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Tuesday, April 20, 2010

1. डॉ॰ राम प्रसाद सिंह द्वारा संगृहीत विशाल लोकसाहित्य : एक परिचय

लेखक - दिलीप कुमार, अध्यक्ष, मगही विभाग, पी॰एन॰के॰ कॉलेज, अछुआ, पटना

विश्व लोकवार्ता के विद्वान आउ भोजपुरी लोकसाहित्य सम्राट् डॉ॰ कृष्णदेव उपाध्याय डॉ॰ राम प्रसाद सिंह के भारत के एगो महान लोकवार्ताविद के रूप में प्रस्तुत कैलन हे । इहाँ हम उनकर बात के खंडन इया मंडन न करे जा रहली हे, बाकि इहाँ उनका द्वारा संग्रह आउ सम्पादन-विश्लेषण कैल मगही लोकसाहित्य के अनेक विधा से पाठक के अवगत करावल चाहइत ही ।

(क) 'मगध की लोककथाएँ : अनुशीलन एवं संचयन' बृहदाकार रूप में प्रकाशित हो चुकल हे । अनुशीलन खंड में लोकवार्ता, लोककथा के उद्भव-विकास, मगही लोककथा के वर्गीकरण आउ ऊ में निहित लोकजीवन आउ लोक संस्कृति के बड़ा शोधपूर्ण वर्णन कैल गेल हे । ग्रंथ के संचयन खण्ड में पौने दू सो मगही लोककथा के वर्गीकृत संग्रह हे । ई ग्रंथ स्नातकोत्तर आउ शोधी-सुधी पाठक ला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हे ।

(ख) 'मगही लोकगीत : भूमिका, संग्रह और भाष्य' लेखक के दूसर बृहद् ग्रंथ, लगभग एक हजार पृष्ठ के मुद्रणस्थ [1] हे । एकरा में मगही लोकगीत के वर्गीकृत संग्रह हे । पुस्तक के भूमिका भाग में गीत के उत्पत्ति आउ विकास, ओकरा में निहित संस्कृति आउ धर्म के आनुष्ठानिक स्वरूप, लोकरीति, लोकास्था आदि लोक मानसी आधार पर चित्रित कैल गेल हे । ई पुस्तक में भी समाजशास्त्री आउ मानवशास्त्री ला पूरा सामग्री मिल जायत । एकरा में लोकगीत के कुअभिप्राय (रूढ़तंतु - Motifs) भी चिह्नित कैल गेल हे जे ग्रंथ के मौलिकता आउ विशेषता बतावऽ हे ।

(ग) 'मगही लोकनाट्य : अनुशीलन एवं संचयन' - एकरा में संग्रह के प्रचलित लोकनाट्य के संग्रह आउ अनुशीलन कैल गेल हे । 'लोकनाट्य के उत्पत्ति आउ विकास' नाम से एकर कुछ अंश पत्र-पत्रिका में पहिले छपल हल, बाकि पूरा ग्रंथ मुद्रणार्थ प्रेस प्रतिलिपि के रूप में फाइल में बंद हे जे जल्दीये छपत ।

(घ) 'मगही लोकोक्तियाँ : अनुशीलन एवं संचयन' - डॉ॰ सिंह के ई ग्रंथ संग्रहालय नियन हे जेकरा में कहउतिया, परतूक, बुझौनियाँ, दसकूटक आउ महवरा के संग्रह-सम्पादन हे । इनका अनुसार खाली कहउतिया ही लोकोक्ति के अन्दर न आवे, बलुक लोकजीवन में प्रचलित सब प्रकार के विशेष उक्ति लोकोक्ति कहलावऽ हे - लोक के के उक्ति, लोक में प्रचलित उक्ति जेकर प्रयोग आउ प्रभाव बोले, करे, इया लोकजीवन के व्यवहार पर पड़ऽ हे ।

कहउतिया लोकोक्ति के प्रधान अंग हे जेकरा लेखक तीन भाग में बाँटलन हे - (1) जाति आउ पेसा सम्बन्धी (2) अदमी के व्यवहार आउ चरित्र सम्बन्धी (3) संस्कृति प्रधान आउ तथ्यपरक । कहउतिया में परम्परा से चलल आवइत अनुभव के सिद्धान्त आउ संक्षेप से कहल जाहे । एकरा में चुटीलापन आउ व्यंग्य के भी प्रधानता रहऽ हे, जइसे - (1) चार चोट सोनार के आउ एक चोट लोहार के (2) पोसली भतिया भेल भतार । एकरा में लक्षणा आउ व्यञ्जना शक्ति से अरथ निकलऽ हे ।

कहउतिया से मिलइत जुलइत मगह में प्रचलित परतूक भी लोकोक्ति के एगो अंग हे । एकरा में लक्षणा से जादे अभिधा के प्रधानता रहऽ हे । परतूक एक तरह के उदाहरण इया दृष्टांत हे, जइसे - (1) नसकट खटिया बतकट जोय, ता घर खरियत कभी न होय । (2) कतिकउर घाम आउ राड़ के बोली न सहाय । ई दुन्नो परतूक में अनुभव परक उदाहरण हे । परतूक तथ्य परक आउ अभिधा मूलक अरथ से भरल रहऽ हे । कहउतिया आउ परतूक में कम अन्तर हे, दुन्नो लोकोक्ति साहित्य के जुड़वा बहिन हे ।

डॉ॰ सिंह के इहे पुस्तक में बुझौनिया आउ दसकूटक के भी संग्रह, वर्णन आउ अनुशीलन कैल गेल हे । बुझौनिया मगह के लइकन, बूढ़ा आउ औरत में काफी मिलऽ हे । साँझ खनी खाके सुते के बेरा बूढ़ी इया लइकन बुझौनियाँ बुझावऽ हथ इया बिआह आदि अनुष्ठान में भी बुझावल जाहे । ई ग्रंथ में मगह के कई सो बुझौनियाँ के संग्रह आउ अनुशीलन विश्लेषण कैल गेल हे । डॉ॰ सिंह के अनुसार 'बुझौनियाँ या पहेली किसी लोकभाषा का लोक विलास एवं मनोरंजन का एक कारक होता है, इससे हास्य सृजन और बौद्धिक विलास होता है । अपने ज्ञान और दूसरों के ज्ञान की परीक्षा लेना ही बुझौनिया का लक्ष्य होता है ।' जइसे - (1) झाँझर कुआँ रतन फुलवारी, न बूझबें तो देबो दूगो गारी (2) फरे न फुलाए, एक सूप रोज निकले

लगले ग्रंथ में आयल दसकूटक पर भी विचार कर लेल जाय जे लोकोक्ति के बड़ी जटिल विधा हे आउ लोकमेधा के प्रखरता आउ बुद्धिमानी के परिचय दे हे । हिन्दी के दृष्टिकूट मगही में दसकूटक के नाम से जानल जाहे । गाँव-गँवई के लोग एकर जटिलता आउ दुरूहता के कारण एकरा 'कपर कूटक' भी कहऽ हथ । दरअसल बात भी ठीके हे, एकरा में एतना जटिलता आउ कष्टसाध्य अर्थ प्राप्त हो हे कि सुने-समझे ओला के माथा चकराय लगऽ हे । न जाने समझे ओला के एक-ब-एक सुन के अरथ जानना समझना बड़ा मोसकिल हो हे, जइसे -

1. कहत मोरा लाज लगे, सुनत परे गारी ।
सास के पुतोह लगे, ससुर के मतारी ॥
[2]

2. तुलातुल समतुल हे, ता पर मेष प्रचण्ड ।
खड़ा सिंहनी अरज करत हे, कुम्भ छोड़ दे कन्त ॥ [3]

3. नौ विप्र एकासी गाय, सेरे दूध बढ़ते जाय ।
विप्र विप्र में झगड़ा भेल, गाय दूध बराबर लेल ॥ [4]

डॉ॰ सिंह के ई ग्रंथ में दसकूटक के बड़ संग्रह के साथ ओकर विवेचन आउ अरथ के सुन्दरता के भी वर्णन कैल गेल हे । लोकजीवन में ई बौद्धिक विलास के साधन गते-गते लुप्त होइत जाइत हे ।

पाठक के जान के अचरज होयत कि डॉ॰ सिंह मगही महवरा के भी लोकोक्ति साहित्य में ही रख देलन हे । इनकर कहनाम हे कि महवरा भी लोकजीवन में कहे के एगो उक्तिए हे । अप्पन बोली इया उक्ति के जादे प्रभावशाली आउ ताकतवर बनावे ला महवरा के प्रयोग मगह में कैल जा हे । ई गुने इहो एगो लोकोक्ति के अंग हे । लोकोक्ति के व्यापक विस्तार से महवरा के हम अलगे न कर सकऽ ही ।

डॉ॰ सिंह के ई संग्रह में मगह में प्रचलित हजारन महवरा के संग्रह कैल गेल हे । महवरा यानी बोले के विशेष आदत जे क्षेत्र-विशेष में प्रचलित हे । मगह में एगो समान उक्ति हे - महवरा हे, आदत हे जे दूसर जगह गारी भी समझल जा सकऽ हे, जइसे - 'दुत सार' । ई महवरा मगह में उक्ति बन गेल हे जे गारी के रूप में न मानल जाय आउ सुनेओला के कोई तकलीफ भी न होय ।

इहे सब सुन के ग्रियर्सन कहलन हे - 'मगध देश कंचनपुरी, सब कुछ भला पर भाषा बुरी ।' परन्तु ग्रियर्सन मगही क्षेत्र के भाषा के लोकोक्ति, उक्ति, आदत के गहराई से अध्ययन न कैलन हे । डॉ॰ सिंह महवरा के भी लोकोक्ति के अन्दर रख के मगही भाषा आउ ओकर क्षेत्रीय विशेषता के मरम प्रतिपादित कैलन हे । ई से ई पुस्तक के जादे महत्त्व हे ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-३, अंक-७, जुलाई १९९७, पृ॰१७-१८ से साभार]

नोट :
[1] "मगही लोकगीत के बृहद् संग्रह" दिस॰ 1999 में प्रकाशित हो चुकले ह ।

[2] पहिला दसकूटक एगो ई घटना पर आधारित हइ कि एक ठो लरकोरी बहू अप्पन ससुर के जब खाना परोस रहले हल त ओकर स्तन से दूध के दू बून ससुर के थारी में गिर पड़लइ ।

[3] दोसर दसकूटक ज्योतिष पर आधारित हइ । रावण आउ भगवान रामचन्द्र दूनहूँ तुला राशि में पैदा होला हल, जबकि लक्ष्मण मेष राशि में, मन्दोदरी सिंह राशि आउ सीता कुम्भ राशि में ।

[4] तेसर दसकूटक हम्मर क्षेत्र में कुछ ई तरह से बोलल जा हइ -

नौ विप्र एकासी गाय, सेर सेर दूध बढ़ल जाय ।
विप्र विप्र में झगड़ा भेल, केतना केतना बखरा भेल ॥

उत्तर :
एकासी गाय से प्रतिदिन प्राप्त कुल दूध के मात्रा
= 1+2+3+4+ .....+81 सेर
= 81 x 82 / 2 सेर [ चूँकि 1+2+3+4+ .....+n = n(n+1)/2 ]
= 81 x 41 सेर

अतः नौ विप्र में हरेक विप्र के बखरा (हिस्सा)
= 81 x 41 / 9 सेर
= 9 x 41 सेर
= 369 सेर
= 9 मन 9 सेर [ चूँकि 40 सेर = 1 मन ]

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