विजेट आपके ब्लॉग पर

Sunday, February 18, 2018

इवान मिनायेव के बिहार यात्राः 2.0 गिरियक आउ पावापुरी में


2.

5 मार्च के हम पुरनका शहर राजगृह के छोड़ देलिअइ आउ गया के रस्ता में हमरा दू जगह के निरीक्षण करे के इरादा हलइ - गिरियक आउ पावापुरी ।
गिरियक राजगृह से पूरब में अवस्थित हइ, कुछ मील के दूरी पर । लगभग आठ बजे सुबह में हम हुआँ पहुँच चुकलिए हल, आउ ओहे दिन पावापुरी भी जाय के इच्छा करते तुरतम्मे पुरावशेष के निरीक्षण में लग गेलिअइ। हियाँ परी दू गो पुरातात्त्विक दर्शनीय स्थल हइ - पहिला - जरासंध के बैठक, आउ दोसरा - गुफा गीध-द्वार । सीधे हमर पालकी के जरासंध के सिंहासन भिर लावल गेलइ, लेकिन हम पहिले गुफा के निरीक्षण करे लगी चाहऽ हलिअइ [*212] आउ देर तक एकर निरीक्षण करते  रहलिअइ; एकर पता लगाना लेकिन बहुत असान हइ - वाहक लोग के खाली खुशामद करे के जरूरत नयँ, जेकन्हीं के हलाँकि गुफा के बारे जनकारी रहऽ हइ, लेकिन कइसूँ ओकन्हीं के समझ में नयँ आवऽ हइ कि कइसे अइसन बेकार के चीज केकरो लगी रोचक हो सकऽ हइ, खास करके सा'ब के, आउ ई आधार पर ओकन्हीं अज्ञान से इनकार करऽ हइ, ई मानते कि सा'ब कुछ तो अधिक काम के चीज खोजब करऽ हथिन । गिरियक गाँव पनचाने नदी के किनारे बस्सल हइ; सामने के पश्चिमी किनारा से दू चोटी वला खड़ा चट्टान उट्ठऽ हइ, जेकरा से पहाड़ी के दू गो समानांतर शृंखला जुड़ऽ हइ, जे गया से उत्तरी-पश्चिमी दिशा में 36 मील तक फैलल हइ । दुन्नु चोटी एगो कृत्रिम चबूतरा से जुड़ल हइ, आउ दुन्नु तरफ खंडहर हइ । हियाँ से दक्षिण-पश्चिम मुड़ला पर आउ लगभग एक मील चलते रहला पर, एगो सकेत घाटी मिलतो, जेकरा में घुमघुमौवा नदी बाणगंगा बहऽ हइ; हियाँ परी उत्तरी शृंखला के दक्षिणी ढलान पर 250 फुट के ऊँचाई पर, एगो गोल छेद दृष्टिगोचर होवऽ हइ; निच्चे से चट्टान में ई एगो छोट्टे गो दरार नियन देखाय दे हइ, लेकिन जब उपरे चढ़के जइबहो, त पइबहो कि एगो बड़गो प्रवेश गुफा में खुल्लऽ हइ, जे 10 फुट चौला आउ 17 फुट उँच्चा हइ । खुद गुफा काफी लंबा हइ । कनिंघम एकर नाप लंबाई में 98 फुट बतावऽ हइ; एकर ऊँछाई अंतिम तरफ कमती होल जा हइ, आउ मेहराब धीरे-धीरे फर्श तक झुक जा हइ । उँचगर तापक्रम, विकर्षक दुर्गन्ध, अंधकार आउ हजारो उड़ते चमगादड़ गुफा में जादे देर तक रहना असंभव कर दे हइ । उपरे से दृश्य बहुत विलक्षण लगऽ हइ आउ कइसूँ वहशी रूप से शानदार; चारो दने अनावृत्त ग्रैनाइट चट्टान उपरे उट्ठऽ हइ, निच्चे हरियाली भी विरले हइ; शांति खाली चील के चीख से भंग होवऽ हइ - हियाँ परी ऊ बहुतायत में हइ, आउ गुफा के नम्मो (नाम भी) एकरे तरफ इशारा करऽ हइ (गीध-द्वार, अर्थात् गीध के द्वार) । वापिस उतरके घाटी में अइला पर, जेकरा में पत्थल के टुकड़ा बिखरल हलइ, हम वापिस जरासंध के सिंहासन दने रवाना हो गेलिअइ । ई स्थान में, जइसन कि हम पहिलहीं बता चुकलिए ह, दू गो चोटी हइ - पश्चिमी चोटी पर जाय लगी कभी सीढ़ी हलइ; [*213] कहीं-कहीं अभियो सोपान (steps) देखल जा सकऽ हइ; हियाँ परी, बहुत संभावना हइ, कोय मठ चाहे मंदिर हलइ - अभी तक देवाल के अवशेष देखाय दे हइ आउ कहीं-कहीं ग्रैनाइट के स्तंभ, आउ पूरा आयताकार चबूतरा पर पत्थल बैठावल (paved)  हइ । चौड़गर रस्ता, दुन्नु चोटी के जोड़े वला चबूतरा के प्रकार, पूरबी चोटी पर ले जा हइ, जाहाँ परी बेलनाकार एगो स्तूप हइ, जेकरा लोग "जरासंध के सिंहासन" कहऽ हइ । ई बेलन (cylinder)14 फुट उँचगर एगो वर्गाकार आधार (pedestal) पर से उपरे जा हइ, स्तूप के बेलन के व्यास 28 फुट हइ, आउ ऊँचाई 21 फुट । हमरा लगी ई अज्ञात मठ के खंडहर के आउ अधिक ध्यान से निरीक्षण करे के चाही हल; लेकिन समय के कमी के कारण हमरा जल्दीए निच्चे उतरे पड़लइ । हियाँ के मठ आउ उपर्युक्त गुफा ऊ जमाना में शायद एक दोसरा से जुड़ल हलइ; हियाँ चोटी पर मंदिर आउ कोठरी हलइ - हियाँ परी भिक्खु लोग रहऽ हलइ, जे दैनिक बौद्ध पूजा आउ अनुष्ठान करते जा हलइ; आउ हुआँ शांत एकांत गुफा में ओकन्हीं में से ऊ सब जइते जा हलइ, जे ध्यान करऽ हलइ, चाहे आउ बाद में, तंत्र के  विकास के दौरान, आत्मा, देवता आउ बौद्धिष्टव लोग के आह्वान करते जा हलइ । ई मामले में कि गिरियक के सूनसान गुफा जइसन स्थान में बस्सल केतना आश्चर्यजनक हद तक संन्यासी लोग के कल्पना काम करऽ हलइ, ई हम सब पास विरासत में प्राप्त ढेर सारा बौद्ध किंवदन्ती से जानऽ हिअइ; ई सब किंवदन्ती आउ तांत्रिक अभिचार (witchcraft) विकसित हो सकलइ आउ अइसन वीरान, उदास आउ वहशी, हर तरह के सांसारिक हो-हल्ला से दूर बसेरा बनइलकइ । पावापुरी, जे किंवदन्ती के अनुसार अधिक प्राचीन हइ, गिरियक से उत्तर-पश्चिम में अवस्थित हइ; कइएक नयका जैन मंदिर के अलावे हियाँ परी कुच्छो अद्भुत चाहे प्राचीन नयँ हइ । मंदिर सब में ठाट-बाट के अनुसार सबसे दिलचस्प हइ ऊ, जे एगो टापू पर बन्नल हइ, एगो बड़गो झील के बीच, जे मछली से भरल हइ - झील पर से होके मंदिर तक बन्नल एगो सँकरा पुल (150 फुट लंबा) हइ; मंदिर में प्रवेश सब्भे यूरोपियन लगी  [*214] निषेध हइ, लेकिन मंदिर के पुरोहित (पुजारी)  - जैन नयँ हइ, बल्कि एगो हिन्दू आउ ब्राह्मण जात के हइ । सब्भे मंदिर धनाढ्यता आउ आंतरिक ठाट-बाट में विख्यात हइ, लेकिन सौंदर्य में नयँ । एक मंदिर के प्रवेशद्वार भिर हम लाल रंग के दू गो लिंगम् (शिवलिंग) देखलिअइ । ई शैव देवता हियाँ परी जैन आउ हिन्दू के बीच समझौता के निशानी हलइ । पावापुरी के मंदिर सब में उत्साहपूर्वक दुन्नु धर्म के लोग भेंट देते जा हइ । तीर्थयात्री लोग खातिर गृह-परिसर (premises), जे एक मंदिर के चारो दने बन्नल हइ, प्रतीयमानतः (apparently) ओकन्हीं के संख्या के ध्यान में रखके बनावल गेले ह । पावापुरी के निरीक्षण के साथ ई दिन (5 मार्च) के हम समाप्त करबइ । मिस्टर व॰ के हियाँ नवादा में रात गुजारके दोसरा दिन तड़के सुबह गया लगी प्रस्थान कर गेलिअइ ।

Friday, February 16, 2018

इवान मिनायेव के बिहार यात्राः 1.3 राजगृह में


बड़गाँव के निरीक्षण करके हम बिहार (अर्थात् बिहारशरीफ) वापिस अइलिअइ, ताकि हम गया जा सकिअइ आउ रस्ता में कुछ दोसर ऐतिहासिक स्थल के भेंट कर लिअइ । बिहार के सबसे नगीच आउ सबसे प्रसिद्ध हइ राजगृह; अनुवाद में ई नाम के अर्थ हइ "राजा के घर" या "त्सारग्राद" (राजनगर) , ग्राद के अर्थ "बाड़ा" या "छरदेवाली" समझके । हमर प्रिय मेजबान (host), बंगाली बाबू, हमरा हुआँ घोड़ा पर पहुँचावे के स्वेच्छापूर्वक सेवा प्रस्तुत कइलथिन । 2 मार्च के करीब बारह बजे, हमन्हीं बिहार से दक्षिण-पश्चिम के बड़गर रस्ता से प्रस्थान कइलिअइ । गरमी हलइ, लेकिन घोड़ागाड़ी के उपरे उठावल परदा हमन्हीं के सूरज के झुलसावे वला किरण से रक्षा कर रहले हल; रस्ता लमगर नयँ हलइ आउ इलाका बहुत सुंदर हलइ - हमन्हीं लगातार गाड़ी से जाब करऽ हलिअइ कइएक गाँव से गुजरते, जे मट्टी के झोपड़ी के समूह हलइ, छोटगर जगह में सट्टल-सट्टल, अलग-अलग झोपड़ियन के बीच सकेत गल्ली के साथ । चावल (धान) के खेत बहुतायत में देखाय दे हइ - लेकिन गाँव में कोय बड़गो संतोष नयँ देखाय दे हइ; ग्रामवासी लोग गंदा हलइ आउ प्रदेश के रिवाज के अनुसार लगभग पूरा नंगा; नंगापन के सबसे अधिक आवश्यक आवरण ओकन्हीं के हलइ - गंदा आउ फट्टल-फुट्टल । ई स्थानीय प्रदेश में [*204] एक्के फसल होवऽ हइ आउ खेतिहर वर्ग के स्थिति के बारे उपरे उल्लेख कइल थोड़े-बहुत आँकड़ा से अनुमान लगावल जा सकऽ हइ । आधा रस्ता में, सीलाव गाँव (आउ सीताव नयँ, जइसन कि साधारणतः नक्शा में पावल जा हइ) में हमन्हीं बड़गर रस्ता से दक्खिन मुँहें मुड़ गेते गेलिअइ आउ लगभग तीन बजे राजगृह पहुँच गेते गेलिअइ । ई नाम के दू गो शहर हइ - पुरनका, जे 5मी शाताब्दी में हीं खंडहर बन चुकले हल, आउ नयका, जेकरा में अभियो तक लोग रहऽ हइ, लेकिन जाहाँ परी न तो कुच्छो प्राचीन हइ आउ न रोचक । दुन्नु शहर एक दोसरा के पासे-पास अवस्थित हइ - मोसकिल से नयका शहर के बाहर होबहो कि तुरतम्मे पहड़ियन के चोटी पर पुरनका शहर के देवलियन के अवशेष दृष्टिगोचर होवे लगऽ हइ । ई बाहरी देवलियन के परिधि (circumference) लगभग आठ मील हइ; एकर मोटाई, ऊ सब जगह में, जाहाँ परी ई सुरक्षित हइ, 13 फुट तक हइ । श्वानचांग के काल में, 7मी शताब्दी तक, खंडहर बन चुकल ई सब देवलियन के पीछू अभियो कइएक अन्दरूनी हिस्सा हइ, जे बहुत निम्मन से सुरक्षित हइ । अंतिम हिस्सा में पहुँचे के पहिलहीं, घोड़ागाड़ी के छोड़ देवे पड़ऽ हइ आउ आगू पैदल जाय पड़ऽ हइ, न तो एक्को घोड़ा आउ न कइसनो चक्का ई जगह पर से होके गति के झेल सकऽ हइ, जेकरा पर एतना प्रचुरता में पुरनका अइँटा आउ हर तरह के झिटकी बिखरल हइ । सकेत रस्ता से होके देवलियन के पार करके घाटी में प्रवेश करभो, जाहाँ परी पुरनका शहर हलइ, आउ जाहाँ परी अभी कोय नयँ रहऽ हइ । बौद्ध गीत में, जेकरा में महान भारतीय शिक्षक के प्रथम क्रियाकलाप के गौरवगान कइल गेले हल, ई स्थल के गिरिब्बज्ज या बाड़ा कहल गेले ह, जे पहड़ियन से बन्नल हइ । पाँच विख्यात चोटी के साथ पहाड़ी सब हियाँ घाटी के निर्माण करऽ हइ; सबसे बड़गर घाटी पश्चिम से पूरब मुँहें हइ, आउ सबसे छोटगर उत्तर से दक्षिण मुँहें; एकर परिधि पाँच मील से जादे नयँ हइ; जब एकरा उत्तर दने से देखभो, त घाटी ढालू, हलाँकि कम उँचगर, पहाड़ी के लगातार देवाल से घिरल प्रतीत होवऽ हइ; ओकर खड़ी ढलान सब पर जाहाँ-ताहाँ विरले घास उग्गऽ हइ, आउ ओकर चोटी पर उज्जर-उज्जर नयका जैन मंदिर सब देखाय दे हइ । ठीक घाटी के समानांतर उत्तर से दक्खिन एगो छोटगर नदी सरस्वती पथरीला मार्ग से टेढ़ा-मेढ़ा होके बहऽ हइ । [*205] एकर किनारा पर अक्षरशः अइँटा, पुरनकन भवन के पत्थर बिखरल पड़ल हइ, आउ कुछ जगह पर काँटेदार झाड़ी के छोटगर-छोटगर अगम्य जंगल आउ उँचगर-उँचगर तुलसी घास हइ । अइँटा के ढेर, छोटगर-छोटगर टीला, प्राचीन स्तूप सब के अवशेष चारो बगली देखाय दे हइ । एगो छोटगर उपवन के छाया में, घाटी के उत्तरी प्रवेश के पास, हमन्हीं लगी तंबू गाड़ल गेलइ । पूरब में विपुलगिरि पहाड़ी हइ, जेकर चोटी पर उज्जर जैन मंदिर हइ, दक्षिण-पश्चिम तरफ वैभारगिरि पहाड़ी, जाहाँ परी सात गरम-गरम झरना हइ आउ महादेव के कुछ  नयका मंदिर । दक्षिण-पूरब मुँहें कुछ दूरी पर रत्नागिरि पहाड़ी देखाय दे हइ; एगो तंग घाटी, जे दूर से बिलकुल नयँ देखाय दे हइ, ओकरा उदयगिरि पहाड़ी से अलगे करऽ हइ । घाटी के दक्खिन में सोनगिरि पहाड़ी से घाटी बंद हो जा हइ ।
पुरनका शहर राजगृह एगो अइसन स्थल हइ, जे स्मरणीय आउ पवित्र भी खाली बौद्ध लोग लगी नयँ हइ । एकर इतिहास के प्रारंभ बहुत प्राचीन काल तक जा हइ; हियाँ मगध साम्राज्य के रजधानी हलइ, आउ ब्राह्मण परंपरा महान हिन्दू महाकाव्य महाभारत के कइएक आख्यान के हियाँ से जोड़लके ह । ब्राह्मण लोग के हियाँ बौद्ध लोग अइते जा हलइ आउ कहल जा हइ कि बिम्बिसार, प्रथम सम्राट्, ओकन्हीं के उपदेश (teachings)के संरक्षण करे वला, हिएँ रहऽ हलथिन - हियाँ परी भिक्षा माँगे लगी अइलथिन हल अपन पिता के घर से पलायन कइल राजकुमार गौतम । ऊ पहाड़ी पर, जाहाँ अभी महादेव के मंदिर हइ, अभियो तक प्राकृतिक गुफा देखाय दे हइ, जाहाँ परी ऊ दुपहरी के गरमी में अराम करे खातिर चल गेलथिन हल ।  अपन उपदेश के क्रियाकलाप के दौरान गौतम राजगृह कइएक तुरी वापिस अइलथिन हल; उनकर निधन के बाद उनकर अनाथ शिष्य लोग हियाँ एकत्र होते गेले हल । ई सब के पीछू कभियो ई शहर के बौद्ध जगत् में कोय विशेष महत्त्व नयँ हलइ । हियाँ निस्संदेह निम्मन से मंदिर आउ स्तूप बन्नल हलइ; हियाँ मठ भी हलइ; लेकिन ओकरा में से केकरो ओतना बड़गो नाम नयँ हलइ जेतना कि नालंदा या बनारस के मठ के हलइ । [*206] 5मी शताब्दी में शहर खंडहर बन चुकले हल; अनुमान लगावल जा सकऽ हइ कि एकर पतन के काल के प्रारंभ बहुत पहिलहीं आउ तब हो गेले हल, जब बौद्ध लोग अपन सामाजिक महत्त्व आउ धन के मामले में भारत के अन्य सब जगह में मजबूत हलइ । बौद्ध के बाद हियाँ ब्राह्मण लोग के धाक जम्मे लगलइ - आउ एकन्हीं के स्थान पर मुसलमान लोग आ गेलइ । ब्रह्मण लोग हियाँ अपन मंदिर बनइते गेलइ, मुसलमान लोग मस्जिद आउ मकबरा; आउ ई बात में आश्वस्त होवे खातिर बहुत तीक्ष्णदृष्टि के आवश्यकता नयँ हइ कि जइसे ऊ सब ओइसीं दोसरो सब बनावल आउ सुसज्जित कइल गेलइ पुरनका बौद्ध सामग्री से - ओहे मूर्ति सब के ब्राह्मण लोग खुद लगी अपनाऽ लेते गेलइ आउ ओकर पूजा करे लगलइ । आउ ओहे से, बिहार में लगभग सगरो आउ भारत के बाकी प्राचीन जगह में लगभग पूर्वसंध्या पर निर्मित भवन में बहुत प्राचीन पुरावशेष के अवशेष (remnant of ancient antiquity) प्राप्त होना लगभग बिलकुल अप्रत्याशित हइ । राजगीर में, एकरा अलावे, पुरनका बौद्ध सामग्री के जैन लोग बहुत उपयोग करते गेलइ, जे आसपास के पहाड़ी पर के चोटी पर मंदिर के निर्माण करते गेलइ । हलाँकि राजगृह वर्तमान काल में एगो पवित्र स्थल हइ, लेकिन हियाँ हम जादे तीर्थयात्री नयँ देखलिअइ - रस्तो पर हियाँ अइते ओकन्हीं के अधिक संख्या नयँ देखाय देलकइ; आउ खाली तड़के सुबह घाटी में कुछ गति दृष्टिगोचर होवऽ हइ; तीर्थयात्री भारत के दूर-दूर क्षेत्र से, विशेष करके जैन लोग, कभी-कभी मध्य पंजाब से, गरम झरना के आसपास एकत्र होवऽ हइ; चारो दने से बंद पालकी में महिला तीर्थयात्री सब के पहाड़ी के चोटी पर विभिन्न मंदिर में ले जाल जा हइ; घाटी नीरस हइ आउ दिन के बाकी समय में बिलकुल शांत रहऽ हइ, सुबह लगभग छो बजे ई कुछ समय लगी सजीव हो उठऽ हइ; गरम झरना के पास बोलचाल के स्वर सुनाय दे हइ; पहाड़ी के ढलान पर दूरहीं से स्वच्छ उज्जर वस्त्र में उद्यमशील तीर्थयात्री सब के जैन संत लोग के चमत्कारिक चरणचिह्न दने चढ़के जइते देखाय दे हइ । ई सब मंदिर में, जइसन कि हम पहिलहीं टिप्पणी कर चुकलिए ह, निश्चय ही कुछ तो आउ अधिक प्राचीन हइ, आउ ढालू पहाड़ी पर के हरेक मंदिर पर चढ़ना असान बात नयँ हइ - चढ़ाई ढालू हइ, आउ केकरो हाथ पवित्र स्थल के रस्ता के असान करे के फिकिर नयँ कइलकइ । [*207] औरतानी आउ वृद्ध लोग के साधारणतः पहाड़ी पर विशेष प्रकार के निर्मित पालकी में ले जाल जा हइ - वाहक द्वारा ई मामले में दर्शावल कला पर आश्चर्यचकित होल बेगर नयँ रहल जा सकऽ हइ, आउ पालकी में बैठल लोग के साहस पर भी; जब निच्चे से वाहक लोग के तरफ चढ़ते देखभो, त लगतो, कि या तो ओकन्हीं सवार लोग के फेंक देते जइतइ, चाहे पालकी ओकन्हीं के कन्हा पर से फिसल जइतइ आउ तीव्र ढलान पर से उड़ते निच्चे चल अइतइ । लेकिन न तो ई, न तो ऊ कभियो होवऽ हइ ।
वैभारगिरि पहाड़ी पर के गरम झरना तरफ एगो सुंदर पथरीला जीना से होके चढ़भो - पहाड़ी के तलहटी में सरस्वती नदी बहऽ हइ, आउ ठीक झरना के पास कइएक ब्राह्मण (हिन्दू) मंदिर हइ, आउ हियाँ परी  ब्राह्मण जाति से कइएक भिखारी के स्थायी अड्डा हइ - ई अर्द्ध-भिक्षुक लोग केकरो आगू नयँ जाय दे हइ, आउ यूरोपियन आउ जैन लोग से ओकन्हीं दान खातिर बार-बार आग्रह करऽ हइ, लेकिन विशेष रूप से हिन्दू तीर्थयात्री लोग से लगाव रहऽ हइ । ई सब के मिलाके ओकन्हीं के आमदनी बड़गो नयँ होवऽ हइ । ई एगो पहाड़ी के पास गरम झरना सात गो हइ; ऊ सब के नाम हइ - गंगा-यमुना-कुंड, आनंद-ऋषि, मार्कण्ड, व्यास, सतद्वार, ब्रह्मकुंड, काशीतीर्थ; पानी, जेकर तापक्रम ब्रह्मकुंड में 105° फारेनहाइट तक पहुँच जा हइ, सिंह आउ बाघ के सिर से सुसज्जित पत्थर के पाइप से होके बाहर निकसऽ हइ आउ पत्थर के हौज में एकत्र होवऽ हइ । पहिलहीं श्वानचांग पाइप के ई सब मूर्तिकला संबंधी अलंकरण के बारे उल्लेख करऽ हइ । मंदिर सब में बौद्ध विरासत के प्रचुरता आश्चर्यचकित करऽ हइ; हियाँ परी ग्रैनाइट के छोटगर-छोटगर चैत्य *) भी लिंगम् में बदलल हइ; दोसरो चीज के बहुत कुछ हियाँ परी पूर्व बौद्ध मंदिर आउ छोटका प्रार्थनागृह (chapels) से लावल गेले ह । मार्कण्ड-कुंड नामक झरना से दक्षिण-पश्चिम तरफ, 276 फुट के उँचाई पर, एगो काफी बड़गर चबूतरा हइ । ई बड़गर बिन खरादल पत्थर से बन्नल हइ [*208] आउ एकरा जरासन्ध के बैठक  कहल जा हइ, मतलब, जरासन्ध के सिंहासन; ई चबूतरा के ऊँचाई 28 फुट हइ; एकर तलहटी में कइएक गुफा हइ, छो आउ आठ फुट वर्ग के । साल के विभिन्न  समय में ई सब गुफा में  अल्पकालीन निवासी, विभिन्न  संप्रदाय के फकीर लोग होवऽ हइ । ओकन्हीं
 

*) चैत्य मतलब स्तूप; ई विभिन्न आकार के होवऽ हइ आउ हमेशे उपरे तरफ से निच्चे दने उलटा कइल चषक के आकृति के होवऽ हइ । कभी-कभी एकर पार्श्व नक्काशी से सुसज्जित रहऽ हइ; लिंगम् (phallus) - शिव या महादेव के प्रतीक हइ ।

के अइसन गंतव्य स्थान प्राचीन काल से हलइ, आउ पूरा संभावना के अनुसार हियाँ अत्यंत प्राचीन काल के बौद्ध कोठरी (cells) हइ । ई सब कोठरी में से दू गो पूरब तरफ हइ, पाँच गो उत्तर तरफ । अइसने गुफा हमरा ब्रह्मकुंड से पश्चिम तरफ देखे में अइलइ, लगभग सो डेग से कुछ अधिक; एकरा पहाड़ी के बगल में तराशके बनावल गेले ह, काफी बड़गो ऊँचाई पर । आउ पश्चिम दूर हटके पहाड़ी में एगो घुमघुमौवा चौड़गर रस्ता हइ, जेकरा में काँटेदार झाड़ी बहुत जादे बढ़ गेले ह । चबूतरा के क्षेत्रफल पचास वर्गफुट हइ; एकर पीछू तरफ एगो बड़गो गुफा हइ, जेकरा में अइँटा के बन्नल कइएक सीढ़ी निच्चे तरफ जा हइ । हमर समय में एकर अंदर घुसना असान नयँ हलइ, एतना अधिक ढहल पत्थल आउ अइँटा से ई भरल हलइ । एकर साइज लेकिन मालुम हइ - 36 फुट पूरब से पश्चिम आउ 26 फुट उत्तर से दक्खिन; ऊँचाई 18 से 20 फुट । ई गुफा में ब्रोडली के कार बसाल्ट से निर्मित बुद्ध के एगो मूर्ति मिलले हल, आउ ई खोज हम सब के ई माने पर बाध्य करऽ हइ कि ई गुफा एगो मंदिर हलइ जे ओतने परिष्कृत नयँ हलइ, जेतना कि अभियो तक निच्चे में गरम झरना (सात-द्वार) में से एगो के पास हइ आउ जेकरा सप्तर्षि के मंदिर कहल जा हइ । एहो कृत्रिम गुफा हइ, लेकिन साइज में बहुत छोटगर, आउ सप्तर्षि के मूर्ति के अतिरिक्त कइसूँ सुसज्जित नयँ हइ । गुफा के सामने चबूतरा पर, जेकर प्रवेश पूरब तरफ से हइ, मुसलमान के तीन गो मजार हइ । चोटी तरफ उपरे चढ़के, 800 फुट के ऊँचाई पर एगो दोसर चबूतरा मिलतो, जे पहिलौका से बहुत मेल खा हइ; हियाँ से 14 से 15 फुट चौड़गर देवाल के अवशेष उपरे दने जा हइ; एकर किनारे-किनारे रस्ता से होते चढ़के जैन मंदिर दने जइबहो, [*209] जे 1300 फुट के ऊँचाई पर हइ । विशेष करके अद्भुत ऊ हइ, जे दक्षिण-पश्चिम में हइ । ऊ बहुत निम्मन से सुरक्षित हइ; एकर मुख्य प्रवेश पूरब मुँहें हलइ; पनरह फुट तक स्तंभावली (colonnade)हइ, जे वर्गाकार कोठरी में प्रवेश करऽ हइ; बारह उँचगर स्तंभ अभी ढह चुकल छत के सँभालऽ हलइ, ई कोठरी से तीन सोपान उपरे दोसरका कोठरी हलइ - जे छोटगर, लेकिन अधिक उँचगर हलइ । ई कोठरी में जाय वला दरवाजा के लिंटेल नक्काशी से सुसज्जित कइल हइ, जे बहुत भद्दा हइ । दरवाजा पर बुद्ध के प्रतिमा हइ । ई उल्लेख करे के लगभग जरूरत नयँ हइ कि एतना ऊँचाई से मंदिर से एगो सुंदरतम दृश्य देखाय दे हइ - हियाँ से नयका शहर राजगृह, बिहार आउ बड़गाँव के टीला सब देखाय दे हइ ।
दक्षिण आउ दक्षिण-पश्चिम दने दू गो बौद्ध मंदिर के खंडहर हइ । वैभारगिरि पहाड़ी के चोटी पर कइएक जैन मंदिर हइ; हियाँ से, घाटी में बिन उतरले, सोनभंडार गुफा पहुँचल जा सकऽ हइ, जे पहाड़ी के दखनी ढलान पर हकइ; हम लेकिन निच्चे उतरके ई गुफा तक घाटी से होके जाना बेहतर समझलिअइ; गरम झरना से हियाँ तक एक मील से जादे दूर नयँ हइ । सोनभंडार गुफा या अनुवाद में "सोना के भंडार" सबसे अद्भुत प्राचीन अवशेष में से एक हइ, जे हम बिहार में देखलिअइ । ई अपने आप में अद्भुत हइ, बहुत प्राचीन अवशेष के स्मारक के रूप में, ऊ इतिहास पर बिन कोय ध्यान रखते, जे ओकरा साथ स्थानीय पुरातत्त्ववेत्ता लोग जोड़ते जा हथिन, आउ जे शंकास्पद से कहीं अधिक हइ । ऊ गुफा, जेकरा में, कहल जा हइ, बौद्ध लोग के पहिला सम्मेलन होले हल, पहाड़ी के दखनी ढलान पर अवस्थित हकइ । श्वानचांग, राजगृह में अपन निवास के वर्णन करते, अन्य बात के अलावे बोलऽ हइ कि ऊ एगो "बड़गो पत्थर के घर" देखलके हल आउ जाहाँ ई पहिलौका सम्मेलन होले हल आउ ई घर जे स्थान पर हलइ, ओकरा बहुत कठिनाई से तर्क देके वर्तमान गुफा के स्थल से जोड़ल जा सकऽ हइ । अगर [*210] ईसा के 7मी शताब्दी में धार्मिक पितर लोग के पहिलौका वास्तविक स्थल के स्मृति एतना धुँधला हलइ कि उनकन्हीं लगी बड़गो घर प्रदान कइल जा हइ, त की एकर ई मतलब नयँ हइ कि ऊ काल में भी गुफा के आद नयँ कइल गेलइ, आउ एकर अस्तित्व नयँ हलइ, आउ ओहे से ई अविश्वसनीय हइ कि ई गुफा के खोज 19मी शताब्दी में होलइ ।
गुफा तक जाय लगी अभी रस्ता से होके चढ़े पड़ऽ हइ, लेकिन पहिले एकरा बदले, शायद, उपरे तरफ सीढ़ी जा हलइ । गुफा के ठीक सामने चबूतरा हइ, लगभग 100 फुट वर्ग में; ई क्षेत्र के कुछ हिस्सा, शायद, आच्छादित ओसारा के साथ बन्नल हलइ, काहेकि गुफा के बाहरी देवाल पर वर्गाकार नियमित खाँच (grooves) देखाय दे हइ, जेकरा में शहतीर बैठावल हलइ । अइँटा आउ पत्थल के ढेर चबूतरा पर बिखरल हइ । गुफा के बाहरी अग्रभाग एतना चिकना आउ समतल हइ कि दूर से पालिश कइल लगऽ हइ, ई 44 फुट लंबा आउ 16 फुट ऊँचा हइ । पश्चिमी छोर से एगो चट्टान उभरल हइ, लेकिन पूरबी छोर पर पत्थर के काटके 20 गो सँकरा सोपान (steps) बनावल हइ । बिलकुल नियमित काटल दरवाजा गुफा में ले जा हइ; दरवाजा के चौड़ाई - 3½ फुट, ऊँचाई - 6 फुट 4 इंच । देवाल के मोटाई 3 फुट हइ - दरवाजा से पच्छिम एगो खिड़की हइ, जेकर चौड़ाई आउ ऊँचाई तीन फुट हइ । एहे दिशा में बिन सिर वला बुद्ध के मूर्ति हइ आउ दू पंक्ति के एगो छोटगर शिलालेख । शिलालेख के वर्णमाला ईसवी सन के प्रारंभ के मानल जा सकऽ हइ । कोय वैरदेव, जे एगो संन्यासी हलइ, अपना बारे लिक्खऽ हइ कि ऊ हियाँ परी रहऽ हलइ आउ ध्यान करऽ हलइ । गुफा के भीतरी भाग मेहराब के निच्चे 33 फुट लंबा आउ 17 फुट चौड़ा हइ । देवलियन पर कइएक अद्यतन वर्णमाला में शिलालेख हइ, लेकिन जेकरा तइयो समझना मोसकिल हइ । गुफा के अंदर में एगो चैत्य हइ, जे बुद्ध के बहुत बारीक काम (fine work) वला प्रतिमा सब से सुसज्जित हइ । ई गुफा हिंदू वास्तुकला (architecture) के प्राचीनतम नमूना हइ; कइएक अइसन नैसर्गिक गुफा श्रीलंका के टापू पर पावल जा हइ । [*211] सोनभंडार के गुफा प्राचीन बौद्ध कोठरी के नमूना हइ जे कभी, अर्थात्, "पाप स्वीकारोक्ति अनुष्ठान" (उपोसथ) के दौरान मंदिर में परिवर्तित कर देल गेलइ; ई ऊ सब कुछ से अधिक प्राचीन हइ, जे हमन्हीं के एकरा में मिल्लऽ हइ, शिलालेख होवे चाहे चैत्य; ई दोसरा सब कुछ, पूरा संभावना हइ, हियाँ बहुत हाल में लावल गेलइ ।
राजगृह में बहुत सारा विलक्षण वस्तु हइ; जइसे विपुलगिरि के पास कइएक दोसर-दोसर गरम झरना हइ । ओकरा में से एगो के हिन्दू आउ मुसलमान दुन्नु पवित्र मानते जा हथिन । उदयगिरि बिजुन एगो चबूतरा अथवा भीमसेन के सिंहासन देखइते जा हथिन । चोटी पर के लगभग सब्भे मंदिर में कुछ न कुछ अधिक प्राचीन पावल जा सकऽ हइ । ई सब्भे पुरावशेष के समान वैज्ञानिक महत्त्व नयँ हइ; लेकिन बहुत्ते चीज के बहुत पहिलहीं फोटोग्राफ के रूप में सार्वजनिक बनावल जाय के चाही हल । स्थानीय पुरावशेष के बहुत स्पष्ट वर्णन बिलकुल काफी नयँ हइ - अगर वर्णन के, जइसन कि अकसर होवऽ हइ, साथ में वर्णनीय स्थल के पछानके चीनी यात्री द्वारा उल्लेख कइल कोय मठ चाहे मंदिर से जोड़े के इच्छा भी शामिल कर लेल जाय, तब लेखक लोग दुर्भाग्यवश अनिच्छापूर्वक तनाव में पड़ जाय लगऽ हथिन आउ ई वर्णन बिलकुल सही प्रतीत नयँ होवऽ हइ ।


Sunday, February 11, 2018

इवान मिनायेव के बिहार यात्राः 1.2 बड़गाँव (नालंदा) में


पालकी में यात्रा करे में बहुत असुविधा हइ, हलाँकि थकाऊ नयँ हइ । गरमी में पालकी में दम घुट्टऽ हइ आउ धूली-धक्कड़ होवऽ हइ, तेजी से चल नयँ सकऽ हो, आउ एकरा अलावे आसपास के क्षेत्र के बहुत कम देख सकऽ हो; पालकी में पढ़ल जा सकऽ हइ, लेकिन बड़ी कठिनाई से ।
[*196] बिहार में कोय उपाय नयँ हलइ, आउ समय के फालतू बिन नष्ट कइले परिवेश के निरीक्षण खाली पालकी में हीं संभव हइ । आउ हम अइसहीं कइलिअइ । शहर से दक्षिण-पूरब छो मील दूर बड़गाँव नाम के एगो छोटगर गाँव हइ, जेकरा भिर कइएगो बड़गर कृत्रिम तालाब हइ आउ टीला के ताँता हइ, जे पहिले बौद्ध स्तूप हलइ । पुरातत्त्ववेत्ता लोग द्वारा उत्खनन शुरू करे के पहिले, आसपास के गाँव के लोग निर्दयतापूर्वक प्राचीन सामग्री आउ लुप्त पवित्र स्थान के खुद के काम लगी उपयोग करते गेलइ । अइँटा, बालुकाश्म (sandstone)से घर बनावल गेलइ, कभी-कभी तीन-तीन मंजिला; चारो दने के जमीन जोतल गेलइ, आउ साथ-साथ पावल गेल हर तरह के पुरावशेष, अगर कइसनो तरह से उपयोगी देखाय देलकइ, त काम में लगा देल गेलइ; लिंटल, कॉर्निस, स्तंभ घर में घसीटके ले जाल गेलइ, पुरनका मूर्ति  सब के नयका नाम देल गेलइ आउ पूजा के वस्तु हो गेलइ । पुरावशेष के अइसनका दोहन (exploitation) अभियो तक जारी हइ, लेकिन कनिंघम आउ ब्रोडली के उत्खनन के चलते बहुत कुछ बच गेलइ आउ बड़गाँव से बाहर ले जाल गेलइ, आउ सब्भे खंडहर के सूचीबद्ध करके शब्द में व्यक्त कर लेल गेले ह, बड़गाँव के प्राचीन नाम के पता लगा लेवल गेले ह ।
बड़गाँव में दू गो पवित्र प्रतिमा पावल गेले ह (देवी वागेश्वरी आउ अष्टशक्ति), आउ दुन्नु पर के अभिलेख (inscriptions) से प्रतीत होवऽ हइ कि दसमी शताब्दी में भी (आउ शायद बहुत बादो) ई जगह नालंदा के नाम से जानल जा हलइ । ई नाम से पश्चात् काल के बौद्ध विद्वत्ता के इतिहास जुड़ल हइ; वर्तमान ग्राम के स्थान पर एगो विशाल आउ प्रसिद्ध मठ अवस्थित हलइ, जे शायद ईसा के पचमी आउ सतमी शताब्दी के बीच अस्तित्व में अइले हल, हलाँकि जाहाँ तक ई जगह के संबंध हइ त एकरा बहुत पहिलहीं से पवित्र मानल जा हलइ, काहेकि हियाँ परी सारिपुत्र के जन्म आउ मृत्यु होले हल, जे गौतम के पहिला आउ प्रिय शिष्य लोग में से एक हलथिन; लेकिन फ़ाशियान, जे बड़गाँव या नालंदा में पचमी शताब्दी में भेंट देलके हल, ऊ बखत तक मठ के उल्लेख नयँ करऽ हइ, आउ खाली स्तूप के बारे बोलऽ हइ, जेकरा ठीक ओहे स्थान पर खड़ी कइल गेले हल जाहाँ परी सारिपुत्र के मृत्यु होले हल । दू सो से कुछ अधिक साल के बाद एगो दोसर चीनी यात्री हियाँ परी रहके अध्ययन कइलकइ [*197] - श्वानचांग नालंदा के पूरा चमक-दमक में पइलकइ । नालंदा ऊ काल में आउ लगातार कइएक शताब्दी बाद तक प्रार्थना स्थान आउ विद्वत्ता के केंद्र हलइ । ई स्थान पर हमन्हीं के विश्वविद्यालय नियन कोय तो संस्थान स्थापित कइल गेले हल; आठ सो मंदिर के पास में हियाँ परी ओतने विद्यालय हलइ, जेकर रख-रखाव के खरचा-बरचा लगी अनुदान राजा से आउ धनी लोग के तरफ से मिल्लऽ हलइ । तारानाथ एगो राजा के उल्लेख करऽ हइ, जे नालंदा के विद्यालय सब पर सो घड़ा सोना के दान देलथिन हल; दोसरा राजा हियाँ परी एगो पुस्तकालय स्थापित कइलथिन हल, जेकरा में विशाल संख्या में पांडुलिपि हलइ - कहल जा हइ, बत्तीस करोड़ अक्षर ऊ सब पर लिक्खल हलइ । नालंदा में लोग खाली अध्ययन लगी नयँ अइते जा हलइ, बल्कि बौद्ध लोग के धार्मिक सिद्धांत आउ दार्शनिक सिद्धांत के खंडन करे लगी विधर्मी (heretical)शिक्षक लोग भी प्रकट होवऽ हलइ । आर्यसंघ के अंतर्गत जब न तब विवाद होवऽ हलइ । नालंदा के विकास महायान के विकास के साथे-साथ प्रारंभ होलइ; ई काल हम सब से केतनो प्राचीन रहइ, लेकिन तत्कालीन शैक्षिक आउ मठ के जीवन के नियमावली में से कइएक आधुनिक भारत में भी जीवित हइ । बिहार लगी प्रस्थान करे के पहिले हमरा सोमनगर जाय के अवसर मिललइ । हियाँ परी गंगा नदी के किनारे, फ्रांसीसी शहर चंदरनगोर के दृष्टि में आउ सीधे दोसरा पटी, राजा टैगोर संख्या में सोल्लह तक मंदिर स्थापित कइलथिन आउ विद्यालय चालू कइलथिन, नालंदा विश्वविद्यालय के कोय छोटगर मठ के रूप में स्थापित कइलथिन । मंदिर, विद्यालय, प्रोफेसर, छात्र सब के खरच-बरच उनके खाता में जा हइ । अधिकांश मंदिर शिव के नाम समर्पित हइ, आउ खाली दू गो अपवाद हइ - एगो देवी काली के समर्पित हइ, आउ एकरा अलावे, भगवान कृष्ण के मंदिर हइ । स्वयं राजा टैगोर वैष्णव संप्रदाय से नयँ हथिन, हलाँकि कृष्ण भगवान के मंदिर स्थापित कइलथिन - उनकर विभिन्न चल संपत्ति के बीच पत्नी सहित कृष्ण के एगो बहुमूल्य मूर्ति प्राप्त होलइ आउ सोलहमा मंदिर के निर्माण के ई एगो आधार हलइ । सब्भे मंदिर गंगा के किनारे एक लाइन में हइ; ऊ सब के पीछू एक-एक भवन हइ, जाहाँ परी व्याख्यान होवऽ हइ आउ शिष्य लोग रहऽ हइ । विद्यालय में [*198] खाली ब्राह्मण ज्ञान के अध्ययन कइल जा हइ आउ सब्भे छात्र ब्राह्मण हइ । धर्म, दर्शन, व्याकरण के पुस्तक के अतिरिक्त हियाँ परी छंदशास्त्र के रचना के अध्ययन आउ टीका करते जा हइ; नालंदा में जइसन होवऽ हलइ ठीक ओइसीं पिता-संन्यासी लोग नयँ खाली निरर्थकता के बारे दार्शनिकता के रूप में प्रस्तुत कर सकऽ हलथिन, आत्मा के आह्वान कर सकऽ हलथिन, बल्कि मुखमुद्रा, नृत्य आउ संगीत के बारे विचार-विमर्श लिक्खऽ हलथिन। जे भवन में व्याख्यान देल जा हइ, ऊ बौद्ध मठ के संरचना के कइएक योजना के बारे आद देलावऽ हइ। भवन के बीचोबीच एगो विशाल सभागृह होवऽ हइ; दू बगल से एकरा से छोटगर-छोटगर सभागार (auditorium) जुड़ल रहऽ हइ, जेकरा में वस्तुतः व्याख्यान देल जा हइ । प्रोफेसर आउ शिष्य लोग फर्श पर बैठते जा हथिन, बिछावल चटाय पर; हरेक प्रोफेसर पर बहुत शिष्य नयँ होवऽ हइ, एहे पाँच-छो गो, आउ विद्यालय में कुल मिलाके पचास से अधिक नयँ । हमरा साथे कलकत्ता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र के एगो सुप्रसिद्ध प्रोफेसर साथ में हलथिन; अइसन विख्यात भेंटकर्ता आउ प्रोफेसर के सामने छात्र लोग भी बहुत स्वाभाविक रूप से प्रसिद्ध होवे लगी आउ खुद के अत्यंत दक्ष देखावे लगी चाहऽ हलइ; एक सभागार में न्याय के स्थानीय प्रोफेसर विवाद भी चालू कइलथिन - विश्लेषण कइल जा रहल एगो पुस्तक के एक स्थान पर के आधार पर ऊ ईश्वर (अर्थात् भगवान) के अस्तित्व सिद्ध करे लगलथिन; राजधानी के विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बीच में दखल देलथिन, आउ दुर्भाग्यवश प्रादेशिक प्रोफेसर पराजित हो गेलथिन, लेकिन तइयो, बहुत लमगर अवधि के चर्चा के बाद, जे लगभग घंटा भर जारी रहलइ । रहे लगी छात्र सब के विशेष भवन देल जा हइ; हरेक के पास एगो शयन-कक्ष होवऽ हइ; सब्भे शयन-कक्ष स्वच्छ रहऽ हइ, आउ सबसे बढ़के कइसनो प्रकार के फर्नीचर के पूरा अभाव - एगो चटाय आउ एगो तकिया - बस एतने, जेकर स्थानीय छात्र के सुख-सुविधा लगी जरूरत होवऽ हइ। ओकन्हीं सब्भे छात्रवृत्तिधारी होवऽ हइ आउ ओकन्हीं के छात्रावास आउ पुस्तक के अतिरिक्त चार से पाँच रुपइया (अर्थात्, 8 से 10 शिलिंग) मासिक मिल्लऽ हइ । प्रोफेसर लोग के वेतन भी सीमित होवऽ हइ - अइसनो हथिन जिनका सोल्लह से बीस रुपइया मासिक मिल्लऽ हइ; पचास रुपइया खाली एक्के गो के मिल्लऽ हइ, [*199] खाली तर्कशास्त्र के प्रोफेसर के । ई वेतन बिलकुल कम नयँ प्रतीत होतइ, अगर ई बात पर ध्यान देल जाय कि एगो देसी व्यक्ति भारत में भोजन, वस्त्र आउ आवास पर केतना कम खरच करऽ हइ । एगो यूरोपियन के सब्भे आवश्यकता अस्तित्व में ओकरा लगी नयँ हइ; ऊ अप्पन तरह से रहऽ हइ आउ अत्यधिक कम खरच करऽ हइ । नालंदा में अइसने एगो संस्थान हलइ, जे अधिक विस्तृत पैमाना पर आउ ब्राह्मण संस्थान नयँ, बल्कि बौद्ध संस्थान हलइ । हुआँ परी बहुतायत में मंदिर के जइसने महाविद्यालय भी हलइ; लेकिन ओइसने तरीका से अध्ययन करते जा हलइ, जइसन कि आजकल के देसी विद्यालय में; ओइसीं वाद-विवाद करते जा हलइ, जइसे कि अभियो तक देसी द्वंद्ववादी लोग (dialecticians) बहस करते जा हइ ।
हमन्हीं से ऊ दूरस्थ काल में हमन्हीं लगी आधुनिक अइसन संस्थान के अपेक्षा नालंदा में, निस्संदेह, बहुत अधिक भौतिक संसाधन हलइ । एकरा अलावे, शिक्षक लोग के बीच बहुत अधिक सृजनात्मक शक्ति हलइ । केकरो संदेह नयँ हो सकऽ हइ कि हिएँ परी आखिरकार ऊ धार्मिक प्रणाली के निर्माण होले हल, जे अभी तक नेपाल, तिब्बत, चीन आउ मंगोलिया में दृढ़तापूर्वक टिक्कल हइ । लमगर अवधि तक नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय बौद्ध विद्वत्ता के केंद्र हलइ, आउ अभियो तक ओकर अंतिम नाश के कोय विश्वसनीय समाचार नयँ हइ; एतने ज्ञात हइ कि नालंदा कइएक तुरी नष्ट होलइ आउ फेर से एकर पुनरुद्धार होलइ; दुश्मन सब न तो एकर बाह्य चमक-दमक के छोड़लकइ, न तो वैज्ञानिक संसाधन के; मंदिर आउ दोसर-दोसर भवन के नष्ट कर देलकइ, पुस्तकालय सब के जराऽ देलकइ, वैज्ञानिक संन्यासी लोग के भगा देलकइ । नालंदा के नाश खाली मगध पर के विधर्मी आक्रमणकारी राजा के सेना ही नयँ कइलकइ - द्वेषी संप्रदाय के शिक्षक लोग नालंदा विश्वविद्यालय के आग लगा देते गेलइ । आउ एकर कइएक शताब्दी के अस्तित्व के दौरान ई एक तुरी नयँ दोहरावल गेलइ । हमन्हीं के ई मालुम हइ, उदाहरणस्वरूप, कि निजी दान के सहायता से खड़ी कइल नालंदा में एगो नयका मंदिर के अभिषेक हो रहले हल । लोग बहुत संख्या में एकत्र होलइ, आउ भिक्खु सब अतिथि लोग के स्वागत कर रहलथिन हल; अतिथि के बीच दू गो भिखारी हलइ, [*200] जे बौद्ध नयँ हलइ; श्रामणेर, अर्थात्, नयका शिष्य उनकन्हीं पर मजाक करे के सोचते गेलइ - ओकन्हीं अतिथि लोग पर कीचड़ उछललकइ, ओकन्हीं के दरवजवा में अँटका देलकइ आउ ओकन्हीं पर कुतवन के उसकाऽ देलकइ; क्रोधित भिखारी खुद लगी बदला लेलकइ; ओकन्हीं मठ में आग लगा देलकइ; मंदिर, विद्यालय, मूर्ति सब जर गेलइ; पुस्तक भंडार भी जर गेलइ । लेकिन मठ के ई अंतिम विध्वंस नयँ हलइ; एकर बाद ऊ फेर से जीवित हो उठलइ, आउ इतिहास जानऽ हइ कि ओकरा पर आक्रमण एक तुरी नयँ होलइ - ओहे से, कोय अचरज के बात नयँ हइ कि वर्तमान काल में बड़गाँव में, पूर्व नालंदा विश्वविद्यालय के स्थान पर, पहिलौका गौरव के जादे कुछ नयँ बच गेले ह; पुरावशेष के विध्वंस पर खाली काल के काम नयँ हइ, बल्कि लोग के भी, काहेकि अपन राष्ट्रीय विशेषता के रूढ़िवाद (conservatism of their national character) के बावजूद भारतीय लोग के नयँ मालुम कि पुरावशेष के कदर कइसे कइल जा हइ ।
नालंदा के खंडहर बड़गाँव ग्राम से दक्षिण-पूरब में पड़ऽ हइ; जब गाँव के नगीच पहुँचे लगबहो, उत्तर-पूरब से, त खंडहर नजर में नयँ अइतो - एतना ऊ तुच्छ हइ - आउ ओकर आसपास के कृत्रिम झील । पहिला झील, जाहाँ से हम खंडहर के निरीक्षण शुरू कइलिअइ, दीर्घ-पोखर के नाम से जानल जा हइ; ई गाँव से उत्तर-पूरब में हइ; पूरब से पश्चिम ई कम से कम एक मील फैलल हइ, आउ उत्तर से दक्षिण एक चौथाई मील; एकर चारो दने आम के पेड़ के सुंदर कुंज हइ । थोड़े सुनी दक्खिन में, खंडहर से पूरब तरफ एगो दोसर झील हइ पनसोखर-पोखर, लगभग ओतने बड़गर, जइसन कि अभी उल्लेख कइल गेलइ । खंडहर से दक्खिन तेसर बड़गो झील हइ इन्द्र-पोखर । खंडहर के चारो दने विभिन्न दिशा में कइएक छोटगर-छोटगर झील देखाय दे हइ, ई सब्भे झील कृत्रिम हइ, आउ ई सब के बारे पहिलहीं श्वानचांग बात करऽ हइ (ईसा के 7मी शताब्दी); ओकर काल में ऊ सब कमल से भरल हलइ, आउ छायादार बाग ऊ सब जगह तक फैलल हलइ, जाहाँ परी अभी उत्तर से दक्खिन तरफ चावल के समतल मैदान के बीच टीला सब के शृंखला देखाय दे हइ । [*201] पानी आउ छाया के प्रचुरता दुपहर के जलवायु में नयँ खाली विलासिता के बात हइ; दुन्नु खाली सौंदर्य लगी स्थापित नयँ हइ, बल्कि प्रथम आवश्यकता के वस्तु के रूप में भी; दक्खिन के लोग एकरा पूरा तरह से समझते जा हइ आउ पूरा तरह से छाया आउ पानी के सौंदर्य के कदर करे में जादे बुद्धिमानी देखावऽ हइ । हियाँ परी पानी आउ छायादार ठंढक के प्रचुरता में उँचगर-उँचगर मीनार, सुसज्जित मंडप बिखरल हइ, जेकरा में वाद-विवाद कइल जा हलइ आउ प्रवचन सुनाय दे हलइ; अइसन उँचगर-उँचगर भवन आउ मंदिर हलइ, जेकरा बारे श्वानचांग उत्साह से बात करऽ हइ कि "ओकर गुंबद आकाश छूअ हलइ, आउ मंदिर सब के खिड़कियन से हावा आउ बादर के प्रजनित होवे के स्थान देखाय दे हलइ; चांद आउ सूरज ओकर उँचगर छत के तल (level)  पर प्रकट होवऽ हलइ" ।
दीर्घ-पोखर झील से दक्षिण-पश्चिम दने चलते-चलते, एकर पहिले कि भूतकालीन स्तूप के शृंखला तक पहुँचल जाय, रस्ता में बौद्ध धर्म के कइएक अवशेष मिल्लऽ हइ, जेकरा बारे वर्तमान काल में लोग के बिलकुल नयँ आद आवऽ हइ आउ न किंवदन्ती के रूप में मालुम हइ । बुद्ध के मूर्ति के पास से गुजरऽ हो - उनका आसीन मुद्रा में प्रस्तुत कइल हइ, मानूँ ध्यान में मग्न हथिन; उनकर चारो दने शिष्य लोग हइ, आउ ओकन्हीं में से हरेक के सिर पर अभिलेख हइ, जेकरा से प्रतीत होवऽ हइ कि चार मूर्ति के चित्रित कइल हइ - (1) सारिपुत्र  (2) मौद्गलायन (3) मैत्रेयाणीपुत्र (4) वसुमित्र । मुख्य मूर्ति के नाक कट्टल हइ, आउ निरार पर गेरू के लेप *) कइल हइ । मूर्ति अभियो तेलिया भंडार आउ भैरवी के नाम से आस-पड़ोस के गाँव के निवासी लोग द्वारा पुज्जल जा हइ । मूर्ति के गेरू से लेप यज्ञ के दौरान कइल जा हइ । ई पक्का चिह्न हइ ई बात के, कि ई मूर्ति के पवित्र मानल जा हइ आउ अभियो तक पुज्जल जा हइ । हियाँ से थोड़हीं दूर पर धर्मवृक्ष हइ; वृक्ष एगो छोटगर चबूतरा से घेरल हइ, जेकरा पर बुद्ध के कइएक प्रतिमा क्रमबद्ध रूप से रक्खल हइ; ऊ सब्भे पर गेरू के लेप लगावल हइ, आउ लगऽ हइ, अभियो तक हिंदू लोग द्वारा ई चाहे ऊ नाम से पुज्जल जा हइ । ई पवित्र वृक्ष के पास में अइँटा के नयका देवाल से छरदेवाली करके एगो छोटगर अहाता बना देवल गेले ह; [*202] बुद्ध के कइएक प्रतिमा के एकरा में एक शृंखला में रख देवल गेले ह, आउ ऊ सब में से एगो बहुत बड़गो साइज के हइ, जे आठ फुट से कम उँचगर नयँ हइ । बुद्ध के ध्यानमग्न मुद्रा में चित्रित कइल हइ, गेरू से लेप कइल हइ आउ वर्तमान काल में तेलियाभंडार के नाम से प्रसिद्ध हइ । चारो बगली कइएक जगह में खुल्लल असमान में प्राचीन मूर्ति सब खड़ी चाहे पड़ल हइ; ओहे सब के बीच में ब्राह्मण (हिंदू) देवता सब के, उदाहरणार्थ, देवी दुर्गा के प्रतिमा, सिर के चारो तरफ बौद्ध धर्म के आस्था के चिह्न सहित (ये धर्म हेतु आदि) आउ सिर में केश सहित ध्यानमग्न बुद्ध के प्रतिमा हइ । हियाँ से थोड़हीं दूर पर स्तूप के ऊ शृंखला शुरू होवऽ हइ, जेकर उपरे हम उल्लेख कइलिए ह; ओकरा में से छो गो उत्तर से दक्खिन एक लाइन में एक के बाद दोसरा उपरे उट्ठऽ हइ । ई सब टीला के उत्खनन कइल गेलइ आउ बड़गो संख्या में मूर्ति मिललइ; ई सब मूर्ति में से कुछ अभी बिहार में हइ; कइएक अभियो स्थल पर ही देखाय दे हइ, आउ मालुम नयँ, ओकरा में से केतना गायब आउ नष्ट हो गेलइ । टीला सब में से सबसे रोचक हइ बीच वला अर्थात् उत्तरी छोर से चौठा; एकरा एतना साफ कइल जा चुकले ह कि अचूक रूप से ई निश्चित करे के अवसर दे हइ  कि हियाँ परी एगो मंदिर हलइ जेकर निचला अंश अभियो सुरक्षित हइ; ई शायद, जइसन कि सुरक्षित अंश के आधार पर निर्णय कइल जा सकऽ हइ, बुद्ध-गया के मंदिर के शैली में बनावल गेले हल आउ एकर काल दसमी शताब्दी चाहे कुछ आउ पहिले के हइ; एकरा बारे निष्कर्ष निकासल जा सकऽ हइ ऊ शिलालेख से, जे मंदिर के दरवाजा बिजुन प्राप्त होले ह । दरवाजा पूरब दिशा में हइ । न तो शिलालेख ही, न स्तंभ आउ न सजावट ही, जेकरा बारे उत्खनन करावे वला ब्रोडली बोलऽ हइ, वर्तमान समय में स्थल पर हकइ। ई मानल जा सकऽ हइ कि कुछ समय के बाद मंदिर के देवाल भी ढहाय लगइतइ, आउ बड़गाँव के खंडहर के स्मृति खाली पुरातात्त्विक निबंध में हीं रह जइतइ । जाहाँ तक मंदिर के संबंध हइ त एकरा बारे चर्चा हम नयँ करबइ, काहेकि संरचना के ई शैली के वर्णन हम बुद्ध-गया में करबइ । [*203] भौगोलिक स्थिति आउ शिलालेख ई बात के आश्वस्त करऽ हइ कि बड़गाँव के स्थल पर वस्तुतः नालंदा मठ हलइ, लेकिन उत्खनित आउ लूट-पाट कर लेल गेल टीला के बीच से 7मी शताब्दी में उल्लिखित ऊ सब भवन के चिह्न (traces) खोजे लगी कपोल-कल्पना (fantasy) के बहुत कल्पित प्रयास आवश्यक हइ । अइसन पहचान (identification) में बचकाना ढंग से विश्वास करे लगी ऊ जे कुछ जरी सुन नालंदा के इतिहास से हमन्हीं के ज्ञात हइ, ओकरा भूल जाय के चाही । तहिया से झील तो सुरक्षित रह गेले ह; अइसन संरचना के मिटाना कठिन हइ, आउ एकरा में कुछ नयँ हइ; दक्षिण में विशेष करके पानी तो हरेक कोय लगी  बहुमूल्य हइ । एकरा अलावे स्थानीय तालाब में से सूरज-तलाव, अर्थात् सूर्य के तालाब, के अभियो तक पवित्र मानल जा हइ । छठ पर्व के अवसर पर हर साल हियाँ परी स्नान खातिर दस हजार तक औरतानी सब एकत्र होवऽ हथिन ।


Thursday, February 08, 2018

इवान मिनायेव के बिहार यात्राः 1.1 बिहारशरीफ में


बिहार में (मार्च 1875)

1.1      बिहारशरीफ में

[*187] फरवरी 1875 में नेपाल के यात्रा खातिर रवाना होते बखत हमरा बिहार अर्थात् प्राचीन मगध होके आवे के इच्छा होलइ । हमरा ई प्रान्त में रुचि हलइ, विशेष रूप से ई कारण से कि ई प्रान्त में प्राचीनता के विविधता हइ, आउ पवित्र स्थल के रूप में भी, जेकर अभी हिन्दू जन के जिनगी में कम महत्त्व नयँ हइ । हियाँ गया शहर हकइ, आउ श्रद्धालु हिन्दू के कहना हइ कि ऊ अदमी भाग्यशाली हइ जे गंगा में स्नान कइलकइ, प्रयाग (अर्थात् इलाहाबाद) में अपन केश मुंडन करवइलकइ, बनारस में मरलइ, आउ जेकरा लगी गया में श्राद्ध निष्पन्न होलइ। हरेक बरस, कउनो समय में हजारों तीर्थयात्री गया में अइते जा हका । सब्भे जात के, भारत के सब्भे हिस्सा से, राजा होवे चाहे रंक, हियाँ जुटते जा हका । प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्य हइ कि श्राद्ध करे, अर्थात्, ऊ पवित्र स्थल पर अपन पितर सब के आद करे, जाहाँ भगवान विष्णु के चरण-चिह्न हइ । एकर अलावे बिहार में बौद्ध धर्म स्थापित होले हल, ई कइएक शताब्दी तक फललइ-फुललइ, आउ हिएँ आझ तलुक पवित्र बोधिवृक्ष अस्तित्व में हइ, सब देश आउ सम्प्रदाय के बौद्ध लोग के तीर्थ स्थान हइ । अभियो तक ई वृक्ष के पूजा करे वलन में उत्तर में तिब्बत आउ नेपाल के, दक्षिण आउ दक्षिण-पूर्व में श्रीलंका, बर्मा आउ स्याम के बौद्ध लोग हका । [*188] लेकिन बिहार एगो पवित्र तीर्थस्थल खाली भारत से बाहर गेल बौद्ध लोग खातिर नयँ हइ; सब्भे सम्प्रदाय के खाली निष्ठावान हिन्दू लोग ही हियाँ तीर्थयात्रा पर नयँ अइते जा हका, बल्कि जैन लोग के भी मंदिर आउ तीर्थस्थल हकइ; मुसलमानो के हियाँ अपन पवित्र मकबरा हकइ । ई देश, जाहाँ बौद्ध लोग पृथ्वी के केन्द्र खोज रहला हल, सत्य के अधार पर चित्रमय स्थिति लगी प्रसिद्ध हइ, लेकिन एकर अलावे खेतिहर अबादी के गरीबी, आउ कुछ स्थान में जमीन के अनुर्वरता खातिर भी; कहीं-कहीं बिहार शहर के आसपास खाली एक्के फसल होवऽ हइ, आउ एक साल पहिले हियाँ के वासी सब के बड़गो भुखमरी के तकलीफ झेले पड़लइ ।
हम कलकत्ता से रेलगाड़ी से रवाना होलूँ आउ दोसरा दिन सुबह में बख्तियारपुर स्टेशन पहुँचलूँ, जाहाँ से हमर बिहार  के पर्यटन चालू होवे वला हल । ई प्रदेश के सुदूर दक्षिण तक जाय खातिर डब्बा से उतरके पालकी के इस्तेमाल करे के हल; बिहार (बिहारशरीफ) शहर जाय लगी आउ कोय दोसर उपाय नयँ हल । पूरे दिन हमन्हीं चलते रहलूँ ऊ सब इलाका से होके, जे चित्रण करे लायक से बहुत दूर हलइ, लगभग ओहे रस्ता से डेढ़ हजार साल पहिले चीनी तीर्थयात्री फ़ा-श्यान गेला हल; लेकिन मगध देश के अइसन खुला मैदान के संस्मरण उनकर कविसुलभ विवरण में कहीं नयँ मिल्लऽ हइ । बौद्ध-धर्म के पालना (हिंडोला), ई देश के पहिला छाप (impression) एकर काम के नयँ हलइ - गरमी, धूरी, सूर्य से दग्ध एकरूप मैदान, कहीं-कहीं दूर में पतरा-पतरा तार के पेड़, कभी-कभार देखाय देवे वला गाँव में गरीबी आउ गंदगी - ई सब कुछ तो ऊ बिलकुल नयँ हलइ, जे प्राचीन मगध के बारे, ओकर समृद्धि के बारे, घना अबादी वला शहर सब आउ धनाढ्य निवासी लोग के बारे बतावल जा हलइ । दखनी पहाड़ी हिस्सा छोड़के, समुच्चे पटना जिला में बड़गर-बड़गर मैदान हइ, कहीं-कहीं पेड़ के छोटगर-छोटगर समूह; वसन्तकाल में गाछ-वृक्ष आउ दग्ध मैदान के हालत दयनीय होवऽ हइ; मिट्टी मुख्य रूप से जलोढ़ (alluvial) हइ आउ गंगकिनारी प्रदेश [*189] विशेष रूप से उपजाऊ के रूप में मशहूर हइ । देर शाम के हमन्हीं बिहार शहर पहुँचलूँ । ई शहर में ऊ समय में एक्को यूरोपियन नयँ निवास करऽ हलइ, आउ एगो बंगाली हमरा एगो बहिर्भवन (outhouse) में शरण देलका, जे ऊ समय डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर काम करऽ हला । हमरा देल गेल घर के एक कमरा के एगो स्तंभ सुन्दर बनइले हलइ, जे बालुकाश्म (sandstone) के तराश करके बनावल हलइ आउ जेकरा पर राजा स्कन्दगुप्त के अभिलेख हलइ - लेकिन खेद के बात हलइ कि ई स्तंभ उलटा तरफ करके जमीन में गड़ल हलइ, आउ अभिलेख के कुछ अंश रगड़इला से कुछ पता नयँ चलऽ हलइ । ई एक्के स्तंभ से ई अनुमान लगावल जा सकऽ हलइ, कि बिहार कउन मामला में धनी हइ । शहर के नाम (सं॰ विहार = मठ), जेकर वास्तविक अर्थ हकइ "मठ-शहर", ई निर्देशित करऽ हइ कि हियाँ कभी बौद्ध लोग हला, बौद्ध शहर हलइ, आउ वास्तव में मुसलमानी स्रोत सब से हमन्हीं के मालूम हइ, कि जब मोहम्मद बख्तियार ई शहर पर चढ़ाय करके कब्जा कइलकइ, त हियाँ ओकरा कइए गो सरमुंडन कइल ब्राह्मण (अर्थात्, बौद्ध भिक्खु), मंदिर, भरपूर मूर्ति, आउ मदरसा के व्यापक अर्थ में 'काफ़िर' (मुसलमान धर्म के नयँ माने वला) लोग के ढेर सारा किताब । ई सब विजेता के सहन नयँ होलइ - वाशिंदा लोग के कतल करके, ऊ मंदिर के तोड़-फोड़ देलकइ, कितब्बन के जरा देलकइ आउ मूर्ति सब के नष्ट कर देलकइ । लेकिन मुसलमान लोग मुस्लिम धर्म में विश्वास नयँ करे वलन के धर्म से संबंधित सब कुछ के बरबाद कर देवे के केतनो कोशिश कइलकइ, तइयो ओकरा से संबंधित स्मारक के ओकन्हीं पूरा तरह से नष्ट नयँ कर पइलकइ । ई तो मालूम नयँ, कि आझकल के बिहार प्राचीन काल में कउन प्रकार के शहर हलइ । मुसलमान काल से पहिले के पुरावशेष ई प्रमाणित करऽ हइ, कि हियाँ कभी एगो बड़गर आउ शानदार शहर हलइ । ऊ शायद पनचाने नद्दी के किनारे बसल हलइ, जे आझकल गरम वसन्त काल में बिलकुल सूख जा हइ, आउ मोटगर देवाल से घिरल हलइ, जे अभियो तक कहीं-कहीं अच्छा से सुरक्षित हकइ । प्राचीन बौद्ध मंदिर से बहुत-कुछ मुसलमान लोग सजावट लगी अपन मस्जिद आउ अपन मकबरा में लेके चल गेलइ । [*190] ऊ सब आउ दोसर-दोसर जगहवन पर बहुत अकसर स्तंभ, कॉर्निस आउ विकृत कइल बौद्ध मूर्ति पावल जा हइ । वर्तमान बिहार एगो शहर के रूप में कइसूँ न तो उल्लेखनीय हइ आउ न दिलचस्प । हियाँ के जनसंख्या कोय पैतालीस हजार हइ । नयका शहर पुरनका शहर के परिखा (moat) के पीछू में बनावल गेले ह आउ बहुत विशाल क्षेत्र में फैलल हइ । अलग-अलग मोहल्ला के बीच में मैदान आउ बाग फैलल हइ; तइयो रोड न तो चौड़गर हइ आउ न साफ-सुथरा । ऊ सब्भे में, बजार भी अपवाद नयँ हइ, पत्थल आउ अइँटा के जइसे-तइसे खड़ंजा कइल हइ । बजार के दुन्नु बगली पक्का घर के साथ-साथ अर्धध्वस्त झोपड़ी फैलल हइ । शहर के अधिकतर मस्जिद अर्धध्वस्त हइ ।
कहल जा हइ कि 1770 के अकाल आउ ओकर पहिले मराठा लोग के आक्रमण से ई शहर के वर्तमान स्थिति हो गेलइ । तब से ई सँभर नयँ पइलइ, हलाँकि अभियो तक एकर व्यापारिक महत्त्व हइ; बिहार से होके, जे नौगम्य (navigable) नदी पर नयँ बस्सल हइ आउ रेल मार्ग से दूर हइ, पटना, गया, हजारीबाग आउ मुंगेर के बीच बड़गो व्यापार होवऽ हइ । बरसात में आउ आंशिक रूप से शरत्काल में खाली बैले पर जाल जा सकऽ हइ; बैलवे पर समान के परिवहन कइल जा हइ । व्यापारी लोग के अपन माल में से कुछ के बिक्री के दौरान बिहार में रुक्के के आदत हइ। बिहार के एक चौथाई घर, अनाज के व्यापार करे वला आउ कागजी ऊतक (paper fabrics) के विक्रेता लोग के हइ । भाग्य के मारल ई शहर में, जे कइएक तुरी बरबाद हो चुकले ह आउ अभी मुख्य रास्ता से बिलकुल दूरवर्ती हइ, तइयो पुरावशेष के बल्कि छोटहीं सही, लेकिन महत्त्वपूर्ण संग्रह हइ । बिलकुल त्याग देवल गेल ई क्षेत्रीय संग्रहालय के इतिहास कुछ ई प्रकार हइ - कुछ साल पहिले हियाँ परी इंगलैंड के एगो डिप्टी मजिस्ट्रेट हलइ, जेकरा हलाँकि जादे जनकारी नयँ हलइ आउ जे प्रशिक्षित नयँ हलइ, लेकिन बड़गो उत्साही व्यक्ति हलइ। ऊ अपन खरचा से उत्खनन (खुदाई) करवइलकइ, आउ जे-जे चीज ऊ आसपास में नयँ पइलकइ, [*191] ऊ सब चीज घसीटके बिहार अपन घर में ले गेलइ । ई तरह कइएक साल गुजर गेलइ; उत्खनन से पुरावशेष के काफी कुछ संग्रह हो गेलइ, ओकर संग्रह के ई उत्साह में नयँ मालुम केतना हद तक ई शौकिया पुरातत्त्ववेत्ता के संग्रहालय विस्तार पइते हल; लेकिन अचानक ई पूरा उपयोगी क्रियाकलाप के बीच एगो अफवाह ई अंग्रेज अफसर के एगो गंभीर अपराध के दोष लगावे लगी शुरू कइलकइ; सबूत बहुत हलइ, आउ खुद के दोषी अनुभव करते, ई पुरातत्त्ववेत्ता भारत से भाग जाना बेहतर समझलकइ, नयँ मालुम काहाँ । लेकिन एकर पहिले ऊ अपन सब्भे पुरावशेष संग्रह के संरक्षण खातिर वर्तमान डिप्टी मजिस्ट्रेट के सौंप चुकले हल । जब सरकार के तरफ से ओकर प्रत्यर्पण करे के माँग शुरू होलइ, त ई अफसर पुरावशेष के प्रत्यर्पण करे से इनकार कर देलकइ, ई बात पर जोर देते कि ई पलायन कइल अभियुक्त (escaped accused) के निजी संपत्ति हइ, नयँ कि कोय दंडित अपराधी (convicted criminal) के । एकरे साथ ई मामला समाप्त हो गेलइ; एकरा चलते संग्रह के बहुत कुछ खो गेलइ । ई संग्रह खराब तरह से रक्खल हइ, आउ एकान्त स्थान में, आउ ई बात के चलते कि ई संग्रह एगो बदनाम व्यक्ति के नाम से संबंधित हइ, ई संभव हइ कि लमगर अवधि तक कोय अंग्रेज एकरा पर उचित ध्यान नयँ देतइ, जे बहुत अफसोस के बात हइ । ई संग्रह में शिलालेख, पत्थल या लकड़ी में कइल नक्काशी (bas-reliefs), स्तंभ, मूर्ति आदि हइ । बहुत कुछ अत्यंत रोचक हइ आउ सर्वोत्तम देख-रेख आउ आकस्मिक फोटो (snapshots) के प्रकाशन के योग्य हो सकऽ हइ । वर्तमान समय में सब समान के बाग में जामा कइल हइ आउ ओहे से परिवर्तनशील मौसम से प्रभावित होवऽ हइ - बारिश में भींग जा हइ, धूल-धूसरित हो जा हइ आउ धीरे-धीरे गरमी के मौसम में नष्ट हो जा हइ; कुछ साल आउ गुजरतइ, आउ निस्संदेह, संग्रह में से बहुत कुछ विज्ञान लगी हमेशे लगी खो जइतइ । अभिए अधिकांश वस्तु सब टुट्टल हइ, आउ मूर्ति के खंड, आउ अखंडित वस्तु सब के भी चोरा लेल जा हइ आउ गायब हो जा हइ । संग्रहालय के सब्भे वस्तु बिहार में संगृहीत हइ आउ बौद्ध धर्म के सबसे अंतिम युग के हइ, पौराणिकी (mythology) के तीव्रतम विकास के युग के हइ; लेकिन ई ओकर महत्त्व के कम नयँ करऽ हइ; ई सब मूर्ति के सहायता से आउ शिलालेख के अध्ययन के बाद आउ अधिक ई निश्चय करे के संभावना हइ [*192] कि बिहार में केतना अवधि तक बौद्ध धर्म टिक्कल रहलइ, आउ भारत में अपन अस्तित्व के अंतिम काल में कउन प्रकार के हलइ । कला के संबंध में पूरा संग्रह, पंजाब में पावल जाल ओइसने वस्तु सब से आउ लाहौर संग्रहालय में संगृहीत वस्तु सब से बहुत निम्नतर कोटि के हइ । भगोड़ा संग्राहक सब वस्तु के एगो विस्तृत सूचीपत्र (catalogue) छोड़ गेलइ, जे लेकिन अभी बिहार में नयँ हइ, आउ ई एगो महत्त्वपूर्ण क्षति हइ; जाहाँ तक वस्तु सब के विवरण के मामला हइ, त निस्संदेह एकरा फेर से तैयार कइल जा सकऽ हइ, लेकिन वर्तमान समय में हियाँ केकरो ई बात मालुम नयँ, कि कउन वस्तु काहाँ से लावल गेलइ, चाहे काहाँ परी कउन हालत में ऊ मिललइ । लेकिन ई संग्रहालय शहर के एगो अल्पकालिक आउ बिलकुल सांयोगिक सौन्दर्य हइ । कुछ साल आउ गुजरतइ, संग्राहक के कलंकित नाम भुला देवल जइतइ, संग्रह पर ही अधिक ध्यान देल जइतइ, आउ येन केन प्रकारेण ओकरा दोसर जगहा पर स्थानांतरित कइल जइतइ; ऊ समय तक, ई आशा कइल जा सकऽ हइ कि आखिरकार अइसन शानदार कारवाँ-सराय बनावल जइतइ, जेकर हमर समय में पैसा के बल पर बनावे लगी शुरुए कइल गेले हल, जे आंशिक रूप से जामा कइल चंदा से, आउ आंशिक रूप से  क्षेत्रीय जमींदार के दान से प्राप्त कइल गेले हल आउ ई तरह पुरावशेष के संग्रहालय के शहर से दूर हटा देलो पर बिहार लगी गौरव के बात होतइ । हाँ, बिहार से कभियो एकर परिवेश (surroundings) से वंचित नयँ कइल जा सकतइ, जे ओकर प्रदान कइल पुरातात्त्विक सामग्री के प्रचुरता के आधार पर आउ चित्रात्मक स्थिति (picturesque location) के चलते उल्लेखनीय हइ । ठीक शहर के पास में एगो छोटगर पहाड़ी हइ - एकरा पर अभी मस्जिद के खंडहर आउ मुसलमान के कुछ मजार हइ । हियाँ परी कुछ बौद्ध मूर्ति आउ छोटगर-छोटगर चैत्य प्राप्त होले ह, आउ एकर आधार पर एगो बहुत ठोस अनुमान लगावल गेलइ कि मस्जिद आउ मजार ऊ जगह लेलकइ, जाहाँ परी पहिले बौद्ध मठ चाहे मंदिर हलइ।
[*193] ई बात के बारे कि हियाँ परी कउन प्रकार के मंदिर हलइ, प्राचीन काल में ओकरा कउन नाम से पुकारल जा हलइ, पुरातत्त्ववेत्ता लोग के बीच अभियो तक विवादास्पद हइ । पहाड़ी के स्थिति पटना से दक्षिण-पूरब आउ बड़गाँव चाहे नालंदा से उत्तर-पूरब ई अनुमान के संभावना दे हइ कि ई पहाड़ी ठीक ओहे एकाकी (solitary) पहाड़ी हइ, जेकरा बारे फ़ाशियान (Faxian, परंपरागत चीनी लिपि में 法顯 , सरलीकृत रूप में 法显) पचमी शताब्दी में बात करऽ हइ । ई जगह पर, ओकर शब्द में, एगो मठ हलइ, जेकर कुछ अवशेष बिहार के संग्रहालय में संगृहीत हइ । मूर्तियन में से कुछ के, जे हियाँ परी मिलले हल, ब्रोडली द्वारा विवरण देल गेले ह आउ ऊ सब पर के समझ लेल जा चुकल शिलालेख (inscriptions) के अनुसार बहुत रोचक हइ । लेकिन ई सब शिलालेख काफी बाद के हइ ।
भारत में, देश के अंदर, रेलमार्ग आउ  राजमार्ग से दूर, साधारणतः अदमी के कन्हा द्वारा ढोवल जाल पालकी में लोग यात्रा करते जा हइ; घोड़ा सगरो नयँ मिल्लऽ हइ, आउ सीधे उपरे से पड़ रहल सूरज के किरण में हमेशे घोड़ा से कइएक घंटा तक यात्रा करना सुविधाजनक नयँ होवऽ हइ; लगभग दस बजे सूरज तेजी से जलावे लगऽ हइ, हियाँ तक कि दिसंबर आउ जनवरी में भी, मतलब शरद् ऋतु  के बीचोबीच में, आउ बाद में तो गरमी आउ जादे कष्टकारक होवऽ हइ ।
बिहार में भारवाहक (कुली) के मजदूरी बहुत जादे नयँ होवऽ हइ आउ स्थानीय प्राधिकारी द्वारा निश्चित कइल जा हइ ताकि यात्री आउ भारवाहक के बीच कोय वाद-विवाद नयँ होवे - लेकिन, भारवाहक एतना कम आग्रही होवऽ हइ कि नगण्य बख्शीश ओकन्हीं के पूरा संतुष्ट कर दे हइ, आउ एकरा खातिर अतिरिक्त सेवा करे लगी तैयार हो जा हइ । ओकन्हीं एक घंटा में तीन से चार मील तक पैदल चल्लऽ हइ; आउ जेतने जादे भारवाहक होवऽ हइ, ओतने जल्दी समान के ढुलाई होवऽ हइ । एक यात्री लगी थोड़े दूरी के यात्रा में चार चाहे छो अदमी पूरा तरह से काफी होवऽ हइ । मूलवासी लमगर दूरी के यात्रा पर भी अकसर कमहीं भारवाहक के साथ चल पड़ते जा हइ; एगो यूरोपियन के अइसन यात्रा करे लगी चाहलो पर कभी सफलता नयँ मिलतइ । बिहार में मजूर के मजूरी बहुत जादे नयँ होवऽ हइ - रोज के हिसाब से दू आना पावऽ हइ, अर्थात् ¼ शिलिंग । जमींदार के काम खातिर [*194] ओकरा एकर आधा मिल्लऽ हइ, चाहे ओकरा चावल देल जा हइ, जेकर कीमत आउ कम होवऽ हइ । पुरनका जमाना में मजदूरी आउ कमती हलइ । औरतियन के तो बहुत कम मिल्लऽ हइ ।
बिहार आउ गया के आसपास ई सब जगह के किसान के स्थिति निम्मन नयँ हइ; ओकरा पास अप्पन नाम से कोय जमीन नयँ होवऽ हइ आउ अधिकांश खाली छोटगर अवधि के किसान होवऽ हइ । अइसन अकसर होवऽ हइ कि ओकरा दस्तावेज के कोय सुरक्षा नयँ होवऽ हइ आउ कभी भी अपन पट्टा (lease) से वंचित कर देल जा सकऽ हइ ।
पट्टा लगी किसान या तो पैसा से चाहे उपज से भुगतान करऽ हइ; पहिलौका हालत में पट्टा के नकदी  कहल जा हइ, दोसरौका में भावली । पट्टा स्थायी  हो सकऽ हइ, चाहे अस्थायी, तीन से नो साल तक के । किराया पैसा के रूप में साल में दू तुरी भुगतान कइल जा हइ, फसल के कटनी के बाद; अगर किसान अपन किराया उपज के रूप में करऽ हइ, त ओकरा हरेक फसल के कटनी के बाद निकास देल जा सकऽ हइ । हलाँकि सैद्धांतिक रूप से किसान के आधा उपज मिल्ले के चाही, लेकिन वास्तव में ओकरा कभियो एक तिहाई से जादे नयँ मिल पावऽ हइ, कभी-कभी तो ओकरो से कम । साधारणतः फसल के कटनी के कुछ समय पहिले किसान के दलाल लोग भावी फासल के आकलन करऽ हइ, आउ अपन मालिक के साथ-साथ अपन खुद के लाभ के ध्यान में रखते, भावी फासल के यथासंभव जादे से जादे पैमाना पर नोट करे के प्रयास करऽ हइ; किसान ओकन्हीं के घूस देवे लगी मजबूर हो जा हइ ताकि सही आकलन नोट कइल जाय, चाहे ओकरा ऊ आधा हिस्सा से जादहीं भुगतान करे पड़ऽ हइ, जे ऊ खुद पावऽ हइ । बिहार के आसापास के जमीन के, सगरो नियन, एकर गुणवत्ता पर निर्भर करऽ हइ; सबसे निम्मन जमीन फी एकड़ 1 पौंड 4 शिलिंग (1 पौंड = 20 शिलिंग) से लेके ओतने माप लगी 4 पौंड 17 शिलिंग पर देल जा हइ; कुछ-कुछ जमीन बिहार के आसपास 6 पौंड 4 शिलिंग फी एकड़ के हिसाब से देल जा हइ, लेकिन 6 शिलिंग आउ 12 शिलिंग फी एकड़ वला भी जमीन हइ । किसान पट्टा पर 2 से 16 एकड़ तक ले हइ; औसत पट्टा साढ़े छो एकड़ से जादे नयँ होवऽ हइ आउ किसान द्वारा पट्टा पर लेल एतना जमीन काफी से अधिक समझल जा हइ । [*195] अंग्रेज अफसर लोग के हिसाब के अनुसार 1 पौंड मासिक आमदनी, ई सब जगह में, छो जन के एगो खेतिहर परिवार के गुजारा लगी पूरा तरह से सुरक्षित होवऽ हइ । पटना जिला में पट्टा चाहे बटाई पर काम करे वलन जोतदार के अलावे बहुत सारा भूमिहीन मजूर लोग हइ, आउ दिहाड़ी पर काम करे वलन मजूर भी हइ, जे दासत्व (slavery) के पहिले गरीबी तक पहुँचावल हइ । दक्षिण बिहार में बहुत अकसर अइसन होवऽ हइ कि कर्जदार खुद के चाहे अपन बाल-बुतरू के दासत्व में बेच दे हइ । ई दास (बंधुआ मजूर) लोग के, जेकर अंग्रेजी कानून द्वारा मान्यताप्राप्त नयँ हइ, अस्तित्व हइ आउ भिन्न-भिन्न नाम से जानल जा हइ - नफ्फर, लौंड़ी आउ गुलाम । स्वतंत्र मजूर के नगद के बदले उत्पन्न अनाज के रूप में (चाहे आउ कोय सुविधा के रूप में) मजूरी देल (paid in kind) जा हइ आउ निस्संदेह जादे नयँ, जइसन कि उपरे उल्लेख कइल जा चुकले ह । दास के कम नयँ मिल्लऽ हइ - ई बात के ध्यान में रखते कि ऊ विरले स्वतंत्रता खोजऽ हइ आउ अपन जिनगी एक्के जगह गुजार दे हइ, आउ जे रोजाना पाँच-छो पौंड (दू-तीन किलो) चावल में संतुष्ट रहऽ हइ ।
कमिया या हरवाहा के पूरा सीज़न खातिर रक्खल जा हइ । साधारणतः ओकन्हीं के 1 पौंड से लेके 2 पौंड तक अग्रिम देल जा हइ आउ अइसन कर्जदार होल हरवाहा ओतना समय तक काम करे लगी बाध्य होवऽ हइ, जब तक कि ऊ अपन कर्ज चुका नयँ दे हइ । मालिक ओकरा हल आउ बीज दे हइ आउ ओकरा से रोजाना जबरदस्ती लगभग नो घंटा काम करवावऽ हइ । बहुत अकसर अइसन होवऽ हइ कि कर्ज कभियो नयँ चुकावल जा हइ आउ ऊ पिता से विरासत के रूप में बेटवा पर चल जा हइ, जे ओहे गुलामी के वहन करऽ हइ । एक मामला में दास (गुलाम) के स्थिति स्वतंत्र दिहाड़ी पर काम करे वला मजूर से बेहतर होवऽ हइ - मालिक ओकरा खाली खाने नयँ, बल्कि कपड़ो दे हइ; एकरा अलावे ओकर बाल-बुतरू के शादी के खरचा उठावे के भारो खुद पर ले हइ ।


इवान मिनायेव के बिहार यात्राः लेखक के परिचय



लेखक के संक्षिप्त परिचय

ए॰पी॰ बरान्निकोव द्वारा रूसी में लिखित इवान मिनायेव के विस्तृत जीवनी के अंग्रेजी अनुवाद "Travels in and Diaries of India and Burma" में पृ॰23-39 में देखल जा सकऽ हइ ।

इवान पावलोविच मिनायेव (Иван Павлович Минаев) (1840-1890) पहिला रूसी भारतविद् हथिन जिनकर शिष्य में  सिर्गेय ओल्देनबुर्ग, फ्योदर शेरबात्स्कोय आउ द्मित्री कुद्र्याव्सकी के नाम आवऽ हइ ।

सांक्त-पितिरबुर्ग विश्विद्यालय में वसिली वसिल्येव के शिष्य इवान मिनायेव पालि साहित्य में रुचि लेलथिन आउ ब्रिटिश म्यूज़ियम आउ बिब्लियोतेक नाश्योनाल में उपलब्ध पालि हस्तलेख सब के सूची (अभियो अप्रकाशित) बनावे खातिर विदेश गेलथिन । उनकर रूसी भाषा में लिक्खल पालि व्याकरण (1872) के अनुवाद फ्रेंच (1874) आउ अंग्रेजी (1882) में प्रकाशित होले हल । मिनायेव के उत्कृष्ट रचना Buddhism: Untersuchungen und Materialien (बौद्ध-धर्म - शोध आउ सामग्री) के प्रकाशन 1887, खंड 1, में होले हल । [1]
  
"मिनायेव लगभग पहिला यूरोपीय प्राच्यविद् हलथिन ... जे ई अनुभव कइलथिन कि प्राचीन भारत के इतिहास आउ समाज लगी बौद्ध धर्म आउ पालि साहित्य के ज्ञान आवश्यक हइ ।" [2]

रूसी भौगोलिक सोसाइटी के सदस्य के रूप में ऊ भारत, सिलोन (श्रीलंका) आउ बर्मा के यात्रा 1874-75, 1880 आउ 1885-86 में कइलथिन हल । उनकर रूसी जर्नल में प्रकाशित यात्रा विवरण के अंग्रेजी अनुवाद 1958 आउ 1970 में प्रकाशित होले हल ।

इवान पावलोविच मिनायेव के जन्म तम्बोव गुबेर्निया (राज्य) के एगो कुलीन परिवार में 21 अक्तूबर 1840 में होले हल । उनकर अच्छा तरह से लालन-पालन घरे पर होलइ आउ बाद में ऊ पहिले मास्को के प्राथमिक शाला में शिक्षा ग्रहण कइलथिन, आउ फेर तम्बोव में, जाहाँ ऊ हाई स्कूल के कोर्स 1858 में पूरा कइलथिन । फेर एहे वर्ष पितिरबुर्ग यूनिवर्सिटी के प्राच्य भाषा प्रभाग में दाखिला लेलथिन, जाहाँ ऊ बखत के महान चीन-विद्या विशेषज्ञ आउ बौद्ध-धर्म के प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर वी॰ पी॰ वसिल्येव आउ पितिरबुर्ग यूनिवर्सिटी के प्रथम संस्कृत प्रोफेसर के॰ ए॰ कोसोविच के मार्गदर्शन में अध्ययन कइलथिन । फरवरी 1861 में उनकर लेख "मंगोलिया के भौगोलिक अध्ययन" पर उनका स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) मिललइ । सन् 1862 में चीनी-मंचूरियन प्रभाग से अपन कोर्स पूरा कइलथिन । घरे पर रहते ऊ फ्रेंच आउ जर्मन भाषा के पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कइलथिन हल । यूनिवर्सिटी में ऊ अंग्रेजी भी सिखलथिन । मिनायेव के बौद्ध-धर्म में विशेष रुचि हलइ, जेकरा से उनका संस्कृत, पालि, प्राकृत भाषा सीखे में प्रवृत्ति होलइ । बाद में ऊ कुछ आधुनिक भारतीय भाषा भी सिखलथिन     

यूनिवर्सिटी के शिक्षा समाप्त कइला पर ऊ बौद्ध-धर्म के मूल स्रोत के अध्ययन के पक्का इरादा कर लेलथिन, जेकरा लगी संस्कृत आउ पालि साहित्य के ठोस आउ गहरा ज्ञान आवश्यक हलइ । अतएव ऊ सन् 1863 में लमगर अवधि के विदेश दौरा कइलथिन आउ सबसे पहिले बेर्लिन आउ ग्योटिंगन में दू बरस के दौरान तत्कालीन प्रसिद्ध प्राच्यविद् बॉप, वेबर आउ बेनफ़ी के व्याख्यान सुनलथिन । राष्ट्रीय शिक्षा मंत्रालय से प्राच्य इतिहास के अध्यापन के खातिर तैयारी करे लगी यात्रा के प्रस्ताव मिलला पर मिनायेव अगला तीन साल स्वतंत्र रूप से पेरिस आउ लंदन में पांडुलिपि के अध्ययन कइलथिन ।

इवान मिनायेव के रचनावली के प्रकाशित अंग्रेजी अनुवाद:

प्रो॰ इवान मिनायेव के संपूर्ण Bibliography "Indian Historical Quarterly, Vol. X, 1934" (पुनर्मुद्रण 1985, दिल्ली) के पृ॰ 811-826 में प्रकाशित होले ह, जेकरा में से निम्नलिखित रचना के अभी तक अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हइ ।

(1)   Pali Grammar (first published,1882)- Reprint 2010
(2)   Travels in and Diaries of India and Burma - 1958, published from Calcutta
(3)   Old India - Notes on Afanasy Nikitin's "Voyage Beyond the Three Seas", 2010
(4)   Clever Wives & Happy Idiots - Folktales from Kumaon Himalayas – 2015
‘*****************************************************************************************************
[1]. Gregory D. Alles. Religious Studies: A Global View. Routledge, 2007. Page 55.
[2]. The Indo-Asian Culture, Volume 18. Indian Council for Cultural Relations, 1969. Page 64.


इवान मिनायेव के बिहार यात्राः अनुवादक के भूमिका


रूसी भारतविद् इवान मिनायेव के बिहार यात्रा (1875)

अनुवादक के भूमिका

रूसी भारतविद् इवान पावलोविच मिनायेव (1840-1890) सन् 1875 में बिहार के यात्रा कइलथिन हल, जेकर संस्मरण "Очерки Цейлона и Индии" (1878) अर्थात् "सिलोन आउ भारत के रूपरेखा" (1878) नामक शीर्षक से दू खंड में प्रकाशित पुस्तक में से पहिला खंड के पृ॰187-230 (अर्थात् कुल 44 पृष्ठ) में छपले हल । जहाँ तक हमरा जनकारी हइ, एकर अभी तक अंग्रेजी चाहे कउनो भारतीय भाषा में अनुवाद नयँ होले ह, जबकि बिहार के बारे  फ्रांसिस बुकानन के 1811-1812 में कइल गेल सर्वेक्षण के 1925 में प्रकाशित रिपोर्ट, फेर किट्टो के 1847 के रिपोर्ट आउ बाद में कनिंघम के 1862-1863 में कइल गेल सर्वेक्षण के 1871 में प्रकाशित रिपोर्ट, ब्रोडली के 1872 के रिपोर्ट अंग्रेजी में उपलब्ध हकइ ।

इवान मिनायेव के संस्मरण के ऐतिहासिक आउ पुरालेखागारीय महत्त्व हइ । अतः एकर अनुवाद करे के बारे कइएक बरस पहिले से हमर विचार हलइ । बिहार के अपने संस्मरण में इवान मिनायेव बिहार (अर्थात् बिहारशरीफ), बड़गाँव, राजगीर, गिरियक, पावापुरी, गया, बोधगया आउ पटना के तत्कालीन भौगोलिक, सामाजिक आउ राजनीतिक परिस्थितिय के वर्णन कइलथिन हँ । ऊ कनिंघम (4 बार), ब्रोडली (2 बार), तारानाथ (3 बार), चीनी यात्री फ़ाशियान (Faxian, 法顯) (4 बार) आउ श्वानचांग (Xuanzang, 玄奘) (5 बार) [भारत में लोग के बीच क्रमशः फ़ाहियान और ह्वेन-सांग के नाम से प्रसिद्ध], मोहम्मद बख़्तियार (1 बार) के नाम के उल्लेख कइलथिन हँ ।


प्रस्तुत हइ - ई यात्रा- वृत्तांत के मगही अनुवाद । एकरा में आयताकार कोष्ठक के अंतर्गत तारांकित चिह्न के बाद के संख्या प्रकाशित मूल रूसी पाठ के पृष्ठ संख्या निर्दिष्ट करऽ हइ ।

1. रूसी भारतविद् इवान मिनायेव के बिहार यात्रा (1875)


रूसी भारतविद् इवान मिनायेव के बिहार यात्रा (1875)



बिहार में (मार्च 1875)




2.0 गिरियक आउ पावापुरी में

3.0 गया में

4.1 बुद्धगया (बोधगया) में

4.2 पटना में

Sunday, February 04, 2018

2.22 रूसी कहानी "कुलीन-किसैनी"


कुलीन-किसैनी
मूल रूसी शीर्षकः Барышня-крестьянка (बारिश्न्या-क्रिस्त्यान्का) ; कहानीकार – पुश्किन
मगही अनुवाद - नारायण प्रसाद

सब्भे पोशाक में तूँ, प्यारी, सुन्दर लगऽ ह ।
--- बग्दानोविच [1]

हमन्हीं के दूरस्थ गुबेर्निया (प्रांत) में से एगो में इवान पित्रोविच बिरिस्तोव के जागीर हलइ । अपन जवानी में ऊ गार्ड सेना में सेवा कइलकइ, सन् 1797 के शुरू  में सेवा-निवृत्त हो गेलइ [2], अपन गाँव चल गेलइ आउ तहिना से हुआँ से कभी बाहर नयँ गेलइ । ऊ एगो गरीब कुलीन लड़की से शादी कइलकइ, जे बुतरू के जन्म देते बखत मर गेलइ, तखने ऊ शिकार पर गेल हलइ । जागीर के देखभाल में जल्दीए ओकरा सांत्वना मिल गेलइ । ऊ अपन योजना के अनुसार घर के निर्माण कइलकइ, कपड़ा के फैक्टरी लगा लेलकइ, अपन आमदनी तीन गुना कर लेलकइ आउ अपन पूरे इलाका में खुद के सबसे बुद्धिमान समझे लगलइ, जेकरा में ओकर पड़ोसी लोग, जे ओकरा हीं अपन परिवार आउ कुतवन के साथ भेंट करे लगी अइते जा हलइ, ओकर बात के खंडन नयँ करऽ हलइ । काम के दिन (on weekdays) ऊ मखमली जैकेट में घुम्मऽ हलइ, छुट्टी के दिन घर के बन्नल बनात के फ्रॉक-कोट पेन्हऽ हलइ; खुद्दे खरच-बरच के हिसाब रक्खऽ हलइ आउ सिवाय "सिनेट राजपत्र" (Senate Gazette) के आउ कुछ नयँ पढ़ऽ हलइ । साधारणतः लोग ओकरा मानऽ हलइ, हलाँकि ओकरा अभिमानी समझल जा हलइ ।  ओकरा साथ खाली ग्रिगोरी इवानोविच मुरोम्स्की के पटरी नयँ बैठऽ हलइ, जे ओकर निकटतम पड़ोसी हलइ । ई एगो असली रूसी जमींदार हलइ । मास्को में अपन जागीर के अधिकतर भाग उड़ा-पुड़ाके आउ तभिए विधुर होल ऊ अंतिम बच्चल अपन गाँव में चल गेलइ जाहाँ परी ऊ हरक्कत जारी रखलकइ, लेकिन अब नयका ढंग में । ऊ अंगरेजी बाग [3] लगवइलकइ, जेकरा पर ऊ लगभग अपन पूरा शेष आमदनी खरच कर देलकइ । अस्तबल के ओकर लड़कन अंग्रेज जॉकी (घुड़दौड़ के घुड़सवार) के तरह पोशाक पेन्हऽ हलइ । ओकर लड़की लगी एगो अंगरेज मैडम गवर्नेस (गृह-शिक्षिका) हलइ । अपन खेती ऊ अंगरेजी ढंग से करऽ हलइ ।
लेकिन विदेशी तरीका से रूसी अन्न पैदा नयँ होवऽ हइ [4],
आउ खरचा में बहुत कमी कइला के बावजूद ग्रिगोरी इवानोविच के आमदनी बढ़ नयँ पइलइ; ऊ गाँव में भी नयका कर्जा लेवे के तरीका खोज ले हलइ; लेकिन ई सब के बावजूद ओकरा बुद्धिमान समझल जा हलइ, काहेकि अपन गुबेर्निया में ऊ पहिला जमींदार हलइ जे "संरक्षण परिषद्" में जागीर गिरवी पर रक्खे के बात सोचलके हल - एगो अइसन मामला जे ऊ जमाना में अत्यंत क्लिष्ट आउ साहसिक प्रतीत होवऽ हलइ [5] । ओकर निंदा करे वला लोग के बीच अपन मत व्यक्त करे में बिरिस्तोव सबसे कठोर हलइ । नयका तौर-तरीका के प्रति घृणा ओकर चरित्र के विशेषता हलइ। ऊ अपन पड़ोसी के आंग्ल-उन्माद (anglomania) के बारे ऊ भावशून्यता (equanimity) से बात नयँ कर पावऽ हलइ आउ मिनट-मिनट ओकर आलोचना करे के अवसर ढूँढ़ते रहऽ हलइ । ऊ अतिथि के अपन जागीर देखावइ, आउ अपन प्रबंधन के प्रशंसा के उत्तर में धूर्त मुसकान के साथ बोलइ - "जी हाँ ! हमरा पास तो ऊ नयँ हइ, जे पड़ोसी ग्रिगोरी इवानोविच के हइ । कन्ने हमन्हीं अंग्रेजी शैली अपनाके खुद के बरबाद करिअइ ! निम्मन होतइ कि हमन्हीं रूसी शैली से हीं बल्कि पेट भरिअइ।" ई आउ अइसने व्यंग्य, पड़ोसी लोग के उत्साह से, नमक-मिर्च लग्गल रूप में ग्रिगोरी इवानोविच के हियाँ पहुँच जा हलइ । अंग्रेजियत के सनकी ई आलोचना के ओतनहीं अधीरता से सहन करइ, जइसे कि हमन्हीं के पत्रकार लोग । ऊ आग-बबूला हो जाय आउ अपन छिद्रान्वेषी अशुभचिंतक आलोचक के भालू आउ संकीर्ण दिमाग वला कहइ ।
ई दुन्नु जमींदार के बीच अइसन संबंध हलइ जब बिरिस्तोव के बेटा ओकरा पास गाँव अइलइ । ओकर शिक्षा-दीक्षा *** विश्वविद्यालय में होले हल आउ ऊ मिलिट्री में योगदान करे लगी मनमनाल हलइ, लेकिन ओकर बाप एकरा लगी तैयार नयँ होलइ । नवयुवक सिविल सेवा लगी खुद के बिलकुल अयोग्य अनुभव करऽ हलइ। ओकन्हीं एक दोसरा के प्रति नयँ झुकलइ, आउ नवयुवक अलिक्सेय ई दौरान एगो नवाबजादा के जिनगी जीए लगलइ, आउ ई सोचके कि कहीं जरूरत नयँ पड़ जाय, ऊ अपन मोंछ बढ़ा लेलकइ [6] ।
अलिक्सेय वास्तव में एगो निम्मन व्यक्ति हलइ । सचमुच अफसोस के बात होते हल, अगर ओकर पातर कमर के कभी मिलिट्री वर्दी नयँ जकड़ते हल आउ अगर ऊ घोड़ा पर खुद के प्रदर्शित करे के बजाय अपन जवानी ऑफिस के दस्तावेज में गुजारके अपन पीठ कुब्बड़ कर लेते हल । ई देखके कि कइसे ऊ शिकार करते बखत, रस्ता के बिन परवाह कइले, हमेशे सबसे आगू सरपट घोड़ा दौड़इते चल जा हलइ, पड़ोसी सब एकमत से बोलऽ हलइ कि ऊ खुद के कभी कोय विभाग के चीफ़ के योग्य नयँ बना पइतइ । नवयुवती सब ओकरा तरफ बार-बार नजर डालऽ हलइ, आउ कुछ तो एकटक भी देखते रहऽ हलइ; लेकिन अलिक्सेय ओकन्हीं पर बहुत कम ध्यान दे हलइ, आउ ओकन्हीं ओकर भावशून्यता के कारण ओकर कोय प्रेम संबंध समझते जा हलइ । वस्तुतः ओकर पत्र सब में से एगो के पता के प्रति एक हाथ से दोसरा हाथ प्रसारित हो रहले हल - सेवा में, अकुलीना पित्रोव्ना कुरोच्किना, मास्को, अलिक्सेय मठ के सामने, ठठेरा सावेल्येव के मकान । आउ अपने से नम्र निवेदन हइ कि ई पत्र के अ.न.र. के हाथ में पहुँचा देल जाय ।
हमर पाठकगण में से ऊ, जे कभी गाँव में नयँ रहलथिन हँ, कल्पना नयँ कर सकऽ हथिन कि ई प्रांतीय नवयुवती लोग केतना सुन्दर होवऽ हइ ! स्वच्छ हावा में, अपन सेब के बाग के छाया में पालित-पोषित, ओकन्हीं संसार आउ जीवन के ज्ञान पुस्तक से प्राप्त करते जा हइ । एकांत, स्वछंदता आउ अध्ययन ओकन्हीं में जल्दीए भावना आउ भावावेग विकसित कर दे हइ, जे हमन्हीं के (अर्थात् रजधानी अथवा बड़गर शहर के) भावशून्य सुन्दरी सब लगी अनजान हइ । अइसन नवयुवती सब लगी घंटी के टनटनाहट एगो साहसपूर्ण कार्य प्रतीत होवऽ हइ, नगीच के शहर के यात्रा जिनगी के युगांतरकारी घटना समझल जा हइ, आउ घर पर अतिथि के आगमन एगो दीर्घकालिक, कभी-कभी अमिट छाप भी छोड़ जा हइ । निस्संदेह, ओकन्हीं के कुछ विचित्रता पर कोय भी निस्संकोच हँस सकऽ हइ, लेकिन सतही प्रेक्षक (superficial observer) के मजाक ओकन्हीं के वास्तविक गुण के मेटा नयँ सकऽ हइ, जेकरा में से मुख्य हइ - चारित्रिक विशिष्टता, व्यक्तित्व के मौलिकता (individuality) [7], जेकरा बेगर, जॉन पाल के मतानुसार, मानवीय महानता के अस्तित्व भी नयँ होवऽ हइ [8]। रजधानी में महिला सब के शिक्षा बेहतर प्राप्त हो सकऽ हइ; लेकिन समाज के रंग-ढंग जल्दीए ओकन्हीं के चारित्रिक विशेषता के समतल कर दे हइ आउ आत्मा के टोपी नियन समरूप (uniform) बना दे हइ । ई न तो फैसला के रूप में कहल जइतइ आउ न निंदा के रूप में, तइयो जइसन कि एगो प्राचीन टिप्पणीकार लिक्खऽ हइ, नोता नोस्त्रा मानेत  [nota nostra manet - (लैटिन) हमर टिप्पणी मान्य ठहरऽ हइ] ।
असानी से कल्पना कइल जा सकऽ हइ कि कइसन छाप अलिक्सेय हमन्हीं के नवयुवती लोग के मंडली पर छोड़लके होत । ऊ ओकन्हीं के सामने प्रकट होवे वला सबसे पहिला उदास आउ निराश व्यक्ति हलइ, ऊ पहिला व्यक्ति हलइ जे ओकन्हीं से बरबाद होल खुशी आउ अपन मुरझाल जवानी के बारे बोलऽ हलइ; आउ ओकरो से बढ़के ऊ मौत के सिर के चित्र के साथ कार अँगूठी पेन्हऽ हलइ । ई सब कुछ ऊ गुबेर्निया (प्रांत) में अत्यंत नवीन हलइ । नवयुवती सब ओकरा पर पागल होब करऽ हलइ ।
लेकिन ओकरा में सबसे जादे रुचि लेवे वली में हलइ हमर आंग्ल-उन्मादी के बेटी, लीज़ा (चाहे बेत्सी, जइसन कि साधारणतः ग्रिगोरी इवानोविच ओकरा पुकारऽ हलइ) । दुन्नु के पिता एक दोसरा हीं नयँ जा हलइ, ऊ अलिक्सेय के अभियो तक नयँ देखलके हल, जबकि ई दौरान पड़ोसी नवयुवती लोग खाली ओकरे बारे बोलऽ हलइ । लीज़ा सतरह साल के हलइ । कार-कार आँख ओकर सामर आउ बहुत मनोहर चेहरा के सजीवता प्रदान करऽ हलइ । ऊ एकलौती आउ ओहे से  लाड़-प्यार से बिगड़ल संतान हलइ । ओकर फुरतीलापन आउ मिनट-मिनट के हरक्कत ओकर पिता के आनंदित करऽ हलइ आउ ओकर चालीस साल के अत्यौपचारिक आउ अविवाहित गवर्नेस मिस जैकसन के निराश कर दे हलइ, जे अपन चेहरा के उज्जर करऽ हलइ आउ भौंह के कार करऽ हलइ, साल में दू तुरी "पामेला" [9] पढ़ऽ हलइ, ओकरा दू हजार रूबल मिल्लऽ हलइ आउ ई बर्बर रूस में  ऊब के मारे मरल जाब करऽ हलइ ।
लीज़ा के देखभाल नास्त्या करऽ हलइ; ऊ ओकरा से जरी अधिक उमर के हलइ, लेकिन ओतने चंचल हलइ जेतना ओकर नवयुवती मालकिन । लीज़ा ओकरा बहुत प्यार करऽ हलइ, अपन सब राज ओकरा बता दे हलइ, ओकरा साथ मिलके अपन मनोरंजन आउ मनसूबा के योजना बनावऽ हलइ; संक्षेप में, नास्त्या प्रिलूचिनो गाँव में, कोय फ्रेंच दुखान्त नाटक चाहे उपन्यास में कोय भी विश्वासपात्र सहेली के अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हलइ ।
"हमरा आझ दावत में जाय लगी इजाजत देथिन", अपन नवयुवती मालकिन के पोशाक पेन्हइते एक रोज नास्त्या कहलकइ ।
"ठीक हउ; लेकिन काहाँ ?"
"तुगीलोवो गाँव में, बिरिस्तोव लोग के हियाँ । ओकन्हीं हीं के रसोइया के घरवली के नामकरण दिवस हइ आउ कल्हे हमन्हीं के दुपहर के भोज लगी निमंत्रण देवे अइले हल ।"
"अच्छऽ !" लीज़ा कहलकइ, "मालिक लोग झगड़ा करते जा हइ, लेकिन नौकर-चाकर सब एक दोसरा के भोज के दावत देते जा हइ ।"
"हमन्हीं के मालिक सब से की लेना-देना हइ !" नास्त्या एतराज कइलकइ; "एकरा अलावे हम तो अपने के नौकरानी हिअइ, अपने के पापा के तो नयँ । अपने तो नवयुवक बिरिस्तोव से झगड़ा नयँ कइलथिन हँ । बुढ़वन के आपस में लड़े देथिन, अगर उनकन्हीं के एकरा से खुशी मिल्लऽ हइ ।"
"कोशिश करिहँ, नास्त्या, अलिक्सेय बिरिस्तोव से जरी मिल्ले के, आउ फेर हमरा निम्मन से बतइहँऽ कि ऊ देखे में कइसन हइ आउ कइसन अदमी हइ ।"
नास्त्या वादा कइलकइ, आउ लीज़ा दिन भर ओकर वापिस आवे के बेसब्री से इंतजार कइलकइ । शाम के नास्त्या अइलइ ।
"अच्छऽ, लिज़ावेता ग्रिगोर्येव्ना", कमरा के अंदर आके ऊ कहलकइ, "हम नवयुवक बिरिस्तोव के देखलिअइ; काफी देखलिअइ; दिन भर साथ-साथ हलिअइ ।"
"अइसन कइसे ? बताव, सब कुछ सिलसिलेबार ढंग से बताव ।"
"जी सुनथिन - हमन्हीं रवाना होलिअइ - हम, अनीसिया इगोरोव्ना, निनीला, दून्का ..."
"अच्छऽ, अच्छऽ, मालुम हइ ।  बाद में ?"
"किरपा करके टोकथिन नयँ, सब कुछ सिलसिलेबार ढंग से बतइबइ । त हमन्हीं ठीक भोजन के बखत पहुँचते गेलिअइ । कमरा लोग से भरल हलइ । अइते गेले हल - कोल्बिनो गाँव के लोग, ज़ख़ार्येवो के लोग, बेटियन के साथ में प्रबंधक (steward) के पत्नी, ख़्लुपिनो गाँव के लोग ..."
"अच्छऽ ! आउ बिरिस्तोव ?"
"जरी ठहरथिन जी । त अइकी हमन्हीं टेबुल भिर बैठलिअइ, प्रबंधक के पत्नी पहिला जगह पर, आउ हम ओकर बगल में ... आउ ओकर बेटियन मुँह फुला लेते गेलइ, लेकिन हम तो ओकन्हीं पर थुक्कऽ हिअइ ..."
"आह, नास्त्या, तोर हमेशे के एतना विस्तृत विवरण केतना उबाऊ होवऽ हउ !"
"आउ अपने केतना अधीर हथिन ! त अइकी हमन्हीं टेबुल भिर से उठते गेलिअइ ... आउ हमन्हीं तीन घंटा बैठल रहलिए हल, आउ खाना निम्मन हलइ; नीला, लाल आउ धारीदार ब्लाँ-माँझ [blancmange - (फ्रेंच) दूध आउ मक्का के आटा के अपारदर्शक जेली नियन बन्नल हलवा] के डिज़र्ट (dessert) ... त हमन्हीं टेबुल भिर से उठते गेलिअइ आउ छुआ-छुऔवल (पकड़म-पकड़ी) के खेल खेले खातिर बाग में गेते गेलिअइ, आउ नवयुवक मालिक हुएँ परी आ गेलथिन ।"
"त फेर ? की ई सच हइ कि ऊ देखे में बहुत सुंदर हइ ?"
"अद्भुत रूप से सुंदर, कहल जा सकऽ हइ, अत्यंत सुंदर । पतरगर, लमगर, गाल पूरा लाल-लाल ... "
"सच ? आउ हम सोचब करऽ हलिअइ कि ओकर चेहरा पीयर हइ । त फेर ? ऊ तोरा कइसन लगलउ ? उदास, विचारमग्न ?"
"की कह रहलथिन हँ ? हम कभी अपन जिनगी में अइसन पागल नयँ देखलूँ हँ । ओकर दिमाग में हमन्हीं साथ छुआ-छुऔवल खेले के विचार अइलइ ।"
"तोहन्हीं साथ छुआ-छुऔवल ! असंभव !"
"बहुत संभव हइ ! ऊ तो कहीं आउ अधिक सोच लेलके हल ! (कोय लड़की के) पकड़ लेइ आउ चूम लेइ !"
"तोर मर्जी, नास्त्या, लेकिन तूँ झूठ बोलब करऽ हँ ।"
"चाहे जे कहथिन, हम झूठ नयँ बोलब करऽ हिअइ । हम जबरदस्ती ओकरा से खुद के छोड़इलूँ । दिन भर ऊ हमन्हीं साथ गुजरलकइ ।"
"त फेर लोग कइसे बोलते जा हइ कि ऊ केकरो प्यार करऽ हइ आउ दोसर केकरो तरफ नयँ देखऽ हइ ?"
"जी हमरा नयँ मालुम, लेकिन हमरा दने तो बहुत तकलकइ, आउ तान्या दने भी, प्रबंधक के बेटिया दने भी; आउ कोल्बिनो के पाशा दने भी, आउ ई कहना पाप होतइ, ऊ केकरो अपमानित नयँ कइलकइ, अइसन शरारती हइ !"
"ई तो अजीब बात हइ ! आउ घरवा में ओकरा बारे की सुनाय दे हइ ?"
"कहल जा हइ, मालिक बहुत निम्मन हथिन - एतना भला, एतना हँसमुख । एक बात ठीक नयँ हइ - लड़कियन के पीछू पड़ जाना उनका बहुत पसीन हइ । लेकिन, हम्मर विचार से, ई कोय बड़गो दोष नयँ हइ - समय के साथ रस्ता पर आ जइतइ ।"
"हमरा ओकरा देखे के केतना मन करऽ हइ !" उच्छ्वास लेते लीज़ा कहलकइ ।
"त एकरा में कउन बड़गो बात हइ ? तुगीलोवो हमन्हीं हीं से जादे दूर तो नयँ हइ, केवल तीन विर्स्ता - ओद्धिर टहले लगी निकल जाथिन चाहे घोड़ा पर चल जाथिन; अपने के पक्का ओकरा से मोलकात हो जइतइ । ऊ तो रोज दिन भोरगरे बंदूक लेके शिकार पर जा हइ ।"
"अरे नयँ, ई ठीक नयँ । ऊ सोच सकऽ हइ कि हम ओकर पीछू लगल हिअइ । एकरा अलावे हमन्हीं के पिता के बीच लड़ाय हइ, ओहे से हमरा ओकरा से परिचित होना असंभव हइ ... आह, नास्त्या ! एक बात जन्नऽ हीं ? हम एगो किसैनी के वेष धारण कर लेबइ !"
"हाँ, हाँ, जरूर । मोटगर कमीज आउ सराफ़ान पेन्ह लेथिन, आउ डीड़ होके तुगीलोवो चल जाथिन; हम विश्वास देलावऽ हिअइ कि बिरिस्तोव के ध्यान अपने ऊपर जाय बेगर नयँ रहतइ ।"
"आउ हम हियाँ के भाषा में बहुत निम्मन से बात कर सकऽ हिअइ । आह, नास्त्या, प्यारी नास्त्या ! कइसन निम्मन उपाय हइ !" आउ लीज़ा अपन दिलचस्प उपाय के दृढ़तापूर्वक साकार करे के इरादा के साथ सुत रहलइ ।
दोसरे दिन ऊ अपन प्लान के पूरा करे में लग गेलइ । बजार से मोटगर कपड़ा, साधारण नीला सूती कपड़ा, आउ तामा के बोताम खरदे लगी अदमी भेजलकइ, नास्त्या के मदत से अपना लगी कमीज आउ सराफ़ान लगी कपड़ा कटलकइ, नौकरानी सब के सीए लगी बैठा देलकइ, आउ साँझ तक सब कुछ तैयार हो गेलइ ।
लीज़ा नयका पोशाक पेन्हके अजमइलकइ आउ अइना (दर्पण) के सामने स्वीकार कइलकइ कि कभियो खुद के ओतना सुंदर नयँ लगले हल । ऊ अपन भूमिका के रेहलसल (रिहर्सल, अभ्यास) कइलकइ, चलते-फिरते बखत झुकके अभिवादन करते आउ कइएक तुरी चीनी मिट्टी के बिलाय नियन सिर हिलइलकइ, किसैनी के अंदाज में बोललइ, आस्तीन से मुँह ढँकते हँसलइ, आउ नास्त्या के पूरा अनुमोदन के योग्यता देखइलकइ । ओकरा लगी एक्के कठिनाई हलइ - ऊ प्रांगण (अहाता) में खाली गोड़ चलके अजमइलकइ, लेकिन ओकर नाजुक गोड़ में घास के थिगली (turf) गड़ रहले हल, आउ बालू आउ कंकड़ ओकरा लगी बरदास के बाहर हलइ । नास्त्या ओकरा हियाँ परी मदत कइलकइ - ऊ लीज़ा के गोड़ के नाप लेलकइ, दौड़ल गड़ेरिया त्रोफ़िम भिर मैदान में गेलइ आउ ओकरा ऊ नंबर के छाल के एक जोड़ी जुत्ता (a pair of bast shoes) के औडर देलकइ।
दोसरा दिन भोरगरे लीज़ा उठ चुकले हल । पूरा घर अभियो तक सुत्तल हलइ । नास्त्या फाटक के बहरसी गड़ेरिया के इंतजार करब करऽ हलइ । भोंपू बज उठलइ, आउ गाँव के पशु के झुंड मालिक के अहाता भिर से होते गुजरे लगलइ । त्रोफ़िम, नास्त्या भिर से गुजरते बखत, ओकरा छाल के छोटकुन्ना चितकबरा जुत्ता देलकइ आउ ओकरा से आधा रूबल के सिक्का इनाम में पइलकइ । लीज़ा चुपके से किसैनी के वेष-भूषा धारण कइलकइ, मिस जैकसन के संबंध में नास्त्या के कान में निर्देश देलकइ, पिछुआनी के ड्योढ़ी से बहरसी निकसलइ आउ पाकशाला-उद्यान (kitchen garden) से होके खेत में भाग गेलइ ।
पूरब में ऊषा के प्रकाश चमक रहले हल, आउ बादर के सुनहरा तांता सूरज के प्रतीक्षा करते प्रतीत हो रहले हल, जइसे कि दरबारी लोग सम्राट् के प्रतीक्षा करते जा हइ; निर्मल आकाश, सुबह के ताजगी, ओस, समीर आउ पक्षी के कलरव लीज़ा के हृदय के शैशव प्रसन्नचित्तता से भर रहले हल । ई आशंका से कि कोय परिचित व्यक्ति से कहीं भेंट नयँ हो जाय, लगऽ हलइ कि ऊ चल नयँ रहले हल बल्कि उड़ रहले हल । पिता के जागीर के सीमा के पास के उपवन के नगीच पहुँचला पर लीज़ा धीरे-धीरे चले लगलइ । हियाँ परी ओकरा अलिक्सेय के इंतजार करे के हलइ । ओकर दिल जोर-जोर से धड़क रहले हल, खुद ओकरा समझ में नयँ आ रहले हल कि काहे; लेकिन जवानी के हमन्हीं के शरारत के साथ अनुभव होवे वला भय ही तो ओकर मुख्य आकर्षण हइ । लीज़ा उपवन के धुंधलाहट में प्रवेश कइलकइ । एकर रह-रहके होवे वला अघोष सरसराहट वला शोर लड़की के स्वागत कइलकइ । ओकर आनंद शांत पड़ गेलइ । धीरे-धीरे ऊ मिठगर सपना में खो गेलइ । ऊ सोच रहले हल ... लेकिन की ठीक-ठीक ई बताना संभव हइ कि एगो सतरह साल के रईसजादी, अकेल्ले, उपवन में, वसंत के सुबह छो बजे कउची बारे सोचब करऽ हइ ? ई तरह ऊ विचारमग्न होल, दुन्नु तरफ उँचगर-उँचगर झुक्कल गाछ से छायादार रोड पर से होके जाब करऽ हलइ, कि अचानक एगो सुंदर शिकारी कुत्ता ओकरा पर भुक्के लगलइ । लीज़ा डरके चीख पड़लइ । तखनिएँ एगो अवाज सुनाय पड़लइ - "तू बो, स्बोगार, इसि ..." [tout beau, Sbogar, ici - (फ्रेंच) सब कुछ ठीक हउ, स्बोगार, एद्धिर आव ...] आउ एगो नवयुवक शिकारी झाड़ी के अंदर से प्रकट होलइ ।
"डरऽ मत, प्यारी", ऊ लीज़ा से बोललइ, "हमर कुत्ता नयँ काटऽ हको ।"  
लीज़ा भय से खुद के सँभाल चुकले हल आउ तुरते परिस्थिति के फयदा उठा लेलकइ ।
"लेकिन नयँ, मालिक", ऊ आधा भयभीत आउ आधा लजाल नियन ढोंग करते कहलकइ, "हमरा डर लगऽ हइ - देखथिन, ऊ केतना निर्दय हइ; फेर से हमरा पर झपटतइ ।"
अलिक्सेय (पाठक ओकरा अब तक पछान लेलथिन होत) ई दौरान एकटक नवयुवती किसैनी दने देखब करऽ हलइ ।
"हम तोरा साथ-साथ चल सकऽ हियो, अगर तोरा डर लगऽ हको", ऊ ओकरा कहलकइ, "तूँ हमरा अपन साथ चल्ले के इजाजत दे हो ?"
"केऽ तोहरा रोकब करऽ हको", लीज़ा उत्तर देलकइ, "हरेक के अपन मर्जी हइ, आउ रस्ता तो सब्भे लगी हइ।"
"कउन गाँव के हकहो ?"
"प्रिलूचिनो के; हम वसिली लोहार के लड़की हिअइ, खुम्मी (mushrooms) चुन्ने लगी जाब करऽ हिअइ ।" (लीज़ा एगो रस्सी से टोकरी लेले जाब करऽ हलइ ।) "आउ तूँ, मालिक ? तुगीलोवो के हकहो की ?"
"बिलकुल सही", अलिक्सेय उत्तर देलकइ, "हम छोटका मालिक के कामेरडिनेर [Kammerdiener - (जर्मन) ज़ारशाही के दौरान रूसी कुलीन परिवार में घर के अंदर काम करे वला नौकर] हिअइ ।"
अलिक्सेय बराबर के दर्जा पर बात करे लगी चहलकइ । लेकिन लीज़ा ओकरा पर नजर डललकइ आउ हँस पड़लइ ।
"लेकिन तूँ झूठ बोलऽ ह", ऊ कहलकइ, "हमरा बेवकूफ मत समझऽ । देखऽ हियो कि तूँ खुद छोटका मालिक हकऽ ।"
"तूँ अइसन काहे सोचऽ हो ?"
"हर तरह से ।"
"तइयो ?"
"मालिक आउ नौकर में अंतर कइसे नयँ समझल जा सकऽ हइ ? तोहर पर-पोशाक ओइसन नयँ हको, आउ दोसरा तरह से बात करऽ हो, आउ कुतवा के हमन्हीं के भाषा में नयँ पुकारऽ हो ।"
लीज़ा अलिक्सेय के लगातार अधिकाधिक पसीन पड़ रहले हल । गाँव के सुंदर-सुंदर लड़कियन के प्रति औपचारिकता बरते के आदत नयँ रहला से ऊ ओकरा आलिंगन करे लगी चहलकइ; लेकिन लीज़ा ओकरा भिर से उछलके दूर हट गेलइ आउ अचानक अइसन कठोर आउ भावशून्य मुद्रा बना लेलकइ कि हलाँकि ई बात से अलिक्सेय के हँस्सी बर गेलइ, लेकिन आउ आगू बढ़े से ओकरा रोक देलकइ ।
"अगर चाहऽ ह कि हमन्हीं आगू दोस्त बन्नल रहिअइ", ऊ शान से बोललइ, "त खुद पर काबू रखिहऽ ।"
"केऽ तोरा ई बड़गो बुद्धि देलको ?" ठठाके हँसते अलिक्सेय पुछलकइ । "कहीं हमर जान-पछान के नास्तिन्का (नास्त्या) तो नयँ, जे तोहन्हीं के छोटकी मालकिन के नौकरानी हइ ? त कइसन-कइसन रस्ता से शिक्षा के प्रचार होब करऽ हइ !" लीज़ा अनुभव कइलकइ कि ऊ अपन भूमिका से बाहर निकस गेले हल आउ तुरतम्मे खुद के सँभार लेलकइ ।
"आउ तूँ की सोचऽ हो ?" ऊ कहलकइ, "की वास्तव में हम कभी मालिक के ड्योढ़ी में नयँ जा हिअइ ? चिंता मत करऽ - सब कुछ सुनलिए आउ देखलिए ह । लेकिन", ऊ बात जारी रखलकइ, "अगर तोरा साथ गप मारते रहलिअइ, त हम खुम्मी नयँ चुन पइबइ । तूँ एक तरफ अप्पन रस्ता जा, आउ हम अप्पन रस्ता देखम । हम निवेदन करऽ हिअइ ..."
लीज़ा चल जाय लगी चहलकइ, अलिक्सेय ओकर हाथ पकड़के रोक लेलकइ ।
"तोर नाम की हको, हमर प्यारी ?"
"अकुलीना", अलिक्सेय के हाथ से अपन अँगुरी छोड़ावे के प्रयास करते लीज़ा उत्तर देलकइ । "हमरा जाय देथिन, मालिक; हमरा घर जाय के बखत हो गेल ।"
"अच्छऽ, हमर दोस्त अकुलीना, हम पक्का तोर पिता वसीली लोहार के हियाँ भेंट देबो ।"
"ई तूँ की कह रहलहो ह ?" लीज़ा तुरंत एतराज कइलकइ, "भगमान के वास्ते मत अइहऽ । अगर घर के लोग जन जइते जइतइ कि हम एकांत में उपवन में छोटका मालिक से गपशप कइलिए ह, त हमरा लगी तो आफत आ जात; हमर पिताजी, वसीली लोहार, हमरा मार-मारके जान ले लेथन ।"
"लेकिन हम पक्का तोरा से फेर मिल्ले लगी चाहऽ हियो ।"
"अच्छऽ, हम कभी फेर हियाँ पर खुम्मी चुन्ने लगी आ जइबो ।"
"कहिया ?"
"शायद बिहान ।"
"प्यारी अकुलीना, तोरा हम चूम सकऽ हलियो, लेकिन हमरा हिम्मत नयँ पड़ऽ हको । त बिहान, एहे समय, ठीक हइ न ?"
"हाँ, हाँ ।"
"आउ तूँ हमरा धोखा तो नयँ देबहो ?"
"नयँ, धोखा नयँ देबो ।"
"भगमान के कसम खा ।"
"अच्छऽ, अइकी तोरा से पवित्र शुक्रवार (Saint Friday) के कसम खा हियो, अइबो ।"
दुन्नु युवा लोग अलग हो गेते गेलइ । लीज़ा जंगल से बाहर निकसलइ, खेत सब के पार कइलकइ, दबे पाँव पाकशाला-उद्यान में घुसलइ आउ भर मेदान फार्म में दौड़ल चल गेलइ, जाहाँ परी नास्त्या ओकर इंतजार करब करऽ हलइ । अन्यमनस्कता से अपन अधीर विश्वासपात्र के प्रश्न के उत्तर देते, हुआँ परी ऊ कपड़ा बदललकइ, आउ अतिथिकक्ष में अइलइ । टेबुल पर नाश्ता लग्गल हलइ, आउ मिस जैकसन, चेहरा के पाउडर से उज्जर कइले आउ शराब के गिलास नियन खुद के तसमा से कसले (laced herself), ब्रेड के पातर-पातर टुकड़ा काटब करब करऽ हलइ । लीज़ा के पिता जल्दी सुबह के सैर लगी ओकर प्रशंसा कइलकइ ।
"तड़के उट्ठे से बेहतर सेहतगर आउ कुछ नयँ हइ", ऊ कहलकइ ।
हियाँ परी अंग्रेजी पत्रिका से लेके ऊ मानवीय दीर्घायुष्य के कइएक उदाहरण देलकइ, ई टिप्पणी करते कि सो से अधिक साल जीए वला लोग वोदका नयँ पीयऽ हलइ आउ जाड़ा आउ गरमी में तड़के उठते जा हलइ । लीज़ा ओकर बात नयँ सुन्नब करऽ हलइ । विचार में ऊ सुबह के मोलकात के सब्भे परिस्थिति के, आउ अकुलीना के नवयुवक शिकारी के साथ होल सब बातचीत के, दोहराब करऽ हलइ, आउ ओकर अंतःकरण ओकरा यातना देवे लगलइ । व्यर्थ में ऊ खुद के तसल्ली देब करऽ हलइ, कि ओकन्हीं के बातचीत शिष्टाचार के सीमा के उल्लंघन नयँ कइलके हल, कि ई हरक्कत के कइसनो दुष्परिणाम नयँ हो सकऽ हलइ - ओकर अंतःकरण ओकर बुद्धि आउ तर्क के अपेक्षा अधिक असंतोष प्रकट करब करऽ हलइ । दोसरा दिन के देल ओकर वचन ओकरा सबसे अधिक बेचैन कर रहले हल - ऊ लगभग तय कर लेलकइ कि अपन गंभीर शपथ के पूरा नयँ कर पइतइ। लेकिन अलिक्सेय ओकरा लगी व्यर्थ के प्रतीक्षा कर-करके वसीली लोहार के बेटी, असली मोटकी आउ चेचकरू (pockmarked) अकुलीना के खोजे खातिर गाँव में आ जा सकऽ हलइ, आउ ई तरह ओकर चंचलतापूर्ण हरक्कत के बारे अंदाज लगा ले सकऽ हलइ । ई विचार लीज़ा के आतंकित कर देलकइ, आउ ऊ दोसरा दिन सुबह में फेर से अकुलीना के रूप में उपवन में जाय के निर्णय कर लेलकइ ।
आउ अलिक्सेय अपना तरफ से हर्षोल्लास में हलइ, दिन भर ऊ अपन नयका परिचय के बारे सोचते रहलइ; रात में सामली-सलोनी सुंदरी के प्रतिमा ओकरा नीन के दौरानो कल्पना में मँड़रइते रहलइ । मोसकिल से भोर होवे कइले हल कि ऊ कपड़ा पेन्ह-उन्हके तैयार हो चुकले हल । बन्दूक में गोली बोजे के समय बरबाद कइले बेगर ऊ अपन वफादार स्बोगार के साथ खेत में निकस गेलइ आउ मिलन के वादा कइल जगह दने दौड़ल गेलइ । लगभग आधा घंटा ओकरा लगी असहनीय प्रतीक्षा में गुजर गेलइ; आखिरकार झाड़ी के बीच में कौंधते नीला सराफ़ान पर ओकर नजर गेलइ आउ प्यारी अकुलीना से मिल्ले लगी झपट पड़लइ । ऊ ओकर कृतज्ञता के भावावेश पर मुसकइलइ; लेकिन अलिक्सेय के तुरते ओकर चेहरा पर उदासी आउ बेचैनी के लक्षण देखाय देलकइ । ऊ ओकर कारण जाने लगी चहलकइ । लीज़ा स्वीकार कइलकइ कि ऊ अपन हरक्कत के हलका से लेलके हल, कि ओकरा ई बात के खेद हलइ, कि ई तुरी ऊ अपन देल वचन के तोड़े लगी नयँ चाहऽ हलइ, लेकिन ई मिलन अब अंतिम होतइ, कि ऊ परिचय के, जे ओकन्हीं लगी कोय निम्मन परिणाम नयँ देतइ, समाप्त करे लगी ओकरा से निवेदन करऽ हइ । ई सब कुछ, जाहिर हइ, किसान के (अर्थात् देहाती) भाषा में कहल गेलइ; लेकिन विचार आउ भावना, जे सरल लड़की में साधारणतः नयँ पावल जा हइ, अलिक्सेय के आश्चर्यचकित कर देलकइ । ऊ अकुलीना के ओकर इरादा से विचलित करे लगी अपन सब वाक्पटुता के प्रयोग कइलकइ; अपन इच्छा के निर्दोषता के बारे भरोसा देलइलकइ, वचन देलकइ कि ऊ कभियो ओकरा पछतावा के मौका नयँ देतइ, ओकर सब कहना मानतइ, ओकरा अपन एक आनंद से वंचित नयँ करे लगी विनती कइलकइ - ओकरा से एकांत में मिल्ले, बल्कि एक दिन छोड़िए के सही, बल्कि सप्ताह में दुइए तुरी । ऊ सच्चा भावावेग के भाषा में बोल रहले हल आउ ई पल में ऊ पूरा प्रेमासक्त हलइ । लीज़ा ओकर बात चुपचाप सुन रहले हल ।
"हमरा वचन द", आखिर ऊ कहलकइ, "कि तूँ कभियो गाँव में हमर खोज नयँ करबऽ चाहे हमरा बारे पूछताछ करबऽ । हमरा वचन द कि हमरा से आउ कोय मिलन के बात नयँ उठइबऽ, सिवाय ऊ मिलन के जेकरा हम खुद निश्चित करबो ।"
अलिक्सेय ओकरा पवित्र शुक्रवार  के कसम खाहीं वला हलइ कि ऊ मुसकान के साथ ओकरा रोक देलकइ ।
"हमरा कसम के जरूरत नयँ", लीज़ा कहलकइ, "खाली तोहर वचन हमरा लगी काफी हइ ।"
ओकर बाद ओकन्हीं साथ-साथ जंगल में टहलते-टहलते मित्रतापूर्वक बातचीत करते गेलइ, जब तक कि लीज़ा ओकरा नयँ कहलकइ - "अब समय हो गेलो" । ओकन्हीं अलग हो गेते गेलइ, आउ अलिक्सेय अकेल्ले रह गेला पर ई समझ नयँ पइलकइ कि कइसे एगो साधारण ग्रामीण लड़की दू तुरी के मिलन में ओकरा पर वास्तविक अधिकार जमा लेवे में सफल हो गेलइ । अकुलीना के साथ ओकर संबंध में ओकरा लगी नवीनता के आकर्षकता हलइ, आउ हलाँकि विचित्र किसैनी लड़की के निर्देश ओकरा लगी बोझिल लगब करऽ हलइ, लेकिन अपन वचन के नयँ निभावे के विचार ओकरो दिमाग में नयँ अइलइ । बात ई हइ कि अलिक्सेय, निर्णायक अँगूठी, गोपनीय पत्राचार आउ अंधकारमय निराशा के बावजूद एगो उदार आउ भावुक युवक हलइ आउ ओकर हृदय स्वच्छ हलइ, जे निर्दोषता के आनंद के अनुभव करे में सक्षम हलइ ।
अगर हम खाली अपन इच्छा पर ध्यान देतिए हल, त पक्का हम ई युवा लोग के मिलन, परस्पर बढ़ते झुकाव आउ विश्वास, क्रियाकलाप आउ बातचीत के पूरा विस्तार से वर्णन करतिए हल; लेकिन जानऽ हिअइ कि पाठकवर्ग के अधिकांश हमर खुशी में सहभागी नयँ होथिन हल । अइसन विवरण साधरणतः उबाऊ हो सकऽ हइ, ओहे से हम संक्षेप में हीं एतना कहके ई बात के छोड़ दे हिअइ कि दुइयो महिन्ना नयँ गुजरले होत कि हमर अलिक्सेय पागलपन के हद तक प्रेमासक्त हो गेलइ, आउ लीज़ा ओकरा से अधिक भावशून्य नयँ हलइ, हलाँकि ओकरा अपेक्षा अधिक चुप रहऽ हलइ । ओकन्हीं दुन्नु वर्तमान से खुश हलइ आउ भविष्य के बारे बहुत कम सोचते जा हलइ ।
अटूट बंधन के विचार काफी अकसर ओकन्हीं के दिमाग में कौंधऽ हलइ, लेकिन एकरा बारे ओकन्हीं कभियो एक दोसरा से नयँ बोलते जा हलइ । कारण स्पष्ट हलइ - अलिक्सेय बल्कि केतनो अपन प्यारी अकुलीना से आसक्त रहइ, हमेशे अपना आउ गरीब किसैनी लड़की के बीच के विद्यमान दूरी के आद रक्खऽ हलइ; आउ लीज़ा जानऽ हलइ कि कइसन घृणा ओकन्हीं दुन्नु के पिता के बीच हलइ, आउ परस्पर सुलह के आशा करे के साहस नयँ करऽ हलइ । एकरा अलावे ओकर स्वाभिमान के गुप्त रूप से एगो अस्पष्ट रोमानी आशा गुदगुदाब करऽ हलइ कि ऊ आखिर तुगीलोवो के जमींदार के प्रिलूचिनो के लोहार के बेटी के गोड़ पर झुक्कल देखतइ । अचानक एगो बड़गो घटना ओकन्हीं के पारस्परिक संबंध के लगभग परिवर्तित कर देलकइ ।
एगो साफ ठंढगर सुबह (जइसनका हमन्हीं के रूसी शरत्काल में बहुत्ते होवऽ हइ) इवान पित्रोविच बिरिस्तोव घोड़ा पर सवार होके बाहर सैर करे लगी निकसलइ, आउ कहीं जरूरत नयँ पड़ जाय ई सोचके तीन जोड़ा बोर्ज़्वा (एगो नस्ल के रूसी शिकारी कुत्ता), साईस आउ झुनझुन्ना के साथ कुछ दास-लड़कन (serf boys) के ले लेलकइ । ठीक ओहे समय ग्रिगोरी इवानोविच मुरोम्स्की निम्मन मौसम से मुग्ध होके अपन पुँछकट्टी घोड़ी के जीन कसके तैयार करे के आदेश देलकइ आउ अपन अंग्रेजी शैली के जागीर के आसपास दुलकी चाल से हाँकते सैर करे लगी गेलइ । जंगल भिर पहुँचते बखत ऊ अपन पड़ोसी के देखलकइ, जे लोमड़ी के खाल के अस्तर लगल चेकमेन (कमर तक के पुरुष के काकेशियाई जैकेट) पेन्हले शान से घोड़ा पर सवार हलइ आउ ऊ खरगोश के इंतजार कर रहले हल, जेकरा लड़कन चीखते आउ झुनझुन्ना बजइते झाड़ी से बाहर करब करऽ हलइ । अगर ग्रिगोरी इवानोविच के ई भेंट के पूर्वकल्पना होते हल, त निस्संदेह ऊ दोसरा दने मुड़ जइते हल; लेकिन ऊ घोड़ी के हाँकते बिलकुल अप्रत्याशित ढंग से बिरिस्तोव भिर पहुँच गेलइ आउ खुद के ऊ अचानक ओकरा भिर से पिस्तौल के निशाना तक के दूरी पर पइलकइ । अब कुछ नयँ कइल जा सकऽ हलइ । मुरोम्स्की एगो शिक्षित यूरोपियन नियन अपन प्रतियोगी बिजुन अइलइ आउ शिष्टतापूर्वक ओकरा अभिवादन कइलकइ। बिरिस्तोव ओइसने उत्साह से उत्तर देलकइ, जइसे सिक्कड़ से बन्हल एगो भालू अपन मालिक के आदेश पर महानुभाव लोग के सामने झुकके अभिवादन करऽ हइ । ओहे पल खरगोश जंगल से निसलइ आउ खेत से होके भागे लगलइ । बिरिस्तोव आउ साईस गला फाड़के चिल्लाय लगलइ, कुतवन के छोड़ देलकइ आउ ओकरा पीछू घोड़वन के पूरा गति से सरपट भगावे लगलइ । मुरोम्स्की के घोड़ी, जे कभी शिकार पर नयँ गेले हल, डर गेलइ आउ भाग खड़ी होलइ । मुरोम्स्की, जे खुद के एगो श्रेष्ठ घुड़सवार घोषित कइले हलइ, ओकरा स्वेच्छापूर्वक भागे देलकइ आउ अंदर-अंदर ई घटना से खुश हलइ, जे ओकरा अप्रिय सहभाषी (बातचीत में साथ देवे वला) से छुटकारा देला देलके हल । लेकिन घोड़ी, सरपट दौड़ते एगो खाई भिर पहुँच गेला के बाद, जेकरा पर पहिले ओकर नजर नयँ गेले हल, अचानक एक तरफ मुड़ गेलइ आउ मुरोम्स्की अपन सीट पर बन्नल नयँ रह पइलइ । बरफ जम्मल जमीन पर काफी जोर से गिरला पर ऊ अपन पुँछकट्टी घोड़ी के कोसते पड़ल हलइ, जे जइसीं खुद के बिन सवार के अनुभव कइलकइ, त मानूँ होश में आके तुरते रुक गेलइ । इवान पित्रोविच अपन घोड़ा सरपट दौड़इते ओकरा दने अइलइ आउ पुछलकइ कि कहीं ऊ घायल तो नयँ हो गेले ह । एहे दौरान साईस दोषी घोड़ी के रास पकड़ले लइलकइ । ऊ मुरोम्स्की के जीन पर चढ़इलकइ, आउ बिरिस्तोव ओकरा अपना हीं निमंत्रित कइलकइ । मुरोम्स्की इनकार नयँ कर सकलइ, काहेकि ऊ खुद के अनुगृहीत (obliged) अनुभव कर रहले हल, आउ ई प्रकार से बिरिस्तोव गौरव के साथ घर वापिस अइलइ, एगो खरगोश के शिकार करके आउ अपन घायल आउ लगभग युद्ध-बन्दी प्रतियोगी के लेले ।
दुन्नु पड़ोसी जलपान करते बखत काफी दोस्ताना ढंग से बातचीत करते गेलइ । मुरोम्स्की बिरिस्तोव से द्रोश्की (घोड़ागाड़ी) के इंतजाम करे के निवेदन कइलकइ, काहेकि ऊ स्वीकार कइलकइ कि घायल होवे के चलते ऊ घोड़ा पर सवार होके घर तक जाय के हालत में नयँ हइ । बिरिस्तोव ओकरा ड्योढ़ी तक छोड़े लगी अइलइ, लेकिन मुरोम्स्की ओकरा से दोस्ताना ढंग से दुपहर के भोजन पर दोसरे दिन (आउ अलिक्सेय इवानोविच के साथ) प्रिलूचिनो आवे के वचन ले लेवे के पहिले नयँ गेलइ । ई तरह से पुराना आउ गहरा जड़ जम्मल दुश्मनी, लगऽ हलइ, पुँछकट्टी घोड़ी के कायरता के कारण अब खतम होवे वला हलइ ।
लीज़ा ग्रिगोरी इवानोविच से मिल्ले लगी दौड़ल बहरसी अइलइ ।
"की बात हको, पापा ?" ऊ आश्चर्य से पुछलकइ, "तूँ लँगड़ाऽ हो काहे ? तोर घोड़िया कन्ने हको ? ई द्रोश्की केक्कर हइ ?"
"तूँ अंदाजा नयँ लगा पइमँऽ, my dear (हमर दुलारी)", ग्रिगोरी इवानोविच ओकरा उत्तर देलकइ आउ जे कुछ होले हल, ऊ सब बतइलकइ । लीज़ा के अपन कान पर विश्वास नयँ हो रहले हल । ग्रिगोरी इवानोविच ओकरा सँभले के बिन कोय समय देले बता देलकइ कि बिहान अपना हीं दुन्नु बिरिस्तोव दुपहर के भोजन पर आवे वला हथिन ।
"ई की कह रहलहो ह !" पीला पड़ गेल ऊ कहलकइ । "बिरिस्तोव, पिता आउ पुत्र ! बिहान हमन्हीं हीं दुपहर के भोजन पर ! नयँ, पापा, तोहर मर्जी - हम तो उनकन्हीं के सामने आवे वली नयँ ।"
"ई तूँ की कह रहलँऽ हँ, पागल तो नयँ हो गेलँऽ ?" बाप एतराज कइलकइ, "कहिना से तूँ एतना शर्मीली हो गेलँऽ, या कि एगो रोमानी नायिका नियन तूँ उनकन्हीं के साथ आनुवंशिक घृणा (hereditary hatred) अनुभव करऽ हँ ? बहुत हो गेलउ, बेवकूफी के बात मत कर ..."
"नयँ, पापा, कउनो हालत में, कइसनो कीमत पर हम बिरिस्तोव लोग भिर अपन सूरत नयँ देखइबो ।"
ग्रिगोरी इवानोविच अपन कन्हा झटकइलकइ आउ ओकरा साथ फेर आउ बहस नयँ कइलकइ, काहेकि ऊ जानऽ हलइ कि ओकर विरोध करके कुच्छो नयँ मिल्ले वला, आउ अपन स्मरणीय सैर के बाद अराम करे लगी चल गेलइ । लिज़ावेता ग्रिगोर्येव्ना अपन कमरा में चल गेलइ आउ नास्त्या के बोलवइलकइ । कल के भेंट के बारे दुन्नु देर तक विचार-विमर्श करते गेलइ । अलिक्सेय की सोचतइ जब ऊ एगो सुसंस्कृत कुलीन नवयुवती के रूप में अपन अकुलीना के पछान लेतइ ? ओकर व्यवहार आउ सिद्धांत के बारे, ओकर समझ-बूझ के बारे ऊ अपन दिमाग में कइसन राय बनइतइ ? एकर विपरीत, लीज़ा के ई देखे के बहुत मन कइलकइ कि ओकर दिमाग पर एतना अप्रत्याशित मिलन के की छाप पड़ऽ हइ ... अचानक ओकर दिमाग में एगो विचार कौंधलइ। ऊ तुरते ई विचार नास्त्या के बतइलकइ; दुन्नु ई विचार के भगमान के वरदान समझके खुश होते गेलइ आउ ओकरा साकार करे के पक्का निर्णय कर लेते गेलइ ।
दोसरा दिन जलपान के बखत ग्रिगोरी इवानोविच बेटी के पुछलकइ कि कीऽ अभियो ऊ बिरिस्तोव से नुक्कल रहे के इरादा रक्खऽ हइ ।
"पापा", लीज़ा उत्तर देलकइ, "हम उनकन्हीं के स्वागत करबो, अगर एहे तोहर मर्जी हको, खाली ई शर्त पर - हम बल्कि उनकन्हीं सामने कइसूँ अइअइ, बल्कि कुच्छो करिअइ, तूँ हमरा डाँटबऽ नयँ आउ कइसनो अचरज चाहे नराजगी के कइसनो भाव व्यक्त नयँ करबऽ ।"
"फेर से कइसनो शरारत सुझलो ह !" हँसते ग्रिगोरी इवानोविच कहलकइ ।
"अच्छऽ, ठीक हउ, ठीक हउ; सहमत हिअउ, तोरा जे मन हउ ओहे कर, कार आँख वली हमर शरारती बिटिया।" एतना कहके ऊ ओकरा निरार पर चुमलकइ आउ लीज़ा तैयारी करे लगी दौड़ल चल गेलइ ।
ठीक दू बजे घर में निर्मित एगो कल्यास्का (घोड़ागाड़ी) , जेकरा में छो घोड़ा जोतल हलइ, अहाता में प्रवेश कइलकइ आउ गहरा हरियर घास के परिसर बिजुन रुकलइ । मुरोम्स्की के दू गो वर्दीधारी नौकर के सहायता से बुढ़उ बिरिस्तोव ड्योढ़ी तक सीढ़ी से चढ़के गेलइ । ओकरे पीछू ओकर बेटा घोड़ा पर सवार होके अइलइ आउ दुन्नु साथे भोजनालय में प्रवेश करते गेलइ, जाहाँ पर टेबुल पहिलहीं से लगा देवल गेले हल । मुरोम्स्की अपन पड़ोसी के एकरा से अधिक आउ स्नेहपूर्वक स्वागत नयँ कर सकऽ हलइ, भोजन से पहिले ओकन्हीं के बाग आउ पशुशाला देखे के प्रस्ताव रखलकइ , आउ सावधानीपूर्वक साफ कइल आउ बालू बिच्छल पगडंडी से होते साथ-साथ चललइ । बुढ़उ बिरिस्तोव के अइसन व्यर्थ के सनक के फेर में नष्ट कइल एतना परिश्रम आउ समय लगी खेद होलइ, लेकिन शिष्टाचार के कारण चुप रहलइ । ओकर बेटवा न तो मितव्ययी जमींदार के अप्रसन्नता में आउ न स्वाभिमानी आंग्लभक्त (anglomaniac) के हर्षोल्लास में हिस्सा बँटइलकइ; ऊ अधीरतापूर्वक मेजबान के बेटी के प्रकट होवे के इंतजार करब करऽ हलइ, जेकरा बारे बहुत कुछ सुन चुकले हल, आउ हलाँकि ओकर दिल में, जइसन कि हमन्हीं सब के मालुम हइ, कोय आउ घर कइले हलइ, लेकिन नवयुवती सुंदरी ओकर कल्पना में हमेशे अधिकार रक्खऽ हलइ ।
अतिथिकक्ष में वापिस अइला पर तीनो लोग बैठ गेते गेलइ - बुढ़वन अपन पहिलौका जमाना आउ अपन-अपन सरकारी सेवा के दौरान के खिस्सा-कहानी के आद करते गेलइ, जबकि अलिक्सेय ई सोचब करऽ हलइ कि लीज़ा के सामने कइसन भूमिका अदा करइ । ऊ निर्णय कइलकइ कि भावशून्य अन्यमनस्कता हरेक हालत में सबसे उचित होतइ आउ एकरे लगी खुद के तैयार कर लेलकइ । दरवाजा खुललइ, ऊ अइसन भावशून्यता आउ अइसन अभिमानी लापरवाही से सिर घुमइलकइ कि सबसे अधिक गहरा जड़ जमावल नाज-नखरा वली सुंदरी के दिल भी निस्संदेह काँप उठते हल । अभाग्यवश लीज़ा के बदले बूढ़ी मिस जैकसन प्रवेश कइलकइ, जे चेहरा उज्जर कइले, कमर कसले, जरी शिष्टतापूर्वक नजर निच्चे कइले हलइ, आउ अलिक्सेय के उत्कृष्ट रणनीति व्यर्थ सिद्ध होलइ । अभी फेर से ऊ खुद के अभी सम्हारियो नयँ पइलके हल  कि दरवाजा फेर खुललइ आउ अबरी लीज़ा प्रवेश कइलकइ । सब कोय उठ गेते गेलइ; पिता अतिथि लोग के (अपन बेटी के साथ) परिचय करावहीं जाब करऽ हलइ कि अचानक रुक गेलइ आउ जल्दी से अपन होंठ काट लेलकइ ... लीज़ा, ओकर सामर-सलोनी लीज़ा के कान तक पाउडर से उज्जर कइल हलइ, ओकर भौं मिस जैकसन के भौं से भी जादे कार कइल हलइ; नकली घुँघराला केश, ओकर अपन केश से कहीं अधिक सुनहरा केश लुई चतुर्दश के विग (नकली केश) नियन मोलायम कइल (fluffed) हलइ; आ लैँबेसिल (à l’imbécile) आस्तीन [10] मादाम द पौंपादूर (Madame de Pompadour) [11] के स्कर्ट के चुन्नट (farthingale) नियन फुल्लल आउ आजू-बाजू लटक रहले हल; ओकर कमर फीता से अक्षर X नियन कस्सल हलइ, आउ ओकर मइया के सब्भे हीरा, जेकरा अभी तक गिरवी नयँ रक्खल गेले हल, ओकर अँगुरी, गरदन आउ कान पर चमक रहले हल । अलिक्सेय ई हास्यास्पद आउ चमकते-दमकते कुलीन युवती में अपन अकुलीना के नयँ पछान पइलकइ । अलिक्सेय के पिता लीज़ा के हाथ बिजुन (चुम्मे लगी) अइलइ, आउ अलिक्सेय झुँझलाहट के साथ अपन पिता के अनुकरण कइलकइ; जब ऊ ओकर गोर-गोर अँगुरियन के छुलकइ त ओकरा लगलइ कि ऊ (अँगुरियन) थरथरा रहले ह। ई दौरान ओकर नजर छोटकुन्ना गोड़ पर गेलइ, जेकरा जान-बूझके उघारल आउ सब तरह के संभव नखरेबाजी के साथ जुत्ता पेन्हावल (shod) हलइ । ई ओकर बाकी वेष-भूषा के साथ होल अरुचि के पाटे में मदत कइलकइ। जाहाँ तक उज्जर आउ कार सुरमा के संबंध हइ, त ई स्वीकार कइल जा सकऽ हइ कि ऊ पहिला नजर में अपन हृदय के सरलता के कारण ऊ सब पर ध्यान नयँ देलकइ, आउ बादो में ओकरा शक्का नयँ होलइ । ग्रिगोरी इवानोविच के अपन वचन के आद पड़ गेलइ आउ आश्चर्य के भाव प्रदर्शित नयँ करे के प्रयास कइलकइ; लेकिन बेटी के हरक्कत ओकरा एतना विनोदपूर्ण लगलइ कि ऊ मोसकिल से खुद के नियंत्रित कर पइलकइ ।  अत्यौपचारिक अंग्रेज औरत हँस्से के मूड में नयँ हलइ । ऊ अंदाज लगा लेलकइ कि कार आउ उज्जर सुरमा ओकर दराजदार अलमारी से चोरावल गेले हल, आउ ओकर चेहरा पर बनावटी सफेदी से चिढ़ के किरमिजी लाली के भाव देखाय देब करऽ हलइ । नवयुवती के हरक्कत पर ऊ आग्नेय दृष्टि (fiery glances) डललकइ, जे अपन सब्भे सफाई के पेश करे के काम के दोसरा बखत लगी टालते ई देखावा कइलकइ कि ऊ सब पर ओकर ध्यान नयँ गेले हल ।   
टेबुल भिर बैठते गेलइ । अलिक्सेय अन्यमनस्क आउ विचारमग्न व्यक्ति के भूमिका अदा करना जारी रखलकइ। लीज़ा नखरा करते रहलइ, खाली फ्रेंच में गुनगुनइते दाँत के बीच से बोलते रहलइ । पिता मिनट-मिनट ओकरा दने नजर फेरते रहलइ, ओकरा ओकर उद्देश्य समझ में नयँ आ रहले हल, लेकिन ई सब कुछ ओकरा बहुत मनोरंजक लग रहले हल । अंगरेज औरत गोसाल आउ चुपचाप हलइ । खाली इवान पित्रोविच सहज महसूस कर रहले हल - दू गो के बराबर खइलकइ, मन भरके पिलकइ, अपन खुद के मजाक पर हँसलइ आउ लगातार मित्रतापूर्वक बातचीत करते आउ ठहाका मारते रहलइ ।
आखिरकार टेबुल भिर से उठते गेलइ; अतिथि लोग चल गेते गेलइ, आउ ग्रिगोरी इवानोविच खुलके हँसलइ आउ पुच्छे लगलइ ।
"उनकन्हीं के मूर्ख बनावे के ई तोर दिमाग में की घुसलो हल ?" ऊ लीज़ा के पुछलकइ । "आउ तोरा मालुम हउ कुछ ? उजरका पाउडर तोरा पर बहुत फब्बऽ हउ; महिला के साज-सिंगार के रहस्य के गहराई में हम नयँ जइबउ, लेकिन तोर जगह पर हम उजरका पाउडर लगइतियो हल; जाहिर हइ, बहुत जादे नयँ, बस थोड़े सुन।"
लीज़ा अपन प्लान के सफलता पर खुश हलइ । ऊ पिता के गले लगा लेलकइ, ऊ ओकर सलाह पर विचार करे के वादा कइलकइ आउ नराज मिस जैकसन के मनावे लगी दौड़ल गेलइ, जे बड़ी मोसकिल से ओकरा लगी दरवाजा खोले लगी आउ ओकर स्पष्टीकरण सुन्ने लगी राजी होलइ । लीज़ा के अपन अइसन सामर चेहरा अपरिचित लोग के सामने देखावे में शरम लगऽ हलइ; ओकरा पुच्छे के साहस नयँ होलइ ... ओकरा विश्वास हलइ कि दयालु, प्यारी मिस जैकसन ओकरा माफ कर देतइ ... आदि, आदि । मिस जैकसन, ई विश्वास हो गेला पर कि लीज़ा ओकर मजाक उड़ावे लगी नयँ सोचलके हल, शांत हो गेलइ, लीज़ा के चूम लेलकइ आउ सुलह के निशानी के तौर पर ओकरा अंग्रेजी पाउडर के एगो डिबिया भेंट कइलकइ, जेकरा लीज़ा हार्दिक कृतज्ञता के साथ स्वीकार कइलकइ ।
पाठक अनुमान लगा ले सकऽ हथिन कि दोसरा दिन सुबह लीज़ा मिलन के उपवन में प्रकट होवे में देरी नयँ कइलकइ ।
"त तूँ, महोदय, कल शाम के हमन्हीं के मालिक के घर गेलहो हल ?" ऊ तुरते अलिक्सेय के पुछलकइ । "तोहरा हमर छोटकी मालकिन कइसन लगलथुन ?"
अलिक्सेय उत्तर देलकइ कि ऊ ओकरा पर ध्यान नयँ देलकइ ।
"खेद के बात हइ", लीज़ा एतराज कइलकइ ।
"लेकिन काहे ?" अलिक्सेय पुछलकइ ।
"ई कारण से कि हम तोहरा से पुच्छे वला हलियो कि जइसन कि लोग के कहना हइ, की ई बात सच हइ ..."
"लोग की बोलते जा हइ ?"
"की लोग ई सच कहते जा हइ कि हम देखे में छोटकी मालकिन नियन लगऽ हिअइ ?"
"कइसन बकवास हइ ! ऊ तो तोरा सामने बहुत बदसूरत लगऽ हइ ।"
"आह, महोदय, अइसन बोलना तो पाप हइ; हमर छोटकी मालकिन तो एतना गोर हथिन, एतना फैशनदार हथिन ! हम कन्ने से उनकर बराबरी करबइ !"
अलिक्सेय ओकरा कसम खाके कहलकइ कि ऊ सब्भे संभव गोर कुलीन नवयुवती से बेहतर हइ, आउ ओकरा बिलकुल विश्वास देलावे लगी ओकर मालकिन के अइसन हास्यास्पद नाक-नक्शा के रूप में वर्णन कइलकइ कि लीज़ा खुलके ठठाके हँसलइ ।
"लेकिन तइयो", ऊ उच्छ्वास लेते कहलकइ, "छोटकी मालकिन बल्कि हास्यास्पद भी लग सकऽ हथिन, तइयो उनका सामने हम मूरख अनपढ़ हिअइ ।"
"अरे !" अलिक्सेय कहलकइ, "एकरा में दुखी होवे के की बात हइ ! अगर तूँ चाहबऽ, त हम तोरा तुरते पढ़े-लिक्खे लगी सिखा देबो ।"
"अच्छऽ, सचमुच", लीज़ा कहलकइ, "त वास्तव में काहे नयँ कोशिश कइल जाय ?"
"ठीक हको, प्यारी; अभिए शुरू कइल जाय ।"
ओकन्हीं बैठ गेते गेलइ । अलिक्सेय जेभी से पेंसिल आउ नोटबुक निकसलकइ, आउ अकुलीना वर्णमाला आश्चर्यजनक गति से सीख लेलकइ । अलिक्सेय ओकर समझदारी पर हैरान होल बेगर नयँ रह सकलइ । दोसर दिन सुबह ऊ लिक्खे के प्रयास कइलकइ; शुरू-शुरू में पेंसिल तो ओकर कहना नयँ मनलकइ, लेकिन कुछ मिनट के बाद ऊ काफी ठीक ढंग से अक्षर लिक्खे लगलइ ।
"ई तो चमत्कार हइ !" अलिक्सेय बोललइ । "हमन्हीं हीं के पढ़ाय-लिखाय तो लंकास्टर प्रणाली से भी बेहतर चल्लऽ हइ [12] ।"
वास्तव में तेसरा पाठ में अकुलीना एक-एक अक्षर टो-टोके "नताल्या, बयार के बेटी" [13] भी अब पढ़े में सफल हो गेलइ, पढ़ाय के बीच-बीच में अइसन टीका-टिप्पणी करते जा हलइ कि जेकरा से अलिक्सेय वास्तव में आश्चर्चकित हो गेलइ, आउ लीज़ा ओहे कहानी से चुन्नल सूक्ति सब से पूरा एक पेज लिख-लिखके भर देलकइ।
एक सप्ताह गुजर गेलइ, आउ ओकन्हीं दुन्नु बीच पत्राचार चालू हो गेलइ । पोस्ट ऑफिस एगो पुरनका बलूत (oak) के पेड़ के कोटर में स्थापित कइल गेलइ । नास्त्या गुप्त रूप से डाकिया के काम निभावऽ हलइ । हुआँ परी अलिक्सेय बड़गर-बड़गर अक्षर में लिक्खल पत्र लावऽ हलइ आउ हुएँ परी ओकरा अपन प्रेयसी के नीला सादा (प्लेन) कागज पर ककोड़बा अक्षर में लिक्खल पत्र मिल्लऽ हलइ । अकुलीना के लिक्खे के शैली स्पष्टतः सुधरते जाब करऽ हलइ, आउ ओकर बुद्धि स्पष्ट रूप से विकसित आउ सुसंस्कृत होब करऽ हलइ ।
एहे दौरान इवान पित्रोविच बिरिस्तोव आउ ग्रिगोरी इवानोविच मुरोम्स्की के बीच हाल के होल परिचय अधिकाधिक मजबूत होते गेलइ आउ जल्दीए दोस्ती में बदल गेलइ, अइकी ई परिस्थिति के कारण - मुरोम्स्की अकसर ई सोचऽ हलइ कि इवान पित्रोविच के मौत के बाद ओकर पूरा जायदाद अलिक्सेय इवानोविच के हाथ में चल जइतइ; कि अइसन हालत में अलिक्सेय इवानोविच ई गुबेर्निया (प्रांत) के सबसे धनी जमींदार में से एक होतइ, आउ कि कोय कारण नयँ हइ कि ऊ लीज़ा से काहे शादी नयँ करइ । आउ बुजुर्ग बिरिस्तोव अपन तरफ से, हलाँकि अपन पड़ोसी में एक प्रकार के सनकीपन (चाहे, ओकर शब्द में, अंग्रेजी मूर्खता) समझऽ हलइ, तइयो ओकरा में कइएक विशिष्ट गुण से इनकार नयँ करऽ हलइ, उदाहरणार्थ - असाधारण चतुरता; ग्रिगोरी इवानोविच काउंट प्रोन्स्की के नगीची रिश्तेदार हलइ, जे एगो प्रतिष्ठित आउ प्रभावशाली व्यक्ति हलइ; काउंट अलिक्सेय लगी बहुत उपयोगी हो सकऽ हलइ, आउ मुरोम्स्की (अइसन इवान पित्रोविच सोचऽ हलइ) शायद अइसन लाभदायक जोड़ी देखके अपन बेटी के शादी करे से खुश होतइ । अभी तक दुन्नु बुढ़उ में से हरेक अपन-अपन दिमागे में सोचते हलइ आउ आखिरकार एक दोसरा से बातचीत करते गेलइ, एक दोसरा से गले-गले मिललइ, ई मामला पर ढंग से विचार करे के एक दोसरा के वचन देते गेलइ आउ हरेक अपन तरफ से ई काम में लग गेते गेलइ । मुरोम्स्की के एगो कठिनाई हलइ - अपन बेत्सी के अलिक्सेय के साथ आउ नगीच से परिचित होवे लगी मनाना, जेकरा ऊ स्मरणीय भोज के बाद से नयँ देखलके हल । लगऽ हलइ, ओकन्हीं एक दोसरा के पसीन नयँ करऽ हलइ; कम से कम अलिक्सेय फेर से कभी प्रिलूचिनो नयँ अइले हल, आउ जब कभी इवान पित्रोविच ओकन्हीं के अपन भेंट देवे के किरपा करऽ हलइ, त लीज़ा हर तुरी अपन कमरा में चल जा हलइ । लेकिन, ग्रिगोरी इवानोविच सोचइ कि अगर अलिक्सेय रोज दिन हमरा हीं आबइ, त बेत्सी ओकरा से जरूर प्रेम करे लगतइ । ई बिलकुल स्वाभाविक हइ । समय सब कुछ ठीक कर दे हइ ।
इवान पित्रोविच अपन इरादा के सफलता के मामले में कम फिकिर करऽ हलइ । ओहे साँझ के ऊ अपन बेटवा के अपन अध्ययन-कक्ष में बोलइलकइ, पाइप सुलगइलकइ, आउ थोड़े देर चुप रहला के बाद कहलकइ - "की बात हउ, अल्योशा, कि लंबा समय से मिलिट्री सेवा के उल्लेख नयँ कइलहीं ? कि कहीं तोरा हुस्सार के वर्दी अब नयँ आकर्षित करऽ हउ !"
"नयँ पिताजी", अलिक्सेय आदर के साथ उत्तर देलकइ, "हम देखऽ हिअइ कि तोहरा ई बात पसीन नयँ हको कि हम हुस्सार (अश्वसेना) में योगदान करिअइ; त हमरा तोहर आज्ञा के पालन करना कर्तव्य हइ ।"
"ठीक हउ", इवान पित्रोविच उत्तर देलकइ, "देखऽ हिअउ कि तूँ एगो आज्ञाकारी पुत्र हकहीं । हमरा लगी ई एगो सांत्वना के बात हइ । आउ हम तोरा पर दबाव डाले लगी चाहवो नयँ करऽ हिअउ; तोरा ... तुरतम्मे ... सरकारी नौकरी करे खातिर विवश नयँ करबउ; लेकिन अभी तो हमर इरादा तोर शादी कर देवे के हउ ।"
"केकरा से, पिताजी ?" अचंभित होल अलिक्सेय पुछलकइ ।
"लिज़ावेता ग्रोगोर्येव्ना मुरोम्स्कयऽ के साथ", इवान पित्रोविच उत्तर देलकइ; "दुलहिन तो बड़ी निम्मन हइ, हइ न ?"
"पिताजी, हम तो शादी के बारे अभी सोचवो नयँ करऽ हिअइ ।"
"तूँ नयँ सोचऽ हीं, ओहे से हम तोरा लगी सोच लेलियो आउ निम्मन से सोच लेलियो ह ।"
"तोहर मर्जी । लेकिन हमरा लीज़ा मुरोम्स्कयऽ बिलकुल पसीन नयँ ।"
"बाद में पसीन पड़ जइतउ । आदत पड़ जइतउ, आउ एक दोसरा के प्यार करे लगम्हीं ।"
"हमरा नयँ लगऽ हइ कि ओकरा हम खुश रख पइबइ ।"
"ओकर सुख के तोरा चिंता करे के जरूरत नयँ । की ? त अइसीं अपन पिता के इच्छा के आदर करऽ हीं ? बहुत खूब !"
"जइसन तोहर मर्जी, हमरा शादी करे के मन नयँ, आउ हम शादी करे वला नयँ ।"
"तूँ शादी करम्हीं, नयँ तो हम तोरा अभिशाप देबउ, आउ भगमान साक्षी हथुन ! हम अपन जायदाद बेच देबउ आउ पैसा जइसे-तइसे उड़ा देबउ, आउ तोरा लगी एगो पलुश्का (पुरनका जमाना के एक चौथाई कोपेक के तामा के सिक्का) नयँ छोड़बउ । तोरा सोचे लगी तीन दिन दे हिअउ, आउ ई दौरान हमरा अपन चेहरा नयँ देखइहँऽ ।"
अलिक्सेय जानऽ हलइ कि अगर पिताजी अपन दिमाग में कोय बात रख ले हथिन, त फेर तरास स्कोतिनिन [14] के शब्द में, उनकर दिमाग से एकरा एगो काँटी से भी नयँ निकासल जा सकऽ हइ; लेकिन अलिक्सेय अपन पिताजी पर गेले हल, आउ ओकरा बहस में हरावल नयँ जा सकऽ हलइ ।
ऊ अपन कमरा में चल गेलइ आउ पिता के अधिकार के सीमा के बारे, लिज़ावेता ग्रिगोर्येव्ना के बारे, ओकरा भिखारी बना देवे के पिता के गंभीर संकल्प के बारे,  आउ अकुलीना के बारे सोचे-विचारे लगलइ । पहिले तुरी ओकरा ई बिलकुल स्पष्ट देखाय देलकइ कि ऊ ओकरा में पागलपन के हद तक प्रेमासक्त हइ; किसैनी लड़की के साथ शादी करे आउ अपन परिश्रम के बल पर जीए के रोमानी विचार ओकर दिमाग में अइलइ, आउ जेतने जादे ई अपन निर्णायक कदम के बारे सोचइ ओतने जादे एकरा में ओकरा समझदारी के बात लगइ । बारिश के मौसम के चलते कुछ समय से उपवन में मिलन बंद हो गेले हल । ऊ बिलकुल साफ-साफ अक्षर में आउ उन्मत्त शैली में अकुलीना के पत्र लिखलकइ, ओकरा अपन सत्यानाश के आशंका के बारे बता देलकइ आउ हिएँ परी ऊ ओकरा शादी के प्रस्ताव भी रख देलकइ । तुरते ऊ पत्र पोस्ट ऑफिस में, अर्थात् पेड़ के कोटर (खोढ़र) में, ले गेलइ, आउ बहुत चैन से सुत रहलइ ।
दोसरा दिन अलिक्सेय अपन इरादा के पक्का संकल्प के साथ भोरगरे मुरोम्स्की के हियाँ रवाना हो गेलइ ताकि ओकरा साथ खुलके बात कर सकइ । ऊ ओकर उदारता के जागृत करके ओकरा अपन पक्ष में कर लेवे पर भरोसा करऽ हलइ ।
"ग्रिगोरी इवानोविच घरे हथिन ?" प्रिलूचिनो के हवेली के ड्योढ़ी के सामने अपन घोड़वा के रोकके ऊ पुछलकइ।
"जी नयँ", नौकर जवाब देलकइ, "ग्रिगोरी इवानोविच तो सुबहे बाहर चल जाय के किरपा कइलथिन ।"
"केतना खेद के बात हइ !" अलिक्सेय सोचलकइ । "त कम से कम लिज़ावेता ग्रिगोर्येव्ना तो घरे पर होथिन ?"
"जी, घरे हथिन ।"
आउ अलिक्सेय घोड़वा पर से उछलके निच्चे अइलइ, लगाम नौकरवा के हाथ में धरइलकइ आउ बिन कोय सूचना देले अंदर चल गेलइ ।
"सब कुछ तय हो जइतइ", ऊ अतिथिकक्ष दने अइते सोचलकइ, "खुद ओकरे समझा देबइ ।"
ऊ अंदर गेलइ ... आउ स्तब्ध रह गेलइ ! लीज़ा ... नयँ, नयँ, अकुलीना, प्यारी सामली-सलोनी अकुलीना, सराफ़ान में नयँ, बल्कि प्रातःकालीन उज्जर पोशाक में खिड़की के सामने बैठल हलइ आउ ओकर पत्र पढ़ब करऽ हलइ । ऊ एतना मगन हलइ कि ओकरा अलिक्सेय के अंदर आवे के आहट सुनाइयो नयँ देलकइ । अलिक्सेय खुशी के मारे चिल्लाय बेगर नयँ रह पइलइ । लीज़ा चौंक गेलइ, सिर उठइलकइ, चीख पड़लइ आउ भाग जाय लगी चहलकइ । अलिक्सेय ओकरा धरे लगी लपक पड़लइ ।
"अकुलीना, अकुलीना ! ..."
लीज़ा खुद के ओकरा से छोड़ावे लगी चहलकइ ...
"मे लेसे-म्वा दौँक, मौँस्यऽ; मे एते-वू फ़ू ? [Mais laissez-moi donc, monsieur; mais êtes-vous fou? - (फ्रेंच) लेकिन हमरा छोड़ देथिन, मिस्टर; लेकिन अपने पागल तो नयँ हथिन ?"] ओकरा दने से अपन मुँह फेरते-फेरते ऊ दोहराब करऽ हलइ ।
"अकुलीना ! हमर दोस्त, अकुलीना !" ओकर हाथ के चूमते ऊ दोहरइते रहलइ । ई तमाशा के साक्षी मिस जैक्सन के समझ में नयँ आ रहले हल कि की कइल जाय । एतने में दरवाजा खुललइ, आउ ग्रिगोरी इवानोविच अंदर अइलइ ।
"आहा !" मुरोम्स्की कहलकइ, "त तोहन्हीं के मामला, लगऽ हको, तय हो चुकलो ह ..."
(आशा हइ,) पाठकगण हमरा परिणाम (उपसंहार) के वर्णन करे के फालतू काम से हमरा मुक्त कर देते जइथिन।

टिप्पणी:
[1] बग्दानोविच - रूसी कवि इप्पोलित फ़्योदरोविच बग्दानोविच (1744-1803) प्राचीन यूक्रेन अभिजात वर्ग (aristocracy) में जन्म लेलथिन हल । ई उद्धरण उनकर लमगर हास्य कविता "दूशिन्का" (1783) के पुस्तक 2 से लेल गेले ह ।
[2] 6 नवंबर 1796 में एकातेरिना द्वितीय (Catherine II) के निधन के बाद ओकर उत्तराधिकारी पावेल प्रथम (Paul I) खुद नयकन लोग से घिरल रहऽ हलइ आउ हर संभव तरीका से एकातेरिना के समर्थक लोग के, विशेष करके गार्ड अफसर सब के, बरखास्त कर देलके हल ।
[3] अंग्रेजी बाग - फ्रेंच बाग, जे ज्यामितीय रूप से सही होवऽ हलइ, के विपरीत अंग्रेजी बाग स्वाभाविक बाग के अनुरूप होवऽ हलइ । एकर विवरण खातिर दे॰ पुश्किन के लघु उपन्यास "दुब्रोव्स्की", अध्याय-13.
[4] विदेशी तरीका से रूसी अन्न पैदा नयँ होवऽ हइ - राजकुमार अलिक्सांद्र अलिक्सांद्रोविच शख़व्स्कोय (1777-1846) के प्रथम व्यंग्य रचना “Мольер! твой дар, ни с чьим на свете несравненный” (मोल्येर ! तोर उपहार संसार के केकरो से तुलना के लायक नयँ) (1808) से उद्धृत पंक्ति । एगो बहुसर्जक (prolific) कवि आउ नाटककार, जे रोमांटिक युग में भी नवशास्त्रीय (neoclassical) बन्नल रहलथिन ।
[5] 1754 से हीं कुलीन वर्ग के बैंक, जमींदार लोग के जायदाद के गिरवी रखके कर्ज दे हलइ, जेकरा चलते कइएक जमींदार चाहे ओकन्हीं के उत्तराधिकारी सब कर्ज में डूब गेते गेले हल चाहे दिवालिया हो गेते गेले हल ।
[6] ऊ जमाना में सिविलियन लोग के विपरीत मिलिट्री में मोंछ रखना आवश्यक हलइ ।
[7] मूल रूसी में हीं पुश्किन द्वारा रूसी शब्द के साथ-साथ कोष्ठक में फ्रेंच शब्द "individualité" के प्रयोग कइल गेले ह, जेकर अंग्रेजी अनुवाद “individuality” हियाँ परी दे देवल गेले ह ।
[8] जॉन पाल - बहुसर्जक जर्मन लेखक योहान पॉल फ़्रिड्रिश रिख़्टर (Johann Paul Friedrich Richter, 1763-1825) के साहित्यिक उपनाम (pen name)। पुश्किन उनकर रचनावली के फ्रेंच अनुवाद "Pensées de Jean-Paul extraites de tous ces ouvrages" (जॉन पाल के सम्पूर्ण रचनावली से उद्धृत उनकर विचार) के पृ.153 से ई उद्धरण लेलथिन हँ, जेकरा में लेखक के कहना हइ – “व्यक्ति में व्यक्तित्व के मौलिकता के सम्मान करे के चाही, ई हरेक सकारात्मक चीज के जड़ हइ” । ई अनूदित पुस्तक पेरिस से 1829 में प्रकाशित होले हल ।
[9] पामेला - संदर्भ हइ सैमुएल रिचार्डसन (Samuel Richardson, 1689-1761) के पत्रात्मक उपन्यास "Pamela, or Virtue Rewarded" (1740) के, जे अपन काल में एगो सर्वाधिक बिक्के वला पुस्तक हलइ ।
[10] आ लैँबेसिल आस्तीन - आ लैँबेसिल [(à l’imbécile -(फ्रेंच) मूर्ख के] आस्तीन बहुत बड़गर आस्तीन होवऽ हलइ जेकरा में केहुनी बिजुन सीसा (लेड) के छोटगर-छोटगर वजन (weights) लगल रहल हलइ जेकरा से ऊ सब लटकते रहऽ हलइ । फ्रांस में कभी अइसन आस्तीन के फैशन हलइ ।
[11] मादाम द पौंपादूर (Madame de Pompadour) - जीन अन्त्वानेत प्वासौँ, मार्किज़ द पौँपादूर (Jeanne Antoinette Poisson, marquise de Pompadour, 1721-1764) लुई पंचदश (Louis XV) के रखैल हलइ ।
[12] लंकास्टर प्रणाली (Lancaster system) -  प्राथमिक विद्यालय के एगो शिक्षा प्रणाली, जेकरा में उच्चतर कक्षा के छात्र निचली कक्षा के छात्र सब के अध्यापन में सहायता करते जा हलइ । ब्रिटिश शिक्षाविद् जोसेफ़ लंकास्टर (1778-1838) के नाम पर ई प्रणाली के नाम पड़लइ ।
[13] नताल्या, बयार के बेटी - रूसी कवि, लेखक आउ इतिहासज्ञ निकोलाय मिख़ायलोविच करमज़िन (1766-1826) के एगो भावुक ऐतिहासिक कहानी के शीर्षक (1792)।
[14] तरास स्कोतिनिन - देनिस इवानोविच फ़नविज़िन (1744-1792) के प्रहसन "Недоросль" (अनाड़ी) के एगो पात्र के नाम। ई प्रहसन उनकर सर्वोत्कृष्ट रचना मानल जा हइ, जेकर मंचन सर्वप्रथम 1782 में कइल गेले हल । मित्रोफ़ान अनाड़ी हइ ।