर श्रोत्रिय तुम्हारे रिश्तेदार हैं ?"

हम बेलाग नहकार गेली । हलाँकि ऊ माहौल में चाहती हल त थोड़े जस हमहूँ अपना दने उपछ सकली हल, अपना के प्रभाकर जी के रिश्तेदार बता के । बाकि, मुरुख जे हली । आखिर में ऊ दुपहरिया के भोजन घड़ी पूछ बइठल - "प्रभाकर जी, धनंजय श्रोत्रिय आपका रिश्तेदार है ?"

हमरा अचरज होल जब ऊ अपन उत्तर 'हाँ' में देलन ।

"लेकिन धनंजय तो कह रहा था प्रभाकर जी, कि आप उसके रिश्तेदार नहीं हैं !" पत्रकार मित्र उनकर उत्तर पर शंका व्यक्त कइलन ।

"वो जरा मुझसे नाराज चल रहा है ।" प्रभाकर जी थोड़े गंभीरता से उत्तर देलन ।

दोसर प्रश्न पूछल गेल - "कैसी रिश्तेदारी है आपसे उसकी ?"

उत्तर मिलल - "आप हमें साहित्यकार-रचनाकार मानते हो ? ... मानते हो न ? ... धनंजय को रचनाकार मानते हो ?"

सबके उत्तर 'हाँ-हाँ' में मिलल । प्रभाकर जी मुस्कइते बोललन - "तो, धनंजय से मेरी रिश्तेदारी में सन्देह कहाँ है !"

हमर खास तरह के मित्र लोग के चेहरा पर आठ बज के बीस मिनट हो गेल

हम ई बात से थोड़े लजइली जरूर बाकि ई बात के गिरह बान्ह लेली कि एक रचनाकार के सबसे करीबी रिश्तेदार दोसर रचनाकारे हो सकऽ हे, ओकर बेटा-पोता नञ् । 'मगही-पत्रिका' के परचार-परसार ले जब गामे-गाम आउ दुआरिए-दुआरिए ढनमनाय पड़ रहल हे, त ई बात के आउ जोरदार ढंग से पुष्टि हो गेल हे, हमर मन में ।

'डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री अंक' जेकर जरूरत हम महसूस कर रहली हल, निकाले के सूचना जब 'मगही पत्रिका' में छापली त दु-चार गो झमठगर मगही के विदमान पूछ बैठलन हमरा से - "श्रीकान्त शास्त्री आपके रिश्तेदार थे क्या ?" बस, प्रभाकर श्रोत्रिय के इयाद करके उनकर चेहरा पर 'आठ-बीस' बजा देली । अजगूत लगल कि आदमी के सोंच के स्तर के सिमाना केतना सिकुड़ गेल हे । खास करके तब जब हमरा से पूछल गेल - "उनकर परिवार के लोग आर्थिक सहजोग दे रहलन हे न ?" याने ऊ अपना के उनका से अलग मानऽ हथ । व्यक्तिवादी दिमाग में कभी समष्टिवादी विचार उभर नञ् सकऽ हे, जैसे बाँस के कोठी में कभियो मीठा फल नञ् लग सकऽ हे ।

खैर, लोग जिनका परिवार कहऽ हे, उनको पर चरचा जरूरी हे । सबसे पहिले खोजते-ढूँढ़ते श्री विष्णुकान्त शर्मा जी के पास गेली, जे जहानाबाद में ऊटा में रहऽ हथ, आउ उनकर बड़का दमाद हथ । पत्रिका देखलन । उनकर अनेक सवाल के जवाब देवे पड़ल, बाकि हमर जरूरत के कोय चीज प्राप्त नञ् हो सकल हुआँ । उनका पास डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री से जुड़ल जे चीज हे, ऊ हे - 'धन मधे धन, तीन लुंडा सन ।'

उनकर छोट दमाद सुरेश आनंद जी से मिले खातिर मायथन गेली बाकि हमर दुरभाग कि भेंट नञ् हो सकल । रह गेलन प्रो॰ शेषानंद बाबू आउ डॉ॰ मारुति बाबू जिनका ल हमर मन में विशेष आदर हे । अपन कोरसिस के बावजूद हम दुरभाग बस उनका पकड़ नञ् सकलूँ । अपने सबसे बादा हे कि ई तीनों विभूति के पास डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री से जुड़ल जे भी सामग्री इया संस्मरण होत, 'मगही पत्रिका' के आगू के अंक में हम जरूर परोसम । ... शास्त्री जी के अप्रकाशित मौलिक रचना तो अब मोसकिले से मिल सकत । शास्त्री जी के ... जदि कुछ रचना प्रकाश में आ सके त हम्मर धन्न भाग !

1955 में जब 'मगही' के छपे ल शुरू होल, ऊ समय शास्त्री जी के साथ ठाकुर रामबालक सिंह के अलावे नउजवान के एगो तिकड़ी हल । ऊ तिकड़ी के दू हस्ताक्षर से अपने के खूब परचे हे, ऊ हथ - मगही के सेसर कहानीकार श्री रवीन्द्र कुमार आउ मगही के सेसर गीतकार डॉ॰ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी । ई अंक में तीनों के रचना सामिल हे । स्व॰ ठाकुर रामबालक सिंह के लेख 'मगही गद्य-पद्य संग्रह' से साभार लेली हे, जे एगो वैयक्तिक लेख हे । रवीन्द्र कुमार डॉ॰ शास्त्री जी के तरासल रचनाकार हथ, ई गुने उनकर रचना संस्मरणात्मक हे, जबकि डॉ॰ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी के लेख ऊ घड़ी के मगही के परिदृश्य चित्रित करे हे जेकर तथ्यात्मक पुष्टि के प्रमाण सिर्फ लेखक के पास हे ।

जब 'मगही' के प्रकाशन रुक गेल आउ 'शोध' जलमतहीं काल के कल्ला में चल गेल त शास्त्री जी लगभग फरास हो गेलन । 'श्रीकान्त सरधांजली अंक' में डॉ॰ रामनन्दन के मसुआइल फूल से लगऽ हे कि उनकर मन में कुहासा भरल 'बिहान' के भी अंदेसा छाय लगल हल । ईहे समय में ऊ एक दिन प्रो॰ वीरेन्द्र वर्मा (हिन्दी/ मगही के श्रेष्ठ गद्यकार) हीं पहुँचलन । वर्मा जी हलन तो मैथिलीभाषी आउ पढ़वऽ हलन अंग्रेजी, बाकि मगह में रहे के चलते उनका मगही से भी मोह हो गेल, जेकरा में श्रीकान्त शास्त्री जी के भी जोगदान हे । प्रो॰ वर्मा के संस्मरण में उनकर टूटन के झलक साफ मिलऽ हे ।

... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...

हमरा जानकारी में खोरठगर से खोरठगर जेतना धातु के कुंदन बनावे के काम डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री कयलन, ओतना आज तक कोय मइया के लाल नञ् कर सकल हे , नञ् करत !

['मगही पत्रिका', अंक-7, जुलाई 2002, के 'संपादकीय' अंश, पृ॰ 5-6]

8. पंडित जी

पंडित जी

[डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) सम्बन्धित संस्मरण]

लेखक - ठाकुर रामबालक सिंह

डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के हमनी पटनियाँ सब 'पंडित जी' के नाम से जानऽ हली । 1955 में 'मगही' मासिक पत्रिका जब छपावे के विचार होलई तब पटना यंगमेन्स एसोसिएशन के सदस्य सब के विचार होलई कि मुख्य सम्पादक पद पर भिक्खु जगदीश काश्यप इया डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के रखल जाय ।

ई काम ला हमनी 'पंडित जी' के गाँव नारायनपुर गेलूँ । हमनी समझइत हलिअइ कि 'पंडित जी' तिनफक्का चन्नन लगउले, खड़ाऊँ पेन्हले, टीकी बढ़इले, कउनो बड़गो पुजारी होथिन । मुला जा ही त का देखऽ ही कि खद्दर के मइल-कुचइल धोती आउ फटिहर गंजी पेन्हले एगो दुब्बर-पातर अदमी आठ-दस गो लइकन के पढ़ावइत हलथिन । हमनी सलाह-मसविरा कयलियइ त ऊ 'मगही' के सम्पादन करे ला तइयार हो गेलथिन ।

ओक्कर बाद 'पंडित जी' के साथे हम बिहारशरीफ गेलूँ । बिहारशरीफ में बहुत्ते व्याख्याता आउर 'मगध संघ' के नौजवान लोग हमनी के साथ देलथिन । एकरा में सर्वश्री हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, रवीन्द्र कुमार, डॉ॰ सिद्धेश्वर प्रसाद, प्रो॰ रमाशंकर शास्त्री, महेश्वर तिवारी ओगइरह के भुलावल न जा सकऽ हइ । तय होलई कि 'मगही' 'बिहार मगही मंडल' के तत्त्वावधान में 'मगध संघ' से प्रकाशित होतई । एही बिबरन मगही में बराबर छपलई ।

फिन हमनी प्रियदर्शी आउ रवीन्द्र कुमार के साथ ले के भिक्खु जगदीश काश्यप से भेंट करे नालन्दा गेलूँ । सुरू में 'मगही' के मुख्य सम्पादक काश्यपे जी के बनावे के विचार हलई । काश्यप जी जानऽ हलथिन कि मगही भाषा ला पंडित जी हड्डी गला रहलथिन हल । ई सोंच के ऊ कहलथिन कि सम्पादक श्रीकान्त शास्त्री आउ तों (ठाकुर रामबालक सिंह) रहऽ, हमरा त्रिपिटक के हिन्दी में छपावे के काम से फुरसत न हो । प्रियदर्शी जी कहलका कि अपने मगध संघ के निर्देशक हथिन, ई मगध संघ के पत्रिका हे, एकरो निर्देशक अपने रहथिन । प्रियदर्शी जी के ऊ मानऽ हलथिन, मान गेलथिन । 'मगही' के पहिला अंक छापे ला एक सौ रुपइया भी काश्यप जी देलथिन ।

'मगही' के पहिला अंक ला पंडित जी बड़कन-बड़कन साहित्यकार के लिखलथिन । बहुत्ते लोग के सन्देस मिलल । हिन्दी के दधीचि शिव जी (आचार्य शिवपूजन सहाय) के सन्देस हल - "मगही मीठी एवं मुलायम बोली है । महिलाओं के मुख से उसमें और मिठास आ जाती है; यह बात मेरे गुरु पं॰ ईश्वरी प्रसाद शर्मा कहा करते थे ।"

पहिला अंक दू हजार छापलूँ । ओकर अइसन धूम मचल कि हो रे बस ! पटना, कलकत्ता, दिल्ली के करीब सबे अखबारन में ऊ अंक के बड़ाई छपल । फिन तो मगही के जे प्रचार भेल कि लोग मगही कार्यालय में आ-आ के 'मगही' खरीदे लगलन । बड़ी मोसकिल से दस-पाँच कौंपी बचा के रखऽ हलूँ । अब तो एक्को अंक हमरा पास न बचल हे ।

पंडित जी के सम्पादन में मगही के दिन दोगना आउ रात चौगना रूप निखरइत रहल । मगही पत्रिका के चलते एक-से-एक बढ़ के लेखक आउ कवि के जनम भेल । एकरा में सर्वश्री सुरेश दुबे 'सरस', रामनरेश पाठक, हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, रवीन्द्र कुमार, लक्ष्मण प्रसाद दीन, योगेश, डॉ॰ रामनन्दन, डॉ॰ शिवनन्दन प्रसाद ओगइरह के नाम लेबे लायक हे । सुरेश दुबे 'सरस' के कविते-सेंगरन 'निहोरा' बिहार सरकार के पुस्तकालयन ला मंजूर भी भेल हल । रामनरेश पाठक अप्पन 'अगहन के भोर' कविता के जब मधुर सुर के साथ राँची कौलेज में परस्तुत कयलथिन तब कइठो बिदेसी लोग ओकरा टेप करके अप्पन-अप्पन देस ले गेलथिन । प्रियदर्शी के 'कहमा पिया केरा गाँव ?' टेक वाला गीत मगही गीत के नमूना बन गेल । रवीन्द्र कुमार के 'मन के पंछी' कहानी तो एत्ते चलल कि घरे-घर अउरत-बानी ओकरा रट गेलथिन । योगेश जी आउ डॉ॰ रामनन्दन के चुटकी सुन-सुन के तो आझो लोग लोट-पोट हो जा हथ । डॉ॰ शिवनन्दन प्रसाद के 'मंजर' शीर्षक निबन्ध भी बहुत चरचित भेल ।

1957 में 'पंडित जी' के गाँव नारायनपुर भिर एकंगरसराय में पहिला मगही सम्मेलन भेल । एकर सफलता लागी देस-भर से आउ बिदेस से भी, ऊ बखत के चीन के प्रधान मंत्री स्व॰ चाऊ-एन-लाइ तक के, सन्देस आयल हल । एकर उद्घाटन कयलथिन हल ऊ बखत के बिहार के शिक्षा-मंत्री आचार्य बदरीनाथ वर्मा आउ सभापतित्व कयलथिन भिक्खु जगदीश काश्यप । बड़ी धूमधाम से ई सम्मेलन भेल आउ एकर रिपोर्ट मगही के नौवाँ अंक में छपल । ई सब एतना जे लिख रहलूँ हे, ई सभ काम पंडित जी के हाँथ से होवऽ हल । तन, मन, धन, सब कुछ पंडित जी मगही आन्दोलन ला नेछावर कइले हलन । हम तो छाया नियन खाली उनखर साथे रहऽ हलियई ।

मगही सम्मेलन में पहिले 'पंडित जी' 'बिहार मगही मंडल' के गठन कयलथिन हल, जेकर सभापति हलथिन डॉ॰ बिन्देश्वरी प्रसाद सिन्हा, उपसभापति डॉ॰ नर्मदेश्वर प्रसाद (बाद में कुलपति, मगध विश्वविद्यालय), आउ मंत्री हलथिन डॉ॰ शिवनन्दन प्रसाद । डॉ॰ शिवनन्दन प्रसाद के हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली, चल गेला के बाद मंत्री के काम डॉ॰ रामनन्दन (भूगोल विभाग, पटना विश्वविद्यालय) सँभारे लगलथिन । मुला जभी कोय काम होवे त 'पंडित जी' के नारायनपुर से बे अइले न होवऽ हल ।

मगही सम्मेलन के बाद हमरा राँची में नौकरी लग गेल । 'मगही' तब रुक-रुक के परकासित होवे लगल । ओकरा बाद 'पंडित जी' डॉ॰ रामनन्दन के मदद से 'बिहान' प्रकासित करे लगला । जे बखत पंडित जी 'मगही' सुरू कयलथिन हल ऊ बखत आई॰ए॰ पास हलथिन । मगही आन्दोलन, लड़िकन के विद्यालय आउ घर के पचड़ा रहे पर भी 'पंडित जी' प्रतिष्ठा के साथ बी॰ए॰ आउर एम॰ए॰ कयलथिन आउ बाद में पी-एच॰डी॰ भी । 'पंडित जी' के बेतुहार खरचा देख के पंडिताइन रंज रहऽ हलथिन । ऊ अप्पन अलगे कोठली में पूजा-पाठ, चउका-बरतन करऽ हलथिन ।

हमरा राँची अइला के बाद भी ऊ अकेले मगही के गाड़ी के खींचते रहलथिन । 1964 में 'मगध संघ' के चौदहमा अधिवेसन के अवसर पर बिहारशरीफ में दोसर मगही सम्मेलन भेल । आउ भी केतना जगह पर सम्मेलन भेल । बिहारशरीफ के सम्मेलन में 'मगध शोध संस्थान' के स्थापना ला संकल्प लेल गेलई हल । ओही मगही के पहिला गैर-सरकारी अकादमी हलई । निदेसक बना के 'पंडित जी' ओकरा चलयलथिन हल । कुछ दिन तक ऊ सुभाष हाई स्कूल, इसलामपुर में शिक्षक के काम कयलथिन हल । मुला विश्वविद्यालय में तो जात-पाँत, भाई-भतीजावाद भरल हे । ईनखर पांडित्य आउ गहिरा अध्ययन के केऊ कदर न कइलकई । जूझइत-जूझइत आखिर में मगही-मगही जपइते बेचारे मगहिया अग्रदूत 1973 में 29 जुलाई के ई संसार से चल देलथिन ।

'मगही', 'बिहान' आउर बहुत्ते-मनी पत्र-पतरिका में उनखर लेख 'एगो मस्त मगहिया' के नाम से छपऽ हल । 'पंडित जी' में सबसे बड़ खूबी ई हल कि ऊ मगहिये में सोचऽ हलथिन आउ मगहिये में लिखऽ हलथिन ।

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भारतेन्दु जइसन कम्मे उमिर में 'पंडित जी' संसार छोड़ देलन । कुछ दिन आउर दुनिया में रहितन हल तऽ भाषा-विज्ञान में एगो नया मोड़ जरूरे अइतई हल । उप्पर जे लिखल गेलइ हे कि हमनी जब उनखर गाँव गेलूँ हल, ऊ बखत 'पंडित जी' लड़िकन के पढ़ावऽ हलथिन । सब्भे लड़िकन के बिना फीस के पढ़ावऽ हलथिन । भाषा-विज्ञान के विदमानन हियाँ जा-जा के भेंट करऽ हलथिन । हमरा एक बेर सुनीति कुमार चटर्जी हियाँ कलकत्ता ले गेलथिन । पंडिते जी के किरपा से राहुल जी के कताब 'हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास' में हमनी के आउ मगही के जिकिर भेलई हे । आर॰आर॰ दिवाकर के किताब 'बिहार थ्रू दी एजेज' में मगध पर जे परिच्छेद लिखल हई ऊ पंडिते जी के लिखल हई । चम्पारण जिला, बंगरी गाँव के श्री गणेश चौबे, 'भोजपुरी' मासिक के सम्पादक श्री रघुवंश नारायण सिंह, श्री कामता प्रसाद सिंह 'काम', श्री कृष्णदेव प्रसाद एडवोकेट, ई सब के साथे तो हमनी के साहित-चरचा चलतहीं रहऽ हलई ।

['मगही पत्रिका', अंक-7, जुलाई 2002, पृ॰ 7-9; सम्पादकः धनंजय श्रोत्रिय]

Friday, March 13, 2009

7. अन्तिम मुलकात एगो अजनबी से

अन्तिम मुलकात एगो अजनबी से

[डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) सम्बन्धित संस्मरण]

लेखक - प्रो॰ वीरेन्द्र कुमार वर्मा (जन्मः 10-1-1939)

हम्मर भुरुकवा दस बजे के बाद उगे हे । आउर दिन के तरह ऊहो दिन भुरुकवा उगे के इन्तजार में बिछाओन पर ओघड़ाल हली कि छोटकी बेटी हँकारलक - "कोय मिले ला अयलथुन हे ।"
"केऽ ...?"
"अरे, उठके देखहो न, हम नञ् चिन्हऽ हकिओ !"

कुनमुनाइत ठुनकैत नीन से बिदाई ले के बाहर निकललूँ ! बैठकी में मिलला मगही के मीसन । जी, मीसन, डॉ॰ श्रीकान्त ! गोर देह, मुदा समय के मार से छत-बिछत सरीर पर लेपल झाईं, कारिख, जहाँ-तहाँ झुर्री से झाँकइत हतासा के टेढ़-मेढ़ लकीर ! परनाम-पाती भेल । आउर हम भौंचके देख रहलूँ हें । बार-बार, अनेक बार निहार रहलूँ हें । ई उहे श्रीकान्त जी हथ, जिनका से पहिलुक मिलन मगही-हिन्दी के प्रसिद्ध साहितकार श्री हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी के घर होल हल । कउनो मिटिंग हल । मगही के बिस्तार वेबहार, विकास पर बल देबे ला । विचार कैल गेल । उहे मिटिंग में डॉ॰ सरयू के एक अंकीय पतरिका 'शोध' बीज पइलक हल ! उ छोड़ऽ, श्रीकान्त जी के बात हे ! जवान-जुआन देह, परसस्त ललाट, चमकइत आँख, विसवास से भरल आवाज ! एक सपना जे मीसन में बदल गेल इया डॉ॰ श्रीकान्त के सउँसे निगल गेल । आउर आज ! टूटल काँच निअर उ सपना के कन-कन जे पूरे सरीर पर पसर के उनका अजनबी बना रहल हे ! न बाबा ! दुनु श्रीकान्त के बीच बड़गो अन्तराल हे ! बड़गो !

"अरे मौसिऔत की घुर-घुर देख रहलऽ हे ?"
"हाँ, तोहरे देख रहलूँ हँ ! कउन हाल कर लेलऽ हे ! "
"आध गो सरीर तो बिमारी खइलको आउर समपूरन सरूप मगही के उपेछा ! मगह के वासी मगही नञ् बोलतन, नञ् लिखतन, त कि मदरास आउ महाराष्ट्र के अदमी बोलत या लिखत ! पर, केकरा समझाऊँ, के सुनत ! सभे के तो गाय के दूध माय के दूध से जादे मीठ लग रहल हे ! हम त हार गेलिओ, मीसन में असफल हो गेलिओ ! "

"ई की बोल रहलऽ हे तूँ ! तोहरा निअर जोद्धा कबहिओ हार माने वाला हो सकऽ हे की ?"
"तऽ अब की करिओ ? घर-दुआर बिखर गेलो, अप्पन पराया हो गेलो । हम गाँव-गाँव घुमते रहलूँ ! लोगन के जगबइत रहलूँ, मुदा सुतल के न जगइबऽ, जागल के नीन के केऽ तोड़ सकऽ हे । ..." (एक छन ठहराव)

"ए वर्मा जी, एक बात हमरा से सीखऽ ! मगही भाई लोगन अउपचारिक सुआगत-सम्मान में कभिओ कान-कुतुर नञ् करतन, मुदा जब काम के बात करवऽ तऽ ढेंका कस के चुप्पी साध लेथुन । 'स्व' से 'पर' तक के जतरा करे के उनका गेयाने नञ् हे, आउर कुछ अमदी में अगर अइसन परेरना हे तऽ समाज में उनकर पहिचान मिटाबे ला, सभे जुट जा हथ । "तू महात्मा बनवऽ ? हम तोहरा अमदीयो से नीचे लुढ़का देबो !"

"ई सब नञ् हे श्रीकान्त जी ! असल में ई समइए विघटन के हे, विखराव के हे, मानव-मूल्य के गिरावट के हे ! साहित, संस्कृति, संस्कार, कला के हरासमान जुग हे ई ! अमदी-अमदी के बीच कटाव हो गेल हे । खुद अपने में भी अमदी के कटाव हे । अमदी के split personality हो गेल हे ! एहो गुनी सभे कुछ बदल गेलइ हे ।"

"ठीक हे, मुदा इहे जुग में तो बिहार के आउर लोक-बानी हे ! उठ रहल हे, लिखताहर के संख्या में दिन-दूना रात चौगुना बढ़ोतरी हे ! मुदा मगही के की हाल हे ! लिखताहर के गिनती जरूरे बढ़ल हे, मुदा पाठक । पाठके नञ् तऽ भासा के की हाल होत ! रोज-ब-रोज पत्र-पत्रिका पूरा जोश से, संकलप से, निकालल जा हे, आउर एक-दू अंक के बाद दस्तावेजी खाता में बिला जा हे । प्रश्न ई नञ् हे कि लिखताहर लिखे, प्रश्न हे समाज में मगही के मान-सम्मान होय । गाय के दूध पी के सरीर फैलावऽ, मुदा गाय के दूध से मन-आतमा के परितृप्त करऽ ! माय के दूध संजीवनी हे । मगही में तभिए निम्मन रचना आयत, जब मगहवासी भासा में प्राण-संचार करतन ! ई तू गाँठ बान्ह लऽ ।

"नञ् श्रीकान्त जी, मीसन हवा में घुल-मिल गेलो ! ई चिनगारी कभी न कभी धुँधुऐतो । आउर, उ दिन दूर नञ् हो । तोहर समरपन व्यर्थ नञ् हे, ई विसवास हे ! चलऽ, आवऽ, भोजन पर जुटऽ ।"

एगो आम अदमी, आम रूप धारन कयले, सरल, सादा याने आम खाना खा के बस एक खास बात कहलन, "मन के दरद कुछ बाँट लेलियो । कुछ हलका महसूस कर रहलियो हे ! माय के बेटन से अधिक सहज भाव से मउसी के बेटा मिललऽ ! देखऽ, फेर कब गला-गला मिलइत ही ! अच्छा, अब चलबो ! आउर सब से मिलना हे ।"

श्रीकान्त जी गेलन, चल गेलन, बिछुड़ गेलन । अब ... ???

['मगही पत्रिका', अंक-7, जुलाई 2002, पृ॰ 19, 40; सम्पादकः धनंजय श्रोत्रिय]

Monday, March 09, 2009

6. मगही के सशक्त कथाकार रवीन्द्र कुमार

मगही के सशक्त कथाकार रवीन्द्र कुमार (12 नवम्बर 1933 - 21 मई 2006)

लेखक - अरुण कुमार सिन्हा (जन्मः 17-1-1935)

रवीन्द्र कुमार के हमरा से जान-पहचान इया रिश्ता ७ मई १९५२ से होयल हल, जब हम्मर बिआह उनकर मंझिला चचा कृष्ण सहाय सिन्हा के बड़ बेटी प्रेमलता के साथे ठीक हो चुकल हल आउ ऊ दिन ऊ तिलक के रस्म अदायगी करे ला हम्मर अप्पन साला ज्योतिन्द्र जी, पुरोहित जी आउ नउआ के संघे हमरा हीं अयलन हल । रवीन्द्र जी, ज्योतिन्द्र जी आउ हम तीनो हमउमरिये हली, एही से रिश्तेदारी के अलावे दोस्ती के सम्बन्ध भी हमनी के बीच गाढ़ा होइत गेल ।

बिहारशरीफ के भैंसासुर महल्ला के निवासी रवीन्द्र जी के बाबू जी चतुर्भुज सहाय मोख्तार हलथिन । उनकर पहिला बिआह ओंदा गाँव में होलइन हल । ओंदा वाली मेहरारू से उनका एगो बेटी बच्ची होलइन हल । कुच्छे साल बाद ओंदा वाली उनका छोड़के दुनिया से चल गेलन । उनका मरला के बाद चतुर्भुज सहाय दोसर बिआह नोम्मा गाँव में कैलन, जिनका से दूगो बेटा होलथिन । ओकरे में से एगो बेटा हलथिन मगही के सशक्त कथाकार रवीन्द्र कुमार आउ ओही नोम्मा गाँव हे उनकर ननिहाल, जेकरा बारे में ऊ अप्पन कहानी 'कोनमा आम' में जिकिर कैलन हे ।

कथाकार रवीन्द्र कुमार के जलम १२ नवम्बर १९३३ ई॰ के होयल हल । ऊ छोटगरे से जिनगी आउ मउअत के खेल बड़ी नजदीक से देखलन हल । ऊ छोटे गो हलन कि उनकर माय, भाई आउ बच्ची दीदी के मउअत हो गेल । बाबू कचहरी चल जा हलन, तब मंझला बाबू कृष्ण सहाय चम्मच से उनका गाय के दूध पिलावऽ हलथिन ।

जवान होला पर ऊ पटना के लोहानीपुर महल्ला में अप्पन मंझला बाबू जौरे रहऽ हलन । खाना-पीना तो सब के जौरहीं होवऽ हलइ, बाकि रवीन्द्र जी अप्पन पाकिट खरचा उनका से न मांग के दू-तीन जगह लइकन के टिउसन पढ़ावऽ हलन ।

रवीन्द्र जी के मंझला बाबू के टी॰के॰घोष एकेडेमी के हेडमास्टर से जान-पहचान हलइन । एही से उनका कहला पर आई॰एस-सी॰ कैला के बाद ओही इस्कूल में ऊ साइंस टीचर हो गेलन । बाद में ऊ अप्पन घरे बिहारशरीफ में आ गेलन आउ उहें पहाड़ीपर के इस्कूल में पढ़ावे लगलन । अइसे हलन तो ऊ साइंस के शिक्षक, बाकि इहें से उनका साहित्य जगत में आवे के रस्ता खुलल ।

पूर्णिया आउ गया में इस्कूल में मास्टरी करे के साथ-साथ रोज कइएक बैच में टिउसन पढ़ावऽ हलथिन । तइयो साइंस पढ़ावे के बावजूद उनका भासा आउ साहित्य से बहुत लगाव हलइन । भासा के बेवहार में सटीक शब्दन के चुनाव, हाजिर जवाबी आउ पसंदीदा दलील - ई उनकर भीतरी गुन हल । दोसरा में भी अगर ऊ कोई खास गुन पावऽ हलन त खुल के सराहऽ हलन ।

शुरू में रवीन्द्र जी हिन्दी कहानी आउ ऊ भी रूमानी-कथा लिखऽ हलन । सिनेमा के कुछ परभाव भी उनकर रचना पर हो जा हलइ । बाद में ऊ गुलशन नन्दा के उपन्यास पढ़ना छोड़ के अज्ञेय जी के उपन्यास 'शेखरः एक जीवनी' जइसन उपन्यास पढ़े लगलन । महान चिन्तक गुरुदत्त के उपन्यास से भी ऊ काफी परभावित होलन । सच तो ई हे कि रवीन्द्र जी धरती आउ जिनगी के सच से जुड़ गेलन हल ।

सन् १९५५ ई॰ के उत्तरार्द्ध में रवीन्द्र जी जब भिक्खु जगदीश काश्यप आउ डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के अनुरोध पर हिन्दी से मगही जगत में प्रवेश कैलन, त उनकर लिखल कहानी देखके राहुल सांकृत्यायन कहलन हल - 'रवीन्द्र जी मगही के प्रेमचन्द हथ ।'

रवीन्द्र जी 'बिहार मगही मंडल' के प्रकाशन में सम्पादक मंडल से जुड़ल रहलन आउ 'मगध संघ' के संस्थापक सचिव आउ बाद में आजीवन उपाध्यक्ष रहलन । उनकर कहानी मगही के विभिन्न पत्रिका 'मगही', 'मगही पत्रिका', 'निरंजना' आउ 'अलका मागधी' में छपते रहल । आकाशवाणी, पटना के 'मागधी' कार्यक्रम में उनकर कइएक कहानी के प्रसारण होयल । 'इंटरमीडियट गद्य-पद्य संग्रह' (मातृभासा)' आउ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी द्वारा सम्पादित संग्रह 'मागधी विधा-विविधा' में भी रवीन्द्र जी के रचना देखल जा सकऽ हे । एकरा अलावे अब तो इनकर मगही कहानी संकलन 'अजब रंग बोले' सन् २००० ई॰ में प्रकाशित हो गेल हे । एकरा में १६ गो स्तरीय कहानी संकलित हे, जे मगही भासा के गौरव बढ़ावऽ हे ।

कवि राम नरेश पाठक के ऊ बड़ भाई मानऽ हलन आउ उनकर लिखल दूगो गीत 'कारी-कारी चुनरिया पसर गेलइ राम' आउ 'उतरल अगहन के भोर इ भइया' के हरमेशा गुनगुनयते रहऽ हलन । केकरो गुन के तारीफ करे के माद्दा उनका में हल । राम नरेश पाठक आउ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी के नजर में रवीन्द्र जी एगो महान कहानीकार हलन ।

एगो छायावादी कवि कह गेलन हे -

वियोगी होगा पहल कवि, आह से उपजा होगा गान ।
उमड़ कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान ।।

रवीन्द्र जी कवि तो न हलन, बाकि जीवन भर अपार दुख झेलइत उनकर गिरे वला आँसू के परभाव उनकर कहानी पर भी गहरा असर छोड़लक हे । दरअसल ऊ शुरुए से भावुक हिरदय के बेकती हलन ।

उर्दू में एगो शेर हे -

इशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना ।
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना ।।

रवीन्द्र जी अप्पन जिनगी में जेतना दर्द आउ पीड़ा सहलन हल, से उनकर बातचीत आउ रचना में साफ नजर आवऽ हे । अकसर ऊ तलत महमूद के गावल एगो पुरान गीत गुनगुनइते रहऽ हलन -

ऐ मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया,
ढूँढ़ ले अब कोई घर नया ।

गया के अभिशप्त मकान खरीदला के बाद उनकर तेज-तर्रार डगडरी पढ़इत छोटका बेटा संजय एगो दुर्घटना में इनका छोड़ देलक । फिर इंजीनियर बनल मंझिला बेटा अजय अप्पन सउँसे परिवार के भार इनके पर छोड़ के कैंसर के शिकार हो गेल । ई दुन्नो मौत रवीन्द्र जी के जिनगी के झकझोर के रख देलक ।

आखिर में १९५७ ई॰ से ही जीवन भर साथ देवे ओली संगिनी सरोज (कमल) देवी रवीन्द्र (सुरुज) के रहते चल बसल । एतना दुख इनकर दिल बरदास्त न कर सकल । परिणाम भेल 'दिल के रोग' आउ जिनगी के खोखला करे वला 'डायबिटीज' । बीतल दुख के भुलावे ला ऊ सिगरेट पीये लगलन आउ 'चेन स्मोकर' हो गेलन । मर्ज बढ़ते गेल आउ २१ मई २००६ ई॰ के ऊ हरमेशा ला आँख मूँद लेलन । अपना पीछे रवीन्द्र जी बड़ बेटा प्रो॰ विजय के अलावे बड़हन परिवार छोड़ गेलन हे ।

जइसन कि हम शुरुए में बता चुकली हे कि रवीन्द्र जी के हमरा से बड़ी लगाव हलइन । हम्मर एगो कविता ऊ एकंगरसराय के अधिवेशन में ठुमरी में गा के तहलका मचा देलन हल । फिर पटना में हम्मर कविता संग्रह 'बाँसुरी बजते रहल' के लोकार्पण के अवसर पर संग्रह के कविता 'गुजरइत नैं रात जहाँ बूझऽ गुजरात हे' पढ़ के सुनैलन हल ।

आज कथाकार रवीन्द्र कुमार हमनी के बीच नैं हथ, तइयो उनका साथे गुजारल पल रह-रह के इयाद आवऽ हे । ऊ एगो हिन्दी फिल्मी गीत आउ ओकरा अंगरेजी में अनुवाद करके सुनावऽ हलन, त बड़ी अच्छा लगऽ हल -

एक दिल के टुकड़े हजार हुए,
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा ।

अंगरेजी अनुवाद -

वन हर्ट्स् सेवरल पिसेज़ बिकेम,
सम हिदर फ़ॉलेन सम दिदर फ़ॉलेन ।

['अलका मागधी', बरिस-१२, अंक-११, नवम्बर २००६, पृ॰ १३-१४, से साभार]

5. डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री आउ तनी इतिहासो

डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री आउ तनी इतिहासो

[डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) सम्बन्धित संस्मरण आउ 'मगध संघ' के स्थापना, बिहारशरीफ से 'मगही' पत्रिका के प्रकाशन एवं दूठो मगही महासम्मेलन (1957; 1964) के इतिहास]

लेखक - रवीन्द्र कुमार (12 नवम्बर 1933 - 21 मई 2006)

1952 में नालन्दा कॉलेज में विज्ञान के छात्र हली । हमनी बैडमिंटन खेलऽ हली । हमनी माने हम, हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, उमेश, अंजनी, कृष्ण स्वरूप आउ कत्ते ने लोग । एक दिन सबके राय होल, काहे न क्लब के एगो नाम देल जाय । विचार-विमर्श के बाद क्लब के नाम 'मगध संघ' देल गेल । खेले के अलावा ओकरा में साहित्यिक आउ सांस्कृतिक गतिविधियो के समावेश कइल गेल । हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी एक्कर संस्थापक मंत्री आउ हम (रवीन्द्र कुमार) संस्थापक संयुक्त मंत्री चुनल गेली ।

प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय के गरिमा प्राप्त करे के कोशिश कइल जा रहल हल । निदेशक पद पर भिक्षु जगदीश काश्यप हलन । काश्यप जी बौद्ध-दर्शन के अन्यतम विद्वान हलन । 1952 में बुद्ध के दर्शन आउ भारत के सन्देश लेके ऊ जापान गेलन हल । जापान के लौटे पर हमनी 'मगध संघ' के ओर से उनखर अभिनन्दन कइली हल । बिहारशरीफ हिन्दी पुस्तकालय के सामने के मैदान में एगो महती जनसभा के आयोजन कइल गेल हल । काश्यप जी बौद्ध-दर्शन के कुछ बात अप्पन भाषण में हमनी के बतउलन हल । एगो बात आउ कहलन हल ... ... बउआ, तोहनी सब खेलऽ ! पढ़ऽ ! मगर बातचीत मगहिए में करऽ ! ... मगही में बतियाय के ई पहिला सन्देश हल ।

कत्ते दिन बीत गेल । फिन एक दिनमा ठाकुर रामबालक सिंह एगो बुजुर्ग अदमी के साथ पटना से हम्मर दुआर पर अयलन । रामबालक सिंह जी से परिचय हल मगर बुजुर्ग अदमी के पहिला बार देख रहली हल । रामबालक जी परिचय देलन - ई श्रीकान्त शास्त्री हथ । मगही ला समर्पित अदमी । हिन्दी आउ संस्कृत के प्रकांड विद्वान हथ । मगही के अलख जगावे ला निकललन हे ।

शास्त्री जी कहलन हल - हम जानऽ ही तोहनी 'मगध संघ' से सम्बद्ध हऽ । मगही में बातचीत करऽ हऽ । सुनऽ ही हस्तलिखित पत्रिका निकालऽ हऽ । ओकरा में हिन्दी आउ मगहियो के रचना रहऽ हे । ई बड़ खोसी के बात हे । ... अब हमनी पटना से एगो मगही पत्रिका निकाले जा रहली हे । तोहनी के सहयोग जरूरी हे ।

हम चुप हली ।

फिन बोललन हल - जलमला होत तो बुतरू होल हे ! बुतरू होल हे ! - मगहिए के अमरित नियर वाणी तोर कान में पहिले गेलो होत । ... अपन बोली बोले में लजा हऽ काहे ? हिन्दी में लिखऽ हऽ, मगहिओ में लिखऽ ...

दुन्नू आगन्तुक ला एक-एक गिलास शर्बत बना के ले अयली । एही हल हम्मर अतिथि सत्कार । शायद सन् '55 अगस्त-सितम्बर के महिन्ना हल । बूँदा-बाँदी होइए रहल हल । उनखर निवेदन हल - प्रियदर्शी जी हीं संगे जाइके । ई हमरा ला पहिला आदेश हल ।

रस्ता भर सोंचइत जा रहली हल - मामूली खद्दर के कुर्ता-धोती में ई अदमी केतना मामूली लग रहलन हल । ओकरो में मामूली कद-काठी के अदमी । मगर रामबालक भाय कहऽ हथ - बड़का भारी विद्वान हथ । ....

उनखनी साथे हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी हीं गेली । ढेर बातचीत होल । फिन तय होल 'मगही' मगही मंडल द्वारा 'मगध संघ' के तत्त्वाधान में प्रकाशित होयत ।

मगही साहित्य के पुनर्लेखन के सिलसिला शुरू होयल । 'मगही' के पहिला अंक 1955 के नवम्बर में प्रकाशित होल । हम्मर कहानी हल - 'असमानी रंग' । तब से केत्ते ने हम्मर कहानी 'मगही' में प्रकाशित होल । 'पित्तर के पुचकारी', 'टुरवा', 'मन के पंछी', 'सब्भे स्वाहा' .... आउ केत्ते ने ।

आद पड़ऽ हे शास्त्री जी के सादगी के । कधियो रामबालक सिंह आउ कधियो अपने हम्मर डेरा लोहानीपुर, पटना आवऽ हलन । तखनी हम पटना सायंश कॉलेज के विद्यार्थी हली । शास्त्री जी के आदेश होबऽ हल - कोय स्तरीय कहानी नञ् भेटायल हे । एक सप्ताह के भीतर लिख के एगो दे दऽ । रात-रात भर जाग के एगो कहानी तइयार करऽ हली आउ दे आबऽ हली । .... हमरा मगही कहानीकार के रूप गढ़ेवाला ओही व्यक्ति हथ ।

'मगही' के प्रकाशन के पहिले हमनी भिक्षु जगदीश काश्यप जी के असिरबाद लेबे ला, नालन्दा गेली हल । काश्यप जी अपने सक्रिय समर्थन देबे ला तइयार न हलन । ऊ कहलन हल - त्रिपिटक के अनुवाद के भार, भारत सरकार द्वारा देल गेल हे । एकरा ला समय-सीमा तय हे । ...समय के अभाव में ...

हमनी उनखा निर्देशक बनके आशीर्वचन देवे ला मिनती कइली हल । मान गेलन हल । कुछ दानो-दक्षिणा देलन हल ।

फिन नालन्दा के कइ ठो भिक्षु सब से मिलली हल । कुछ भिक्षु अप्पन लेख के अंगरेजी में डिक्टेशन लेलन हल । फिन ऊ सब लेख के मगही रूपान्तर कइल गेल हल । 'मगही' में ऊ सब लेख छापल गेल हल ।

श्रीकान्त शास्त्री जी के सम्पादकीय बड़ सटीक होबऽ हल । 'एगो मस्त मगहिया' के नाम से अंगरेजी कविता के मगही कविता रूपान्तर 'मगही' में छपइत रहऽ हल । ऊ मगही एकांकी आउ कहानियो लिखइत रहऽ हलन । 'मगही' में सब प्रकाशित होयत रहऽ हल । आकाशवाणी, पटना से उनकर रचना प्रसारित होयत रहऽ हल ।

मगही भाषा के विकास ला हरसट्टे सोंचइत रहऽ हलन । सब मगहियन सब के एक ठामा जमा करे के एगो योजना बनइलन । सबसे सहयोग लेलन । एकंगरसराय में एगो बृहत् मगही सम्मेलन के आयोजन कइलन । 'बिहार मगही मंडल' आउ 'मगध संघ' के सहयोग तो हइए हल ।

6 जनवरी 1957 में ई आयोजन कइल गेल । बिहारशरीफ से हम, प्रियदर्शी, गिरीश रंजन, लल्लन, करुणेश आउ कुछ लोग गेली हल । पटना से बड़का-बड़का विद्वान जइसे डॉ॰ वी॰ पी॰ सिन्हा, डॉ॰ नर्मदेश्वर प्रसाद आउ नञ् जाने कत्ते लोग एकंगर अइलन हल । मगही के सर्वश्रेष्ठ कवि रामनरेश पाठक, रुद्र जी, रामचन्द्र शर्मा किशोर, सुरेश दूबे 'सरस' आउ नञ् जाने कत्ते लोग अयलन हल । एके मंच पर मगहियन विचारक, विद्वान, कवि, लेखक, सब जमा कर देल गेलन हल ।

खुला अधिवेशन में आचार्य बदरीनाथ वर्मा के लमहर भाषण होल हल । तखनी ऊ बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री हलन । दिन भर कार्यक्रम चलइत रहल हल । भोजन आउ ठहराव - सब एकंगर उच्च विद्यालय में । रात में कवि सम्मेलन होल हल । भोजपुरी आउ मैथिली कवियन के भी न्योतल गेल हल । ढेर रात तक कवि सम्मेलन चलइत रहल हल ।

मगही के अइसन सम्मेलन आझ तक नञ् देखली । बिहारशरीफ में मगही सम्मेलन के सफल आयोजन होल हल । मगर एकंगर वाला सम्मेलन के कोय जवाब नञ् हल । एकर श्रेय डॉ॰ शास्त्री जी के जा हे । साधारण कद-काठी, साधारण बस्तर पहिरेवाला शास्त्री जी भव्य मगही सम्मेलन के अंजाम देलन हल । 'मगही' के मगही सम्मेलन विशेषांक निकसल । पहिला पेज में भिक्षु जी जगदीश काश्यप के भरपेजी फोटो छपल हल । ओक्कर बाद कइठो पेज में मगही सम्मेलन उत्सव के फोटो हल । ओकर बाद देखऽ ही एगो भर पेजी फोटो हमरो छपल हे । फोटो के निच्चे छप्पल हे - मगही रथ के सारथी - श्री रवीन्द्र कुमार । अप्पन फोटो देख के मन पुलकित हो गेल । आँख से लोर चूए लगल । सोंचे लगली - हम का एत्ते कयली हे जे हमरा एतना प्रतिष्ठा देल गेल ।

राहुल सांकृत्यायन जी 'हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास' लिख रहलन हल । ई कई भाग में बाँटल हल । एक्कर सोलहवाँ भाग लोकभाषा के हल । छपे पर ई अंक में मगही कहानीकार के रूप में एक अवतरण हाल हल । हम्मर कहानियो के समीक्षा हल । ... रवीन्द्र कुमार इतिहासिक पुरुष हो गेलन । .... हम जानऽ ही ई सब के कइलन ? डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री जी; आउ के ।
उनखर स्नेह आउ आशीर्वाद हम पयली; जिनगी भर नञ् भूल सकम ।

ऊ पारस हला । जे-जे उनखा से सटल, सब सोना हो गेलन । पीएच॰डी॰, डी॰लिट् सब उपाधि से विभूषित हो गेलन ।

पूर्णियाँ जिला स्कूल में हली । अखबार में उनकर निधन के समाचार पढ़ली । आँख बार-बार लोर से डबडबा उठऽ हल । उनखा हम्मर शत-शत प्रणाम !

['मगही पत्रिका', अंक-7, जुलाई 2002, पृ॰ 14-15; सम्पादकः धनंजय श्रोत्रिय]

Sunday, March 08, 2009

4. तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते

तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते

[डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) सम्बन्धित संस्मरण ]

लेखक - तारकेश्वर भारती (30 सितम्बर 1925 - 1996 (?))

हम 'मगही' में न 'नैनाकाजर' कहानी लिखतूँ हल न डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री जी से हम्मर जान-पहचान होत हल । बात ई हल कि शास्त्री जी के दउड़-धूप कैला से एकंगरसराय में एगो मगही सम्मेलन (6 जनवरी 1957) बोलावल गेल । डॉ॰ शिवनन्दन प्रसाद हम्मर लँगोटिया इयार हथ । ऊ शास्त्री जी से हमरा बारे में का बतिऔलन कि मगही सम्मेलन में सामिल होबे ला हमरो नेवता मिलल । गया से एकंगर पहुँचलूँ । शास्त्री जी हमरा करेजा से लगा लेलन । डॉ॰ संपत्ति अर्याणी उहँई खड़ा हलन । ऊ शास्त्री जी से पुछलन कि ई के हथ ? जवाब मिलल - 'मगही' में 'नैनाकाजर' कहानी अपने पढ़ली हे न ? ऊ कहानी के लेखक भारती जी ईहे हथ । ऊ कहानी पढ़े से बिसवास होबे हे कि मगही में भी समर्थ कहानी सफलता के साथ लिखल जा सके हे । हम झेप गेलूँ । अदना लेखक के ऐसन तारीफ शास्त्री जी के स्नेह कहल जा सके हे आउ का ? बाद में ऊ हम्मर परिचय कत्ते विद्वान से करैलन आउर परिचय के माध्यम हल वही 'नैनाकाजर' उहाँ हम देखलूँ कि ऊ सम्मेलन के कर्ता, धर्ता, विधाता शास्त्रीए जी हथ । शास्त्री जी सगरो नाचल चलथ । छोट-छोट बात के धेयान रखथ । उहाँ मगही भायचारा के गंगा बहा देलन शास्त्री जी । एतना उमंग, एतना लगन, एतना खेयाल - बात अप्पन बेटा-बेटी के बिआह में भी साइते कोय रखे हे । खाय-पीये में, मिले-जुले में, बैठे-उठे में भी उहाँ मगहिए बोलल जा हल । ऐसन बुझा हल कि हिन्दी के बनवास दे देल गेल हे ।

हम्मर कार्यक्षेत्र गया रहल, लेकिन शास्त्री जी के तो समूचे बिहार हो गेल हल इया ई कहल जाय कि मगही संसार हल । ई गुने हमरा-उनका बीच में मुलकात कोय दस बरिस तक न होल । अखबार से उनकर मगही आन्दोलन के जानकारी मिलते रहल ।

हम गया छोड़ के दहपर ऐलूँ । पटना में आ रहलूँ हल । एकंगर उतरलूँ कोय काम से । शास्त्री जी देख लेलन ! जा रहलूँ हल कि गला फाड़ के पुकारलन । देखऽ ही तो शास्त्री जी ! गले-गले मिललन । हाल-चाल पूछलन । फिर हाथ पकड़ले-पकड़ले हलवाई के दुकान पर बैठा देलन । दुनूँ भाय डट के पूड़ी-मिठाय खैलूँ; पान भी खिलौलन । तब पुछलन, अच्छा ई तो बतावऽ, एकंगर कइसे ऐला ? हम बतौली कि अब हम गया न रहऽ ही, दहपर हाई स्कूल में हेडमास्टर ही । सुनते हुलस गेलन । हेडमास्टर ही ई सुन के न । ई गुने कि हम्मर इलाका में आ गेला हे, तो मिलजुल के मगही के कुछ काम करम । बतौलन कि एजो 'मगध शोध संस्थान' नाम के संस्था खोले के विचार हे आउर एकरा में अपने के सहयोग देबे पड़त । हम कहली कि अपने के आग्याँ पर हम जहाँ कहब उहाँ हाजिर होम ।

कैक महीना बाद 'मगध शोध संस्थान' के गठन ला नालन्दा में भिक्षु जगदीश काश्यप के सभापतित्व में एगो बड़गो बैठक बुलावल गेल । ओकरा में भारत सरकार के उपमंत्री प्रो॰ सिद्धेश्वर प्रसाद, नालन्दा पालि इंस्टीच्यूट के आधा दर्जन प्राध्यापक, डॉ॰ सरयू प्रसाद, प्रो॰ मौआर इत्यादि भी सरीक होलन हल । हम देखली कि सब कोय शास्त्री जी के आदर करऽ हलन । आदर न, लेहाज कहल जाय तो जादा सही होत । वहाँ शास्त्री जी संस्थान के जरूरत पर जे भाषण कैलन ओकरा से साफ झलकऽ हल कि मगही के सम्हारे ला केतना उमतायल हलन, केतना बेदम हलन आउर मगही में शोध कार्य करे के समय आ गेल हे एकरा केतना साफ-साफ देखऽ हलन । संस्थान गठित हो गेल तो ऐसन नितरैलन जैसे कि उनका दौलत मिल गेल । हमरा ताजुब बुझाल कि मगही के नाम पर हिन्दी-सेवी विद्वान के भी ऊ जुटा लेलन । उनकर मीठा तर्क के सामने आदमी झुक जा हल ।

शास्त्री जी संस्थान के कार्यक्रम तैयार करके एगो बैठक में लैलन तब हम उनकर सूझ आउर कल्पना-शक्ति के कायल हो गेलूँ । लगल कि एतना दिन तक ऊ मगही आउर शोधे पर सोचते रहलन हल आउर कुछ पर न । लेकिन, परोगराम एतना बोझिल हल कि हमनी सब के ऊ व्यवहारिक न लगल । तब शास्त्री जी ऊ परोगराम के एक गुटका संस्करण भी आगे बढ़ौलन । ओकरे ले के काम आगे बढ़ावे के विचार तय होल । संस्थान के काम पर संशय पैदा होबऽ हल तब शास्त्री जी ओकरा आनन-फानन दूर कर दे हलन । लगऽ हल कि समस्या के समाधान ला हमनी के माथापच्ची करे पड़ऽ हल आउर ऊ समाधान रेडीमेड रखले रहऽ हलन ।

'शोध' पत्रिका के प्रकाशन के सफलता पर हमरा सन्देह हल । भाय सरयू बाबू भी एकरा बड़ा कठिन काम समझऽ हलन । लेकिन शास्त्री जी अप्पन व्यथा में पहले अँटौले रहऽ हलन कि काम कब-कैसे होत आउर घबड़ाहट न देखाबऽ हलन । उनकर वाणी में ऐसन प्रेरणा बसऽ हल कि अलसाय आउर कदराय में केकरो बनवे न करऽ हल ।

मगही वर्तनी आउर मगही भाषा के विस्तार आउर क्षमता पर ऐसे तो कैक बैठक में बोलऽ हलन लेकिन संस्थान के राजगीर अधिवेशन में ऊ विषय पर उनकर भाषण बहुत सारगर्भित आउर महत्त्वपूर्ण समझल गेल । उनके व्यक्तित्व के जादू हल कि ऊ अधिवेशन में मिनिस्टर भी पधारलन आउर भाषा आउर साहित्य के भारी-भरकम विद्वान भी । ऊ अधिवेशन तरुण जी के आर्थिक सहयोग से सफल हो सकल, लेकिन संघटनकर्ता तो शास्त्री जी ही हलन । उनका में आदमी के पहचाने के विशेष शक्ति हल, ई माने पड़े हे । केकरा से कौन काम हो सके हे, ई उनका बारीकी से पता हल । काम कराबे के ढंग उनकर अद्भुत हल । पहले प्रेरणा दे के पीछे हट जा हलन । आगे बढ़ते देख के पीछे-पीछे चले लगऽ हलन । आगे बढ़ऽ हियो, चलल आबऽ पीछे-पीछे - ई उनका पसंद न हल । उनका नेतागिरी के सौख न हल, लेकिन उनका में गुने ऐसन हल कि उनका नेता मान के चले पड़ऽ हल ।

शास्त्री जी से हमरा अन्तिम भेंट अप्पन विद्यालय के साहित्यिक आयोजन के समय पर होल । उनका निमंत्रण देली हल तुलसी शतवार्षिकी में अध्यक्षता करे ला । ऐलन; उनकर स्वागत कैली । उदास देखली तो हाल-चाल पुछली । तोतरा के बोललन कि हमरा लकवा मार देलको ह । बोल न सकियो, लेकिन तोहर आदेस पर नै कैसे ऐतूँ हल । हाजिर हो गेलियो । हम्मर दिल बैठ गेल, उनकर हालत देख के । उनका सभापति के आसन पर बइठौली आउर अपने कार्य-संचालन कैली । सभापति के हैसियत से कुछ बोल न सकलन । अप्पन आदमी पर एतना खेयाल, एतना नेह बिरला आदमी रखऽ हथ । ऊ औसर पर विद्यालय परिवार से एक भारी चूक हो गेल हल ओक्कर मलाल जिनगी भर रहत । रात के विद्वान, कवि, लेखक आउर आमंत्रित सज्जन भोजन कैलन । होस न रहल कि शास्त्री जी न बैठलन । सुबह पता चलल कि शास्त्री जी न खैलन काहे कि उनका डालडा से परहेज हे, अप्पन तन्दुरुस्ती के खयाल से । एतना सरमिंदा हो गेली कि बरनन न कर सकऽ ही । शास्त्री जी भी काहे न कहलन कि हमरा वास्ते दू ठो सुखल रोटी बनवा द । छेमा माँगली तब मुसका के बोललन - का हरज होल ? न खइली । सोचली कि उपास रह गेला से अच्छे होत । पेट सुद्ध हो जात । ऐसन सज्जनता पर प्राण न्योछावर !! अप्पन डेरा में ले जा के दूध-रोटी खिलौली । प्रेम से खैलन । न सिकवा न सिकायत । क्षमाशीलता के अजगुत मिसाल । चले लगलन तो झिझक के गाड़ी भाड़ा बढ़ौली । हम्मर हाथ मोड़ के कहलन - भाय भारती जी, अपना में ई सब न चले हे । हम बोलाबी तू चल आबऽ, तूँ बोलैला हम चल ऐलियो - गाड़ी भाड़ा का ?

बात तो मामूली लगे हे, लेकिन मामूली घटना से ही तो आदमी के बड़प्पन और इन्सानियत के पहचान होबे हे । शास्त्री जी बहुत मिलनसार हलन । आउर मिलनसार वही हो सके हे, जेकरा में घमंड न रहे । विचार आउर रहन-सहन आउर पहनावा में बहुत सादा हलन । कभी-कभी कपड़ा फटल-चिटल आउर मइल भी पहिनले उनका देखलूँ हल । कपड़ा-लत्ता के बारे में थोड़ा लापरवाह हलन । सोचऽ हलन, हमरा देखाबे के हे ? जैसन ही तैसन सही । एकरो में लोग शास्त्री जी के चीन्हिये ले हथ तो आउर का चाही ? आदमी गोरा-चिट्टा हलन आउर देह भारी-भारी । उमर निढाल, पर तो भी होठ लाल-लाल । आँख में नेह-कातरता साफ झलकऽ हलन । भौं घना । कुल मिला के व्यक्तित्व प्रभावशाली हलन ।

उठ गेला तो लगे हे मगही के जीवनदानी चल गेला । मगही माता के गोदी आज सूना-सूना लगे हे ।

['बिहान', दिसम्बर 1973; 'मगही पत्रिका', अंक-7, जुलाई 2002, पृ॰ 12-13; सम्पादकः धनंजय श्रोत्रिय]

Friday, March 06, 2009

3. कहवाँ से हंसा आयल

कहवाँ से हंसा आयल

(डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री सम्बन्धित संस्मरण)

लेखक - अरुण कुमार सिन्हा (जन्मः 17 जनवरी 1935)

14 मई 1952 के हमर बिआह बिहारशरीफ के भैंसासुर मोहल्ला में होल त हम जानली कि हमउमरिया साँवर वरन के जे जुवक हथ, हम्मर सार हथ, नाँव हे रवीन्द्र कुमार; विग्यान के छात्र हो के भी एत्ता भावुक हथ कि भासा के शब्द पर उनकरा कमांड हासिल हे । लिखा-पढ़ी में हमरो सुरुए से रुचि हल । ई गुने सुभाविक हल कि हमन्हीं दुनहुँ के बीच काफी बने लगल । अइसे त रवीन्द्र जी के बहुत्ते दोस्त हलन बाकि एगो दोस्त हलन आउ अभियो हथ - हरिश्चन्दर जी जिनकर नाँव 'कवि जी' पड़ गेल हल । रवीन्द्र जी आउ हरिश्चन्दर जी में उठा-पटक छोड़ के सब हो जा हल । तेज तर्रार रवीन्द्र जी के आगू हरिश्चन्दर जी तर्क करे में मात खा जा हला ।

बिहारशरीफ के कुमार टॉकीज के पास के चाय के दुकान पर रवीन्द्र एवं पार्टी के जमावड़ा यादगार स्वरूप बन गेल हल । बहस-मोहाबिसा, कविता-वाचन, गीत-गायन के रोज-रोज सिलसिला देख के दुकानदार ऊब के वरदास करऽ हल, ई गुने कि पार्टी के सदस्य बढ़े से ओकर चाय के बिक्रियो बढ़ते जा हल ।

1956 के ऊ दिन हम ससुरारे में हली जब कि हरिश्चन्दर जी सुबहे-सुबह भाग के केबाड़ी थपथपा के पुकरलका - 'रवीन्दर ! रवीन्दर !' खिड़की से झाँक के देखली त हरिश्चन्दर जी एगो हमन्हीं से बड़ उमर के जुबक के साथ बहिरसी ठड़ी हथ । हम उठ के बाहर जा के दरवाजा खोल देली । हमरा देख के हरिश्चन्दर जी पूछलका - "रवीन्दर हथ ?" उत्तर में हामी भर देली हम । हरिश्चन्दर जी कहलका - "कह दऽ उनका कि डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री अइलन हे ।"

रवीन्द्र जी ऊ समय मुँह धो रहलन हल । हम जा के उनका हरिश्चन्दर जी के संवाद सुनइली त ऊ तुरन्ते जल्दी-जल्दी कुल्ला-गरारा कर के बाहर अयलन । हमहूँ बाहर इँकसली । डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री से प्रणाम-पाती होल । उनका से दूरा पर बिछल चौकी पर बैठे ला रवीन्द्र जी अनुरोध कैलका त शास्त्री जी कहे लगला - "भाई, भिक्खु जगदीश काश्यप जी से मिल के आ रहली हे । अपने के मालूम हे कि एकंगरसराय में मगही सम्मेलन होवे ला जा रहल हे । अपने सभ जरूर आयब । रवीन्द्र जी अपने से हमरा बड़ उम्मीद हे । प्रियदर्शी जी से अपने के काफी तारीफ हम सुनली हे । हिन्दी में तोहर लिखल कहानी देख-सुन के काफी खुशी होवऽ हे हमरा बाकि ओकरा से जादे खुशी हमरा तब होत जब मगही माय ला कहानी तों लिखे लगबऽ । जलमल होवऽ त लोग थारी बजइलको होत आउ 'नुनू-बाबू' शब्द जे हे मगही के ओही कान में पड़लो होत । दिल से इँकसल शबद कैसन मिठगर आउ अपनापन लेल होवऽ हे, ई कवि आउ कहानीकार जरूरे महसूस करे हे । एकरा बिसरिहऽ नञ् - येही हमर अपने से अनुरोध हे । फिर कल भेंट होत । अभी सभे के नेओते के हे, बड़ जबरदस्त काम हे, ई आदमी जुटाबे के । अप्पन रचना कविता-कहानी सम्मेलन में अइहऽ त लेले अइहऽ । 'मगही' पत्रिका भी इँउस रहल हे, एकरा ला भी रचना भेजिहऽ ।"

कह के ऊ धोती-कुरता ओला सज्जन (डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री) चमरखानी चप्पल घसीटते चल गेला । बाकि हमन्हीं पर एक छाप दे के । छाप की देलका, रात भर नींद नञ् आल । सुबह में मगही भासा में दूगो कविता रच लेली त खर्राटा ले के सो गेली ।

नौ बजे दिन में जगली त रवीन्द्र जी के दुनहूँ रचना सुनइली । 'किन-किन बोलइ कंगनवाँ' त उनका एतना भा गेल कि ऊ ठान लेलका कि ओकरा ऊ सम्मेलन में जरूरे सुनइतन । हम उनका ऊ रचना दे देली (सम्मेलन के बाद रवीन्द्र जी बतइलका कि 'किन-किन बोलइ कंगनवाँ' के लोग बढ़िया मान के सराहलन) आउ दोसरका रचना 'तोरा हम नञ् भुलइबो हे' के डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के पास भेज देली जे 'मगही' वर्ष-1, अंक-11 के सितम्बर 1956 में छपल । पुरैनियाँ जिला में अच्छा पद पर बहाली से मगही छेत्तर से सम्पर्क टूट गेल पर हम्मर लेखनी रुकल नञ् । हम मगहिये में जादे लिखऽ ही ई त डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के प्रेरणा हे । ऊ हम्मर बीच शारीरिक रूप से नञ् रह के भी मगही के पुरोधा बनल हथ । उनका शत-शत नमस्कार हे ।

["मगही पत्रिका", अंक-7, जुलाई 2002, पृष्ठ 20; सम्पादकः धनंजय श्रोत्रिय]

नोटः रवीन्द्र कुमार (12 नवम्बर 1933 - 21 मई 2006)

Thursday, March 05, 2009

2. कृष्णदेव बाबू से भेंट

कृष्णदेव बाबू से भेंट

लेखक - डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (8 फरवरी 1923 - 29 जून 1973)

एकंगरसराय उच्च विद्यालय के प्रधान बैजू बाबू कहलन - पटना के कृष्णदेव बाबू हिआँ बहुत्ते मगही गीत हे । ऊ मगही में खुब्बे खोज कइलन हे । फिन की हल, पटना जा के उनखा से मिले के बात मन में ठान लेली ।

पटना गेली आउ केत्ते ने साहित्यिक लोग से मिलली । पटना कालेजियट में कवि रामगोपाल शर्मा 'रुद्र' मिललन । ओहू कृष्णदेव बाबू के नाम लेलन । सोंचली, साँझ के मिली तो ठीक रहत । बिड़ला मन्दिर, सब्जीबाग में ठहरल हली । अनचोक्के कलकत्ता के हिन्दी दैनिक 'सन्मार्ग' के सम्पादक पंडित त्रिगुणानन्द से भेंट हो गेल । कहियो ऊ पटना के दैनिक 'आर्यावर्त' में हलन । आज ऊ कलकत्ता जा रहलन हल । 'आर्यावर्त' के उप-सम्पादक श्री रघुनन्दन प्रसाद जी हम्मर पटना आवे के बात ऊ सुनलन आउ अनचोक्के होल ई मुलाकात के ऊ बड़ खुसी के रूप में लेलन । ओहू कृष्णदेव बाबू के नाम बड़ आदर से लेलन । हम दून्नू लंगरटोली तक अइली । पंडित जी के तुरतम्मे टीसन जाय के हल । ऊ ओन्ने गेलन आउ हम कृष्णदेव बाबू दन्ने । एगो हम्मर जानल-पहचानल छात्र उनखर मकान के पता बता देलक ।

पहिले तो हम हिचकिचइली । पीछू कइगो सीढ़ी पार करे पर हम देखली - एगो दीप्तिपूर्ण व्यक्तित्व । इंडियन नेशन के पन्ना में भुलायल कइसन हल ऊ व्यक्तित्व ! नयापन आउ पुरानापन के एगो अजगुत सम्मिश्रण । 'की एही कृष्णदेव बाबू हथ ?' मने-मन सोंचली । हम्मर पैर के अवाज उनखा हमरा दने ताके ला बाध्य कर देलक । हम्मर सक सवाल के रूप धारन कइलक तो जवाब मिलल 'हाँ' । हम सरधा से नत हो के ओहीं पर बिच्छल कुरसी पर बइठ गेली ।

"तूँ के हऽ ? कन्ने चललऽ हऽ ?" ई हल कृष्णदेव बाबू के सवाल । हम की जवाब देती होत ! मगर जवाब तो देवहीं के हल । देली । लड़खड़ायत अवाजो में सफलतापूर्वक जवाब देली । उनखा भिजुन आवे के गरज बतयली । तनी देर खातिर ऊ हमरा दन्ने गम्भीर हो के ताकते रहलन । हम्मर बात सुनते रहलन । किन्तु छन भर लगी मौन हो गेलन । हम सोंचली, हम भटक के कउनो दोसर कृष्णदेव बाबू हीं तो न चल अइली ।

ऊ चुपचाप उठलन आउ तनिक्के देर में कइठो ड्राइंग कौपी ले अइलन । सायत उप्पर लिखल हल - मगही गीत । हम सोंचली हल कि ऊ लोक-गीत के संग्रह कइलन होत । मगर अइसन बात न हल । ऊ एगो कौपी बढ़ावइत कहलन - 'भिन्नरुचिर्हि लोकः' एही गुने हम्मर गीत तोरा पसिन पड़तो कि न, हम न जानऽ ही; तइयो ले लऽ आउ देख लऽ, हिन्दी आउ मगही लगी हम्मर की बिचार हे ।

ऊ गीत खालिस मगही भासा में हल । छन्द 'दंडक' हल । गीत में मगही, हिन्दी के अप्पन सहोदर बता के, दुन्नू के हिल-मिल के रहे ला उपदेस देलक हल । गीत लमहर होवहूँ पर हल बड़ लहरेदार । हम सौंसे गीत पढ़ गेली । ई जान के हमरा बड़ा संतोख होल कि ई ओही कृष्णदेव प्रसाद हथ जिनखर 'जगउनी' आउ 'चाँद' नाम के दूगो मगही गीत पटना विश्वविद्यालय द्वारा संकलित प्रवेशिका हिन्दी पद्य-संग्रह में मौजूद हे । गीत में भाव अपूर्व हल । मगर भासा खालिस मगही हल ।

ऊ बतउलन - हम एकरा में के जादेतर गीत के आझ से बीस बच्छर पहिले लिखली हल । ई सब मगही के रचइत देख के कुछ इयार-दोस सब हम्मर हँसी उड़ावऽ हलन । बाकि हम्मर तो पक्का बिस्वास रहल हे कि इनखरो समय आवे के हे ।

एही सिलसिला में ऊ आगे बतउलन - जउन बखत तक महात्मा गाँधी चरखा के नामो न लेलन हल, ऊ बखत हम चरखा पर मगही गीत लिखली हल । मगह में बहुत सन्त, महात्मा, कवि, कलाकार होलन हे । ओनहनीं के मगही गीत सउँसे मगही छेत्र में गावल जा हे । छपलो मगही साहित्य भेंटा हे । मगही के खालिस रूप नालन्दा अंचल के गाँव में भेंटा हे ।

कृष्णदेव बाबू मगही पर जे खोज के काम कइलन हे, ऊ मगही खातिर अनमोल हे । हम जइसहीं ऊ सब के चरचा कइली, ऊ कहलन - ई सब गीत के उपयोग तूँ जइसे चाहऽ, करऽ । बाकि रहलो देखे के बात । आझ-कल हम खाली ओकील रह गेली हे, ए गुने जो कउनो छुट्टी-छपाटी के दिन आवऽ तब हम सब चीज तोहरा देखइयो । बाद में जइसन तोहर मन अइतो ओइसने करिहऽ ।

मगही के ऊ पाँच भाग में बाँटऽ हथ । मगही के व्याकरनी के सम्बन्ध में ऊ काफी छानबीन कइलन हे । एगो सुसिच्छित सुसंस्कृत व्यक्तित्व में मगही के एते बड़गो छाप देख के हमरा तो बड़ अचम्भा होल । मगर ऊ बतउलन कि मगही उनखर मातृभाषा हे आउ हिन्दी राष्ट्रभाषा । अइसहीं, ऊ संस्कृत के पितृभाषा मानऽ हथ । उपनिषद् के अनेक श्लोक के ऊ मगही में भावानुवाद कइलन हल जे देखे आउ गुने लायक हे । ऊ कहलन, हमरा हीं बियाह-सादी में जे गीत गावल जा हे, सब सहरी भाषा में न रह के खालिस मगहिए में रहऽ हे । इ सब लगी हम्मर खास हिदायत भी रहऽ हे ।

हम न तो निराला से मिल रहली हल आउ न बर्नाड शॉ से । तइयो हमरा एगो मगही-सेवी मगही कवि से मिल के एत्ते आत्म-संतोख होल जेत्ते कउनो यथार्थ सरस्वती-पुत्र से मिल के कउनो साहित्यिक जीव के हो सकऽ हे ।

[इंटरमीडिएट मगही गद्य-पद्य संग्रह; "मगही पत्रिका", अंक-7, जुलाई 2002, पृष्ठ 38-39]

7. मगही के मानक रूप के पक्षधरः डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री

मगही के मानक रूप के पक्षधरः डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री

लेखक - डॉ॰ स्वर्णकिरण (जन्मः 16-3-1934)

["मगही पत्रिका", अंक 7, जुलाई 2002, में पृ॰ 21-22, 40 पर छपल मूल लेख के चुनिन्दा अंश]

'तीन कोस पर पानी बदले सात कोस पर बानी' याने तीन कोस पर पानी बदल जा हे, सात कोस पर बोली बदल जाहे । गया-पटना में "हम जाइत ही", नालन्दा (10 नवम्बर 1972 में पटना जिला से कट के बनल जिला) में "हम जा ही", कहूँ "ऊ जा हथुन", "ऊ जा हथिन"; कहूँ "ऊ जा हथ" । कहे के मतलब ई कि मगही बोली आउ भाषा में एकरूपता न हे - कउनो लोकभाषा के साथ ईहे कहल जात ।

श्रीकान्त शास्त्री के जनम नालन्दा जिला (पहिले के पटना जिला के नारायणपुर गाँव, इस्लामपुर थाना) में भेल हल बाकि एन्ने-ओन्ने जाये से मगही के अनेकरूपता के दूर करे ला इनका में छटपटाहट के भाव शुरू से ही देखे के आवऽ हे । ई पाँतियन के लेखक के डेरा पर एक बेर ई मगही भाषा दने प्रेम जगावे ला लगभग तीस बरिस पहिले ऐलन हल - इहे ई पाँतियन के लेखक के साथ इनकर पहिला साक्षात्कार कहल जाएत ।

ई पाँतियन के लेखक श्रीकान्त शास्त्री के नाम सुनले हल; मगही विद्यापीठ, बिहार मगही मंडल के साथ इनकर जुड़ाव हल आउ ई मगही के उन्नति, प्रगति आउ विकास ला सब कुछ देवे ले तैयार हलन - एकर आभास हल । ई पाँतियन के लेखक के जीविका के साधन हिन्दी रहल हे; ई से मगही भाषा दने कउनो खिंचाव न हल; फिन मगही भाषा के तरह-तरह के रूप के देख के वितृष्णा भी हल - "कहो हथिन", "कहो हथुन" (टाल क्षेत्र के मगही), "कहऽ हखिन", "कहऽ हीवऽ" (जल्ला क्षेत्र के मगही"), "कहऽ हियो" (पूर्वी पटना के मगही), "कहित हियो" (पश्चमी पटना के मगही), "कहइत ही" (गया के मगही), "कहऽ ही" (नालन्दा के मगही), वगैरह ।

श्रीकान्त शास्त्री के स्वागत-सत्कार कर के, हम बैठवली - मगही भाषा पर बातचीत चलल । मगही के प्रति एतना समर्पन भाव आउ एतना गहिर अध्ययन के पता न हल । शास्त्री जी मिठगर भाषा के बारे में बतलौलन - मगही भाषा आउ साहित्य के मर्मी विद्वान् कृष्णदेव प्रसाद के हवाला देलन कि मगही के ढेर विस्तार हे ।

आदर्श मगही - गया जिला में बोलल जा हे ।

शुद्ध मगही - राजगीर से ले के बिहारशरीफ के उत्तर चार कोस वेना स्टेशन तक आउ पटना जिला के कुछ दोसर-दोसर हिस्सन में बोलल जा हे ।

टलहा मगही - पूरा मोकामा, बड़हिया थाना, बाढ़ सबडिविजन के गंगा के ई पार के कुछ पूर्वी भाग, लक्खीसराय थाना के कुछ उत्तर भाग, गिद्धौर आउ पूरब में (?) फतुहाँ तक बोलल जा हे ।

सोनतटिया मगही - áसोन के किनारे किनार पटना आउ गया में बोलल जा हे ।

जंगली मगही - राजगीर, गया आउ छोटानागपुर के जंगल में बोलल जा हे ।

पुरान पटना जिला के भीतर भी पाँच भाग देखे में आवऽ हे । उत्तर में टाल, तरियानी आउ जल्ला तीन भाग, दक्खिन में पूर्वी पटना आउ पच्छिमी पटना दू भाग ।

टाल क्षेत्र - बख्तियारपुर, बाढ़ आउ मोकामा

जल्ला क्षेत्र - पटना शहर, पुनपुन आउ फतुहा

तरियानी क्षेत्र - दानापुर, मनेर आउ बिहटा

पूर्वी पटना - तेल्हाड़ा, एकंगरसराय, बिहारशरीफ, नालन्दा, राजगीर, इस्लामपुर आउ सिलाव

पच्छिमी पटना - नौबतपुर, विक्रम, मसौढ़ी आउ पालीगंज ।

श्रीकान्त शास्त्री के बतलौला से मगही क्षेत्र के पूरा नक्शा ई पाँतियन के लेखक के सामने आ गेल । मूल रूप से आरा के निवासी होला के कारन भोजपुरी भाषा-भाषी भेला से, ओकरा भीतर हिचक जरूर भेल बाकि लोकभाषा दने प्रेम जगल आउ संकल्प ले लेलक कि मगही के भी सीखे के चाही ।

मगही भाषा भोजपुरी भाषा के समान लठ्ठमार भाषा न हे, मिठगर भाषा हे आउ ढेर मनी शब्द मिलइत-जुलइत हे । हिन्दी भाषा के बीच मगही के शब्द के प्रयोग से आकर्षन आयत ऐसन धारना बँधल । कुछ दिन मगही के पत्र-पत्रिका आउ छोट-छोट किताब पढ़ के ढेर मनी शब्द संगृहीत हो गेल - इन्नर (इन्द्र), गिरही (गृह), थेथर, पहुँचा, इम्हक, कूँची, सुतरी, बुतरू, लइका (लड़का के अर्थ में), बाबू (गया जिला में लड़का के खातिर प्रयुक्त), इंजोरिया, बदरकट्टू (बदरी फटने पर), हरसट्टे (हमेशा) वगैरह । श्रीकान्त शास्त्री के ई श्रेय मिले के चाही कि ई पाँतियन के लेखक के झुकाव मगही दने भेल आउ बाद में चल के मगही में रचना करे लगल । अब तो कई-एक ठो किताब भी मगही में छप गेल हे ।

1. भिक्षु जगदीश काश्यप

भिक्षु जगदीश काश्यप (1909 - 28 जनवरी 1976)

लेखक - श्री तारकेश्वर भारती (30 सितम्बर 1925 - 1996 (?))

नवनालन्दा महाविहार के उद्घाटन राष्ट्रपति कइलन हल । ऊ बखत हम गया में काम करऽ हली । अखबार में विवरण पढ़ली तो भारी खुशी होल । बस, बस पकड़ के राजगीर होते हुए पहुँच गेली नवनालन्दा महाविहार के परिसर में । उहाँ पहुँचला पर ऊँचा-ऊँचा भवन जैसे विहँस के हमरा पास बुलावे लगल । दाहिना तरफ विशाल जलाशय पछिया हवा से तरंगाइत हो के प्राचीन नालन्दा के अड़ोस-पड़ोस के अनगिनत सरोवर के याद दिलावे लगल । भवन के आँगन के लता-गुल्म आउ बिहँसइत फूल के कियारी मन मोह रहल हल ।

फाटक के भीतर घुसलिअइ तो चमन में चहलकदमी करइत एगो भिक्षु दिखाय पड़लन । गदराल देह, कद साधारण, माथा बेलमुंड, पीला कपड़ा पहिरले । हम जरा ठिठक गेली तब हमरा तरफ मुखातिब हो के पूछलन - "आ जा, किनको से मुलकात करे के हो ?"
"जी, भिक्षु काश्यप जी से ।" हम ऊ व्यक्ति के नीचे से ऊपर तक गौर से देख के महसूस कैलूँ, हो न हो एही भिक्षु जी हथ, बाकी मगही में बोललथिन एही गुने चकरा गेली ।
"तो आबऽ, हरियर घाँसे पर बैठ के बतियावल जाय" - एतना बोल के ऊ अपने पालथी मार के बैठ गेलन आउ हमरा पकड़ के बगल में बैठा लेलन । एतबड़गो अदमी के बराबरी में बैठे के साहस हम नञ बटोर सकली, घसक के आमने-सामने बैठ गेली ।

“अपने कहाँ से आ रहली हे ? अपने के नाम ?” - बोली में मानो मिसरी घोर के बोललन । अभी तलुक हम उनखा परनामो-पाती नञ कर सकलियइ हल । होसे नञ रहलइ । उनखर चरण छू के हम जवाब देलूँ - "आ तो रहली हे ई बखत राजगीर से, लेकिन रहना होवे हे गया में । नाम तारकेश्वर भारती हे ।" हम चरण तो एकाएक छू लेली हल, लगल कि ऊ केकरो से चरण छुआना पसन्द नञ करऽ हथिन ।
"तो कुछ कहल जाय, कन्ने चलली हे ?" - ऊ बोललन ।
"जी, अपने के दर्शन के चाह हमरा यहाँ खींच लइलक हे । दर्शन पा के कृतार्थ हो गेली ।"
उनखर गोल-गोल आँख भीतर के बात परखे में माहिर हलइ । बोललन - "ऊपरी बात छोड़ल जाय । काम के बात कहल जाय ।"
अब हम समझ गेली कि जादे आडम्बरपूर्ण शिष्टाचार उनखा नञ सोहा हे । ई वजह से सम्हल के निवेदन कइली - "नवनालन्दा महाविहार के स्थापना के उद्देश्य, कार्यक्रम, शिक्षण-विषय आउ ओक्कर स्तर के जानकारी चाहऽ ही ।"
उनखर चेहरा पर प्रसन्नता के रेखा उभर आल आउ मीठा-मीठा आउ धीरे-धीरे बोल के ऊ सब बात बता देलन । हम चले के इजाजत माँगली तो फाटक तक आ के बिदा कइलन । नवनालन्दा के पुरोधा, जगत विख्यात बौद्ध विद्वान एतना सरल, एतना अभिमानशून्य ! किमाश्चर्यम् इतः परम् ?

साहित्य-सेवा सायते रोटी जुटावे हे साहित्यकार ला । बाकी ई रोग के रोगी चंगा नञ होवे हे । कुसंगत से ई रोग हमरो लग गेल हल । गया में साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक गतिविधि से जुड़ल रहली । डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के मौन-मुखर प्रेरणा से मगही में भी लिखे के हबस होल । 'नैना काजर' कहानी १९५६ में 'मगही' पत्रिका में छपल, जेकर सम्पादन-निर्देशक काश्यप जी तथा सम्पादक डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री आउ ठाकुर रामबालक सिंह हलन । मगहिया लोग ऊ कहानी के जरूरत से जादे सराहलन । हमरा छटपटी समाल कि नालन्दा के इर्द-गिर्द कउनो स्कूल में आ जैती हल तो मगही में जम के कुछ काम करतूँ हल । मनोरथ पूरो हो गेल । उच्च विद्यालय दहपर-सरगाँव (पटना - अब नालन्दा) में प्रधानाध्यापक हो के चल अइली । मगही में कामे करे के, आउ काश्यप जी से सरोकार बढ़ावे के, मौका मिल गेल ।

काश्यप जी सच्चा मानी में मगध के नया सांस्कृतिक जागरण के पुरोधा आउ मगही के महान उन्नायक हलन । आजादी के ठीक बाद ऊ काशी से नालन्दा अइलन आउ मगध ला एगो नया युग सिरज देलन ।
भिक्षु जगदीश काश्यप - भिक्षु पूर्व काल के जगदीश नारायण - के जनम राजगीर के पास रौनिया गाँव में १९०९ ई॰ के कातिक मास में एक कायस्थ परिवार में होल हल । सुप्रसिद्ध वैदिक रिसर्च-स्कॉलर पं॰ अयोध्या प्रसाद इनखर मामा लगऽ हलन । नालन्दा कॉलेज में एक बार वैदिक गणित पर पंडित जी के अद्भुत विद्वत्तापूर्ण भाषण होल हल जबकि गणित के भारी-भारी सवाल ऊ लिखते-लिखते हल कर देलन हल । सभा के अध्यक्ष काश्यप जी से अपन रिस्ता बता के ऊ एहू कहलन कि गिरहस्ती के जंजाल से बच के निकल भागे में ऊ काश्यप जी के मदद कइलन हल । पंडित जी के प्रभाव से पहिले ई आर्यसमाज दने झुकलन, बाकी फिनु बौद्ध धर्म के तरफ मुड़ गेलन । भिक्षु जी के लिखाई-पढ़ाई राँची, पटना आउ काशी में भेल । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र आउ संस्कृत में एम॰ए॰ कइलन । १९३२-३३ में गुरुकुल बैद्यनाथधाम के आचार्य पद के सुशोभित कइलन । १९३४ में लंका जा के प्रवज्या ग्रहण कइलन आउ उहाँ के विद्यालंकार कॉलेज में पालि भाषा आउ बौद्ध-साहित्य के गहन अध्ययन कइलन । १९३५-३६ में मलाया, बर्मा, पेनांग आउ सिंगापुर के परिदर्शन कर के चीनी भासा सिखलन आउ बौद्ध धर्म के धुआँधार प्रचार कइलन । स्वदेश लौट के १९३८-४० में उच्च विद्यालय, सारनाथ के प्रधानाध्यापक बनलन । फिनु १९४०-५० में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पालि के प्राध्यापक रहलन ।

१९५० में नालन्दा के जीर्णोद्धार के अपन मिसन के तहत नालन्दा कॉलेज में पालि विभाग के शुभारम्भ कर के १९५०-५१ में विभागाध्यक्ष रहलन । डॉ॰ चन्द्रिका सिंह 'उपासक' के काशी से साथ लइलन हल । नवनालन्दा महाविहार के स्थापना ला एँड़ी-चोटी के पसीना एक कइलन । आखिरकार बिहार सरकार के शिक्षा-मंत्री आचार्य बदरीनाथ वर्मा आउ शिक्षा-सचिव जगदीशचन्द्र माथुर के सहयोग से भिक्षु जी के सपना साकार होल । राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद दिनांक २० नवम्बर १९५१ के दिन नवनालन्दा महाविहार के शिलान्यास कइलन । तब से, बीच के कुछ बरिस के छोड़ के जबकि ऊ वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के पालि-विभागाध्यक्ष हो के चल गेलन हल, काश्यप जी नवनालन्दा महाविहार (नालन्दा पालि-प्रतिष्ठान) के निदेशक के रूप में, देश-विदेश में प्रसिद्ध शिक्षा-केन्द्र के रूप में ओकर विकास करे के काम में दिन-रात जुटल रहलन ।

बौद्ध-जगत में इनकर गिनती राहुल सांकृत्यायन आउ भदंत आनंद कौशल्यायन जउरे भारी विद्वान के रूप में हल । तीनो मिल के 'खुद्दक निकाय' के सम्पादन भी कइलन हल । त्रिपिटक के गहन अध्ययन के कारण १९४० में भिक्षु जी के लंका में त्रिपिटकाचार्य के उपाधि से सम्मानित कैल गेल हल । त्रिपिटक के नागरी में छपावे के भारत सरकार के योजना के ई सरकार के आग्रह पर संपादक के रूप में पूरा कइलन । १९५२ में टोकियो में दोसर विश्व-बौद्ध-महासम्मेलन में भाग लेलन आउ बौद्ध-साहित्य के अथाह पांडित्य के परिचय देलन ।

टोकियो से लौटलन तो १९५० में स्थापित साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संस्था 'मगध संघ' द्वारा २ नवंबर १९५२ के दिन बिहारशरीफ में श्री बिहार हिन्दी पुस्तकालय के परिसर में उनखर सार्वजनिक अभिनन्दन होल । ऊ घड़ी मगध संघ के दोसर अधिवेशन के अध्यक्ष पद से ऊ नागरिक जन से लोकभासा मगही के अपनावे के आहवान कइलन । स्थापना के बादे से ऊ निर्देशक के रूप में मगध संघ के मार्गदर्शन करइत रहलन । अध्यक्ष योगेन्द्र श्रीवास्तव, मंत्री हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, सह-मंत्री रवीन्द्र कुमार, साहित्य मंत्री महेश्वर तिवारी अइसन मगध संघ के कार्यकर्त्ता सब के ऊ प्रेरणा केन्द्र हलन । उनकरे संपादन-निर्देशन में १९५१ में बिहारशरीफ से हिन्दी द्विमासिक 'नालन्दा' के प्रकाशन ई मंडली द्वारा होल हल । ओही वर्ष मगध संघ के प्रस्ताव पर सुरेन्द्र प्रसाद 'तरुण' राजगीर में मगध सांस्कृतिक संघ के स्थापना कइलन । ओहू काश्यपे जी के मार्गदर्शन में काम करऽ हलइ ।

१९५५ में बिहार मगही मंडल, पटना आउ मगध संघ, बिहाशरीफ के मगही मासिक 'मगही' जब पटना से निकलल तो ओकर प्रधान संपादक बने ला तो ऊ तइयार न होलन, बाकी निर्देशक बने ला, खास कर के प्रियदर्शी जी के आग्रह मान के, राजी हो गेलन । प्रथमांक ला एक सौ रुपइया तुरते निकाल के देलन । फिर तो मगही आन्दोलन के ऊ केन्द्र में आ गेलन । ६ जनवरी १९५७ के दिन डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के भारी उद्योग से एकंगरसराय में जब पहिला मगही महासम्मेलन होल तो ओकर अध्यक्षता काश्यपे जी कइलन । दोसर मगही महासम्मेलन ५ अप्रैल १९६४ के दिन मगध संघ के चौदहवाँ अधिवेशन पर बिहारशरीफ में होल हल । मगध शोध संस्थान के स्थापना के प्रस्ताव ओकरा में पास होल हल ।

पटना में संस्थान के स्थापना के असफल प्रयास के बाद डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री ओकर स्थापना लगी बिहारशरीफ में डॉ॰ सरयू प्रसाद हीं अम्बेर आउ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी हीं सोहसराय आवा-जाही कर रहलन हल तो सहजोग वास्ते हमरो मुँह छूलन, आउ हम झटपट तइयार हो गेली । भारत सरकार के उपमंत्री प्रो॰ सिद्धेश्वर प्रसाद भी जुड़ गेलन । निश्चय होल कि संस्थान के स्थापना नालन्दा में काश्यप जी के अध्यक्षता में कैल जाय । सिद्धेश्वर बाबू, शास्त्री जी, सरयू बाबू आउ प्रियदर्शी जी के आहवान पर मगही के जानल-मानल विद्वान सब के सभा नवनालन्दा महाविहार के परिसर में काश्यप जी के अध्यक्षता में २९ जनवरी १९६७ के दिन होल । संस्थान के रूपरेखा स्वीकार कैल गेल आउ कार्यसमिति के गठन होल । भिक्षु जगदीश काश्यप के अध्यक्ष आउ डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री के निदेशक बनावल गेल । प्रो॰ सिद्धेश्वर प्रसाद आउ डॉ॰ वी॰ पी॰ सिन्हा उपाध्यक्ष तथा डॉ॰ सरयू प्रसाद आउ हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी मंत्री-सहमंत्री बनलन । अनेगन विद्वान के साथे-साथ हमरो कार्यसमिति में रक्खल गेल ।

संस्थान के पहिला अधिवेशन सुरेन्द्र प्रसाद 'तरुण' के मूल्यवान सहजोग से राजगीर में २ आउ ३ मार्च १९६८ के दिन होल । संस्थान के अध्यक्ष के रूप में काश्यप जी अध्यक्ष के आसन पर हलन । मगही के प्रचार-प्रसार, साहित्य-सृजन, सर्वेक्षण आउ शोध के योजना पर कइ-गो प्रस्ताव स्वीकार कैल गेल । पिछला कार्यसमिति के विस्तार कर के आउ कइ-गो विद्वान के पदाधिकारी बनावल गेल । हमरा संगठन मंत्री के भार सौंपल गेल । अब भिक्षु जी से मिले के अनेक बार मौका मिलल । मिलते रहे से समीपता मिलल । संस्थान के कार्यक्रम आउ रूपरेखा के ठोस आधार देवे ला भिक्षु जी के विशाल अनुभव आउ प्रगाढ़ पाण्डित्य के निर्देशन के बार-बार जरूरत पड़ल ।

हमनी सब बड़गो काम देख के थरभसा जा हली तब भिक्षु जी बहुत बारीकी से सुलझा बता दे हलथिन । 'जेतना सहजोग शोध नियन भारी आउ कठिन काम में मिले के चाही, नञ मिल रहल हे' के रोना सुन के उनखर पेसानी पर चिन्ता के कउनो रेखा कभियो नञ उभरल । उनखर विचार में 'ई सब होवे करे हे' के भाव रहऽ हल । अप्पन खरा-खोटा अनुभव कैक बार सुनावऽ हलन । एहू बतउलन कि नवनालन्दा महाविहार के खड़ा कर के ई रूप देवे में उनका गाँधी जी के ई कथन के संचाय के व्यवहारिक तौर पर साक्षात्कार भेल कि अच्छा काम पवित्र उद्देश्य रख के, शत-प्रतिशत ईमानदारी से करवऽ तो, नञ तो जन-सहजोग के अभाव होतो, नञ पइसा के ।

भिक्षु जी से मिल के बतियाय के मौका हमरा जब-तब मिलिये जा हल, बाकी हम बराबर खयाल कइली कि उनखर बातचीत प्रचारात्मक नञ होवऽ हल । गहरा विद्वान हलन, बौद्ध-दर्शन में पारंगत मानल जा हलन, बाकी बातचीत में ऊ विद्वत्ता नञ छलकावऽ हलन । सायत छलकेवला अधजल गगरी नञ हलन, ई वजह से । उनखर ज्ञान अन्तर्मुखी हल, बहिर्मुखी नञ । अपने मन से कुच्छो नञ बोलथुन-बतइथुन । पुछला पर सहज भाव से, बिलकुल सुलझल ढंग से, बता के नेहाल कर देथुन ।

हम जाने चाहऽ हलियइ कि अप्पन अधीनस्थ आदमी के साथ उनखर बरताव कइसन रहऽ हलइ । एकर अध्ययन अपना जानते बारीकी से कर के देखलियइ तो पइलियइ कि उनखर प्रशासन में भी नेह के मिठास रहऽ हलइ । ऊ गंभीर बनल रहऽ हलथिन, बनल की, सुभाव से ही गंभीर हलथिन आउ भिक्षु-जीवन उनखर गंभीरता में हजाफा ला देलकइ हल । एकरा से लोग उनखा से डरऽ हलन नञ, लेहाज रक्खऽ हलन ।

काश्यप जी के दैनिक परिचर्या जाने के हमरा कौतूहल हल, ई गुने उनखा से हम कभी भोर के मिललूँ तो कभी साँझ के, आउ दुपहरिया के भी । भरल भादो सुक्खल जेठ ऊ ब्राह्ममुहूर्त्ते में जग जा हलन । उठते के साथ कुछ मंत्र गुनगुना हलन । स्नानादि से निबट के प्राणायाम या ओइसने कुछ करते हम उनखा देखलूँ हल । धर्म के किताब रोज पढ़े के रुटीन हल । हलन तो बौद्ध, बाकी हिन्दू दर्शनशास्त्र, जैन आगम ग्रंथ आउ पाश्चात्य दर्शनशास्त्र के भी अध्ययन ऊ मनोयोग से करऽ हलन । छेड़ला पर कउनो धरम के दार्शनिक बारीकी पर सुलझल विचार परगट करऽ हलन । मधुकर-कृति के आदमी हलन । जहाँ से जे ज्ञान मिले, संचय कर लेबे के ऊ आग्रही हलन ।

उनखर स्वास्थ्य अच्छा रहऽ हलइ एकर रहस्य उनखर पौष्टिक आहार नञ हलइ । भोजन बिलकुल सादा करऽ हलन । 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' मान के शरीर कामचलाऊ रखे ला उनखर आहार-निद्रा के कार्यक्रम चलऽ हलइ ।

अकसर साधक, सन्त, तपस्वी, साधु जन-समाज से छिटकल चलऽ हथ । भिक्षु जी अपवाद हलथिन । अमीर-गरीब, विद्वान-अपढ़, बालक-वृद्ध सब से मिलऽ हलथिन आउ उनखर समस्या धीरज से सुन के, आउ धीरे-धीरे बोल के, समाधान भी सुझा दे हलथिन ।

नवनालन्दा महाविहार जइसन अन्तरराष्ट्रीय संस्था के निर्माण हँसी-खेल नञ हे । अप्पन नेक सुभाव, संगठन-पटुता आउ प्रेरक व्यक्तित्व से ऊ सपना के साकार कर छोड़लन । जे संस्था के संस्थापक होवऽ हे ओक्कर माथा में ओक्कर एगो खाका खिंच जा हे, एही से संस्था ओक्कर मन के अनुकूल बन के तरक्की करते जा हे । भिक्षु जी महाविहार ला चुन-चुन के शिक्षक बहाल कइलन हल । भारी-भरकम डिग्री से कर्मठता, समर्पण आउ ईमानदारी पर जादे ध्यान देलन हल । जब तलुक ऊ रहलन, नवनालन्दा महाविहार कुछ अइसने बुझा हल जइसे प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय अँगड़ाई ले के उठ रहल हे । आगे तो - 'रम गया जोगी, हवन की राख खाली रह गई !' पता नञ, नालन्दा विश्वविद्यालय के स्थापना कब होत आउ के करत ?

काश्यप जी मगही, हिन्दी, पालि, अंग्रेजी आदि कइ भासा में लिखऽ हलन । मगही पत्रिका में उनखर लेख छपऽ हल । 'इंटरमीडियट मगही गद्य-पद्य संग्रह (मातृभासा)' में उनखर लेख 'पटना कइसे बसल' छपल हे । 'खुद्दक निकाय', 'दीघ्घ निकाय', 'संयुत्त निकाय', 'उदान' आउ 'मिलिन्द पन्ह' के उनखर हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध हे । त्रिपिटक के नागरी संस्करण के संपादन-प्रकाशन उनखर ऐतिहासिक महत्त्व के काम हे । 'पालि महाव्याकरण' उनखर अमर कृति हे । 'पाश्चात्य तर्कशास्त्र' हिन्दी में पाठ्यग्रंथ के रूप में चलऽ हल । 'बुद्धिज़्म फ़ॉर एव्रीबॉडी' उनखर अंग्रेजी कृति हल, जेकर अनुवाद फ्रेंच, जर्मन आदि कैक भासा में कैल गेल हल ।

'परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ?' इनसान के साथ जिनगी आउ मौत के झमेला लगले हे । भिक्षु जगदीश काश्यप अपवाद कइसे रहतन हल ? २८ जनवरी १९७६ ऊ तिथि हल जब उनखर तिरोभाव हो गेल । उनखर देहावसान बौद्ध-जगत में गहरा अवसाद भर देलक । ऊ तो निर्वाण पा गेलन, बुद्ध के शरण में जा पहुँचलन, बाकी श्रमण-परम्परा के आगे बढ़ावे वाला, शिक्षा, भासा आउ संस्कृति के पुरोधा उनखर टक्कर के कोय दोसर नञ देखाय पड़ रहल हे । उनखर कृति नवनालन्दा महाविहार उनखर कीर्ति-पताका हे । जब तलुक ई पताका फहरत, भिक्षु जी यश-शरीर में जीवित रहतन ।

["मागधी विधा विविधा" (विविध विधा में स्तरीय मगही लेखन के परिचायक एगो संकलन); खण्ड-१: मगही गद्य साहित्य; सम्पादक - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, मगध संघ प्रकाशन, सोहसराय (नालन्दा); १९८२; कुल पृष्ठ ४+१४२+२; ई संस्मरण पृ॰ १११-११६ पे छप्पल हकइ]

NOTE:
"Bhikkhu Jagdish Kashyap was born as Jagdish Narain in 1908 at Ranchi in the state of Bihar in India. But his ancestral home was in the village of Raunia in the district of Gaya. Raunia village is not far from the Barabar Hills in one direction and Rajgir and Nalanda in another." - p.xv in "Bhikkhu Jagdish Kashyap (A Biography)", pp.xv-xxxi in the book "STUDIES IN PALI AND BUDDHISM - A Memorial Volume in Honour of Bhikkhu Jagdish Kashyap", Editor: A. K. Narain; IInd Edition 2006; 1st Published 1979; Publisher: B.R. Publishing Corporation [A Division of BRPC (India) Ltd.], 425, Nimri Colony, Ashok Vihar, Phase-IV, Delhi-110052; Cost: Rs. 750/-.