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Friday, July 18, 2014

18. असली पकिटमार

असली पकिटमार

मूल जर्मन शीर्षक – Der Taschendieb (देअर टाशेनडीब)             मगही अनुवाद - नारायण प्रसाद

एगो बेपारी एक तुरी यात्रा पर गेलइ । ऊ एगो छोट्टे गो शहर में ठहर गेलइ, काहे कि ऊ अपन दोस्त से भेंट करे लगी चाहऽ हलइ । एगो होटल में एगो रूम किराया पर लेलकइ आउ फेर अपन दोस्त के फ्लैट पर गेलइ।

दुन्नु दोस्त एक साथ बैठके देर तक गपशप करते गेला । देर रात के बेपारी अपन होटल वापिस चललइ । शहर के गलियन में बहुत अन्हेरा हलइ आउ बहुत कठिनाई से ऊ अपन रस्ता देख पावऽ हलइ । गलिया में कोय नयँ हलइ । अचानक ओकरा पैर के आहट सुनाय देलकइ । एगो अदमी बगल के गली के कोनमा भिर से तेजी से अइलइ आउ दुन्नु टकरा गेते गेलइ । ऊ अदमिया माफी मँगलकइ आउ तेजी से आगे बढ़ गेलइ । बेपरिया रुक गेलइ । "अभी की समय होब करऽ होतइ ?" ऊ सोचलकइ आउ अपन घड़ी देखे ल चहलकइ । ऊ अपन जैकेट के पाकिट में खोजलक, लेकिन ओकरा घड़िया नयँ मिल्लल । ओकर सब्भे पाकिट खाली हलइ। तेजी से ऊ धउगके ऊ अदमिया तरफ गेल, ओकरा कोटवा पकड़के रोकलक आउ चिल्लाल, "जल्दी से घड़िया दे !" ऊ अदमिया बहुत डर गेलइ, काहे कि बेपरिया के अवाज में बहुत गोस्सा हलइ । ऊ घड़िया दे देलकइ, आउ बेपरिया संतुष्ट होके चल गेलइ । ऊ तुरते होटल में अपन रूम में पहुँचल आउ बत्ती जलइलक । तब ओकरा बिछावन के बगल के टेबुल पर घड़ी पर नजर पड़ल । ऊ अपन हाथ पाकिट में घुसइलक आउ ऊ अदमिया के घड़िया देखलक ! "हे भगमान !”, बेपरिया बोललइ, "वास्तव में हमहीं पकिटमार  हकिअइ, ऊ अदमिया नयँ!”

रतिया के बेपरिया के ठीक से नीन नयँ अइलइ । बिहान होला पर ऊ घड़िया लेके पुलिस के पास अइलइ । जल्दीए घड़िया के मालिक के ढूँढ़ लेवल गेलइ आउ ओकरा घड़िया वापिस दे देवल गेलइ ।


Tuesday, June 21, 2011

17. टिकट के शान


लघुकथाकार - कृष्ण कुमार भट्टा, भट्टा, काशीचक, नवादा


टिकट कटाके शान से पलेटफारम पर घूम रहली हल । गाड़ी खुलल त अप्पन सीट पर जाके बइठ गेली । अगले टीसन से हम्मर बोगी में टिक चेक होवे लगल । टिकट मजिस्ट्रेट के साथे पुलिस भी हल । मजिस्ट्रेट चेकिंग रहला से भीड़ कम हल । जेकरा पास टिकट नयँ हल ओकर हालत बेमरिया नियन होल हल ।

टिकट चेक करइत-करइत मजिस्ट्रेट हमरा भिर आल आउ सबसे टिकट माँग-माँग के चेक करे लगल । हमरो से माँगलक, मुदा हम शान से मुड़ी दोसर देन्ने घुरा के बाहर के नजारा देखे लगली । ऊ दू-तीन दफा हमरा से टिकट माँगलक, मुदा हम ओइसहीं आना-कानी कइले रहली । ऊ ई सोच के आगे बढ़ गेल कि ई लइका के पास टिकट हे, ईहे लेल अइंठ रहल हे । हम्मर चेहरा पर तनिक्को डर नयँ हल, काहे कि टिकट जे कटा लेली हल ।

मुसकइते जब हम मुड़ी एन्ने घुमइली त बगल के अदमी कहे लगलन, 'भाय साब ! तूँ अप्पन टिकट काहे नयँ देखइलऽ ?'
ई सुनके हम शान से कहली,  'आज तक ले कहियो हम टिकट न देखइली हे, त आज का देखाम ?'
'हमरा तो लगऽ हे कि तोरा पास टिकटवे न हवऽ, त देखइबऽ की ?' दोसर अदमी टुभकल ।
'का ? हमरा पास टिकट नऽ हे ?' हम तमतमायल पाकिट में हाथ देली, त होशे उड़ गेल । काहे कि टिकट फटलका जेभी में रखे से गिर गेल हल । हम ऊपर-नीचे देखे लगली । एन्ने-ओन्ने सगरो देखली, बाकि कहुँ टिकट के पता न चलल ।

सब के नजर हमरे पर हल । अभी मजिस्ट्रेट भी उहे बोगी में हल, मुदा दूर चल गेल हल । हम्मर पूरा देह में पसेना चमके लगल हल । हम हड़बड़ा गेली, ई लेल सब जातरी हमरा देख के ठिठियाय लगलनतइयो हम चुप रहली । अब हमरा मजिस्ट्रेट का, ओकर पुलिसवो से डर लगल हल । एही से हम गया न जाके नवादा में ही उतर गेली ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-८, अंक-५, मई २००२, पृ॰१८ से साभार ]

16. अप्पन अप्पन समझ


लघुकथाकार - डॉ॰ सी॰ रा॰ प्रसाद, प्रा॰ शिक्षा प्रसार पदाधिकारी, मसौढ़ी (पटना)

औरत-मरद अप्पन दुन्नो लइकन के साथे पटना जादूघर के मुरती देखइत हलन । एकबैक लमहर यक्षिणी के मुरती के पास ठहर गेलन, जे दीदारगंज, पटना सिटी से मिलल हल । मरद यक्षिणी के स्तन के तरफ इशारा करके अप्पन औरत के तकौलक । औरतिया लजा के आगे बढ़ गेल ।

तनिके देरी के बाद उनकर चार बरस के बेटा अप्पन दीदी जौरे मुरती भिर पहुँचल । ऊ स्तन के तरफ इशारा करइत चिल्ला के बोललक - 'दीदी-दीदी ! देख नऽ । केतना बड़का दूधू हई !'

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-८, अंक-५, मई २००२, पृ॰१७ से साभार ]

Saturday, April 16, 2011

15. 'हराई' से मुक्ति दिलावेवला भुखलू महतो


लघुकथाकार - नवल किशोर सिंह, रानीपुर, फुलवारी शरीफ, पटना

चढ़ते अषाढ़ बरसात के पहिला पानी पड़ गेल । बरखा जे शुरू भेल त रात भर बरसल । पानी ला खखायल खेत के तरास मेटल आउ फटल दरारो मेट गेल । भुखलू महतो दिन में दू दफे खेत में घूम के देखलन । बिहान खेत में फरहरी जोते ला मनसूबा बना के साँझ के दुन्नो बैलन के मन से खिअयलन ।

भोरहीं डुगडुग्गी पिटा गेल कि आज जमीन्दार के खेत में 'हराई' जोताएत । महतो के मन चिड़चिड़ा गेल । मने-मन चार गो घिनायल गारी देलन । ई कहाँ के नेयाव हे कि पहिला पानी पड़ला पर जमीन्दार के खेत में एक दिन बिना मजदूरी के हर जोते पड़त । भुखलू के ई बात कहियो पसन्द न पड़ल, बाकि हरेक साल विरोध करे ला सोच के भी ऊ परम्परा निभावित जाइत हलन ।

जमीन्दार के ई शोषण के खिलाफ अवाज उठावे ला मन बनाके घर से बाहर निकललन । फिन ई सोच के अँगना में लउट गेलन कि झंझट करे से का फायदा ? चुपचाप हर-बैल लेके अप्पन खेत में सोझ हो गेलन । संजोग के बात कि जमीन्दार सिंह जी ओनहीं से चलल आवित हलन ।

भुखलू के देख के उनकर पारा गरम हो गेल - 'काहे हो ? हम्मर खेत पच्छिम भर हे, तूँ उत्तर काहे जाइत हें ? चल, घुमाव बैलन के पच्छिम !'

'मालिक ! बात अइसन हे कि ऊँचगर होवे के चलते हम्मर खेत में पानी न टिके । कड़कड़ा के धूपा उगल हे से देखतहीं ही अपने । दिन भर में सूख गेला पर फरहरी न जोतायत । एही से सोचली कि हम अप्पन खेत आज जोत लीं । अपने के खेतन में तो गाँव भर के हर चलवे करत । एगो खाली हम्मर हर न चले से अपने के कोई नुकसान न होयत ।'

जमीन्दार सोचलन कि बात तो ई ठीके कहइत हे बाकि आज एगो ई 'हराई' न देत, देखा-देखी बिहान दोसर किसान भी कोई न कोई बहाना बनैतन । एहि से ऊ कड़क के बोललन - 'चल, घुमाव बैल ! बदमाशी करे से काम न चलतउ ।'

भुखलू हाथ जोड़ के विनती करे लगल, तइयो सिंह जी न मानलन आउ जबरदस्ती बैलन के उत्तर देन्ने हाँके लगलन । भुखलू अरउआ से पच्छिम हाँकथ आउ सिंह जी उत्तर । अचानक भुखलू के दिमाग में ई बात घूम गेल कि आज न त फिन कहियो नऽ मिलत मौका । इनकर बड़ाहिल भी कोई न हथ इहाँ । एतना सोचइते ओकर अरउआ बैल पर से घूम के सिंह जी के पीठ पर पड़े लगल ।

चार-पाँच अरउआ तड़ातड़ लगला पर सिंह जी उहाँ से भाग चललन । तहलका मच गेल । अजादी के पहिले के ई घटना के पात्र लोग आज जीवित न हथ, तइयो 'हराई' से मुक्ति दिलावेवला भुखलू महतो के नाम आजो ले हथ लोग ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-५, अंक-७, जुलाई १९९९, पृ॰१३ से साभार । मूल शीर्षक - 'हराई' ]

Saturday, March 27, 2010

14. औरत के विरोध

लघुकथाकार - डॉ॰ राज नारायण, 227/II, पंडितवाड़ी, देहरादून

'दीदी ! ई का करइत ह ? बड़का गो बढ़ियाँ फोटो हइ । ओकरा जरावइत हहूँ ?' - पड़ोसिन के बाइस साल के बेटी कमला चउखट पार करके घर में घुँसइते पुछलक ।
'बुन्नी, रख के का करवई ?' माथा पर घाव के दाग आउ चेहरा उदासी में डुबौले सुखदा कहलक । फिन बोलल, 'बुन्नी, हउ पिढ़वा के खींच के बइठऽ । ई फोटउआ आउ कागज-पत्तर के जरा के उठऽ ही ।'
'केकर हइ फोटउआ ?'
'ऊहे मुँहझौंसा के ।'
'केकरा गरिआवइत हहूँ ?'
'तोरे पहुना, आनी अप्पन पिलुअहवा भतार के ...'
'गरिआवे ला नऽ चाहऽ हवऽ ।'
'काहे न गरिअयवई । माथा फोड़ के मारलक हे लाते-घूँसे बुन्नी ! कहलक हे कि एक लाख रुपइया बप्पा से माँग के न लयमें, त इधर में गोड़ मत रखिहें । खाली हाथे अएलें, त जरा के मुआ देवउ । पइसा ला हम तोरा साथे कुच्छो कर सकऽ ही । बुन्नी, तूहीं कहऽ, ऊ रकसवा भिजुन कइसे जाएम ?' कहइत सुखदा के आँख से लोर टपक गेल ।

फोटो जरा के उठल सुखदा आउ बइठे ला कमला के पीढ़ा दे देलक । पड़ोस से अचानक सुखदा के माय सुमित्रा आ गेलन, तऽ कमला बोललक - 'परनाम चाची !'
'जीअ बुन्नी ! हँ, कल्ह हवऽ तीज परब । दिन भर निर्जला उपवास करऽ आउ परसों जाके पारन करिहऽ ।'
'चाची ! तूँ करहूँ ई परब हम्मर चाचा जी के खुसी ला । बाकि हम न करम ।' - कमला बोलल ।
'काहे ? पति के सुख ला तीज करे के चाही सब्भे औरत के । का बुन्नी, गलत कहित ही ?' - एतना कह के सुमित्रा ओकरा पर नजर गड़ा देलक ।

कमला एक मिनट सोच के कहलक - 'चाची ! जब से सुनली हे कि ऊ इंगलैंड में एगो जर्मनी के मेम के साथे रहऽ हे, तब्बे से हम ओकरा से नाता तोड़ लेली । चाची, सच कहऽ ही, अब ऊ हम्मर पति कहाँ रहल । तीन साल से कोई फोन आयल, न चिट्ठी-पतरी । जब हम ओकर कोई हइए न ही, तब ऊ हम्मर कउन हे ? सुखदा दीदी के पति मार-पीट के भगा देलक आउ हम्मर मरद कुत्ता निअर ओकरा पीछे पोंछी हिलावइत फिरे हे । अब सुनऽ ही कि रूस जाइत हे कुतवा । जेन्ने जाय के मन हउ, जो ! मर कोढ़फुट्टा ! अइसन पति ला तीज करवई कि दिन-रात सरापिते रहवई ।'

'ठीके कहइत हे कमला बुन्नी ! पति देवता रहे, तब जरूर करे के चाही तीज । मगर जब ऊ जनावर-राकस बन जाये, तब काहे ला कोई तीज करत ?' - सुखदा कहलक ।

सत्तर साल के बुढ़िया सुमित्रा अप्पन चश्मा ठीक करइत सोचे लगल कि जमाना केतना बदल गेल हे । पहिले कुटम्मस होयलो पर पति लागी तीज बरत करऽ हल औरत, ओही औरत आज विरोध करे लागी तइयार हे कमर कसके ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-१६, अंक-३, मार्च २०१०, पृ॰१० से साभार]

Wednesday, February 17, 2010

13. अनपढ़ के अनुवाद

लघुकथाकार - अरुण कुमार सिन्हा

हाकिम अप्पन चपरासी से बोललन - 'भीखू, अभी बहिरसिये जाके बइठऽ ।'
भीखू पूछलक - 'की बात हे, हुजूर ?'
हाकिम बतइलका - 'राम बाबू अभिये आवे वला हथ । हुनखे से हमरा 'कनफिडेंशियल' बात करे के हे ।'
भीखू जब बहिरसी इकसल त कलुआ चपरासी टोक देलक - 'आझ जलदिये बहिरा गेलें, भीखू ! हाकिम नञ हथुन की ?'
भीखू बतइलक - 'बात ई नञ हे, कल्लू भाय ! हाकिम तो आल हथ । राम बाबू नेताजी आवे वला हथ । हाकिम के हुनखे से 'कनफुसियल' बात करे के हे ।'
भीखू के अंगरेजी बोले न अइलइ बाकि ओकर मगही अनुवाद करे से कलुआ चपरासी के ओतना बात समझ में आ गेल जेतना हाकिम समझावल चाहऽ हलथिन ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-३, अंक-३, मार्च १९९७, पृ॰१८ से साभार]

Saturday, November 14, 2009

12. जरल पर नीमक

लघुकथाकार - डॉ॰ सी॰ रा॰ प्रसाद

स्कूटर पर सवार एगो पति-पत्नी जाइत हलन । पीछे से एगो कार वाला रगड़ते पार हो गेल । दुन्नो फेंका गेलन । स्कूटर डैमेज हो गेल । पति के ठेहुना फूटल, शर्ट-पैंट रगड़ा के फट गेल । पत्नी के सलवार-समीज फट गेल । कमर-पीठ में चोट लगल । खून भी बहइत हल ।

दू गो राहगीर मिल के रोड पर फेंकायल जोड़ी के उठा के सामने वला मंदिर के सीढ़ी पर बइठा देलन । दुन्नो दरद से कराह रहलन हल ।

एही बीच उनकर मोबाइल पर फोन आयल । पति कराहइत फोन रिसीव कैलन - 'हलो !'
'जमीन खरीदे ला बात करे खातिर आज चलबऽ ?'
'न हो पंकज । आज स्कूटर पर हम्मर एक्सीडेंट हो गेलक ।'
'जादे चोट हवऽ का ? आ जइयो ?'
'न हो ! अइसे नाक-थोथुन टूट गेल हे । बाकि आवे के जरूरत न हई ।'
'एही से न कहऽ हिवऽ कि कार खरीद लऽ ! जाड़ा-गरमी-बरसात, हर मौसम में अराम रहतवऽ । दुपहिया में बैलेंस मिलऽ हई ? ठोकर लगते फेंका जयबऽ ।'

घायल पति फोन काट के जेभी में रख लेलक । फोन पर मिलल सलाह जरल पर नीमक जइसन परपराय लगलकातो एम॰बी॰ए॰ पास नौजवान साठ हजार के महीना कमा हे । बाकि कब, कहाँ, का बोले के चाही, ई पढ़ाई कब होयत ?

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-१५, अंक-११, नवम्बर २००९, पृ॰१२ से साभार]

Thursday, October 22, 2009

11. फर्ज

लघुकथाकार - हरीन्द्र विद्यार्थी

पटना टीसन पर अन्हेरा गहराय लगल हल । अइसे तो टीसन पर अनदिनो अँटान न रहे, बाकि एक जगह कुछ जादे भीड़ देख के चन्दू ठुमक गेल। दूगो वर्दीधारी पुलिस के खड़ा देख के ओकर उत्सुकता आउ बढ़ गेल । बीच में एगो गोर सुन्नर महिला आउ बगल में एगो पान चबावित अधवइस औरत बइठल हल ।

गोरकी तिरिया बोलल - "न जानि कन्ने हम्मर भाई छूट गेल । ई घड़ी रात के हम कहाँ जाऊँ ?"

"रात के कहाँ जयबऽ ? जहन्ना जाना ठीक नऽ हो । तूँ पटने रुक जा । बिहान होतो त चल जइहऽ ।" एगो सिपाही बोललक ।
"हँ बाबू ! पटने रुक जाही । बाकि जायम कहाँ ?"
अधवइस औरत टुभकल - "चल ! हमरा साथ रात भर रहिहें, फिन सबेरे चल जइहें । बाकि डेरा हम्मर हियाँ से दूर हउ । तब तक हमरे साथ रह ।"
"इनके साथ रिक्शा में चल जो ! न तो हम तोरा, जहाँ कह, हुएँ पहुँचा देवउ ।" अधवइस सिपाही बोलल ।
जवनका सिपाही खइनी पर ताल देके बोललक - "हँ, बढ़ियाँ तो हउ । अइसन भला अदमी थोड़े ई जुग में मिलतउ ?"

ऊ गोरकी तिरिया थोड़ा घबड़ायल, फिन बोलल - "नऽ बाबुन, हम रात भर टीसने पर गुजार देम ।"

"टीसन पर कइसे रहबे ? चल, हम तोरा थाना में पहुँचा दे हिअउ ।" सिपाही जी तुनकलन ।
कुछ जातरी ई माजरा देख के गते मुसकयलन । ओकरे में से एगो उमरदराज अदमी बोलल - "ई तो छोकरी हई रे, चललई ई सब के रतभोज !"
"चल, छोड़ ई तमाशा ! हियाँ तो रोज के एही नजारा हउ । केकर-केकर हिसाब रखबे ? चल, गाड़ी पर सीट ले लेवल जाय ।" दोसर जातरी बोलल ।

चन्दू सोचे लगल कि चुपचाप चलल जाय इया ई महिला के ऊ फन्दा से निकालल जाय । थोड़ा आगे बढ़ल त ओकरा इयाद आल कि गोरकी के बगल में बइठल बुढ़िया तो ई शहर के चर्चित एजेण्ट हे । ऊ लउट आल आउ भीड़ भिर आके गोरकी तिरिया से पूछलक - "कहाँ घर हउ ?"
"जहानाबाद, काको में ।" उत्तर मिलल ।

चन्दू थोड़ा हिम्मत बाँध के बोललक - "देख, ई शहर बड़का मंडी हउ । हियाँ रोज औरत के खरीद-बिक्री होवऽ हउ । रात भर अकेले रह गेले त गिद्ध सब तोरा नोच के खा जतउ । सबेरे कहूँ पर बेहोश पावल जयमें इया लाश बरामद होतउ । चुपचाप गाड़ी धर के जहन्ना लउट जो । हमरा फर्ज बुझयली त तोरा समझा रहलियो हे । अब जइसन तोर मर्जी ।"

"नऽ नऽ बाबू ! हम जहन्ने चल जायम ।" एतना कह के ऊ गाड़ी में चढ़ गेल ।
चन्दू डेरा में लउट के जब अप्पन घरनी के ई लीला सुनयलक तब ओकर घरनी बोललन - "रात में जहन्ना ? ऊ कउन बड़ा सुधरल जगह हई ?"

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰ ७-८ से साभार]

Saturday, October 17, 2009

9. लमरी न भंजल

लघुकथाकार - दिलीप कुमार

बिहटा स्टेशन पर जब बिपत नाना रेलगाड़ी से उतरलन तब उनकर पाकिट में एक सौ के एगो लमरी हल । ऊ सोचलन कि अगर लमरी भंज जायत तब सब रुपइया खरच हो जायत । एही से ऊ बस पर चढ़ के उतर गेलन आउ पैदले चले ला मन में ठान लेलन ।

२० किलोमीटर चल के अप्पन नाती हीं पहुँच गेलन । उनकर नाती चेतन नाना के देखइते प्रणाम कैलक आउ स्वागत सत्कार में लग गेल ।

एक घंटा के बाद बिपत नाना अप्पन नाती से कहलन - "बउआ ! तीन गो रुपइया हमरा पइंचा दे दऽ ! हम कभी आयम तब लेले आयम इया केकरो से भेजवा देम । काहे कि मियाज हम्मर बिलकुल थकल हे । अभी पाँच किलोमीटर जाय ला हे । जीप पर चढ़ के चल जायम ।"

एतना कहला पर चेतन तीन गो रुपइया नाना के देके कहलक - "काहे लागी तीन गो रुपइया भेजवऽ नाना ! तीन गो रुपइया बड़का चीज हे ?"

"देख नाती ! हमरा पइसा के कमी नऽ हे ।" पाकिट में से लमरी हाथ में निकाल के देखावइत कहे लगलन, "देख, एगो लमरी हे । लेकिन एकरा भंजा न रहली हे, काहे कि खरचा हो जायत । हम बिहटे से इहाँ तक भूखे-पियासे पैदले चल अइली हे । अब तनिये दूर ला एकरा भंजा दीं !"

"नऽ नाना ! भंजयबऽ काहे ला ? जीप के भाड़ा देहीं देलिवऽ, खाना-पीना होहीं गेलवऽ । ई लमरिया हमरा दे दऽ ! खुदरा पइसा हमरो से खरच हो जाहे । एकरा नाना के असीरवाद समझ के रखले रहम । बिसवास करऽ, हम एकरा भंजे न देबुअ ।" एतना कह के चेतन नाना के हाथ से लमरी लेके अप्पन पाकिट में रख लेलक ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰२४ से साभार]

Friday, October 16, 2009

8. ममता के देवी

लघुकथाकार - कृष्ण चन्द्र चौधरी

फेंकनी अप्पन गोदी में दू महीना के बुतरू लेले दुआरी पर बइठल हल । बुतरू बोखार से तलफइत हल । ओकर हालत देख के फेंकनी के चेहरा पर चिंता के छाँह पसरल हल ।

फेंकनी के मरद चार दिन से दतवन बेचे शहर गेल हलन । फेंकनी के हाथ में एक्को पइसा नयँ हल जे दवा-दारू करा सकऽ हल । ओझा-गुनी से भी कोई फयदा नयँ होल ।

फेंकनी पइसा लेल दसो दुआरी हो आल हल, मुदा कहीं से पइसा नयँ मिलल हल । मिलतइ हल भी कहाँ से ? सउँसे भुईं टोली के एक्के हालत हल । हाँफइत बुतरू पर नजर पड़ल त फेंकनी के आँख लोर से भर गेल ।

ओही घड़ी सुकनी बूढ़ी काँख में पोटली दबयले उहाँ आ खड़ा होल । दिन भर भीख माँग के आल हल, से थक गेल हल । तनि सुस्ताय ला बइठ के पूछलक -"फेंकनी ! तूँ काहे रोवइत ह ?"

"हम्मर बुतरू बेमार हे माय ! हाथ में एक्को पइसा नयँ हे । दवा-दारू कहाँ से करा सकऽ ही ?" फेंकनी सुबकते बतयलक ।

"हम पइसा देइत हियो, कोई डागडर से जाके देखावऽ ।" कह के सुकनी अप्पन पोटली खोललक आउ दस रुपइया के नोट ओकर हाथ पर रख देलक । फेंकनी के लगल कि गाँव-गाँव माँग-चाँग के खाय ओली सुकनी बूढ़ी भीखमंगनी नयँ हे, बलुक ममता के देवी हे ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰२७ से साभार; पत्रिका में प्रकाशित लघुकथा के मूल शीर्षक - "देवी"]

Thursday, October 15, 2009

7. सफाई के असर

लघुकथाकार - डॉ॰ सी॰ रा॰ प्रसाद

राजधानी नाम के रह गेल हे । सगरो गंदगी भरल हे । दस बजे दिनो में रोड किनारे लोग झाड़ा फिरइत देखल जा सकऽ हथ । पेशाबखाना पखाना जहाँ-तहाँ बनल हे, लेकिन ओहू में एतना गंदगी कि नाक फट जाय । करमचारी के वेतन देवे ला निगम आउ सरकार के पास कातो पइसे न हे ।

एगो घर के बगल में लोग पेशाब कर दे हलन । एक दिन मकान मालिक उहाँ लिख देलन - "भाई लोग ! इहाँ पेशाब न करल जाय ।"

बाकि केकरो पर कोई असर न होवल । तब उहाँ लिखायल - "इहाँ पेशाब करे वला दंड-जुर्माना के भागी होयतन ।"

तइयो कोई फरक न पड़ल । एन्ने-ओन्ने ताकइत नजर बचा के लोग उहईं पेशाब करिये दे हलन । पेशाब से देवाल के नीचे के मट्टी राख-पतवार गीला रहे लगल । सड़न से बदबू दूर-दूर तक फैले लगल । मकान मालिक के कै गो से बाता-बाती, गाली-गलौज तक हो गेल । ऊ खिसिया के लिखवयलन - 'देखऽ गदहा मूतइत हवऽ !"

तबो जोर से लगला पर रहगीर उहईं पेशाब करे से बाज न आवइत हलन आउ लिखलका के अनदेखा कर दे हलन । तब मकान मालिक एगो गमकल गारी लिख देलन - "अरे मादर ... गदहा ! इहाँ मत मूत ।"

काहे ला कउनो पर असर पड़ो । पेशाब-पखाना रोकल जा सकऽ हे ? कुत्ता सूअर अइसन लोग ओहीं पर पनढार करते रहलन । काहे कि उहाँ कूड़ा-कचरा फट्टल प्लास्टिक से गंदगी के अम्बार लगल रहऽ हल ।

एक दिन मकान मालिक के का मन में आयल कि ऊ सब लिखल मेटवा देलन । कूड़-कचरा बाहर फेंकवा देलन । ऊ जगह के साफ-सुथरा कराके मट्टी भरवा के लीप-पोत के सुन्दर बना देलन । उहाँ दस गो मट्टी के गमला में फूल लगवा के सजवा देलन । नया-नया ईंटा, चूना से लाइनिंग करवा देलन ।

अब उहाँ फूल के खुशबू फैल गेल हे, तुलसी के पौधा लग गेल हे । सफाई के अइसन असर होल कि अब एक्को अदमी उहाँ पेशाब करे के हिम्मत न करऽ हे ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-१०, अंक-५, जनवरी २००४, पृ॰६ से साभार]

Monday, October 12, 2009

6. बोलती बंद हो गेल

लघुकथाकार - विशेश्वर मिश्रा 'विकल'

हम आकस्मिक अवकाश में हली । हेडमास्टर साहेब भी हमरा छुट्टी देले हलन । क्षेत्रीय पदाधिकारी के औचक निरीक्षण भेल । हम्मर दरखास्त के नजरअंदाज करके हमरा औफिस बोलावल गेल । अगला दिन औफिस में मिलला पर पदाधिकारी जी कहलन - "बड़ा बाबू से मिल लऽ !"

बड़ा बाबू से मिलली त ऊ हमरा से एक हजार रुपइया घूस माँगलन । आके साहेब के सामने घिघिअइली, "छुट्टी में रहला पर भी बड़ा बाबू एक हजार माँगइत हथ ।"

"छुट्टी केकरा कहल जाहे से तो हम जानवे न करीं । नौकरी बचावे ला हवऽ त कम से कम पाँच सौ रुपइया लगवे करतवऽ ।" साहेब के बात सुन के हम्मर बोलती बंद हो गेल

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰२७ से साभार]

Saturday, October 10, 2009

5. हैसियत

लघुकथाकार - डॉ॰ अभिमन्यु प्रसाद मौर्य

शिवनाथ जी आज बहुत खुश हथ । अप्पन लंगोटिया इयार शम्भु जी के मोटर कार पर कपड़ा बजार जाइत हथ ! रस्ता में शम्भु जी पूछ बइठलन - "सब ठीक ठाक हो गेलई हे न शिवनाथ भाई !"

"हँ शम्भु भाई ! सब तय हो गेलई हे । आठ भर सोना, एगो मोटर साइकिल, कलर टीवी, फ्रीज के अलावे डेढ़ लाख नगद देवे ला हई । एकरा अलावे दरवाजा के शोभा में बाजा-बत्ती हमरे करे ला हे ।"

शम्भु जी कहलन - "इंजीनियर लड़का के एतना से कम का देबहू ?"

शिवनाथ जी हामी भरलन - "एही से तो हम एतना देवे ला तइयारो हो गेली । आज लड़का के पसन्द से कपड़ा दिलावे जाइत ही ।"

दुन्नो इयार के हथुआ मार्केट पहुँचला के बाद लड़का अप्पन बाबूजी के जौरे रिक्शा से उतरलन । राम सलाम भेल । चारो एगो निमन होटल में बइठ के नश्ता कैलन । फिन एगो बड़का कपड़ा दोकान में घुसलन तब दू घंटा के बाद खरीदारी करके निकललन । बारह हजार रुपइया के कपड़ा किनाएल ।

शिवनाथ जी एगो खाली रिक्शा पर कपड़ा के पैकेट रख के चालक के कहलन - "बाबू लोग के पोस्टल-पार्क पहुँचा देहू ।"

लड़का के बाबूजी कहलन - "शिवनाथ बाबू ! अभी लड़की के कपड़ा लेवे ला तो बाकिये हे ।"
शिवनाथ जी हड़बड़ायल बोललन - "ऊ सब जनानी लोग के काम हे । अपने के घरुआरी हइए हथन । ओही अप्पन पसन्द से कीन लेतन ।"
"से कइसे होयत ? लड़की के कपड़ा भी अपने कीन के हमरा दे दीं । कन्या निरीक्षण में हम ओही चढ़ा देम ।"

अबकी शम्भु बाबू चउँक गेलन । कहलन - "लड़का के कपड़ा हमनी देली, से तो ठीक हे बाबू साहेब ! बाकि लड़की के कपड़ा तो अपने के देवे पड़त । एही रेवाज हे ।"

"हम ई सब कुछ न जानी । हम खाली लड़का लेके बरात में चल आयम । बेटी-दमाद के का देवे ला हे, से अपने समझीं ।"

शम्भु जी कुछ कहतन हल, ओकरा से पहिलहीं शिवनाथ जी हाथ जोड़ के लड़का के बाबूजी से कहलन - "अपने जब अइसन बात कहइत हथिन तब तो हमरा बुझायत हे कि ई बियाहे न होयत ।"

शम्भु जी फिन चउँकलन आउ शिवनाथ जी के समझावे लगलन - "ई का कहइत ह शिवनाथ भाई ! लड़की के कपड़ा में पाँच हजार से जादे नऽ लगतवऽ ।"

"बात खाली पाँच हजार रुपइया के नऽ हई शम्भु भाई ! हम सोचइत ही कि हमरे देवल डेढ़ लाख रुपइया में से जउन हम्मर बेटी पर एतनो खरचा न कर सकऽ हे, ऊ परिवार के हैसियत दरअसल डेढ़ लाख दहेज के लायक हइये न हे ।"

शम्भु जी उनका समझावे के अन्तिम प्रयास केलन - "कोई भी निरनय जल्दीबाजी में न लेवे के चाही ।"

"हम कोई आवेश में ई निरनय न ले रहली हे । हम सोच-समझ के ई कदम उठावइत ही । विचार करे के बात ई हे कि जउन लोग बियाहो में अप्पन पुतोह के एगो साड़ी नऽ दे सकऽ हथ, उनका हीं रह के तो हम्मर बेटी जिनगी भर कपड़ा ला तरस जायत ।" एतना कह के शिवनाथ जी रिक्शा पर से कपड़ा के पैकेट उठयलन आउ शम्भु जी के कार में रख देलन ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰९-१० से साभार]

4. सच के जाँच

लघुकथाकार - कृष्ण कुमार भट्टा

गाड़ी जइसहीं नवादा टीसन से खुलल, हम्मर नजर एगो कड़कड़िया सौटकिया नोट पर पड़ल । अभी हम ओकरा उठावे ला करिये रहली हल कि एगो अदमी के लात से ठेला के ऊ आउ करगी लग गेलथूक बिगे के बहाने हम ऊ नोट उठा लेली । सोचली के जेकर होयत ऊ बेचारा के नींद न आयत, ई लागी ठीक पहचान करके ई रुपइया दे देवे के चाही ।

हम्मर दिमाग में एक बात आयल, फिन हम सौ के नोट जेभी में रखके पचसटकिया कड़कड़िया नोट निकाल के सभे से कहली - "भाई जी, ई रुपइया किनकर हे ?"
तीन चार अदमी कहे लगलन - "हम्मर हे ! ई नोट हम्मर हे ।"
हम कहली -"केकरो भी होयत, त एक्के अदमी के न होयत ? सच-सच बोलऽ, त रुपइया दे देबुअ ।"

बाकि ऊ सब अप्पन दावा पर अड़ल हलन ।

एतने में एगो अदमी जे दूर में बइठल हल, धड़फड़ायल अयलक, बाकि नोट देख के चुप हो गेल ।

हमहीं उनका से पुछली - "का भाई जी, ई नोट तोहरे हवऽ का ?"
ऊ अदमी कपस के कहलक - "न भाई जी ! ई नोट हम्मर न हे । हम्मर नोट सौटकिया हेरायल हे आउ ई पचसटकिया हे ।"

बस, जेभी से सौटकिया नोट निकाल के ऊ अदमी के देके सभे से कहली - "भाई साब ! ई नोट इनकरे हे । काहे कि नोट पचास के नञ, सौ के मिलल हमरा । हम तो सब के जाँच करे के खातिर ई चाल चलली हल ।" सब लोग के मुड़ी लाज से झुकल रह गेल ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰८ से साभार]

Friday, October 09, 2009

3. बोझ

लघुकथाकार - अशोक कुमार भास्कर

रश्मि सत्तर रुपइया के एगो किताब लेके एक सौ रुपइया के नोट दोकानदार के देलक । दोकानदार रसीद आउ पचास रुपइया के एगो नोट बढ़ा देलक । रश्मि हड़बड़ी में बाकी तीस रुपइया समझ के चल आयल ।

ओकरा ऊ घड़ी एगो झटका लगल जब लौज में आके देखलक कि दोकानदार तीस रुपइया के जगह पर पचास के एगो नोट दे देलक हल । जब ऊ लौज के सभे सहेली से ई बात कहलक तब सभी खुशी से उछल पड़लन । ऊ लोग रश्मि से कहलन, "एकरा में से कुछ खरचा-पानी कर ।"

लेकिन रश्मि के ई बात पसन्द न आयल । ऊ छो-पाँच में पड़ गेल । समझ में न आ रहल हल कि कउची करे आउ कउची न करे । ऊ रुपइया ओकर मन में पहाड़ नियन बोझ बनल हल ।

रश्मि ऊ रुपइया लउटा देवे ला सोच लेलक । हलाँकि पइसा के बहुत कड़की चल रहल हल, तइयो दूसरका दिन सबेरहीं ऊ दोकान पर पहुँच गेल, जहाँ से कल्हे किताब ले गेल हल । देखलक कि ओही बूढ़ा दोकान खोलले बइठल हे । रश्मि जइतहीं कहलक - "का बूढ़ा बाबा ! दोकान चलावे के हो कि एकर भट्ठा बइठा देवे के हो ?"

बूढ़ा दोकानदार तनी-मनी सकल चीन्ह रहल हल । लेकिन ऊ बात ओकर भेजा में न अँट रहल हल । ओकर जवाब न मिलला पर रश्मि फिन कहलक -"कल्ह जउन किताब ले गेलियो हल, ओकरा में तूँ बीस रुपइया जादे देलऽ हल । लऽ ! पकड़ऽ अप्पन बीस रुपइया ।"

बूढ़ा दोकानदार के ई समझ में न आ रहल हल कि ई जुग में अइसन नेक सोचे वला कन्ने से निकल गेल । बूढ़ा एक टक से रश्मि के निहारइत रहल आउ रश्मि पइसा देके अप्पन मन के बोझ उतार लेलक । रश्मि के चेहरा पर आत्मसन्तोष साफ झलक रहल हल ।

[मगही मासिक पत्रिका "अलका मागधी", बरिस-४, अंक-१, जनवरी १९९८, पृ॰२८ से साभार]

Monday, July 20, 2009

2. ओकील कउन - हम कि पंडीजी ?

दोषी कउन ?


कथाकार - प्रमोद बिहारी मिश्र उर्फ परमोद बजरपरुआ
(जन्मः ? - निधनः 22 सितम्बर 2008 10:00)

नौरतरा में पाठ करे ओला पंडीजी के फलाहार करावइत ओकील साहेब पुछलन - 'ऐं पंडीजी, अपने से पूजा-पाठ कराके हम दछिना नऽ दीहीं, त ओकर दोष-पाप केकरा लगत ?'
पंडीजी तड़ाक से बोललन - 'जी ! अपने के !'
ओकील साहेब जिज्ञासा कयलन - 'हम पूरा दछिना दीहीं आउ अपने बढ़िया से पूजे-पाठ न करीं, त ओकर दोष-पाप ?'
'जी ! अपने के !' - तुरते पंडी जी उवाचलन ।
'अच्छा पंडीजी ! अपने खिसियाएम नऽ त एगो आउ बात पूछीं ?'
'पूछीं जजमान ! खिसियाएम काहे ? हमनी के बोलिए आउ झोलिए पर तो नाज हे ।'
ओकील साहेब बड़ी गंभीर होके अप्पन सवाल दागलन -'पंडीजी ! अपने से दुर्गा सप्तशती के समुल्लह परायन के करार हल आउ अपने एही वास्ते संकल्पो लेली हल, त रोज बीसे मिनट में शंख बजाके पाठ कइसे खतम कर देवऽ ही अपने ? बताईं तो, एकर दोष-पाप केकरा होएत ?'
पंडीजी कलेवा करइत परम शांत स्वर में बोललन -'जी ! अपने के होएत आउ केकरा ?'

ओकील साहेब भीतरे-भीतर धिकइत हलन, एकाएक खदबदएलन - 'ऐं जी ! सब्भे में दोष-पाप हमरे ?'
पंडीजी धड़ाक से बोललन - 'तब आउ केकर ? अपनहीं बताईं । ई सब रहस्य के बात हे, सुनीं - अपने केकरो मोकदमा लड़इत हीं, मोवक्किल अपने के सब फीस-फास पहिलहीं सिरिस्ता में सबके सामने फरिया देलक हे । मान लीं कि कोई कारन से अपने से नागा-खाता हो गेल आउ अपने ओकर मोकदमा हार गेलीं, तो जज साहेब, अपने के बीसबरसा में बान्धिहन कि मोवक्किल बन्धायत ?' एतना कहइत आचमन करके पंडीजी अगिला दिन आवे के भरोसा देइत दोसरा हीं ला विदा हो गेलन ।

एने ओकील साहेब के अपन सर्टिफिकेट पर संदेह होए लगल । सोचे लगलन कि असल में ओकील हम ही कि पंडीजी ?



["अलका मागधी", जुलाई 2009, बरिस-15, अंक-7, पृ॰19 से साभार]

Monday, August 14, 2006

मगही लघुकथाएँ

लघुकथा मगही साहित्य की एक अत्याधुनिक विधा है । इसका जन्म 20 वीं शती के सातवें दशक में समझना चाहिए जब डॉ० राम प्रसाद सिंह की पहली लघुकथा जमशेदपुर से निकलनेवाली 'भोर' पत्रिका में प्रकाशित हुई । यह लघुकथा - 'अमरत्व के भूख' 19 सितम्बर 1966 को लिखी गई थी और सम्भवतः 1969 में प्रकाशित हुई थी । ऐसे तो लघुकथाओं का उद्गम वैदिक साहित्य से खोजने का प्रयास किया जाता है और उसका बीज पंचतन्त्र और जातककथा में पाए जाने की सम्भावना व्यक्त की जाती है, परन्तु आधुनिक हिन्दी या मगही लघुकथाओं का उनसे कुछ लेना-देना नहीं है ।
डॉ० राम प्रसाद सिंह - 96 लघुकथाओं का लिखित संग्रह, 50 लघुकथाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित । 'मगह के आवाज' के दूसरे खंड में लघुकथा का संग्रह ।

डॉ० अभिमन्यु प्रसाद मौर्य और डॉ० उमाशंकर सिंह (सं०) - लघुकथा संग्रह 'छतीसी' ।
संजीव कुमार तिवारी (सं०) - लघुकथा संग्रह 'धरोहर' (21 लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संग्रह) ।
केशव प्रसाद वर्मा - लघुकथा संग्रह 'हाथी के दाँत' ।

जनवरी 1998 में 'अलका मागधी' का लघुकथा विशेषांक प्रकाशित ।
अप्रैल 1998 में 'पाटलि' का लघुकथा विशेषांक प्रकाशित । इसमें 13 लघुकथाएँ और दो लघुकथा पर आधारित आलेख हैं । जिससे लघुकथा की पृष्ठभूमि एवं गतिविधि का भी संकेत मिलता है ।

मगही लघुकथा की प्रगति जिस तेजी से हो रही है उससे इस विधा के उज्ज्वल भविष्य की सहज कल्पना की जा सकती है । पुराने कथाकारों के साथ नित्य नए-नए कथाकार मगही लघुकथा लेखन के क्षेत्र में पदार्पण कर रहे हैं ।

मगही के प्रमुख लघुकथाकारों की सूची (वर्णक्रमानुसार)

1 अभिमन्यु प्रसाद मौर्य, डॉ०
2 अम्बिका सिंह
3 अलखदेव प्रसाद 'अचल'

4 अवधेश प्रसाद सिंह
5 उमाशंकर सिंह, डॉ०
6 केशव प्रसाद वर्मा

7 चन्देश्वर सिंह, डॉ०
8 तृप्ति नारायण शर्मा, प्रो० - दर्जनों लघुकथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
9 दलीप कुमार, प्रो०

10 नरेन्द्र प्रसाद सिंह
11 महेन्द्र प्रसाद 'देहाती'
12 राम पारिख

13 राम प्रसाद सिंह, डॉ०
14 राम विलास 'रजकण'
15 रामनरेश प्रसाद वर्मा, प्रो०

16 रामयतन प्रसाद यादव
17 ललन कुमार मिश्र
18 वीर विजय सिंह 'बेसुध', डॉ०

19 वीरेन्द्र सिंह आजाद
20 श्रवण कुमार 'मधुर'
21 संजीव कुमार तिवारी

22 सच्चिदानन्द प्रसाद
23 सुखित वर्मा
24 स्वर्ण किरण, डॉ०
लघुकथा के कुछ नमूने
1. औकात - डॉ० अभिमन्यु प्रसाद मौर्य
बेटी के बिआह करेला दउड़इत-दउड़इत वर्मा जी चिन्ता में आधा हो गेलन । आज ऊ सतवाँ बार एगो लड़का के घरे जाइत हथ । तीन दफे ऊ लोग भी इनका घरे आके लड़की देखे के बहाने खूब मिठाई खा चुकलन हे । जब लड़की पसन्द आ गेल, तब ऊ लोग फाइनल बात करे ला आज बोलयलन हे ।
नश्ता-पानी के बाद वर्मा जी बातचीत के शुरुआत कैलन - "हरेक लड़की के बाप अप्पन औकात के मोताबिक अप्पन बेटी के देवे ला दहेज के रकम जमा कैले रहऽ हे । हमहुँ अप्पन औकात के हिसाब से तीन लाख दे देम ।
"अप्पन औकात काहेला बतावइत ही वर्मा जी ! ", लड़का के बाप बोललन - "तिलक-दहेज के निर्धारण लड़का के औकात के मोताबिक होवे के चाहीं । हम्मर लड़का के बिआह पाँच लाख से कम में न होयत । अपने से अगर एतना के इन्तजाम हो जायत, तबे बिआह होयत ।"
वर्मा जी के तो बोलती बंद हो गेल । ऊ समझ गेलन कि न नौ मन तेल होयत न राधा नाचत । जौरे आयल अप्पन साला मुन्ना जी से वापस चले के इशारा कैलन । मुन्ना जी उनकर इशारा समझ गेलन । बाकि उठे से पहिले ऊ एगो सवाल कैलन - "बाबू साहेब ! वर्मा जी के पास तीन लाख जमा हे, त कहल जा सकऽ हे कि उनकर तीन लाख के औकात हे । बाकि अपने के बारे में कइसे पता चलत कि अपने के पाँच लाख के औकात हे ? अपने अप्पन बैंक खाता में पाँच लाख जमा देखा देम, तब हमरा बिसवास हो जायत ।"
लड़का के चचा खिसिया के बोललन - "अदमी हर हमेशे एतना रुपइया जमा थोड़हीं रखऽ हे ।"
"आज न हे त कहियो के तारीख में देखा दीं कि ऊ दिन अपने के बैंक खाता में पाँच लाख जमा हल । अगर पहिले न हल कहियो, तब हमनी दुन्नो पाटी एक महीना के समय ले लीं । अपने जउन दिन देखा देम कि अपने के पास पाँच लाख जमा हो गेल, ओही दिन हमनी दहेज के पाँच लाख अपने के पास जमा कर देम ।" एतना कहके मुन्ना जी वर्मा जी के साथे बाहर निकल गेलन ।
[ अलका मागधी, लघुकथा विशेषांक, दिसम्बर २००५, अंक १२, पृष्ठ – १]
2. पाकिटमार - नरेन्द्र प्रसाद सिंह
पटना गया फास्ट पसिंजर टरेन पटरी पर रेंग रहल हे । डिब्बा के नीचे-ऊपर, अखानों-पखानों हियाँ तक कि इंजन पर भी अदमी के ऊपर अदमी लदल हे । आरच्छन आउ सधारन बोगी में कउनो अंतर नैं, मुदा रावा-छोवा सब एक्के भाव ।
कुली के दसटकिया देवे से एगो सीट बड़ी मोसकिल से मिलल, सेहो गेट के सटले । बोगी तो कोंचायले हल, गोड़ मोड़े के भी जगह नैं हल । एतने में एगो बबुआन अदमी घड़ी-चश्मा लगयले, जेबी में फोटरपीन खोंसले हमरा भिजुन आके खाड़ हो गेलन । हुँनखर बबुआन चेहरा देख के हम तनि घसक गेलूँ । ऊ पट-दबर बइठ गेलन आउ धन्यवाद देलन ।
हमनी के बीच गढ़गर गलबात होवे लगल । पुछला पर अप्पन नाम कुमार कलाधर बतौलन, जे गया जी जाइत हलन । हमहूँ बिन पुछले अप्पन नाम मगही रचनाकार नरेन्दर बतइली आउ सोझे-सोझे कह देली - "हमरो तो हुएँ जाय के हे ।" ई बात दूध में जोरन लेखा दही बन गेल, मुदा दोस्ती जम गेल ।
हम्मर हाथ में पटना से छपेवला पत्रिका 'अलका मागधी' के एगो अंक हल । ओकरा में हम्मर लिखल कहानी छपल हल 'पाकिटमार' । कहानी पढ़के ऊ कहे लगलन -"ई तोहरे लिखल कहानी हो ? बड़ बेस मगही लिखइत ह । कहानी के प्लॉट भी निमने हो । हमरो साथ एक तुरी अइसने घटना घटल हल ।"
गाछ-बिरिछ, गाँव-शहर, जानवर-धुर सबके सब भागल जाइत हे । खाली टरेन अहथिर बुझाइत हे । कलाधर जी कहे लगलन - "नरेन्दर भइया ! पाकिटमार न जानी कउन इसकूल से पास करऽ हे । हम तो हुँनखर बुद्धि के लोहा मानऽ ही । का कहीं नरेन्दर भइया ! एक तुरी हमरा दिल्ली जाय के हल । राजधानी इस्परेस के बोगी में अदमियन जौरे सटपट के बइठल हली, जइसन कि आझ । टरेन तखनें मुगलसराय जंक्सन पर खाड़ हल । एगो हमरे-तोहरे जइसन बबुआन अदमी पाकिटमार के खिस्सा सुनावे लगलन । हम सोचली कि ऊ शरीफ अदमी हथ जे हमनीं के पाकिटमार से सचेत रहेला सिखा रहलन हे ।"
हम खुस होके कहली - "कलाधर जी ! तोहर घटना तो हम्मर कहानी से सोरहो आना मिलइत हे । कहते जा । रस्ता भी कटइत रहतो आउ मनवों परफुल्लित रहत ।"
टरेन बेलागंज टीसन पर खाड़ हे । गाड़ी हिएँ मेल करेवला हल । हम पुछली - "आगे की भेल ?"
कलाधर जी कहे लगलन - "ऊ आदमी जे हमनीं के कहानी सुना रहल हल, अप्पन हाथ हम्मर उपरका जेबी में डाल देलक ।"
कलाधर जी हम्मर पाकिट में हाथ डाल के कहलन - "अइसे करते ऊ पायदान पकड़ के दोसरका गाड़ी पर टप गेल, जे मेल करे लागी बगले के पटरी पर खाड़ हल ।"
हम नैं बुझली कि कलाधर जी हम्मर कहानी के सचकोलवा पात्र हथ । ऊ भी झट से उतरलन आउ पट से दुसरका टरेन में चढ़ गेलन । ओन्ने गाड़ी भी सीटी मार के पटरी पर घिसिआय लगल । हम तो हुँनखर असरा ढेर देरी तक देखइत रहली कि ऊ अब अइतन कि तब ।
एन्ने हम्मर टरेन भी तूफान बन के भागे लगल । हम अप्पन पाकिट में हाथ देही त देखऽ ही कि सब के सब रुपइया, टिकट, फोटरपीन सहित धोकड़ी भी गायब हे ।
हम्मर हाथ में 'अलका मागधी' के अंक अइसहीं धरल रह गेल । हम तो ठिसुआयल हाथ मलइत रह गेली । हँ, 'पाकिटमार' सिरनामा पर हम्मर दुन्नो आँख से लोर टप-टप टपके लगल ।
दोसर दिन 'हिन्दुस्तान' अखबार में ई समाचार पढ़के हैरान रह गेली, जेकरा में छपल हल - " 'पाकिटमार' कहानी के लेखक नरेन्दर जी के पाकिट मारल गेल पटना-गया फास्ट पसिंजर टरेन में ।"
[ अलका मागधी, लघुकथा विशेषांक, दिसम्बर 2005, अंक - 12, पृ.18-19 ]