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Saturday, February 28, 2009

16. बिहार मगही मंडप का 70वां कार्यक्रम संपन्न

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_5242028_1.html

बिहार मगही मंडप का 70वां कार्यक्रम संपन्न

15 Feb 2009, 10:06 pm

वारिसलीगंज (नवादा) : स्थानीय नगर पंचायत के माफी गांव में बिहार मगही मंडप का 70वां कार्यक्रम रविवार को आयोजित हुआ। मौके पर मगही संवाद नामक पत्रिका का लोकार्पण और गीतकार डा. सुनील के गाये मगही गीत के सीडी भी जारी किये गये। सीडी जारी करते हुए मंडप के अध्यक्ष रामरतन सिंह रत्‍‌नाकर ने कहा कि मगही में गीत की जो कमी थी उसे डा. सुनील ने पूरा कर दिया। श्री रत्नाकर ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि भारत के चार करोड़ लोगों की मातृभाषा मगही को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान देने का संघर्ष साहित्य और राजनैतिक मंचों से जारी रहेगा। मौके पर 21 वीं सदी की नारी विषयक मगही संवाद का लोकार्पण कवि कारू गोप तथा उदय भारती ने किया। आगतों का स्वागत अरविन्द सिंह ने किया। कार्यक्रम में नवादा, नालंदा, शेखपुरा तथा गया जिले के कवि एवं लेखकों ने अपनी कविता का पाठ कर उपस्थित जन समुदाय को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रमुख कवियों में दीनबंधु प्रो. धीरेन्द्र कुमार धीरू, रामभजन शर्मा बटोही, श्री निवास सिंह, डा. सुनील सिंह, रामनंदन सिंह समेत दर्जनों लोगों ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम के दौरान मंडप के अध्यक्ष द्वारा कवि, लेखकों तथा पत्रकारों को उपहार भेंट किया गया।

1. "मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

1.8. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ ८

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ ८

मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा,
कई ख्वाब थे जो मचल गये ।
मेरे दिल के शीशमहल में फिर लो
चिराग यादों के जल गये ।
मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा ....

मेरा कोई तेरे सिवा नहीं,
मेरे गम की कोई दवा नहीं ।
मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा ....

मुझे तुझसे कोई गिला नहीं,
तुम बदल गये तो बदल गये ।
मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा ....

वही वादियाँ, वही रास्ते
वही मंजरे, वही मरहले
वही मंजरे, वही मरहले ...

मगर अब नजर में जो तुम नहीं,
वो हजार जलवे पिघल गये ।
मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा ....
कई ख्वाब थे जो मचल गये ....

मेरे दिल के शीशमहल में फिर लो
चिराग यादों के जल गये ।
मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा ....

गीत - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी

प्लेबैक - मुबारक बेगम

1.7. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ ७

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ ७


ओ ... ओ ... ओ - २

आई गेलय रिमझिम ई फुहार
हो चल रे भइया चल अब खेत सजा ले
हो - आई गेलय रिमझिम ई फुहार
हो चल रे भइया चल अब खेत सजा ले - २


चल रे भइया, हलवा ले ले, बैलवा ले ले
ओ ... ओ ... ओ ...
नाचो गाओ सब मिलि - २
हो नाचो गाओ सब मिलि
खुशी के ई दिनमा भइया भाग बना ले
भइया भाग बना ले - २
छुटि गेलय दुखवा हमार
छुटि गेलय दुखवा हमार ।
हो चल रे भइया चल अब खेत सजा ले- २


करिया बदरियो देखी ... हो ... हो
बाजत मन के बसुलिया ।
बाजत मन के बसुलिया ।
बाल बलकवा झूमै - २
बगिया में कूकै कोइलिया ।
कोरस - बगिया में कूकै कोइलिया ।
रामा बगिया में कूकै कोइलिया ।

गीत - ललन

प्लेबैक - मन्ना डे, सुमन और कोरस

1.6. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ ६

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ ६

कौन ते कसुरिया हमार, से गोकुला तजलऽ हे माधो !
रसे-रसे कइलऽ पिरितिया, से जतियो न पूछलऽ हे माधो !
छोड़ देलूँ कुल परिवार, जोगिनियाँ बनइलऽ हे माधो !

सुखल नदिया में नइया बहउलऽ - २
काठ के खटोलना पै सेजिया सजउलऽ - २
नइया विन पतवार हो, से हमरो भूलयलऽ हे माधो !

सूतल-सूतल उमरिया गँवयलूँ - २
उठलूँ पलंगिया से तोहरा न पयलूँ - २
काटे घर परिवार हो - से दरदियो न बुझलऽ हे माधो !

रसे-रसे कइलऽ पिरितिया, से जतियो न पूछलऽ हे माधो !
छोड़ देलूँ कुल परिवार, जोगिनियाँ बनइलऽ हे माधो !

गीत - ललन

प्लेबैक - सुमन कल्याणपुर

Friday, February 27, 2009

1.5. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ ५

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ ५


लड़की : कुसुम रंग लहँगा मँगा दे पियवा हो

कुसुम रंग लहँगा मँगा दे पियवा हो


लड़का : कुसुम रंग लहँगा मँगैवो धनियाँ हे
कुसुम रंग लहँगा मँगैवो धनियाँ


लड़की : लहँगा मँगा दे - लहँगा मँगा दे
पिया ओढ़नी रंगा दे - २
अँगिया में गोटवा टका दे पियवा हो - २
कुसुम रंग लहँगा मँगा दे पियवा -


लड़का : लहँगा मँगैवो लहँगा मँगयवो, धानी ओढ़नी रँगैवो
अँगिया में गोटवा टकयवो धनियाँ हे, अँगिया में - २
कुसुम रंग लहँगा मँगैवो धनियाँ -


लड़की : कजरा लगा दे - कजरा लगा दे
पिया मेंहदी रचा दे - २
अपने हाथ हमरा सजा दे पियवा
अपने हाथ हमरा - २
कुसुम रंग लहँगा -


लड़का : कजरा लगयवो - कजरा लगयवो धानी, मेंहदी रचयवो - २
अपने हाथ तोहरा सजयवो धनियाँ हे, अपने हाथ - २
कुसुम रंग लहँगा मँगैवो धनियाँ -


लड़की : कुसुम रंग लहँगा मँगा दे पियवा हो - २

गीत - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी

प्लेबैक - आशा भोंसले और मोहम्मद रफी

1.4. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ ४

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ ४

बड़ रे जतन से हम सियाजी के पोसलूँ
सेहो रघुवंशा ले ले जाय -
सखिया के अँखिया से धुलै कजरवा
झर झर नीर बहाय -
झर झर नीर बहाय -
ताकय सियाजी के हहरल हिया ले ले
ताकय सियाजी के हहरल हिया ले ले
जोड़ी से बेजोड़ी कइले जाय ।
सियाजी के सेहो रघुवंशा ले ले जाय ।
जा हे ! सखी तुम मुडेरे की चिड़िया
भोर भये उड़ जाय
भोर भये उड़ जाय
सुन रे सखी तू तो खूँटे की गइया,
हाँको जिधर हँक जाय
सियाजी के सेहो रघुवंशा ले ले जाय ।
बड़ रे जतन से हम सियाजी के पोसलूँ
सेहो रघुवंशा ले ले जाय ।

गीत - ललन

प्लेबैक - सुमन और कोरस

1.3. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ ३

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ ३



लड़की : मोरे मन मितवा सुना दे ऊ गितवा - २


बलमुआ .... हो .... २
गितवा जे गावै मोरा मनमा - २

लड़का : सुन गोरिया कैसे सुनइयो ऊ गितवा
सुना दे ऊ गितवा -
सजनिया हे, गितवा जे गावै मोरा मनमा ।

लड़की : मनमा से फूटै मिलनमा के गनमा -
मिलनमा के गनमा ।

लड़का : नैनवा के कोरवा सजाव ना सपनमा - २
सजाव न सपनमा ।

लड़की : मनमा से फूटै मिलनमा के गनमा -
मिलनमा के गनमा ।
ललकी किरिनिया अइतई हमरे अँगनमा
हमरे सिंगार तूही हमरे सजनमा
हो बलमुआ हो किन किन बोलै कंगनमा - २

लड़का : बनके बावरिया रचाव न लगनमा - २
दिलवा से दूर कर दे मन के भरममा
ना हम सिंगार तोहरै नाहीं सजनमा - २
सजनिया हइ जुड़ले जुड़इतो न परनमा - २

लड़की : मोरे मन मितवा सुना दे ऊ गितवा - २
बलमुआ हो .... .... - २
गितवा जे गावै मोर मनमा ।

गीत - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी

प्लेबैक- सुमन और मुकेश

1.2. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ २

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ २

ओ सखिया, ओ सखिया कैसे के
गगरिया भरियो तोरी भरियो तोरी
हे डगरिया सूनी डर लागे ना
गगरिया भरियो तोरी, डगरिया सूनी डर लागे ना
ओ सखिया कैसे के गगरिया भरियो तोरी,
डगरिया सूनी डर लागे ना
गगरिया भरियो तोरी, डगरिया सूनी डर लागे ना
चार टके की ओढ़े चदरिया, बात बोले अनमोला
सहरी सजना बड़ा सयाना हे - रामा
सहरी सजना बड़ा सयाना हे रामा
कनखी से ताकै मोरी-ओरी, हो डगरिया सूनी डर लागे ना
लाख टके की मोरी चुनरिया बालम के मन अटके
हो बालम के मन अटके ।
लाख टके की मोरी चुनरिया बालम के मन अटके ।
पनघट-पनघट प्यासल भटकै हे रामा
पनघट-पनघट प्यासल भटकै हे रामा।
अँखिया मिलावै चोरी-चोरी,
हे डगरिया सूनी डर लागे ना
हे डगरिया सूनी डर लागे ना
जिनकर मद में मातल झूमै नाचै मन मतवाला ।
हो नाचै मन मतवाला ।
जिनकर मद में मातल झूमै नाचै मन मतवाला ।
मरम न समझे दरद न जानै हे रामा ।
मरम न समझे दरद न जानै हे रामा ।
दिलवा में पैसई जोरा-जोरी
गगरिया भरियो तोरी, डगरिया सूनी डर लागे ना ।
ओ सखिया कैसे के गगरिया भरियो ।
डगरिया सूनी डर लागे ना
डगरिया सूनी डर लागे ना ।

गीत - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी

प्लेबैक - सुमन और कोरस

1.1. मोरे मन मितवा - गाना नं॰ १

"मोरे मन मितवा" फिल्म के गाना

गाना नं॰ १

हो - हो - होली हो ।
मधुवन में रास रचाये मनमोहन मतवाला हो ।
मधुवन में रास रचाये मनमोहन मतवाला हो ।
जब तक फागुन मस्त महिनमा - २
हो तब तक धूम मचाये हो -
मनमोहन मतवाला - होली हो ।
उड़े रंग गुलाल लुभाये मनमा ।
उड़े रंग गुलाल लुभाये मनमा ।
होली अइलई रंग डार सुहाना दिनमा ।
होली अइलई रंग डार सुहाना दिनमा ।
उड़े रंग गुलाल लुभाये मनमा ।
भींग गेलइ गोरी धानी चुनरिया
केसरिया रंग डारई,
केसरिया रंग डारई
बद्दा मार .... .... समझे ।
तनिको दरद न जतावै ।
उड़े रंग गुलाल - मोरा खनकय कंगना
उड़े रंग गुलाल - लुभाये मनमा ।
हो गोरिया कर ले नयना चार, सुहाना दिनमा ।
हो गोरिया कर ले नयना चार, सुहाना दिनमा ।
उड़े रंग गुलाल लुभाये मनमा ।
ओ पुरवैया के मस्त झकोरवा रहि-रहि प्यार जतावै ।
ओ पुरवैया के मस्त झकोरवा रहि-रहि प्यार जतावै ।
ओ तोरे मुख के रंग अबीरिया रह-रह प्यार जगावै ।
ओ तोरे मुख के रंग अबीरिया रह-रह प्यार जगावै ।
ओ तोरे मुख के रंग अबीरिया मन के प्यास बढ़ावै ।
उड़े रंग गुलाल लुभाये मनमा ।
उड़े रंग गुलाल रंगीला फगुना ।
हो गोरिया कर ले नयना चार, सुहाना दिनमा ।
उड़े रंग गुलाल लुभाये मनमा ।
स -र -र सर सरर सर सरर सर स- र - र
सखियन संग कान्हा
रास रचावै, रास रचावै
धूम मचावै, धूम मचावै
नयन लड़ावै, नयन लड़ावै
राधा के संग, गोपिन के संग ।

गीत - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी

प्लेबैक - मन्ना डे, सुमन और कोरस

6. बाबूलाल मधुकर

जन्म तिथिः 15 सितम्बर 1941 (सोमवार) [आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी]

जन्म स्थानः ग्राम-ढेकवाहा, जिला - पटना (अब नालन्दा)

मगही सेवाः

नाटक - नयका भोर (1967) (मगही का प्रथम नाटक)

उपन्यास - (1) रमरतिया (1968, द्वितीय संस्करण 2008)
(2) अलगंठवा (2001)

कविता संकलन - (1) लहरा (2) अंगुरी के दाग (1979)

कथा-काव्य - रुक्मिन के पाती (2008)

2. मगही फिल्म

मगही फिल्म


लेखक - प्रो॰ लक्ष्मीचन्द्र प्रियदर्शी

१९६१ के बात हे। दुनिया के फिल्म-मैप पर भारत के जगह देलावे वाला महान निर्देशक सत्यजीत राय अप्पन नया फिल्म "अभिजान" के पटकथा तइयार कर रहलन हे। नायिका बिहार के कउनो गाँव के लड़की हे जेकरा एगो ट्रक-ड्राइवर कलकत्ता भगा ले गेल हे। फिल्म बंगला में हे, बाकि नायिका के पूरा संवाद, स्वाभाविकता के खातिर, बिहारी भासा में होवे के चाही। बंगला संवाद-संकेत तइयार करके राय अप्पन शिष्य आउ फिल्म के सहकारी निर्देशक गिरीश रंजन से हिन्दी संवाद लिखे ला कहऽ हथ। गिरीश रंजन के कहनाम हे, गाँव के लड़की हिन्दी बोलऽ कहाँ हे ? राय सहमत हो जा हथ कि संवाद बिहार के कोय लोकभासा में होवे के चाही। गिरीश ऊ संवाद मगही में लिखऽ हथ। पूरा फिल्म में चलइत नायिका वहीदा रहमान के मगही संवाद "अभिजान" में एगो अलगे चमक लेके आवऽ हे। फिल्म में मगही के पहिला परवेस मिल जा हे - ऊ भी सत्यजीत राय के फिल्म से ! एगो शुभारम्भ होवऽ हे।

मगही-जगत् के तरफ से मगध संघ के मन्त्री हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी अप्पन संघ के पुरान साहित्य मन्त्री गिरीश रंजन के बधाई आउ सत्यजीत राय के धन्यवाद के पत्र लिखऽ हथ। राय के आभार-स्वीकृति-पत्र मिलऽ हे आउ मिलऽ हे कलकत्ता यूथ क्वायर के १९६३ के वार्षिक प्रदर्शन-मंच पर मगही लोक संगीत के प्रदर्शन के निमन्त्रण-पत्र। राय के अध्यक्षता आउ रूमा गुहा टकुर्ता के मन्त्रीत्व में ई संस्था हर बरस भारत के लोक कला के प्रदर्शन कलकत्ता के समुद्र कलामंच पर करऽ हे। कलामन्त्री लल्लन के नेतृत्व में मगध संघ के कलाकार दल मगही लोक संगीत के समाँ बाँध दे हे, सब के दिल जीत ले हे। कलकत्ता के बंगला-हिन्दी-अंग्रेजी अखबार के पन्ना मगही लोक संगीत के तारीफ में रंग जा हे।

ई बीच १९६२ में भोजपुरी फिल्म "गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो" के भारी सफलता से लोकभासा सब में फिल्म निर्माण के ट्रेंड बन गेल हे। मगही में फिल्म निर्माण के पृष्ठभूमि तइयार हे।

१९६३ में अचानक पटना में तीन मित्र मिलऽ हथ आउ फिल्म देखऽ हथ "गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो"। तीन दिमाग में एक सवाल कउँधऽ हे - की हे एकर सफलता के राज ? संगीतकार लल्लन के ऊ तत्त संगीत लगऽ हे, साहित्यकार हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी के घर के बोला के सुखद नजदीकपन, आउ फिल्मकार गिरीश रंजन ऊ में लोक के छुअन से भरल-पूरल एगो नया अभिव्यक्ति परखऽ हथ। नतीजा के रूप में सामने आवऽ हे फिल्म निर्माण आउ वितरण संस्था "मगध फिल्म्स"। श्रवण कुमार, शिवनन्दन प्रसाद, हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी, गिरीश रंजन आउ तपेश्वर प्रसाद १९६३ में पाँच पार्टनर के रूप में पटना में कम्पनी के निबन्धन करावऽ हथ। पचास हजार के पूँजी हे, आगे पूँजी ला वितरक के खोज हे। सत्यजीत राय के अनेक फिल्म के निर्माता, बड़गो वितरक-प्रदर्शक, आर॰डी॰ बंसल रुचि देखावऽ हथ। कहानी सुनऽ हथ, गीत सुनऽ हथ। वितरण ला तो तइयार हइये हथ, निर्माण भी आर॰डी॰ बंसल प्रोडक्शन के विश्वविख्यात बैनर में करे के प्रस्ताव रक्खऽ हथ। काम के जिम्मेवारी तइयो "मगध फिल्म्स" यूनिट पर ही रहे के हे। प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार हो जा हे। एही "मोरे मन मितवा" के निर्माण के पृष्ठभूमि हे।

लगभग एही समय में एगो आउ यूनिट मगही फिल्म के निर्माण में लगऽ हे। निर्माता पी॰एन॰ प्रसाद के नालन्दा चित्र-प्रतिष्ठान के बैनर में मगही फिल्म "भइया" के निर्माण होवऽ हे। "भइया" के प्रदर्शन १९६४ में होवऽ हे जबकि "मोरे मन मितवा" के १९६५ में। तेसर फिल्म मगही में अब तक न बनल हे।

"भइया" में बड़ भाई द्वारा छोट भाई ला अप्पन आश्रित मंगेतर के तेयाग आउ छोट भाई के बहके-सम्हले के कथानक हे। कथा आउ निर्देशन फणी मजूमदार के हे, जिनका भारत के सब से जादे भासा में फिल्म बनावे के गौरव हे। पटकथा नवेन्दु घोस के आउ संवाद ब्रजकिशोर के हे। संगीत ई फिल्म के उज्ज्वल पक्ष हल, जेकर श्रेय संगीतकार चित्रगुप्त, गीतकार प्रेम धवन आउ विन्ध्यवासिनी देवी तथा गायक-गायिका मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले आउ उषा मंगेशकर के जा हे। नया अभिनेता गोपाल नायक हे, विजया चौधरी नायिका। तरुण बोस, लता सिन्हा, रामायण तिवारी, अचला सचदेव, पद्मा खन्ना, ब्रजकिशोर, अमल सेन, भगवान सिन्हा, हेलेन आउ सुन्दर कलाकार हथ। छायाकार चन्दू, ध्वनि आलेखक मधु देशपांडे, फिल्म सम्पादक आर॰ टिपनिस, कला निर्देशक देश मुखर्जी आउ नृत्य निर्देशक सत्यनारायण फिल्म के तकनीसियन हथ। "भइया" के पहिला प्रदर्शन पटना से वीणा सिनेमा में होल हल।

"मोरे मन मितवा" के कथा-पटकथा-संवाद आउ निर्देशन गिरीश रंजन के हल। गिरीश १९५९ के अन्त में बिहारशरीफ से कलकत्ता गेलन; ३५, दुर्गापुर लेन, कलकत्ता-२७ में बड़ भाई तपेश्वर प्रसाद हीं रह के सत्यजीत राय से फिल्मकला सिखलन आउ बंगला फिल्म में अप्पन पहिचान बनइलन हल। बिहारशरीफ में १९५७-५९ में मगध संघ के साहित्यमन्त्री के रूप में ऊ मगही आन्दोलन आउ लेखन से जुड़ चुकलन हल। उनकर लिखल "मोरे मन मितवा" में मगही मिट्टी के सोंधा गन्ध भरल हे। सामन्तवाद, तिलक-दहेज, अशिक्षा आउ पारिवारिक कलह से ढँकल मगध के एगो गाँव में जागरन के नया लहर आवे के कहानी के ऊ सही कैनवस देलन हे। बाकि फिल्म के सबसे सबल-सफल पक्ष ओकर गीत-संगीते हे।

शंकर-जयकिशन के सहजोगी दत्ताराम के संगीत निर्देशन में फिल्म के गीत लिखलन हे हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी आउ लल्लन। प्रियदर्शी के लिखल 'कुसुम रंग लहँगा मँगा दे पियवा हो', 'मोरे मन मितवा, सुना दे ऊ गितवा' तथा गजल 'मेरे आँसुओं पे न मुस्कुरा', जेकरा क्रमशः रफी आउ आशा, मुकेश आउ सुमन कल्याणपुर तथा मुबारक बेगम गइलन हे, मगध क्षेत्र में जन-जन के कण्ठहार बन गेल आउ रेकार्ड-रेडियो से अब तक लोकप्रिय हे।

"मोरे मन मितवा" के नायक सुधीर, नायिका नाज, कलाकार सुजीत कुमार, बेला बोस, हेलेन, सविता चटर्जी, रवि घोस, विपिन गुप्ता, पहाड़ी सान्याल, अनुभा गुप्ता, छाया देवी, वीरेन चटर्जी आउ हरबंस हथ। बिहार के सत्यवान सिन्हा, रामानन्द आउ सिद्धू के अभिनय जीवन ई फिल्म से शुरू होवऽ हे। तकनीसियन छायाकार विशु चक्रवर्ती, ध्वनि आलेखक सौमेन चटर्जी, अतुल चटर्जी आउ सुजीत सरकार, फिल्म सम्पादक वैद्यनाथ चटर्जी, कला निर्देशक रवि चटर्जी आउ नृत्य निर्देशक सत्यनारायण हथ। फिल्म बढ़ियाँ बनल हे।

१९६५ तक के लोकभासा में बनल फिल्म के समारोह 'भोजपुरी फिल्म फेस्टिवल, १९६५' नाम से आयोजित होल। निर्णायक मंडल के अध्यक्ष नामी निर्देशक मृणाल सेन हलन। सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित "मोरे मन मितवा" के ऊ फेस्टिवल में चार पुरस्कार प्राप्त होल।

लोकभासा फिल्म के साथ नवीनता के सनातन आकर्षण, लोकभासा आउ लोकजीवन के निकट छुअन, लोकधुन के सजीवता आउ मधुरता तथा कम खर्च के सहूलियत हे। एकरे बल पर ६२-६६ में खूब जोर से एकर ट्रेंड बनल। अनेक लोकभासा में फिल्म के निर्माण होल। बाकि ६६ के बाद बन रहल फिल्म के भी पूरा न कइल जा सकल, जहाँ के तहाँ छोड़े पड़ल। कारण ? खर्च के सस्तापन के साथ चउतरफा सस्तापन वेआप जाय से, नवीनता के आकर्षण हटे के साथे साथ, सारा तामझाम एकवारगी बैठ गेल। लोकभासा फिल्म के आगे ई बड़गो चुनौती हे, सबक हे।

१९७६ में, ठीक दस बरस बाद, भोजपुरी 'दंगल' के साथ ट्रेंड फिर पलट रहल हे। भोजपुरी के कईगो फिल्म बनल हे। अधूरा मैथिली फिल्म 'ममता गाबय गीत' के पूरा कइल जाय के खबर हे। मगही फिल्म के कोय खबर न हे। हिन्दी फिल्म में मगध के संस्कृति, कला आउ भासा के झलक छिटपुट रूप में जहाँ-तहाँ मिल जा हे ! १९७९ में तपेश्वर प्रसाद के निर्देशन में बनल हिन्दी फिल्म "छठ मइया की महिमा" में मगध के ई अप्पन पर्व के अंतरंग झाँकी पटना में छठ के विविध पक्ष के वास्तविक चित्रण आउ विन्ध्यवासिनी देवी के गावल मगही छठ-गीत मउजूद हे। अइसहीं शत्रुघ्न सिन्हा के "गौतम गोविन्दा" के संवाद में मगही के पुट हे।

बिहार सरकार फतुहाँ में स्टुडियो बनावे आउ फिल्म के पूँजी ला वित्त के व्यवस्था करे के विचार कर रहल हे, ई चरचा हे। मगध के धरती पटना में ई सब चरचा होय आउ मगध के लोकभासा मगही में फिल्म बनावे के खेयाल कोय मन में न जागे, ई कउनो स्थिति न हे। कमी पैसा आउ प्रतिभा के न हे, साधन-संयोजन के हे। न मालूम भविष्य के ओट में की हे!

 

[ हिन्दी विभाग, कन्हाई लाल साहु कॉलेज, नवादा]


--- "मगही" - मगध संघ के तिमाही पत्रिका, बरीस १; अंक १; जनवरी-मार्च १९८६; सम्पादक - हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी; पृ॰ ७२-७५; प्रकाशक - मगध संघ प्रकाशन, सोहसराय (नालन्दा).

 

Thursday, February 26, 2009

1. मगही फिल्म "मोरे मन मितवा" (1965)


मोरे मन मितवा
MOREY MAN MITWA

Produced by: R. D. Bansal

Story, Scenario & Direction: Girish Ranjan

Music: Dattaram Dance: Satyanarayan

Controller of Production: Bimal Dey

Camera: Bishu Chakraborty
Art Direction: Rabi Chatterjee

Audiography: Soumen Chatterjee, Atul Chatterjee,
Sujit Sarkar

Editing: Baidyanath Chatterjee Make-up: Anant Deo

Lyrics: Harishchandra Priyadarshi, Lalan

Associate Music Director: Lalan


Recording:
Minoo Katrak, B.N. Sharma, Rabin Chatterjee(Bombay)


Background Music & Re-recording: Shyam Sundar Ghose
Production Manager: Sudip Mazumdar
Processed at: India Film Laboratories Private Ltd.


Laboratory Asst.:
Abani Roy, Tarapada Chowdhury, Mohan Chatterji,
Abani Mazumdar


Produced at:
Technicians Studi, New Theatres, R.K.Studio(Bombay)



Supervision: R. B. Mehta
Stills: Pics Studio
Publicity: Sailesh Mukherjee



ASSISTANTS


Direction: Bishu Brahma, Pradip Niyogi,
Hridesh Kumar Panda



Camera: K. A. Reza, Nirmal Mallik, Ashok Das
Sound: Rathin Ghose, Dhiren Naskar, Babaji



Editing: Rabin Sen
Art Direction: Somenath Chakraborty



Make-up: Bhim Naskar Music: Sunil
Dance: Khopkar
Management: Madan Das, Arun Das





CAST:



KUMARI NAAZ, SUDHIR, SUJIT KUMAR
Anuva Gupta, Bela Bose, Sabita Chatterjee,
Chhaya Devi, HELEN, Pahari Sanyal, Bepin Gupta,
Rabi Ghose, Biren Chatterjee, Harbans, Pranita,
Kajal, Jayanti, Ruby, Namita, Asha, Bakul, Sandhya,
Shikha, Sipra, Bina, Swapna, Alpana, Jayashree,
Lila, Dipti, Sunilesh, Sidhulal, Bhanu, Satyaban,
Debansu, Paresh, Mukundalal, Nikhil, Kanai, Mani,
Kamal, Anup, Smriti Kumar, Sambhu, Ramananda (Sr.)




PLAYBACK
MD. RAFI, MANNA DEY, MUKESH, ASHA BHONSLE,
SUMAN KALYANPUR, MUBARAK BEGUM




Acknowledgements:
The Superintendent, Patna Medical College,
Dr.H.N.Singh


Dr.Purnendu Narayan Singh, M.I.C. Grand Hotel, Patna,
Rajesh Verma, Rajen Tarafdar




World Right Controller
R.D.B. & Co.








मोरे मन मितवा
(कथासार)






जमीन्दार रायबहादुर अम्बिका प्रसाद और सरोजिनी देवी का एकलौता बेटा रमेश जितना ही सुन्दर, प्रतिभावान था, उतना ही मधुकर गायक भी । वह पटना मेडिकल कॉलेज का एक सर्वथा सम्पन्न विद्यार्थी था । उसी गाँव के एक छोर पर सरजू महतो अपने दो पुत्रों लछमन और पल्टू, पत्नी धनियाँ और लाड़ली बेटी कमली के साथ रहता था । लक्ष्मण, महतो की प्रथम विवाहिता पत्नी का पुत्र था तथा पल्टू और कमली धनियाँ के । रमेश और कमली, बचपन से ही एक आत्मा और दो शरीर की तरह खेलते खाते आ रहे थे । रमेश के प्यार का अंकुर कमली की भरपूर जवानी का आलम पाकर एक हरे-भरे वृक्ष के रूप में लहलहा उठा, लेकिन रमेश के दिल में कमली के प्रेम का अंकुर एक पौधा ही बनकर रह गया । रमेश अवकाश के पश्चात् पुनः कॉलेज चला गया जैसे जाता था ।

काल इसी प्रकार चलता रहा । एक दिन सरजू को अपने काल ने ले ही लिया । लक्ष्मण की पत्नी पार्वती परिवार के साथ अपना निर्वाह न कर सकी ।

इसी बीच कमली के हाथ पीले हो गए । अपने श्वसुर के घर जाते हुए कमली को मार्ग में रमेश ने एक बनारसी साड़ी भेंट की । कमली कुछ कह न सकी और उसकी आँखों से आँसू का सागर फूट पड़ा । कमली की सखी फुलिया ने वह चित्र लौटा दिया जिसको उसने बहुत दिनों से बचाकर रखा था । रमेश आँसुओं के साथ चित्र लौटाने क भाव न समझ सका और कुछ अधिक ही समझ लिया ।

दुर्दिन का एक वर्ष जिसमें महामारी ने सारे गाँव को क्रीडा क्षेत्र बना लिया रमेश अपने मित्र डाक्टरों और नर्सों के साथ सेवार्थ चल पड़ा । अचानक सास और पति से विहीन कमली मिली । असहाय ! कमली रमेश की छाती से लिपट गई । रमेश का दिल पश्चात्ताप से भर गया ।

बदकिस्मत कमली ने रमेश को बड़ी पीड़ा पहुँचाई । उसने उसको पत्नी बनाने का संकल्प किया । पहले तो कमली भय से काँप गई और घर भाग आई । बाद में उसने भी रमेश के मशविरे को मंजूर करने की प्रतिज्ञा की । बाबू अम्बिका प्रसाद इस खबर से अत्यन्त क्रोधित हो गए और अपने पुत्र को इस अधर्म से बचाने के लिए लक्ष्मण तथा उसके परिवार को गाँव से निकाल दिए ।

इसके बाद ? क्या अम्बिका प्रसाद की उसफल (?) कुलीनता उनके अन्तःकरण में संचित पुत्र स्नेह पर शासन कर सकी ?


मोरे मन मितवा
(ख़ुलासा कहानी)

वजीहा, मिहनती और सुरीला गवकार जवाँसाल रमेश पटना मेडिकल कालेज का तालिबे इल्म और सरोजिनी देवी और गाँव के ज़मीन्दार बाबू अम्बिका प्रसाद का एकलौता बेटा था । उसी गाँव के दूसरे हिस्से में सरजू महतो अपनी पहली बीवी के बेटे लछमन, दूसरी बीवी धनिया और उसके बेटे पल्टू और बेटी कमली के साथ रहता था । कमली और रमेश बचपन ही से एक दूसरे के साथ खेलते कूदते रहे थे । जवान होने पर कमली के दिल में बचपन की यादें गहरी मुहब्बत में बदल गई । लेकिन रमेश के दिल में मुहब्बत की कोई लगन नहीं थी । चुनांचे छुट्टियाँ गुज़ार कर वो पटना वापस चला गया ।

वक़्त गुज़रता गया । यहाँ तक कि एक दिन सरजू ने आख़री साँसें लीं । लछमन की बीवी पार्वती अपने ख़ानदान के साथ निबाह न कर सकी । इसी दौरान कमली की भी शादी हो गई । रमेश ने ससुराल जाते हुए कमली को एक बनारसी साड़ी तोहफ़े में दी । कमली जवाब में कुछ न कह सकी और आँसुओं में डूब गई । कमली की सहेली फुलिया ने रमेश को वो तस्वीरें लौटा दीं जो अब तक कमली ने महफ़ूज़ कर रखी थीं । रमेश इन तस्वीरों को कमली से रोने के ताल्लुक़ से जोड़ न सका ।

उस साल बड़ी तबाही मची । गाँव में वबा फूट पड़ी । रमेश डाक्टरों की एक टीम के साथ मदद को पहुँचा । यहाँ रमेश ने देखा कि कमली अपने मर्दे शौहर और सास की लाश के पास खड़ी है । कमली बतौर ग़म में रमेश के बाज़ू से जा लगी ।

बदनसीब कमली की मुसीबत रमेश से देखी न गई । चुनांचे उसने उसके साथ शादी करने का फ़ैसला कर लिया । पहले तो कमली उस तज्वीज़ पर हैरान हो उठी और अपने घर भाग खड़ी हुई । लेकिन बाद में वो शादी करने के लिए राज़ी हो गई । बाबू अम्बिका प्रसाद को जब ये मालूम हुआ तो वो अज़ा में भूत हो गये और लछमन और उसके ख़ानदान को अपने बेटे के इरादे को रोकने के लिए गाँव से बाहर निकाल दिया ।

उसके बाद क्या हुआ ?

क्या अम्बिका प्रसाद की झूठी रियासत बेटे रमेश को पिदराना शफ़क़त से मरहूम कर सकी ? वो पिदराना मुहब्बत .... मजबूर हो कर उसे कबूल करने पर मजबूर हो गये ?

इसका जवाब पर्दए सीमीं पर देखिये !



       
MOREY MAN MITWA
(Synopsis)


The handsome meritorious and sweet singer youth Ramesh, a student of Patna Medical College, is the only son of Village Zamindar, Ambika Prasad and Sarojini Devi. In another part of the same village, there lived Saraju Mahato with his son from his first wife, Lachhman, second wife Dhaniya and her son Paltu and daughter Kamli. Both Ramesh and Kamli had been each other's companion since their boyhood days. The ties of this friendship had grown into a deep love in the heart of Kamli at the full brim of her youth. But Ramesh could feel no impulse from within. He went back to Patna after holidays.


Time rolls on. One day Saraju breathed his last. Parvati, Lachhman's wife, couldn't adjust herself with the family.

Meanwhile Kamli got married. Ramesh offered her a 'Banarashi' saree on her way to her father-in-law's house. Kamli could say nothing but burst into a sea of tears. Fulia, Kamli's friend, returned to Ramesh his photograph which Kamli preserved so long with her. Ramesh could not link this photograph with her bursting out of tears and realised something more of it.

It was a foul year. Epidemic had spread over the village. Ramesh set out with his group of doctors and nurses for relief work when all of a sudden he discovered helpless Kamli with her dead husband. She threw herself to the embrace of Ramesh. His heart filled with repentance.

The unfortunate Kamli pained him much. He decided to marry her. Kamli at first became frightened at the proposal and ran home but afterwards she made up her mind to accept. Ambika Prasad got angry at the news and drove Lachhman and his family out of the village to resist his son.

Then ? Will the false aristocracy of Ambika Prasad reign over the fatherly affection towards his son Ramesh ?

15: जो मगही की बात करेगा वही मगध पर राज करेगा

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_5169214_1.html

जो मगही की बात करेगा वही मगध पर राज करेगा
19 Jan 2009, 08:49 pm

शेखपुरा : जो मगही की बात करेगा वही मगध पर राज करेगा। यह एलान मगही मंडप ने आसन्न लोकसभा चुनाव को लेकर किया है। इस बाबत मगही मंडप के जिला अध्यक्ष रामचन्द्र ने बताया कि आसन्न लोकसभा चुनाव को लेकर इस पूरे क्षेत्र में मगही भाषा की हो रही राजनीतिक उपेक्षा को चुनावी मुद्दा बनाया जायेगा। रामचन्द्र ने बताया कि इसी मुद्दे को अमलीजामा पहनाने के लिए तथा रणनीति तैयार करने के लिए 25 जनवरी को शेखोपुरसराय में खास आयोजन मगही मंडप द्वारा किया गया है। रामचन्द्र ने कहा कि लोकसभा चुनाव में जो प्रत्याशी मगही भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए अपने समर्थन की घोषणा करेगा क्षेत्र में उसी को वोट दिया तथा दिलाया जायेगा। रामचन्द्र ने बताया कि मगही भाषी मतदाता बिहार के नवादा, जमुई, मुंगेर, नालंदा, पटना, गया, जहानाबाद तथा औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र के साथ झारखंड के भी 5 जिलों में चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। रामचन्द्र ने इस पूरे क्षेत्र के सांसदों तथा विधायकों पर आरोप लगाया कि मगही भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक उपेक्षा के कारण ही मगही भाषा को आजतक संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। इस उपेक्षा से आहत करोड़ों मगही भाषी लोकसभा चुनाव में अपने गुस्से का इजहार करेगे। उन्होंने कहा कि सिर्फ बिहार में मगही भाषा बोलने वाले 3.5 करोड़ लोग हैं।