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Wednesday, July 22, 2026

हम्मर कीऽ अपराध?

हम्मर कीऽ  अपराध?

मूल तमिल - आर॰ विलिनाथन्   

उड़िया अनुवाद - पौरुष (मार्च 1981)  

मगही अनुवाद - नारायण प्रसाद

हमरा से कीऽ गलती होलइ?  हमरा नौकरी से काहे ससपिन (सस्पेंड) कइल गेलइ? बड़ी सोच-विचार कइलो पर हम एकर कारण ढूँढ़ न पइलूँ। अगर अपने जान पाथिन त हमरा बतइथिन। जरी स सोचथिन।

हम झूठ काहे ल कहिअइ? चाह तैयार करते बखत जइसे ई कागज के टुकड़ा जल रहले ह, ठीक ओइसहीं ऊ दिन हमर दिल जले लगल हल।

साधारणतः हम रद्दी लिफाफा जलाके चाह तैयार करऽ हूँ। लेकिन ई दफ्तर में एक अफवाह उड़ गेल ह कि हम चिट्ठी जलाके चाह तैयार करऽ हिअइ। हम तो बारंबार कहऽ हूँ कि ई अभियोग गलत हइ। लेकिन दोसर के नजर में ई सही हइ।

फिर अपने पूरा के पूरा घटने सुन लेथिन। अपने असली बात जान पइथिन।

न जानूँ ऊ कखने अइता - ई तरह के उद्वेग भरल मन लेके शायद प्रेमिका प्रेमी के बाट जोह रहल ह। एतने में प्रेमिका लगी चिट्ठी आवऽ हइ - नाया सपना भरल संदेश लेके। नौकरी से संबंधित दौरा पर गेल विरहविदग्ध पति शायद नाया शहर के कोय होटल के कोय कोठरी से चिट्ठी लिक्खऽ हइ अपन प्राणप्रिया घरवली के पास। मइया के खर्चा लगी रुपइया भेजे वला बेटा के प्यार भरल चिट्ठी आवऽ हइ। कन्या चिट्ठी दे हइ मइया के हानि-लाभ जाने ल। पदोन्नति लगी बेअग्गर कर्मचारी चिट्ठी भेजऽ हइ अपन जानल-पहचानल कोय ऊपर वला हाकिम के पास। ई सब बात के अलावे नजदीकी रिश्तेदार के मिरतु के समाद लेले आवऽ हइ कोय दुःखदायक पत्र। ई सब्भे तरह के चिट्ठी-पत्र के बाँटे के काम में लगल हकूँ हम। हम एगो डाकिया हकूँ। हमर नाम दामोदर हके। हम अपन काम में लगल हकूँ, फल के आशा नञ् करऽ हूँ। हम जानऽ हूँ - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

छोट्टे-छोट्टे बुतरू सब के खुश करे खातिर हम जे कुछ कइलिए ह, की ऊ गलत हइ? हमर समझ में ई सही हइ। लेकिन बाकी लोग के नजर में ई गलत हइ। बियाह के बहुत दिन के बादो कोय संतान नञ् होवे के कारण हम दोसर लोग के बुतरू के देखके खुश हो जा हलूँ। ऊ सब के ठोर पर हँस्सी लावे लगी हम जे कुछ करऽ हलूँ, ऊ लोग-बाग के आँख के काँटा काहे बन गेल, ई हमर समझ में नञ् आल। हम करवो करऽ हलूँ की? रस्ता पर कइएक रद्दी लिफाफा पड़ल रहऽ हकइ। हम ओकरा जामा करके लावऽ हलूँ आउ सिद्धिरस्तुनञ् जाने वला बुतरू के देखके ओकर हाथ में एगो लिफाफा धरा दे हलूँ। कहऽ हलूँ - ले, तोर मामूँ एगो चिट्ठी भेजलथुन हँ आउ कोय बुतरू के हाथ में लिफाफा पइते कहऽ हलूँ - ले, तोर नाना ई सुन्दर चिट्ठी भेजलथुन हँ बुतरू आनन्दविभोर हो जा हल। ओकन्हीं के आनन्दित देखके हमहूँ पुलकित हो उठऽ हलूँ।

पराया बुतरू के हमरा अइसे खुश करते देखके भगमान के शायद दया लग गेलइ। ओहे से हमर घर में जलम होल एगो बच्ची के।

बाकी बुतरुअन साथ हम जइसन खेल खेलऽ हलूँ, अपन बेटियो के साथ ओइसने खेल खेले लगलूँ। एक दिन ओकरा बोलाके कहलूँ - ले, तोर चिट्ठी अइलो ह।

- चिट्ठी? हमरा चिट्ठी भेजलकइ केऽ?तोतराल अवाज में ऊ बोलल।

- तोर दुलहवा।

- सच?ऊ हँस पड़ल।

एहे तरह से चल रहल हल हमर जीवन प्रवाह। एक दिन हमर बेटी हमर हाथ में एगो चिट्ठी देके बोललक - ई चिट्ठी के डाक में डाल दिहऽ।

- केकरा चिट्ठी भेज रहलहीं ह?हम पुछलूँ।

- अपन दुलहवा हीं। ऊ जवाब देलक।

हम दुनू बेकत ई बात सुनके मारे हँसी के बेदम हो गलूँ।

बेटी बड़ होवे लगल। ओकरा इस्कूल जाय के समय आ गेल। हम सोचलूँ कि बिद्दा तो हमर भाग में नञ् हल, बाकि अपन बेटी के एकरा से वंचित काहे करूँ। कम-से-कम बी॰ए॰ तक ओकरा जरूर पढ़ाम।

ऊ दिन हम दफ्तर से छुट्टी लेके घर बइठल हलूँ। एगो चिट्ठी आल हमर बेटी लता के नाम। लता ऊ बखत कौलेज जा हल। चिट्ठी पाके हम सोचलूँ, ओकरा पास चिट्ठी केऽ लिखलक होत? जरूर ओकर कोय सहेली लिखलक होत। ई सोचते-सोचते हम चिट्ठी खोल डाललूँ। चिट्ठी पढ़े पर हमर सर चकरा गेल।

कौलेज में आजकल कीऽ पढ़ावऽ हका? खाली प्रेम से संबंधित गवेषणा चल रहले ह कीऽ हुआँ? मोहन नाम के कोय युवक ई चिट्ठी भेजलके हल। ई हलइ एगो प्रेमपत्र।  

पहले तो चिट्ठी पढ़ला पर हमर सर गरम हो गेल। लेकिन बाद में हम शांतभाव से सोचे लगलूँ। सोचलूँ कि एकरा में गोस्सा करे के कीऽ बात हइ? आजकल युवक-युवती अपन भाग के फैसला खुद्दे करे के प्रयास करऽ हइ। एकरा में हमरा माँ-बाप के हैसियत से तो ऊ सब के सहायता करना उचित हकइ। बेकार के ड़ँगा लगावे से कीऽ लाभ? अगर ई युवक अच्छा होवे त हमरा ओकन्हीं के आगे ढ़े में मदत करे के  चाही।

हम गुप्त रूप से ई मोहन के बारे में विभिन्न सूत्र से खबर जामा करे लगलूँ। देखलूँ कि ई युवक के चरित्र अच्छा नञ्। प्रेम करना ओकर एगो शौक हइ। ऊ ई तरह कइएक लड़की के प्रेमपत्र दे हइ, अइसन सुने में आल। ई सब कुछ हम अपन बेटी के बता देलूँ। मोहन के विरुद्ध जे कुछ हम सुनलूँ हल, ओकर अच्छा तरह से वर्णन करके लता के सुना देलूँ। लेकिन ई सब कइलो पर मोहन के प्रति लता के सहानुभूति कुच्छो कम नञ् होल, बल्कि ऊ दुन्नु के बीच घनिष्ठता बढ़ले गेल। वस्तुतः प्रेम अन्धा होवऽ हइ, एकर सबूत हमरा मिल गेल। हम जेतना कड़ा अनुशासन बरतऽ हलूँ, लता ओतने अधिक मोहन से प्रेम करऽ हले। एक दिन सब्भे अनुशासन के पीछे छोड़के लता मोहन के साथ कोय अनजान जगह में भाग गेल।

ई तरह के कोय दुर्घटना घटत, एकर आशा हमर घरवली के नञ् हल। लता के चल जाय के दुइए दिन बाद ऊ खाट पकड़ लेलक। हृदय के असीम पीड़ा ऊ सहन नञ् कर पइलक आउ एक सप्ताह के अन्दरे ऊ आँख मून लेलक - हमेशे लगी। ई घटना से हम तो अधमरू हो गेलूँ। तइयो हमर हृदय में एक क्षीण आशा शेष हले - शायद हमर लड़की जीवन के उथल-पुथल में कटु सत्य जान पावत, शायद ऊ फिर जीवन के स्वाभाविक धारा में वापस आ जात ... ...।  

हमरा एक तरह के अवाज सुनाय दे हले मानु हमर आत्मा कह रहल ह - दामोदर! ई सब लगी तूँहीं उत्तरदायी हँ। बुतरुअन के झूट्ठो-फुस्सो के चिट्ठी देके तूँहीं ओकन्हीं के मन में वृथा आशा आउ अभिलाषा के सृष्टि कइलऽ हँ। ओकरे तो ई नतीजा हउ। ई तरह के घटना केतना परिवार में घटलो होत, केऽ जानऽ हउ?

कीऽ करूँ? हमर तो ई तरह के झूठ चिट्ठी बाँटना एगो आदत बन गेल ह। ओहे से निश्चय कइलूँ कि डाक के नौकरी छोड़ देम। 43 साल के उमर में बहुत मेहनत करके हम मैटिक के परीक्षा देलूँ। पास कइला के बाद ऊपर के हाकिम के कह-सुनके सॉर्टरके नौकरी पा गेलूँ।

पोस्टल सॉर्टर के रूप में हमर जनकारी बढ़े लगल। जनकारी एतना बढ़ गेल कि कोय लिफाफा के हाथ में लेतहीं हम बता सकऽ हलूँ कि ओकर वजन केतना होतइ। एकरा में ठीक-ठाक टिकट लगल हइ कि नञ्, ई हम ओकर वजन से जान ले हलूँ। खाली एतने नञ्, लिफाफा के अन्दर में कीऽ होतइ, एकरा बारे में ठीक-ठाक अनुमान लगाना हमरा लगी सम्भव हो गेल।

आउ एगो महारत हम हासिल कर लेलूँ। लिफाफा के देखतहीं हम भाँप ले हलूँ कि एकरा में प्रेमपत्र होतइ कि नञ्। हमर ई अनुमान शत-प्रतिशत सही उतरऽ हल। ई तरह के चिट्ठी देखतहीं हमरा अपन बेटी के घटना तरोताजा हो जा हल। लता जे तरह से दुर्भाग्य के शिकार होल, बाकी लड़की के साथ अइसन नञ् होवे, एहे हमर आन्तरिक कामना हल। फेनु ई तरह के चिट्ठी देखतहीं हम ओकरा अलगे रख दे हलूँ। ओकरा ऊ दिन के डाक में कभियो नञ् भेजऽ हलूँ।

अपने सोचऽ होथिन, हमर बेटी के कीऽ होलइ? वस्तुतः हमरा जेकर आशंका हलइ, ओहे होलइ। ऊ धूर्त बदमाश छोकरा हमर बेटी के असहाय अवस्था में छोड़के कहीं भाग गेलइ। ऊ बखत हमर बेटी दू बुतरू के माय बन चुकल हल। छो बच्छर के लम्बा अवधि के बाद अपन बेटी के बारे में एहे खबर हमरा मिलल। हम खबर पइतहीं ओकरा ले आवे खातिर ओकर घर गेलूँ।    

जानऽ हथिन, बेटी हमरा कीऽ उत्तर देलकइ? ऊ कहलक - ऊ दिन तोहर बात नञ् मानके हम घर छोड़के चल अइलूँ हल। आज तोहर बात मानके हम अगर फेर तोहर घर वापस आ जाउँ, त मान-इज्जत रहत तो? हमर पति के बुद्धि भ्रष्ट हो गेल ह, त कीऽ हमहुँ बुद्धि भ्रष्ट कर लेउँ? हम अपने गोड़ पर खड़ा होके ई दुन्नु बुतरू के पालम-पोसम। एकरा से हमर पति के कुल-रक्षा होवत। हमर चिन्ता छोड़ऽ।

हमर बेटी के ई तरह के दुःसाहस दोसर लड़कियन के मन में जागे, अइसन हम कभियो नञ् चाहऽ हूँ। ओहे से जे चिट्ठी के बारे हमरा सन्देह होवऽ हके, ओकरा बिना पढ़ले कभियो डाक में नञ् छोड़ऽ हूँ। दोसर के चिट्ठी पढ़ना अच्छा बात नञ् हइ, ई हम मानऽ हूँ। लेकिन खुफिया विभाग के कर्मचारी अइसन चिट्ठी कइसे पढ़ऽ हका? 

हमर आदत से अपने अच्छा तरह से अवगत हो गेलथिन होत। पहले रस्ता में पड़ल लिफाफा, पोसकाड आदि जामा करे के जे बुरा आदत हलइ, ऊ अभी तक गेलइ नञ्। वस्तुतः ई तरह के पोसकाड, लिफाफा आदि हम कभियो जामा करऽ हूँ आउ चाह तैयार करे में ओकर इस्तेमाल करऽ हूँ। चाह तैयार करे बखत शंकाहा पत्र के खोलके हम पढ़ लेल करऽ हूँ।  

हम तो ई क्षेत्र में काफी महर्रत हासिल कर लेलूँ ह। ओहे से सन्देह के परिसर के अन्दर आवे वला चिट्ठी  के हम कभियो नञ् छोड़ऽ हूँ। एकर ई मतलब नञ् कि वास्तविक प्रेम के विरुद्ध हम अड़ँगा लगावऽ हिअइ। वस्तुतः जाहाँ सच्चा प्रेम रहऽ हइ, हुआँ हम दुन्नु प्रेमी के विवाहसूत्र में आबद्ध करे के चेष्टा करऽ हिअइ। जाहाँ ई तरह के प्रेम के अभाव देखऽ हूँ, हुआँ हम खाली लिफाफा भेजके दुन्नु प्रेमी के बीच कड़वाहट पैदा करऽ हिअइ ताकि ओकन्हीं के बियाह नञ् हो पावे।

ई तरह से बहुत दिन गुजर गेल। कोय पत्रप्रेषक अपन गन्तव्य स्थान में नञ् पहुँचे के डाक विभाग में शिकायत कइलके हल। ऊ शिकायत के अर्जी पर छानबीन कइल गेलइ। हम आपिस (ऑफिस) में लिफाफा जलाके चाह बनावऽ हिअइ - ई बहुत लोग के सहन नञ् हो पावऽ हलइ। ऊ सब जाँच अफसर के हमरा विरुद्ध कह देलकइ।

बहुत कर्मचारी बतइलकइ कि हमर बेटी के जीवन नष्ट हो गेला के बाद हमर सिर फिर गेले ह। हम मानऽ हिअइ, हम दोषी हकिइ। जवाब में हम बहुत सारा चिट्ठी ऊपर के हाकिम के सामने पेश करबइ। ऊ बखत हम मालूम करा देइ कि जे अफसर हमरा अपराधी साबित कइलका ह, ओकर बेटि के मिथ्याप्रेम के फन्दा से हम बचइलि ह। ऊ लड़की सर्वनाश के मुख से रक्षा पा गेले ह। असर के जब ई बात मालूम होतइ, ऊ बखत ऊ मन ही मन हमरा पर कृतज्ञता प्रकट करतइ।  

अपने पूछ सकऽ हथिन कि हम ऊ लड़की के बचइलि, एकर कीऽ प्रमाण हइ? अरे बाबू, अपने जानऽ हथिन कि ई मिथ्याप्रेमी केऽ हइ? जे धूर्त बदमाश हमर बेटी के फँसाके ओकर जिनगी बरबाद कर देलकइ, ओहे फेर ई अफसर के बेटी के अपन फन्दा में फँसावे के कोरसिस कर रहले ह।

बेचारी अब कीऽ कर रहले होत? अजी साहब, अब हमर लड़की के केकरो सहानुभूति के जरूरत नञ्। अपन बापे के तरह ओहो डाक विभाग में सॉर्टरके रूप में काम चालू कर देलके ह।

 

[उड़िया मासिक पत्रिका ‘पौरुष, मार्च 1981, पृ॰73-78 से साभार]

 

 


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