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Wednesday, June 22, 2016

रूसी उपन्यास "आझकल के हीरो" ; भाग-1 ; बेला - अध्याय-1



रूसी उपन्यास – “आझकल के हीरो”
भाग-1
1. बेला - अध्याय-1

हम एक डाक स्टेशन से दोसरा डाक स्टेशन में घोड़ा बदलाय वला घोड़ागाड़ी में तिफ़लिस से यात्रा कर रहलिए हल । हमर गाड़ी के एकमात्र सामान हलइ एगो छोटगर सूटकेस, जेकरा में आधा हिस्सा जॉर्जिया के बारे यात्रा संस्मरण से भरल हलइ । ओकरा में से अधिकांश, अपने के सौभाग्य से, खो गेलइ, लेकिन सूटकेस के साथ बाकी सामान, हमर सौभाग्य से, पूरा बच गेलइ ।
जब हम कोयशाऊर घाटी में प्रवेश कइलिअइ, त हिमाच्छादित पर्वतमाला के पीछू सूरज डुब्बे जा रहले हल । ओसेतिन कोचवान अथक रूप से घोड़वन के हाँक रहले हल, ताकि रात होवे के पहिले कोयशाऊर शिखर पर पहुँच जाय, आउ गला फाड़के गीत गा रहले हल । ई घाटी बड़ी सुन्दर हइ ! चारो दने से अलंघ्य पर्वत, ललहन चट्टान, लटकल हरियरका मारवल्ली (ivy) आउ गुच्छा धारण कइले चिनार, पीयर खड़ी चट्टान (cliffs), नाला सब के कतार, आउ हुआँ उँचगर-उँचगर सुनहरा बरफ के झालर (fringe), आउ निच्चे में अराग्वा (नदी), दोसर बेनाम छोटगर नद्दी के आलिंगन में लेते, करिया, पूरा अन्हार दर्रा (gorge) से शोर करते फूट पड़ते, चानी रंग के रिबन के रूप में आगू पसर जा हइ आउ अपन केंचुली के साथ साँप नियन चमकऽ हइ ।
कोयशाऊर पर्वत के तलहटी में पहुँचला पर, हमन्हीं एगो दूख़न [1]  के पास ठहरते गेलिअइ । हियाँ परी हल्ला-गुल्ला करते बीस जॉर्जियन आउ पहाड़ी लोग जामा होते गेलइ; पासे में ऊँट के एगो काफिला रात गुजारे खातिर ठहरल हलइ । हमरा अपन गाड़ी के ई अभिशप्त पर्वत के शिखर पर ले जाय लगी भाड़ा पर बैल लेवे के हलइ, काहेकि शरत्काल आ गेले हल आउ जमीन बरफ से ढँक्कल हलइ - आउ ई पहाड़ के शिखर लगभग दू विर्स्ता लम्मा हलइ ।

कोय उपाय नयँ हलइ, हम छो बैल भाड़ा पर लेलिअइ आउ कुछ ओसेतिन लोग । ओकन्हीं में से एक अदमी हमर सूटकेस अपन कन्हा पर उठइलकइ, दोसर लोग बैलवन के लगभग एक साथ चीखते मदत करे लगलइ ।

हमर गाड़ी के पीछू चार बैल एगो दोसर गाड़ी के अइसे असानी से घींच रहले हल, जइसे कोय भार नयँ रहइ, ई बात के बावजूद, कि ऊ गाड़ी उपरे तक सामान से भरल हलइ । ई परिस्थिति हमरा अचंभित कर देलकइ । ओकर पीछू-पीछू ओकर मालिक चल रहले हल, एगो चानी मढ़ल कबार्दी पाइप पीते । ऊ बिन स्कंधिका (epaulettes) वला एगो अफसर के ओवरकोट आउ चेर्केस रोएँदार टोपी धारण कइले हलइ । ऊ लगभग पचास साल के लगऽ हलइ; सामर रंग के ओकर चेहरा देखा रहले हल, कि ऊ लम्मा समय से काकेशियाई पर्वत से दक्खिनी क्षेत्र  के (Transcaucasian) सूरज से परिचित हलइ, आउ समय से पहिलहीं उज्जर होल ओकर मोंछ ओकर दृढ़ चाल आउ ओजस्वी चेहरा से मेल नयँ खा हलइ । हम ओकरा भिर गेलिअइ आउ सिर झुकाके अभिवादन कइलिअइ - ऊ चुपचाप हमर अभिवादन के उत्तर देलकइ आउ धुआँ के एगो बड़गर बादल छोड़लकइ ।

"हमन्हीं दुन्नु हमसफर हिअइ, लगऽ हइ ?"
ऊ फेर से चुपचाप सिर झुकइलकइ ।
"अपने, शायद, स्तावरोपोल जा रहलथिन हँ ?"
"जी हाँ, बिलकुल ... सरकारी सामान के साथ ।"
"किरपा करके बताथिन, कि काहे अपने के ई भारी गाड़ी चार बैल असानी से घींच रहले ह, लेकिन हम्मर, खाली गाड़ी के छो-छो जनावर ई सब ओसेतिन के मदत से मोसकिल से घसकाब करऽ हइ ?"
ऊ धूर्ततापूर्वक मुसकइलइ आउ सार्थक रूप से हमरा दने तकलकइ ।
"अपने, शायद, काकेशिया में हाले अइलथिन हँ ?"
"एक साल होलइ", हम जवाब देलिअइ ।
ऊ दोसरा तुरी मुसकइलइ ।
"की, की होलइ ?"

"जी हाँ, एहे बात हइ ! ई एशियाई लोग छँट्टल बदमाश हइ ! अपने सोचऽ हथिन, ओकन्हीं चिल्लाके मदत करऽ हइ ? ई तो शैताने के मालूम, कि ओकन्हीं चिल्लाके की बोलऽ हइ । लेकिन बैलवन तो ओकन्हीं के बात समझऽ हइ; बल्कि बीस (बैल) जोतथिन, लेकिन ओकन्हीं अपन भाषा में चिल्लइतइ, त ई बैलवन अपन जगह से टस से मस नयँ होतइ ... एक नंबर के ठग हइ सब ! लेकिन ओकन्हीं से की लेबहो ? ... यात्री लोग से पइसा ऐंठना पसीन करते जा हइ ... बिगड़ल ठग लोग हइ ! देखते रहथिन, ओकन्हीं अपनहूँ से वोदका लगी पइसा लेतइ । हमहूँ ओकन्हीं के जानऽ हिअइ, हमरा बेवकूफ नयँ बनइते जा सकऽ हइ !"

"आउ अपने लम्मा समय से हियाँ सेवा (नौकरी) में हथिन ?"
"हाँ, हम अलिक्सेय पित्रोविच [2] के समइए से हियाँ नौकरी में हिअइ", ऊ शान से जवाब देलकइ । "जब ऊ लाइन (सीमा) पर अइलथिन हल, हम सब-लेफ्टेनेंट हलिअइ", ऊ आगू बोललइ, "आउ उनके अधीन पहाड़ी लोग के विरोध में सेवा के कारण हमरा दू तुरी प्रोन्नति (प्रोमोशन) मिललइ ।"
"आउ अभी अपने ? ..."
"अभी हम तेसरा लाइन बटालियन में हिअइ । आउ अपने, हम पूछ सकऽ हिअइ ?"
हम ओकरा बतइलिअइ ।

बातचीत एकरे साथ खतम हो गेलइ आउ हमन्हीं चुपचाप अगले-बगली चलते रहलिअइ । पर्वत के शिखर पर हमन्हीं के बरफ देखाय देलकइ । सूरज डूब गेलइ, आउ दिन के बाद सीधे रात आ गेलइ, बिन कोय गोधूलि वेला के, जइसन कि अकसर दक्खिन में होवऽ हइ; लेकिन बरफ के चमक के चलते हमन्हीं असानी से रस्ता पछान ले हलिअइ, जे अभियो पर्वत के उपरे तरफ जा रहले हल, हलाँकि ओतना ढालू नयँ हलइ । हम अपन सूटकेस गाड़ी में रक्खे के हुकूम देलिअइ, आउ बैल के बदले घोड़ा के जोते लगी आउ अंतिम तुरी घाटी दने दृष्टि डललिअइ; लेकिन घना कुहरा, जे दर्रा से लहर के रूप में आ धमकलइ, एकरा बिलकुल ढँक लेलकइ, आउ हुआँ से एक्को अवाज हमन्हीं के कान तक उड़के नयँ पहुँचऽ हलइ । ओसेतिन शोरगुल करते हमरा घेर लेते गेलइ आउ वोदका लगी बख्शिश (tips) माँगे लगलइ; लेकिन स्टाफ-कप्तान (लेफ्टेनेंट आउ कप्तान के बीच के रैंक) ओकन्हीं पर एतना भयंकर रूप से चिल्लइलइ, कि ओकन्हीं पल भर में तितर-बितर हो गेते गेलइ ।
"कइसन लोग हइ !" ऊ बोललइ, "रूसी में रोटी के की कहल जा हइ, ई मालूम नयँ, लेकिन ई सीख गेलइ – ‘अफसर, वोदका लगी पइसा देथिन !’ हमर विचार से तातार लोग एकन्हीं से बेहतर हइ - ओकन्हीं तो पीयऽ नयँ हइ ..."

स्टेशन तक अभियो करीब एक विर्स्ता रह गेले हल । चारो दने सन्नाटा हलइ, एतना शांत, कि एगो मच्छड़ के भनभनाहट से ओकर उड़ान के पीछा कइल जा सकऽ हलइ । बामा दने गहरा दर्रा कार हो रहले हल; ओकर पीछू आउ हमन्हीं के सामने पर्वत के गहरा नीला शिखर, झुर्री पड़ल, बरफ के परत से ढँक्कल, गोधूलि वेला के चमक अभियो बरकरार रखले फीका क्षितिज पर देखाय देब करऽ हलइ । करिया आकाश में तरिंगन टिमटिमाय लगलइ, आउ विचित्र बात हइ, कि हमरा लगलइ, कि उत्तर में हमन्हीं हीं के अपेक्षा ई (आकाश) बहुत जादहीं उँचगर हइ । रस्ता के दुन्नु दने नग्न, करिया चट्टान उपरे दने उट्ठल हलइ; कहीं-कहीं बरफ के तर्रे से झाड़ी देखाय दे रहले हल, लेकिन एक्को सुक्खल पत्ता नयँ सरसराब करऽ हलइ, आउ प्रकृति के ई जीवनहीन निद्रा के बीच डाक स्टेशन के त्रोयका के थक्कल घोड़वन के हिनहिनाहट आउ रूसी (घोड़ागाड़ी के) घंटी के बीच-बीच में टनटनाहट सुन्ने में निम्मन लगऽ हलइ ।
"कल मौसम निम्मन रहतइ !" हम कहलिअइ ।
स्टाफ-कप्तान एक्को शब्द जवाब नयँ देलकइ आउ हमरा अँगुरी से उँचगर पर्वत दने इशारा कइलकइ, जे सीधे हमन्हीं के सामने उट्ठल हलइ ।
"ई की हइ ?" हम पुछलिअइ ।
"गूद-गोरा ।"
"त एकरा से की ?"
"देखथिन, कइसन धुआँब करऽ हइ ।"
आउ वास्तव में गूद-गोरा धुआँब करऽ हलइ; एकर बगल में बादर के हलका धारा रेंग रहले हल, जबकि शिखर पर एगो करिया घना बादर हलइ, एतना करिया, कि करिया असमान में ई एगो धब्बा प्रतीत हो रहले हल ।

हमन्हीं अब डाक स्टेशन, आउ एकर चारो तरफ के साक्ल्या (काकेशिया के पहाड़ी झोपड़ी) के छत पछान सकऽ हलिअइ, आउ हमन्हीं सामने स्वागत करे वला अग्नि कौंधे लगलइ, जब आर्द्र आउ शीतल हावा के झोंका अइलइ, दर्रा सनसनाय लगलइ आउ फूही पड़े लगलइ । मोसकिल से हम नमदा के चोगा (felt cloak) अपन देह पर डाल पइलिइए हल, कि बरफ पड़े लगलइ । हम स्टाफ-कप्तान दने आदरपूर्वक देखे लगलिअइ ...
"हमन्हीं के हियाँ परी रात गुजारे पड़तइ", ऊ खेदपूर्वक बोललइ, "अइसनका बर्फानी तूफान (blizzard) में पहाड़ से होके यात्रा नयँ कइल जा सकऽ हइ । की ? क्रिस्तवाया पर हिम-स्खलन (avalanches) होले हल ?" ऊ कोचवान के पुछलकइ ।
"नयँ, महोदय", ओसेतिन-कोचवान उत्तर देलकइ, "लेकिन बहुत, बहुत (हिम-स्खलन होवे के) आशंका हइ ।"

स्टेशन में यात्री खातिर कमरा खाली नयँ होवे के कारण, हमन्हीं के धुआँसा (smoky) साक्ल्या में रात गुजारे खातिर ले जाल गेलइ । हम अपन हमसफर के साथ में एक गिलास चाय पीए लगी आमंत्रित कइलिअइ, काहेकि हमरा साथ ढलवाँ-लोहा (cast-iron) के चायदानी हलइ - जे काकेशिया के भ्रमण में हमर एकमात्र सांत्वना हलइ।

साक्ल्या के एक सिरा एगो खड़ी चट्टान (cliff) पर बन्नल हलइ; तीन गो पिच्छुल, भिंगल सोपान (steps) ओकर दरवाजा तक ले जा हलइ । टोते-टाते हम अंदर घुसलिअइ आउ एगो गाय से टकरा गेलिअइ (नौकर-चाकर के कमरा के स्थान में ई लोग हीं दोगही होवऽ हइ) । हमरा समझ में नयँ आल, कन्ने जाँव - एक दने भेंड़ मेमिया हके, आउ दोसरा दने कुत्ता गुर्राब करऽ हके । भाग्यवश, बगल में एगो मद्धिम रोशनी चमक रहले हल, जे हमरा दरवाजा नियन दरार खोजे में मदत कइलकइ । हियाँ परी काफी दिलचस्प तस्वीर खुललइ - चौड़गर साक्ल्या, जेकर छत धुआँ के कारिख लगल दूगो खंभा पर आधारित हलइ, लोग से भरल हलइ । बीच में जमीन पर आग चटक रहले हल, आउ धुआँ के, जे छत में के छेद से हावा के जोर से वापिस ढकेल देल गेले हल, एतना घना आवरण छाल हलइ, कि हम देर तक ठीक से कुछ देख नयँ पइलिअइ; अगिया भिर दूगो बूढ़ी बइठल हलइ, ढेर सारा बुतरू आउ एगो दुब्बर-पातर जॉर्जियन, सब कोय चिथड़ा में । कुछ नयँ कइल जा सकऽ हलइ, हमन्हीं अगिया बिजुन शरण लेलिअइ, पाइप जलइलिअइ, आउ जल्दीए चायदानी स्वागतपूर्वक सिसकारी पारे लगलइ ।

"दयनीय लोग !" हम स्टाफ-कप्तान के कहलिअइ, हमन्हीं के गंदा मालिक (hosts) दने इशारा करते, जे चुपचाप हमन्हीं तरफ एक प्रकार से स्तंभित होल देख रहले हल ।
"महामूर्ख लोग !" ऊ उत्तर देलकइ । "विश्वास करथिन ? कुछ नयँ करते जा सकऽ हइ, कइसनो शिक्षा के काबिल नयँ ! कम से कम हमन्हीं के कबार्दी, चाहे चेचेन लोग बल्कि डाकू रहइ, लंगटे, तइयो भयंकर लोग हइ, लेकिन एकन्हीं के कइसनो हथियार में रुचि नयँ हइ - एक्को गो के पास ढंग के खंजर (कटार) नयँ देखबहो । पक्का ओसेतिन लोग हइ !"
"आउ अपने लम्मा अवधि तक चेचन्या (Chechnya) में रहलथिन हल ?"
"हाँ, हुआँ हम लगभग दस साल तक कंपनी (पलटन) के साथ किला में रहलिए हल, कामेन्नी ब्रोद के पास - (ई जगह के बारे) जानऽ हथिन ?"
"सुनलिए ह ।"
"अइकी, बबुआ, ई गलाकाटू (cut-throats) लोग से तो हमन्हीं ऊब चुकलिए ह; अभी तो, भगमान के किरपा से, मामला कुछ अधिक शांत हइ; लेकिन कभी अइसन समय हलइ, जब परकोटा (rampart) से सो डेग दूर गेलहो नयँ कि कहीं पर झबरा शैतान घात लगइले बइठल मिलतो -  जरिक्को सनी उबासी लेवे लगी मुँह बइलहो नयँ, कि तखनिएँ देखहो - या तो कमंद (lasso, halter) गरदन में पड़ गेलो, चाहे सिर के पिछला हिस्सा से गोली पार हो गेलो । लेकिन बहादुर लोग ! ..."
"आउ अपने के, अवश्य, बहुत अपूर्व अनुभव होले होत ?" हम उत्सुकता से उत्तेजित होके कहलिअइ ।
"काहे नयँ ! होले हल न ..."

हियाँ परी ऊ अपन बामा बगल के मोंछ खुजलावे लगलइ, मूड़ी गोत देलकइ आउ सोच में डूब गेलइ । हमरा ओकरा से कोय तो कहानी जाने के बड़ी मन कइलकइ - अइसन इच्छा, जे सब्भे यात्रा करे वला आउ यात्रा वृत्तांत लिक्खे वला लगी स्वाभाविक होवऽ हइ । एहे दौरान चाय तैयार हो गेलइ; हम सूटकेस से दूगो सफरी गिलास निकसलिअइ, चाय ढरलिअइ आउ एगो ओकरा सामने रखलिअइ । ऊ चुस्की लेलकइ आउ मानूँ अपने आप से बोललइ - "हाँ, होले हल न !" ई विस्मय के उद्गार हमरा बड़गो आशा बन्हइलकइ । हमरा मालूम हइ, कि पुरनकन काकेशियाई लोग बतियाना, किस्सा सुनाना पसीन करऽ हइ; ओकन्हीं के अइसन कम्मे मोक्का मिल्लऽ हइ - हो सकऽ हइ कि कोय लगभग पाँच साल कहीं एकांत में कंपनी के साथ रहइ, आउ पूरे पाँच साल ओकरा कोय नयँ "ज़्द्राव्स्त्विचे" (रूसी - "नमस्ते") कहइ [काहेकि फ़ेल्डवेबेल (जर्मन "Feldwebel" - वरिष्ठ सर्जेंट) बोलऽ हइ - "ज़्द्राविया झिलायू" (रूसी - "अपने के स्वास्थ्य के कामना करऽ हिअइ") ] । आउ गप मारे के बहुत कुछ होवऽ हलइ - चारो तरफ जंगली, उत्सुक लोग; रोज दिन खतरा, मनोरम घटना होते रहऽ हइ, आउ हियाँ नयँ चाहतहूँ ई सोचबहो, कि हमन्हीं हीं एतना कम नोट (रेकर्ड) कइल जा हइ ।

"थोड़े आउ रम नयँ लेथिन ?" हम अपन सहभाषी (साथ में गपशप करे वला) के कहलिअइ, "हमरा पास तिफ़लिस के उज्जर रम हइ; अभी ठंढा हइ ।"
"नयँ जी, धन्यवाद, हम नयँ पीयऽ हिअइ ।"
"अइसे कइसे ?"
"एहे बात हइ । हम कसम खा लेलिए ह । जब हम सब-लेफ्टेनेंट ही हलिअइ, एक तुरी, जानऽ हथिन, हमन्हीं आपस में रंगरेली मना रहलिए हल, आउ रात के खतरा के चेतावनी देल गेलइ; आउ अइकी हमन्हीं नीसे में सीमा पर गेते गेलिअइ, आउ हमन्हीं फेरा में पड़ गेलिअइ, जब अलिक्सेय पित्रोविच के पता चल गेलइ - हे भगमान, ऊ केतना भड़क गेलथिन ! हमन्हीं कोर्ट-मार्शल से बाल-बाल बचलिअइ । ई पक्का हइ - कभी-कभी पूरे साल बिता दे हो आउ केकरो से भेंट नयँ होवऽ हको, आउ वोदका के चक्कर में पड़ गेलऽ - त गेलऽ काम से !"
एतना सुनके, हमर आशा लगभग टूट गेल ।
"आउ अइकी बल्कि चेर्केस लोग के बात लेथिन", ऊ बात जारी रखलकइ, "जइसीं शादी चाहे किरिया-करम के दौरान पीके धुत्त हो गेलो, ओइसीं कटाई (मारामारी) चालू हो गेलो । हम तो एक तुरी कइसूँ बचके निकस गेलिअइ, हलाँकि हम एगो शांतिप्रिय राजकुमार के हियाँ पहुना (अतिथि) हलिअइ ।"
"ई कइसे होलइ ?"
"अइकी (ऊ पाइप भरलकइ, कश लगइलकइ आउ कहानी चालू कइलकइ) ।


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2 comments:

Sameer Kumar said...

ई त गजबे लिख देल्हू ह। खूब आभार हम्मर दने से।

नारायण प्रसाद said...

तोहरा पसीन पड़लो, ई जानके हमरा बड़गो खुशी होलो ।