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Friday, October 09, 2009

3. बोझ

लघुकथाकार - अशोक कुमार भास्कर

रश्मि सत्तर रुपइया के एगो किताब लेके एक सौ रुपइया के नोट दोकानदार के देलक । दोकानदार रसीद आउ पचास रुपइया के एगो नोट बढ़ा देलक । रश्मि हड़बड़ी में बाकी तीस रुपइया समझ के चल आयल ।

ओकरा ऊ घड़ी एगो झटका लगल जब लौज में आके देखलक कि दोकानदार तीस रुपइया के जगह पर पचास के एगो नोट दे देलक हल । जब ऊ लौज के सभे सहेली से ई बात कहलक तब सभी खुशी से उछल पड़लन । ऊ लोग रश्मि से कहलन, "एकरा में से कुछ खरचा-पानी कर ।"

लेकिन रश्मि के ई बात पसन्द न आयल । ऊ छो-पाँच में पड़ गेल । समझ में न आ रहल हल कि कउची करे आउ कउची न करे । ऊ रुपइया ओकर मन में पहाड़ नियन बोझ बनल हल ।

रश्मि ऊ रुपइया लउटा देवे ला सोच लेलक । हलाँकि पइसा के बहुत कड़की चल रहल हल, तइयो दूसरका दिन सबेरहीं ऊ दोकान पर पहुँच गेल, जहाँ से कल्हे किताब ले गेल हल । देखलक कि ओही बूढ़ा दोकान खोलले बइठल हे । रश्मि जइतहीं कहलक - "का बूढ़ा बाबा ! दोकान चलावे के हो कि एकर भट्ठा बइठा देवे के हो ?"

बूढ़ा दोकानदार तनी-मनी सकल चीन्ह रहल हल । लेकिन ऊ बात ओकर भेजा में न अँट रहल हल । ओकर जवाब न मिलला पर रश्मि फिन कहलक -"कल्ह जउन किताब ले गेलियो हल, ओकरा में तूँ बीस रुपइया जादे देलऽ हल । लऽ ! पकड़ऽ अप्पन बीस रुपइया ।"

बूढ़ा दोकानदार के ई समझ में न आ रहल हल कि ई जुग में अइसन नेक सोचे वला कन्ने से निकल गेल । बूढ़ा एक टक से रश्मि के निहारइत रहल आउ रश्मि पइसा देके अप्पन मन के बोझ उतार लेलक । रश्मि के चेहरा पर आत्मसन्तोष साफ झलक रहल हल ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰२८ से साभार]

2 comments:

ललित शर्मा said...

बूढ़ा दोकानदार के ई समझ में न आ रहल हल कि ई जुग में अइसन नेक सोचे वला कन्ने से निकल गेल । बूढ़ा एक टक से रश्मि के निहारइत रहल आउ रश्मि पइसा देके अप्पन मन के बोझ उतार लेलक । रश्मि के चेहरा पर आत्मसन्तोष साफ झलक रहल हल ।
नारायण बाबु बहुतै बढिया लघु कथा हे, ई लोकल भाषा के पाठक कमती हल,परयास जारी रहे, हमहु लिखत बा छत्तिसगढी http://adahakegoth.blogspot.com मा पाठक बहुतै कम,

नारायण प्रसाद said...

शर्मा जी,

मातृभाषा छत्तीसगढ़ी रहला पर भी अपने "मगही भाषा एवं साहित्य" ब्लॉग पर भेंट देलथिन आउ अपने के मगही में लिक्खल लघुकथा अपने के पसन्द पड़लइ, ई जान के हमरा बड़ी खुशी होलइ ।

हमहूँ अपने के छत्तीसगढ़ी ब्लॉग पर भेंट देके अप्पन प्रतिक्रिया व्यक्त करवइ ।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के समृद्ध करे लगि हिन्दी के सब्हे भाषा या उपभाषा (सन् २००१ के जनगणना के अनुसार कुल ४८) से अब तक हिन्दी कोश में अनुपलब्ध सब शब्द, खास करके सांस्कृतिक आउ कृषि शब्दावली, शामिल कर लेवे के चाही ।