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Wednesday, June 16, 2010

37. बदलेगी भाषा अकादमियों की नियमावली

बदलेगी भाषा अकादमियों की नियमावली

पाठक की देखरेख में प्रारूप हुआ तैयार

अराजकता खत्म करने में जुटा एच॰आर॰डी॰ (मानव संसाधन विकास)

एकरूपता बनाने की हो रही कोशिश

आशीष कुमार मिश्र

हिन्दुस्तान दैनिक, पटना संस्करण, 1 जून 2010, पृष्ठ 2.

http://epaper.hindustandainik.com/

पटना : राज्य सरकार का मानव संसाधन विकास विभाग मृतप्राय भाषा अकादमियों को जीवंत बनाने में जुट गया है । शुरुआत सभी अकादमियों को अड़ोस-पड़ोस में स्थानान्तरित करने से हुई । मैथिली, मगही, भोजपुरी, संस्कृत, बांग्ला और दक्षिण भारतीय भाषा संस्थान में से चार सरकार द्वारा शास्त्रीनगर के आवंटित क्वार्टरों में शिफ्ट भी हो चुकी हैं । दो अकादमी 'किराए का घर' छोड़ने में आनाकानी कर रही हैं । तर्क यह है कि मकान मालिक का लाख रुपए से अधिका किराए का बकाया है । दूसरा तर्क है कि किताबें और सामान बहुत अधिक हैं । पर एच॰आर॰डी॰ इन तर्कों पर पसीजने वाला नहीं । उसने अकादमियों को कहा है कि बकाए से विभाग को अवगत कराएँ, सारा पैसा मिल जाएगा । मानव संसाधन विकास विभाग सभी भाषा अकादमियों में व्याप्त अराजकता खत्म करने में जुट गया है ।

विभाग के विश्वस्त सूत्रों की मानें तो अब सरकार भी इनकी नियमावली में भी संशोधन करने जा रही है । ताकि इन पर सरकार का पूरी तरह अंकुश बना रहे और जनता की गाढ़ी कमाई का जो पैसा इनपर सालाना खर्च हो रहा है उसका परिणाम निकल सके । नियमावली में संशोधन का प्रारूप शिक्षा सचिव के॰ के॰ पाठक की देखरेख में बन चुका है । शीघ्र ही इसपर विधि विभाग की राय ली जाएगी । अब तक अकादमियाँ अपनी उप-समिति के द्वारा निर्णय लेती थीं जिससे सरकार इनके संचालन में बहुत दखल नहीं कर पाती थी । नियमावली में संशोधन का दो मकसद महत्त्वपूर्ण है । एक तो इसे लचीला बनाया जाएगा । दूसरा सभी भाषा अकादमियों के संचालन के लिए नियमावली में एकरूपता लाई जाएगी । संशोधन में यह कोशिश की जा रही है कि इनका संचालन ऐसे हो कि किसी विवाद की गुंजाइश नहीं रहे । फिलहाल इन अकादमियों में कई तरह के विवाद हैं । केस-मुकदमों की लम्बी फेहरिस्त है । अनियमित तरीके से नियुक्तियों और प्रोन्नतियों के कई मामले हैं । विभागीय सचिव के॰ के॰ पाठक इन्हें दुरुस्त करने में जुट गए हैं ।


शोध संस्थानों के भी दिन फिरेंगे

मानव संसाधन विकास विभाग ने राज्य के अकादमियों और शोध संस्थानों को पटरी पर लाने के लिए नया फार्मूला तैयार किया है । भाषायी अकादमियों का जिम्मा जहाँ विभा ने उच्च शिक्षा निदेशक डॉ॰ जे॰पी॰ सिंह को दिया है वहीं सभी शोध-संस्थानों की कमान शिक्षा सचिव के॰ के॰ पाठक के हाथों में होगी । श्री पाठक अरबी-फारसी, प्राकृत, मिथिला, जगजीवन राम,  के॰ पी॰ जायसवाल, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी समेत राज्य के सभी शोध संस्थानों के पन्ने पलटने शुरू कर दिए हैं । माना जा रहा है कि इनके गठन के उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में शीघ्र ही कदम उठाए जाएँगे ।

"फिलहाल भाषाई अकादमियों में काम-धाम नहीं हो रहा । गरीब राज्य का पैसा यहाँ बर्बाद हो रहा था । जिन उद्देश्यों के तहत इनका गठन हुआ, वह तमाम गतिविधि यहाँ शुरू होगी । पुस्तकों का प्रकाशन, बिक्री से लेकर शोध तक के सभी कार्य होंगे ।"

डॉ॰ जनार्दन प्रसाद सिंह

(उच्च शिक्षा निदेशक)




2 comments:

अनुनाद सिंह said...

अच्छी खबर है। अन्य राज्यों की भषा अकादमियाँ भी बीमार हैं उन्हें भी शल्यचिकित्सा की आवश्यकता है ताकि वे समय के साथ कदम मिलाकर चल सकें।

indli said...

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।