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Thursday, January 14, 2016

मगही के वर्तनी के मानकीकरण



मगही के वर्तनी के मानकीकरण

लेखक - नारायण प्रसाद

1.0       मगही के सब्भे विद्वान ई बात से सहमत हथिन कि मगही के वर्तनी के मानकीकरण कइल जाय, विशेष रूप से क्रियारूप के (प्रियदर्शी, 1986; सिंह, 1987; अर्याणी, 1993; स्वर्णकिरण, 2002; श्रोत्रिय, 2002 आउ 2011; मिश्र, 2009; सिंह, 2011; राम नन्दन, 2012; प्रसाद, 2012) । ई आउ आवश्यक हो जा हइ जबकि भारतीय संविधान के अष्टम अनुसूची में मगही के नाम हेतु गत शताब्दी के उत्तरार्द्ध से चालू कइल मगहीभाषी के आन्दोलन जड़ पकड़ रहले ह ।

2.0       मानकीकरण में थोड़े समय तो लगवे करऽ हइ जइसन कि हिन्दी आउ मैथिली भाषा के वर्तनी के मानकीकरण के इतिहास से कुछ अन्दाज लगावल जा सकऽ हइ । इ दुन्नु भाषा के मानकीकरण के संक्षिप्त इतिहास देल जा रहले ह । आशा कइल जा हइ कि एकरा से कुछ सीख लेके आउ आजकल के मीडिया के उपयोग करके मगही के वर्तनी में निश्चतता खातिर ई दुन्नु भाषा के मानकीकरण में लगल समय के अपेक्षा बहुत कम समय लगतइ । एहो आशा कइल जा हइ कि मगही में प्रकाशित पत्रिका के संपादक सब एकरा में एगो मुख्य भूमिका निभइते जइता ।

2.1       हिन्दी वर्तनी के मानकीकरण के प्रयास उनइसमी शताब्दी के अस्सी के दशक से चालू होलइ आउ बीसमी शताब्दी के साठ के दशक तक विशेष रूप से चललइ (तिवारी एवं बाला, 1983) । "हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास" के अनुसार - "उन्नीसवीं शताब्दी उत्तरार्ध में गद्य की भाषा का रूप स्थिर नहीं हो पाया था । ... उन्नीसवीं शताब्दी उत्तरार्ध के लगभग सभी लेखकों की भाषा दोषपूर्ण है । स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र की भाषा दोषों से मुक्त नहीं है । इस काल के लेखकों की भाषा ब्रजभाषा, पूर्वी हिंदी, प्राचीन रूपों, बंगला के प्रयोगों और मुहावरों, अशुद्ध और शिथिल व्याकरण, और वाक्यविन्यास आदि दोषों से भरी पड़ी है ।" (भाग 8; 1972:248-249); "भारतेंदु और उनके सहयोगी 'वे इच्छा किया', 'आशा किया' ऐसे प्रयोग भी कर जाते थे और वाक्यविन्यास की सफाई पर भी उतना ध्यान नहीं रखते थे ।"; "अशुद्धियों की विस्तृत तालिका के लिए डा. उदयभानु सिंह रचित शोधग्रंथ महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका युग (सं॰ 2008) के पृष्ठ 213 से 244 द्रष्टव्य हैं।" (भाग 9; 1978:204, 206) । हिन्दी के द्वितीय साप्ताहिक आउ बिहार के सर्वप्रथम हिंदी पत्रिका 'बिहार-बंधु' (मार्च 1873 से बिहारशरीफ से, फिनो मार्च 1874 से पटना से प्रकाशित; दे॰ प्रसाद, 1992) के संपादक के भेजल पत्र से प्रेरित हो के श्री छत्रधारी सिंह हिंदी वर्तनी विषयक समस्या के 'काशी पत्रिका', 'वैष्णव पत्रिका', 'हिंदी बंगवासी' आदि से एकत्र करके, संक्षिप्त समाधान के साथ 1884 में 'लेख नियम' शीर्षक से एगो लघुपुस्तिका के रूप में खड्गविलास प्रेस, बाँकीपुर से प्रकाशित करवइलथिन । ई हिंदी वर्तनी मानकीकरण से संबंधित सबसे पहिला प्रयास हलइ (तिवारी एवं बाला, 1983:20) । संस्थागत प्रयास में केंद्रीय हिंदी निदेशालय के महत्त्वपूर्ण भूमिका रहले ह जेकर परिणाम हइ - पहिले तुरी  प्रकाशित 'हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' (1967) से लेके अद्यतन प्रकाशित संशोधित पुस्तिका 'देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' (2010) । तइयो अभियो तक कुछ मामला में विद्वान सब में मतभेदे चालू हइ । असहमति आउ अमानक के बिंदु निम्नलिखित हइ (देवेश, 2011) - (1) संयुक्ताक्षर संबंधी प्रयोग (2) कारक चिह्न या परसर्ग संबंधी प्रयोग (3) अनुस्वार तथा अनुनासिक चिह्न (चंद्रबिंदु) संबंधी प्रयोग (4) 'कर' आउ 'वाला' प्रत्यय के प्रयोग (5) श्रुतिमूलक '' आउ '' संबंधी प्रयोग (6) विदेशी ध्वनि लगी नुक्ता के प्रयोग (7) पूर्णविराम आउ अंगरेजी फुलस्टॉप के प्रयोग ।

2.2       मैथिली के मानकीकरण एक शताब्दी से भी पहिले डॉ. ग्रियर्सन चालू कइलथिन हल । उनका कहना हलइ (ग्रियर्सन, 1881:1-2) - "हमरा सबसे अधिक कठिनाई अनुभव होल ई भाषा के अति उर्वरता के चलते । क्रिया, विशेष रूप से, हमर धीरज के सबसे जादे परीक्षा लेलक । मैथिली शाब्दिक अर्थ में एगो बोली हइ । कोय मानक नयँ हइ जेकर प्रमाण देल जाय । ओहे से कउनो शब्दरूप के  अश्लील या अशुद्ध समझ के निकालल नयँ जा सकऽ हइ । ई आशा कइल जा हइ, खाली हमरे द्वारा नयँ, कि ई प्रकार के पुस्तक के प्रकाशन से एक प्रकार के मानक निर्धारित होतइ । ... जे बोली के हम मानक के रूप में चुनलिये ह, ऊ हइ मधुबनी सबडिविजन के, जे केन्द्र में अवस्थित हइ, जेकरा सब्भे ब्राह्मण मिथिला के मुख्यालय मानऽ हथिन ।" सुभद्र झा भी एकरे मानक मनलका (1941:39)

2.2.1    एकर बादो मैथिली भाषा के मानकीकरण के अनेक बार चेष्टा कइल गेलइ । अयोध्या प्रसाद खत्री (1857- 4 जनवरी 1905) के जब मैथिली में मासिक पत्र निकाले के विचार अइलइ त भाषा के मानक रूप स्थिर करे खातिर अन्यान्य विद्वान के साथे-साथ कवीश्वर चंदा झा के भी 3 अगस्त 1903 के पत्र लिखलथिन हल (मिश्र, 2006:14-15) काशी से प्रकाशित मैथिली मासिक 'मिथिलामोद' (1905-1941) से मैथिली वर्तनी के निर्धारण आउ मिथिलाक्षर के पुनःप्रतिष्ठा लगी वातावरण निर्माण होलइ (योगानंद झा, 2006:25) सन् 1936 में मुजफ्फरपुर में मैथिली लगी निर्मित 'शैली निर्धारण समिति' के अध्यक्ष महामहोपाध्याय डॉ. उमेश मिश्र 'शैली' के वैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत कइलका । 'शैली' (वस्तुतः 'लेखनशैली' अर्थात् 'कोय शब्द के वर्तनी लिक्खे के शैली' अर्थ में प्रयुक्त) पर तत्कालीन सब्भे विचारदृष्टि पर सावधानीपूर्वक विचार करके एगो प्रश्नावली परिचालित करके ब्योरेवार सब सिद्धान्त के निर्माण कइल गेलइ । त्रैमासिक पत्रिका 'मैथिली साहित्य पत्र' (1936-1939) के संपादक आचार्य रमानाथ झा एकरा लागू कइलका । तब से अधिकतर लेखक बहुत कम्मे संशोधन के साथ एहे शैली के अपनइते गेला (मिश्र, 1950:22-23)। मैथिली पत्रिका 'मिथिला-मिहिर' (1909-1989) एगो बड़का काज ई कइलकइ कि भाषा-वर्तनी के स्वरूप स्थिर करे आउ ओकरा में एकरूपता लावे के प्रयास कइलकइ आउ बहुत हद तक ओकरा में सफलो होलइ (राजमोहन झा, 2006:18)

2.3       मानकीकरण के मामले में मगही के दधीचि डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री (1923-1973) जी के कहलाम हलइ (लोहानी, 1997:15-16) - "अभी मानक मगही के चक्कर में मगही के लेखक कवि के नई पड़े के चाही । एकर स्वाभाविक रूप से साहित्य विकसित होवे के जरूरत हे ।" शिवप्रसाद लोहानी जी आकाशवाणी से प्रसारित अपन निबन्ध "साहित्य में परम्परा आउ नवीनता" में मत प्रकट कइलका हल (लोहानी, 1997:9-10) - "मगही के लिखित औ छप्पल साहित्य के लम्बा अवधि नई होल ह । मगर एतने कम समय में मगही ई देखा देलक कि सभे विधा में कलम चलावे के ताकत एकरा में विद्यमान हे । गरचे परम्परा औ नवीनता के विवाद एकरा में अभी खुल के सामने नई आवल ह मगर भाषागत परम्परा के मानकीकरण के सन्दर्भ में एकर स्वरूप कुछ जरूरे परिलक्षित होवऽ हे । सवाल ई हे कि थोड़े-थोड़े दूर पर भाषा के उच्चारण के विविधता जे हे ओकर मानकीकरण कैसे होवत । परम्परा औ नवीनता के ध्यान में रखके विद्वज्जन एकरा कोई मानक मगही बना सकऽ हथ । पर एकरा में सावधान रहे के जरूरत हे कि कहीं ई विवाद के रूप नई ग्रहन कर ले । ई गुनी शायद अभी एही अच्छा होवत कि स्वाभाविक रूप से अभी आवे ला बीस-पच्चीस बरस रचनाकार सब रचना करते जाथ, मगही के भण्डार भरते जाथ ।"

2.3.1    उपर्युक्त मगही विद्वज्जन के विचार से हमहूँ सहमत हकिअइ । लेकिन उनकर विचार जे समय में प्रस्तुत कइल गेले हल ओकर बाद मगही में बहुत कुछ साहित्य प्रकाशित हो चुकले ह । हमर विचार ई हइ कि कम से कम प्रखंड स्तर तक के मगही क्षेत्र के हरेक जिला से मगही लेखक अपन क्षेत्रीय मगही के प्रतिनिधि के रूप में अपन रचना, विशेष रूप से गद्य साहित्य, प्रकाशित करते जाथिन ताकि मगही के मानकीकरण में सुविधा होवे (प्रसाद, 2012) । अभी तक जेतना प्रकाशित मगही साहित्य हमरा अध्ययन करे के अवसर मिललइ ओकर आधार पर मगही वर्तनी के कुछ अन्तरिम (provisional, tentative) सिद्धान्त आउ नियम प्रस्तुत कर रहलिए ह ।  

3.0       मगही वर्तनी पर विस्तृत नियम बनावे के पहिले कुछ सिद्धान्त के प्रतिपादन आवश्यक हइ ताकि मगही वर्तनी के मानकीकरण लगी कम से कम नियम के आवश्यकता पड़े ।

मगही भाषा के वर्तनी के मानकीकरण सम्बन्धी प्रस्तावित सिद्धान्त

(1) क्रियारूप, सर्वनामरूप आउ कारक विभक्ति में विभिन्नता के छोड़के बाकी शब्द (संज्ञा, विशेषण, मूल क्रिया अर्थात् धातु आदि) समुच्चे मगहीभाषी क्षेत्र से साहित्य में अपना लेवे के चाही, विशेष रूप से कृषि, सामाजिक आउ सांस्कृतिक शब्दावली कउनो मगहीक्षेत्र के रहे, ओकरा समाविष्ट करे के पूरा प्रयास कइल जाय ।

(2) खाँटी मगही शब्द में '', '' के स्थान पर क्रमशः 'अइ', 'अउ' के प्रयोग कइल जाय । ध्यातव्य - पैना (तेज अर्थ में), लेकिन, पइना (डंडा अर्थ में) ।

(3) क्रियापद आउ सर्वनाम कोय भाषा के मूल शब्द होवऽ हइ । ई दुन्नु के कोय दोसर भाषा से उधार नयँ लेल जा हइ (दे॰ पं॰ किशोरीदास वाजपेयीकृत 'हिन्दी शब्दानुशासन', पृ॰ 40) । अतः मगही क्रियारूप, सर्वनाम आउ सर्वनाम से निर्मित अन्य (क्रियाविशेषण आदि) शब्द में '', '' के बदले क्रमशः 'अइ', 'अउ' के प्रयोग कइल जाय ।
उदाहरणस्वरूप कइलक ('कैलक', 'कयलक' नयँ), कइलकइ, कइलकउ, गेलइ, गेलउ (गेलौ नयँ); अइसन, अइसने, अइसनो, अइसीं, अइसहीं, अइसहूँ, कइसन, कइसनो, कइसे, कइसूँ, कइसहूँ, जइसन, कउन, कउनो, जउन, इत्यादि ।

(4) उपर्युक्त सिद्धान्त (3) के अतिरिक्त अन्य हिन्दी शब्द जे मगहियो में प्रयोग में हइ, ओकरा में प्रयुक्त '', '' वर्ण के अइसहीं लिक्खल जाय, 'अइ', 'अउ' के रूप में नयँ ।

उदाहरणस्वरूप - ऐन, ऐनक, औरत, औरतियन, औरतियो के, औघड़ इत्यादि ।

(5) मगही के भाषा के रूप में विकसित करे खातिर ई जरूरी हइ कि वर्तनी अइसन निर्धारित कइल जाय कि संप्रेषणीयता में कोय बाधा नयँ उत्पन्न होवे, कउनो ज्ञान-विज्ञान के विचार मगही में अभिव्यक्त कइल जा सके । । एकरा खातिर जरूरी हइ कि तत्सम शब्द के ज्यों के त्यों लिक्खल जाय जब तक कि एकरा आउ तरह से लिक्खे के कोय कारण नयँ दिखे - जइसे कि उपन्यास, कहानी, नाटक आदि के कोय पात्र बिलकुल अनपढ़ होवे त जइसे ओकरा से कोय शब्द के स्वाभाविक उच्चारण अपेक्षित होवे ओहे रूप के वर्तनी के प्रयोग लेखक कर सकऽ हका ।

(6) समानार्थी कइएक शब्दरूप में से यदि कोय एक रूप अइसन होवे जे व्याकरण के दृष्टि से नियमित हो, आउ शेष अनियमित, तो नियमित रूप के मानक मानल जाय ।

उदाहरणस्वरूप - नालन्दा जिला के मगही में भूतकाल में '' एवं '' दुन्नु प्रत्यय के प्रयोग देखल जा हइ - 'हम गेनूँ' चाहे 'हम गेलूँ', 'तूँ गेनहीं' चाहे 'तूँ गेलहीं' । भूतकालिक क्रिया में '' प्रत्यय सामान्य रूप से खाली मागधी परिवारे के भाषा में नयँ, बल्कि संसार के कइएक दोसर-दोसर भाषा परिवार में पावल जा हइ, जइसे बंगला, उड़िया, मराठी, रूसी, चीनी (चीनी भाषा में '' प्रत्यय के रूप में नयँ, बल्कि क्रिया-समाप्ति सूचक एगो निपात हइ) इत्यादि । अतः '-' प्रत्ययान्त भूतकालिक क्रियारूप के मानक माने के चाही ।

(7) कुछ सीमित क्षेत्रीय प्रयोग के छोड़के साधारणतः मगही के क्रियारूप, संज्ञा के लिंग पर आधारित नयँ होवऽ हइ । मानक मगही में ई सीमित क्षेत्रीय प्रयोग के त्याग करके क्रियारूप में संज्ञा के लिंग के आधार पर कोय विकार नयँ लावे के चाही ।

उदाहरणस्वरूप - 'ऊ कहलकी' के स्थान पर 'ऊ कहलकइ', चाहे 'ऊ कहलक'

(8) यथासंभव हिन्दी के 'ही' आउ 'भी' के स्थान पर खाँटी मगही में प्रयुक्त क्रमशः '-' आउ '-' प्रत्यय के प्रयोग कइल जाय ।

ई विषय पर विस्तृत जनकारी लगी देखल जाय हमर लेख - "मगही में हिन्दी के 'ही' आउ 'भी' के प्रयोग पर विवेचन" (अलका मागधी, मार्च 2011, पृ॰5-10; पाटलि, नवम्बर 2011, पृ॰6-16) ई लेख में कुल 16 नियम के सोदाहरण चर्चा कइल गेले ह । 'पाटलि' पत्रिका में छप्पल लेख में सब उदाहरण के संदर्भ देल हइ, जबकि 'अलका मागधी' में संदर्भ रहित हइ ।
ई लेख इंटरनेटो पर देखल जा सकऽ हइ -  http://magahi-sahitya.blogspot.in/2011/03/2.html.

(9) कोय खास विषय पर लेखन खातिर यदि शब्द के कमी महसूस होवे त संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेज़ी आदि से शब्द उधार लेके यथासाध्य देवनागरी लिपि में तत्तत् रूप में ही अर्थात् बिना कोई विकृति के लिक्खल जाय । विदेशी भाषा (अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी आदि) से लेल गेल शब्द के उच्चारण के अनुसार देवनागरी लिपि में लिप्यन्तरण करके लिक्खल जाय ।

(10) मगही में कोय तत्सम शब्द या कोय विदेशी शब्द उधार लेला के बाद ओकर रूप मगही व्याकरण के अनुसार चलतइ आउ एकरा चलते अगर कोय विकार होतइ त साधारणतः अन्तिमे वर्ण में होतइ ।

जैसे - 'शुरू से', लेकिन 'शुरुए से' । हियाँ '-' प्रत्यय लगला पर अन्तिम दीर्घ स्वर के ह्रस्व हो जइतइ, लेकिन एकरा चलते आदि '' के '' नयँ करे के चाही ।

(11) तीन या तीन से अधिक अक्षर वला असमस्त (अर्थात् बिना समास वला) हिन्दी (तत्सम या अरबी-फारसी) शब्द के पहिले दू लगातार अक्षर के स्वर दीर्घ रहला पर मगही में पहिला दीर्घ वर्ण के ह्रस्वीकरण के प्रवृत्ति पावल जा हइ ।

जइसे, आकाश - अकाश, आधार - अधार, आराम - अराम, कानून - कनून, चालाक - चलाक, साधारण - सधारण, सामान - समान, इत्यादि । सामान्यतः  मगही में ह्रस्वीकृत रूप के प्रयोग करे के चाही । हाँ, गम्भीर रचना में कोय लेखक चाहऽ हका, त तत्सम रूप के भी प्रयोग कर सकऽ हका ।

असमस्त शब्दे में - "आनाकानी" के "अनाकानी" नयँ होवऽ हइ, काहे कि ई असमस्त शब्द नयँ हइ । अपवादस्वरूप, 'वाला' प्रत्ययान्त शब्द में 'वाला' के 'वला'  रूप प्रयोग में देखल जा हइ । पहिले दू अक्षर के दीर्घ रहले पर - 'नगाड़ा' के 'नगड़ा' नयँ होवऽ हइ ।

उपर्युक्त नियम मूल शब्द खातिर हकइ । जब '' प्रत्यय आवऽ हइ त नगाड़ा+आ = नगड़वा (वकार आगम सहित) रूप बनके ह्रस्वीकरण होवे करतइ ।

(12) उपर्युक्त सिद्धान्त (5) से ई निष्कर्ष निकलऽ हइ कि परिवर्द्धित देवनागरी लिपि के जेतना वर्ण हइ, ओकर प्रयोग आवश्यकतानुसार मगही भाषा में कइल जा सकऽ हइ ।

उपर्युक्त सिद्धान्त पर विस्तृत चर्चा होला के बाद मगही क्रियारूप के मानकीकरण पर अलगे से चर्चा कइल जा सकऽ हइ । मगही भाषा के मानकीकरण असल में मुख्य रूप से मगही क्रियारूप के मानकीकरण पर ही निर्भर हइ । एकरा पर हम्मर एक ठो अंग्रेज़ी लेख “Standardization of Magahi Verbs and the Magahi of Biharsharif” (मगही क्रियारूप के मानकीकरण आउ बिहारशरीफ के मगही) द्रष्टव्य हइ ।

मगही भाषा के वर्तनी के मानकीकरण सम्बन्धी प्रस्तावित नियम

(1) यथासाध्य मगही में प्रचलित खाँटी शब्द के प्रयोग कइल जाय ।

मगही में कइएक अइसन शब्द हकइ जेकर संगत हिन्दी में कोय शब्द नयँ हइ । मगही के अनेक संज्ञा, विशेषण, नामधातु आदि शब्द हिन्दी में अपनइला से हिन्दी के शब्दावली में श्रीवृद्धि होतइ ।

खाँटी मगही शब्द के मतलब ई नयँ समझल जाय कि तत्सम, या हिन्दी में प्रचलित अन्य शब्द के जइसे-तइसे विकृत करके जबरदस्ती मगहीकरण कइल जाय । जैसे - 'भाव' के 'भाओ', 'प्रस्ताव' के 'परसताओ', 'श्रीगणेश' के 'सीरीगनेस', 'वगैरह' के 'ओगइरह', 'वाला' के 'ओला', 'वर्तनी' के 'बरतनी', आदि से मगही साहित्य के लाभ से जादे हानिए होत ।

खाँटी मगही शब्द के उदाहरण - अगाती, अगारी-पगारी, अजबरिया, अजलत, अतत्तह, अतू, अनकुर, अनखा, अनबेरा, अन्नस, अबधर, अरउआ, अरमेना, अलबलाहा, अलबलाही, असराहा, अहूठ, उकरुम, उजलत, उताहुल, उबेरा, उसकुन, उसकुन्नी, उसरना, ओरियाना, ओहरले, कठराड़, कन्हेरा, करगी, करियाती, कोंची, कोती, कोहड़ी, खक्खन, खखनल, खखुआना, खमसल, खोंटा, "-गर" प्रत्ययांत शब्द (उदाहरणार्थ - टेसगर, रसगर, सवदगर), गाछी, गिरथाइन, (दीया) घर करना, चउरहा, चमड़चीट, चमरचीट, चेपा, चोंता, छिछियाल, छिनरपत, जुआल, झग्गड़, झरङा, टटऊपर, डिड़ियाना, डिहाँस, ढनकल, ढमकोल, ढिक्का, ततलब्जी, तरूपरी, दमाही, दोगही, धाध, धोकड़ी, नन्हका, नन्हकी, नारन, पइन, पइना, परङा, परतर, पिट्ठा, पिपरी, पोकठाल, फुदना, फूही, फेद्दा, फोकराइँध, फोहवा, बनउरी, बनायके (= बिलकुल), बरकना, बिन्ना, बिसखाल, भंभाड़ा, भंभाड़ी, भुड़की, भुररना, मखना, ममोसर, मरहिन्ना, मान (माँद), मोकमास, (गूह) मोखना, मोरी, लबधना, लर-खुर, लरछुत, लाहरी, लुतरी, लेसड़ियाहा, लोछियाल, लोहराइन, सकेत, सल्लग, सहजबउरी, सहजाना, सहरना, सिधमाइन, हरसज, हिरसी, हेक्टर (= तेज, दक्ष)

(2) ज्ञान-विज्ञान के कउनो शाखा के तकनीकी शब्द खाली तत्सम रूप में लिक्खल जाय (सिद्धान्त (5))

(3) तत्सम व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्द खाली तत्सम रूप में लिक्खल जाय (सिद्धान्त (5))

(4) समानार्थी कइएक शब्दरूप में से यदि कोय एक रूप अइसन होवे जे भोजपुरी प्रभावित होवे, चाहे स्त्रीलिंग के आभास करावे, तो मानक मगही में ई रूप के त्याग करके अन्य वैकल्पिक शब्दरूप के अपनावे के चाही ।

उदाहरणस्वरूप - 'हम कइली' आउ 'हम कइलूँ' में पहिला विकल्प में स्त्रीलिंग के आभास होवऽ हइ । अतः हियाँ दोसरका विकल्प के मानक माने के चाही ।

(5) 'अपने' (हिन्दी के 'आप') शब्द के प्रयोग मानक मगही में अन्य पुरुष में कइल जाय (जइसन कि हिन्दी में कइल जा हइ - 'आप करते हैं', न कि 'आप करते हो'), उत्तम पुरुष चाहे मध्यम पुरुष में नयँ । अतः 'अपने करम' आउ 'अपने करथिन' ('आप करें' अर्थ में) में से दोसरका विकल्प के मानक मानल जाय ।

(6) नालन्दा जिला में प्रयुक्त 'जइथिन', 'करथिन' आदि क्रियारूप के प्रयोग निवेदन अर्थ में ('जाएँ', 'करें') आउ भविष्यत्काल में भी ('जाएँगे', 'करेंगे') कइल जा हइ । लेकिन अन्य जिला में भविष्यत्काल अर्थ में '' आगम वला रूप भी पावल जा हइ - 'जइतथिन', 'करतथिन' । चूँकि भविष्यत्काल में तकार आगम सहित क्रियारूप व्याकरण के दृष्टि से नियमित रूप हइ, अतः एहे रूप के मानक मगही में स्थान देल जाय (सिद्धान्त (6))

(7) 'नहीं' अर्थ में प्रयुक्त मगही में नयँ, नञ, नञ्, नइ, नई, नईं, नै, नैं आदि विकल्प में से 'नयँ' चाहे 'नञ' अपनावल जाय । हल् चिह्नयुक्त 'नञ्' हमर विचार से फालतू के टंकण के काम बढ़इतइ, काहे कि 'नञ' आउ 'नञ्' के उच्चारण तो एक्के नियर होवऽ हइ ।

(8) 'पढ़इलकइ' आउ 'पढ़उलकइ' जइसन भूतकाल क्रियारूप विकल्प में '-अइ' आउ '-अउ' प्रत्यय में से पहिला प्रत्यय के मानक मानल जाय ।

(9) 'करऽ हइ' आउ 'करो हइ' जइसन क्रियारूप विकल्प में धातु में '-' आउ '-' प्रत्यय में से पहिला प्रत्यय के मानक मानल जाय ।

(10) 'पिलाना, पियाना', 'खिलाना, खियाना' दू वैकल्पिक रूप में पहिला नियमित रूप के मान्यता देल जाय ।

(11) 'जइथुन, खइथुन' आउ 'जथुन, खथुन' दू वैकल्पिक रूप में पहिला नियमित रूप के मान्यता देल जाय ।

(12) 'करे लगलइ', 'करो लगलइ', 'करऽ लगलइ' - जइसन तीन क्रियारूप में से पहिला क्रियारूप के मानक मानल जाय ।
(13) 'हलऽ लऽ', 'हला ला' - ई दू क्रियारूप में से पहिला क्रियारूप के मानक मानल जाय । ओइसहीं 'तूँ जादे चिंता करऽ हऽ'  आउ 'तूँ जादे चिंता करऽ हा' - ई दुन्नु विकल्प में पहिला के मानक मानल जाय ।

(14) 'खाय लगल', 'जाय लगल', 'छिरियाय लगल'  आउ 'खा लगल', 'जा लगल', 'छिरिया लगल' इत्यादि वैकल्पिक क्रियारूप में से पहिला क्रियारूप के मानक मानल जाय ।

(15) भूतकाल में ककार के प्रयोग खाली सकर्मक क्रिया से कइल जाय, अकर्मक में नयँ । उदाहरणस्वरूप – ‘गेलक, उठलक’ आदि के जगह पे 'गेल, उठल' के मानक मानल जाय । ध्यातव्य - मरलइ (अकर्मक ‘मरा’ चाहे 'मरी' अर्थ में), लेकिन मरलकइ / मालकइ (सकर्मक ‘मारा’ अर्थ में) ।

(16) 'ही', 'हिया' (दे॰ 'मगही विरंज', ले॰ मनोज कुमार कमल) आउ 'हइ', 'हेया' - ई वैकल्पिक क्रियारूप में से पहिला क्रियारूप के मानक मानल जाय ।

(17) 'दुन्नु', 'दुन्नूं', 'दुन्नूँ' इत्यादि वैकल्पिक रूप में से पहिला के मानक मानल जाय ।

(18) अनुस्वार आउ चन्द्रबिन्दु के प्रयोग हिन्दी में जइसे प्रस्तावित हइ, ओइसहीं कइल जाय (विस्तार खातिर देखल जाय - 'हिन्दी वर्तनी की समस्याएँ' (तिवारी एवं बाला, 1983) एवंदेवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी’, IS 16500:2012, भारतीय मानक ब्यूरो, अगस्त 2012

सन्दर्भ ग्रन्थः

Grierson, G.A. (1881): “An Introduction to the Maithili Language of North Bihar containing A Grammar, Chrestomathy and Vocabulary”, Part-I: Grammar; Asiatic Society, Calcutta; viii+114+2+3 pp.
Jha, Subhadra (1941): “Maithili Phonetics”, Indian Linguistics, 8 (1940-1944), pp.39-70.
अर्याणी, सम्पत्ति (1993): “मगही भाषा के मानक रूप” - “मगही व्याकरण-प्रबोधमें तृतीय खण्ड, “मगही भाषा के कुछ समस्या के अध्याय-1 के अन्तर्गत मगही भाषा के मानक रूप”, पृ॰ 3-16 ई मूल लेख के चुनिन्दा एवं थोड़े-सन सम्पादित अंश इंटरनेट पर उपलब्ध हकइ -
(http://magahi-sahitya.blogspot.com/2009/06/4.html)
झा, योगानंद (2006): "मैथिली पत्रकारिता के सौ वर्ष", लहेरियासराय, दरभंगा, 64 पृष्ठ ।
झा, राजमोहन (2006): "मैथिलीक मानकीकरण आ पत्र-पत्रिका", पृ.17-20 [चौधरी, शरदिन्दु (सं.): "मैथिली पत्रकारिता: दशा ओ दिशा", प्रकाशकः शरदिन्दु चौधरी, पटना; 96 पृष्ठ] मैथिली में ।
तिवारी, भोलानाथ एवं किरण बाला (1983): “हिन्दी वर्तनी की समस्याएँ”, प्रकाशक - शब्दकार, 159, गुरु अंगद नगर (पश्चिम), दिल्ली-92; कुल - 135 पृष्ठ.
देवेश, देवेन्द्र कुमार (2011): "मानक हिंदी वर्तनी: प्रमुख समस्याएँ और सुझाव", paper presented in "National Workshop on the Problems of Standardization of Hindi Spellings", organised by NCERT, New Delhi, 22-23 December.
प्रसाद, नारायण (2012): “मगही क्रियारूप के मानकीकरण आउ बिहारशरीफ के मगही”, मगही पत्रिका (सं॰ धनंजय श्रोत्रिय), जुलाई-अगस्त, पृ॰41-50; अंग्रेजी में ।
प्रसाद, वासुदेव नन्दन (1992): “बिहार का प्रथम हिंदी पत्रः 'बिहार बंधु' ” (पृ॰13-21), निबंध;सुमन’, त्रैमासिक पत्रिका, सं. लक्ष्मीचन्द्र प्रियदर्शी, वर्ष 3, अंक 1, जनवरी-मार्च; कुल 40 पृष्ठ; नवादा/ नालंदा से प्रकाशित ।
प्रियदर्शी, हरिश्चन्द्र (1986): “मगही भासाः मानक मगही आउ वर्तनी”, “मगही”, मगध संघ के तिमाही पत्रिका, सम्पादक - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, बरीस 1, अंक 1, जनवरी-मार्च, पृ॰ 76-77.
(http://magahi-sahitya.blogspot.com/2009/03/7.html)
मिश्र, जयकान्त (1950): “A History of Maithili Literature”, Vol.II, Tirabhukti Publications, Allahabad; 187 pp.
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मिश्र, विनीत कुमार अकेला’ (2009): “मगही भासा :  मानकता के कसउटी पर”, अलका मागधी, बरिस-15, अंक-5, मई, पृ॰ 5-7. (http://magahi-sahitya.blogspot.com/2009/09/5.html)
राम नन्दन (2012):"मगही लिखे में हिज्जे के समस्या", बिहान, खंड 28, अंक 3, अक्टूबर 2011 - जनवरी 2012, पृ॰24-30
लोहानी, शिवप्रसाद (1997):"गलबात" (मगही निबन्ध संग्रह), सुकृति प्रकाशन, नूरसराय (नालन्दा), कुल-120 पृष्ठ । "साहित्य में परम्परा औ नवीनता", पृ॰1-10; "मगही के स्वर्गीय साहित्यकार", पृ॰11-23
वाजपेयी, पं॰ किशोरीदास (1998): “हिन्दी शब्दानुशासन”, पंचम संस्करण, संवत् 2055 वि॰; नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी; कुल - 12+4+40+8+6+608 पृष्ठ ।
सिंह, राम प्रसाद (1987): “मगही के मानक रूप” (मगही निबंध संग्रह), मगही अकादमी, तूतबाड़ी, गया, पृष्ठ 1-6. (http://magahi-sahitya.blogspot.com/2006/09/blog-post_04.html)
सिंह, भरत (2011) "मगही कलमकारन से", पाटलि, नवम्बर 2011, पृ॰51-52
स्वर्णकिरण (2002): “मगही के मानक रूप के पक्षधरः डॉ॰ श्रीकान्त शास्त्री”, मगही पत्रिका, अंक 7, जुलाई 2002,  पृ॰ 21-22, 40 । ई मूल लेख के चुनिन्दा अंश इंटरनेट पर उपलब्ध हकइ -
(http://magahi-sahitya.blogspot.com/2009/03/7_05.html)


Original Quotations
Grierson (1881: 1-2):
Our greatest difficulty has been experienced from the luxuriance of the language. The verb, especially, much tried our patience. Maithili is a बोली in the literal sense of the word. Beyond a History of Krishna and /the songs of Vidyapati Thakur, I know of no literary work which it possesses. It is emphatically a spoken language. There is no standard to which it can be referred, and hence no form can be put aside as vulgar or impure. It is hoped, not only by myself, that the publication of a treatise like the present will tend to fix a standard and to foster a literature which might easily arise in so racy and fluent a language./// The dialect which I have adopted as a standard is that of the Madhubani Sub-division, which is centrally situated, and which is admitted by all Brahmans to be the head-quarters of Mithila.

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