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Wednesday, July 22, 2026

हम्मर कीऽ अपराध?

हम्मर कीऽ  अपराध?

मूल तमिल - आर॰ विलिनाथन्   

उड़िया अनुवाद - पौरुष (मार्च 1981)  

मगही अनुवाद - नारायण प्रसाद

हमरा से कीऽ गलती होलइ?  हमरा नौकरी से काहे ससपिन (सस्पेंड) कइल गेलइ? बड़ी सोच-विचार कइलो पर हम एकर कारण ढूँढ़ न पइलूँ। अगर अपने जान पाथिन त हमरा बतइथिन। जरी स सोचथिन।

हम झूठ काहे ल कहिअइ? चाह तैयार करते बखत जइसे ई कागज के टुकड़ा जल रहले ह, ठीक ओइसहीं ऊ दिन हमर दिल जले लगल हल।

साधारणतः हम रद्दी लिफाफा जलाके चाह तैयार करऽ हूँ। लेकिन ई दफ्तर में एक अफवाह उड़ गेल ह कि हम चिट्ठी जलाके चाह तैयार करऽ हिअइ। हम तो बारंबार कहऽ हूँ कि ई अभियोग गलत हइ। लेकिन दोसर के नजर में ई सही हइ।

फिर अपने पूरा के पूरा घटने सुन लेथिन। अपने असली बात जान पइथिन।

न जानूँ ऊ कखने अइता - ई तरह के उद्वेग भरल मन लेके शायद प्रेमिका प्रेमी के बाट जोह रहल ह। एतने में प्रेमिका लगी चिट्ठी आवऽ हइ - नाया सपना भरल संदेश लेके। नौकरी से संबंधित दौरा पर गेल विरहविदग्ध पति शायद नाया शहर के कोय होटल के कोय कोठरी से चिट्ठी लिक्खऽ हइ अपन प्राणप्रिया घरवली के पास। मइया के खर्चा लगी रुपइया भेजे वला बेटा के प्यार भरल चिट्ठी आवऽ हइ। कन्या चिट्ठी दे हइ मइया के हानि-लाभ जाने ल। पदोन्नति लगी बेअग्गर कर्मचारी चिट्ठी भेजऽ हइ अपन जानल-पहचानल कोय ऊपर वला हाकिम के पास। ई सब बात के अलावे नजदीकी रिश्तेदार के मिरतु के समाद लेले आवऽ हइ कोय दुःखदायक पत्र। ई सब्भे तरह के चिट्ठी-पत्र के बाँटे के काम में लगल हकूँ हम। हम एगो डाकिया हकूँ। हमर नाम दामोदर हके। हम अपन काम में लगल हकूँ, फल के आशा नञ् करऽ हूँ। हम जानऽ हूँ - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

छोट्टे-छोट्टे बुतरू सब के खुश करे खातिर हम जे कुछ कइलिए ह, की ऊ गलत हइ? हमर समझ में ई सही हइ। लेकिन बाकी लोग के नजर में ई गलत हइ। बियाह के बहुत दिन के बादो कोय संतान नञ् होवे के कारण हम दोसर लोग के बुतरू के देखके खुश हो जा हलूँ। ऊ सब के ठोर पर हँस्सी लावे लगी हम जे कुछ करऽ हलूँ, ऊ लोग-बाग के आँख के काँटा काहे बन गेल, ई हमर समझ में नञ् आल। हम करवो करऽ हलूँ की? रस्ता पर कइएक रद्दी लिफाफा पड़ल रहऽ हकइ। हम ओकरा जामा करके लावऽ हलूँ आउ सिद्धिरस्तुनञ् जाने वला बुतरू के देखके ओकर हाथ में एगो लिफाफा धरा दे हलूँ। कहऽ हलूँ - ले, तोर मामूँ एगो चिट्ठी भेजलथुन हँ आउ कोय बुतरू के हाथ में लिफाफा पइते कहऽ हलूँ - ले, तोर नाना ई सुन्दर चिट्ठी भेजलथुन हँ बुतरू आनन्दविभोर हो जा हल। ओकन्हीं के आनन्दित देखके हमहूँ पुलकित हो उठऽ हलूँ।

पराया बुतरू के हमरा अइसे खुश करते देखके भगमान के शायद दया लग गेलइ। ओहे से हमर घर में जलम होल एगो बच्ची के।

बाकी बुतरुअन साथ हम जइसन खेल खेलऽ हलूँ, अपन बेटियो के साथ ओइसने खेल खेले लगलूँ। एक दिन ओकरा बोलाके कहलूँ - ले, तोर चिट्ठी अइलो ह।

- चिट्ठी? हमरा चिट्ठी भेजलकइ केऽ?तोतराल अवाज में ऊ बोलल।

- तोर दुलहवा।

- सच?ऊ हँस पड़ल।

एहे तरह से चल रहल हल हमर जीवन प्रवाह। एक दिन हमर बेटी हमर हाथ में एगो चिट्ठी देके बोललक - ई चिट्ठी के डाक में डाल दिहऽ।

- केकरा चिट्ठी भेज रहलहीं ह?हम पुछलूँ।

- अपन दुलहवा हीं। ऊ जवाब देलक।

हम दुनू बेकत ई बात सुनके मारे हँसी के बेदम हो गलूँ।

बेटी बड़ होवे लगल। ओकरा इस्कूल जाय के समय आ गेल। हम सोचलूँ कि बिद्दा तो हमर भाग में नञ् हल, बाकि अपन बेटी के एकरा से वंचित काहे करूँ। कम-से-कम बी॰ए॰ तक ओकरा जरूर पढ़ाम।

ऊ दिन हम दफ्तर से छुट्टी लेके घर बइठल हलूँ। एगो चिट्ठी आल हमर बेटी लता के नाम। लता ऊ बखत कौलेज जा हल। चिट्ठी पाके हम सोचलूँ, ओकरा पास चिट्ठी केऽ लिखलक होत? जरूर ओकर कोय सहेली लिखलक होत। ई सोचते-सोचते हम चिट्ठी खोल डाललूँ। चिट्ठी पढ़े पर हमर सर चकरा गेल।

कौलेज में आजकल कीऽ पढ़ावऽ हका? खाली प्रेम से संबंधित गवेषणा चल रहले ह कीऽ हुआँ? मोहन नाम के कोय युवक ई चिट्ठी भेजलके हल। ई हलइ एगो प्रेमपत्र।  

पहले तो चिट्ठी पढ़ला पर हमर सर गरम हो गेल। लेकिन बाद में हम शांतभाव से सोचे लगलूँ। सोचलूँ कि एकरा में गोस्सा करे के कीऽ बात हइ? आजकल युवक-युवती अपन भाग के फैसला खुद्दे करे के प्रयास करऽ हइ। एकरा में हमरा माँ-बाप के हैसियत से तो ऊ सब के सहायता करना उचित हकइ। बेकार के ड़ँगा लगावे से कीऽ लाभ? अगर ई युवक अच्छा होवे त हमरा ओकन्हीं के आगे ढ़े में मदत करे के  चाही।

हम गुप्त रूप से ई मोहन के बारे में विभिन्न सूत्र से खबर जामा करे लगलूँ। देखलूँ कि ई युवक के चरित्र अच्छा नञ्। प्रेम करना ओकर एगो शौक हइ। ऊ ई तरह कइएक लड़की के प्रेमपत्र दे हइ, अइसन सुने में आल। ई सब कुछ हम अपन बेटी के बता देलूँ। मोहन के विरुद्ध जे कुछ हम सुनलूँ हल, ओकर अच्छा तरह से वर्णन करके लता के सुना देलूँ। लेकिन ई सब कइलो पर मोहन के प्रति लता के सहानुभूति कुच्छो कम नञ् होल, बल्कि ऊ दुन्नु के बीच घनिष्ठता बढ़ले गेल। वस्तुतः प्रेम अन्धा होवऽ हइ, एकर सबूत हमरा मिल गेल। हम जेतना कड़ा अनुशासन बरतऽ हलूँ, लता ओतने अधिक मोहन से प्रेम करऽ हले। एक दिन सब्भे अनुशासन के पीछे छोड़के लता मोहन के साथ कोय अनजान जगह में भाग गेल।

ई तरह के कोय दुर्घटना घटत, एकर आशा हमर घरवली के नञ् हल। लता के चल जाय के दुइए दिन बाद ऊ खाट पकड़ लेलक। हृदय के असीम पीड़ा ऊ सहन नञ् कर पइलक आउ एक सप्ताह के अन्दरे ऊ आँख मून लेलक - हमेशे लगी। ई घटना से हम तो अधमरू हो गेलूँ। तइयो हमर हृदय में एक क्षीण आशा शेष हले - शायद हमर लड़की जीवन के उथल-पुथल में कटु सत्य जान पावत, शायद ऊ फिर जीवन के स्वाभाविक धारा में वापस आ जात ... ...।  

हमरा एक तरह के अवाज सुनाय दे हले मानु हमर आत्मा कह रहल ह - दामोदर! ई सब लगी तूँहीं उत्तरदायी हँ। बुतरुअन के झूट्ठो-फुस्सो के चिट्ठी देके तूँहीं ओकन्हीं के मन में वृथा आशा आउ अभिलाषा के सृष्टि कइलऽ हँ। ओकरे तो ई नतीजा हउ। ई तरह के घटना केतना परिवार में घटलो होत, केऽ जानऽ हउ?

कीऽ करूँ? हमर तो ई तरह के झूठ चिट्ठी बाँटना एगो आदत बन गेल ह। ओहे से निश्चय कइलूँ कि डाक के नौकरी छोड़ देम। 43 साल के उमर में बहुत मेहनत करके हम मैटिक के परीक्षा देलूँ। पास कइला के बाद ऊपर के हाकिम के कह-सुनके सॉर्टरके नौकरी पा गेलूँ।

पोस्टल सॉर्टर के रूप में हमर जनकारी बढ़े लगल। जनकारी एतना बढ़ गेल कि कोय लिफाफा के हाथ में लेतहीं हम बता सकऽ हलूँ कि ओकर वजन केतना होतइ। एकरा में ठीक-ठाक टिकट लगल हइ कि नञ्, ई हम ओकर वजन से जान ले हलूँ। खाली एतने नञ्, लिफाफा के अन्दर में कीऽ होतइ, एकरा बारे में ठीक-ठाक अनुमान लगाना हमरा लगी सम्भव हो गेल।

आउ एगो महारत हम हासिल कर लेलूँ। लिफाफा के देखतहीं हम भाँप ले हलूँ कि एकरा में प्रेमपत्र होतइ कि नञ्। हमर ई अनुमान शत-प्रतिशत सही उतरऽ हल। ई तरह के चिट्ठी देखतहीं हमरा अपन बेटी के घटना तरोताजा हो जा हल। लता जे तरह से दुर्भाग्य के शिकार होल, बाकी लड़की के साथ अइसन नञ् होवे, एहे हमर आन्तरिक कामना हल। फेनु ई तरह के चिट्ठी देखतहीं हम ओकरा अलगे रख दे हलूँ। ओकरा ऊ दिन के डाक में कभियो नञ् भेजऽ हलूँ।

अपने सोचऽ होथिन, हमर बेटी के कीऽ होलइ? वस्तुतः हमरा जेकर आशंका हलइ, ओहे होलइ। ऊ धूर्त बदमाश छोकरा हमर बेटी के असहाय अवस्था में छोड़के कहीं भाग गेलइ। ऊ बखत हमर बेटी दू बुतरू के माय बन चुकल हल। छो बच्छर के लम्बा अवधि के बाद अपन बेटी के बारे में एहे खबर हमरा मिलल। हम खबर पइतहीं ओकरा ले आवे खातिर ओकर घर गेलूँ।    

जानऽ हथिन, बेटी हमरा कीऽ उत्तर देलकइ? ऊ कहलक - ऊ दिन तोहर बात नञ् मानके हम घर छोड़के चल अइलूँ हल। आज तोहर बात मानके हम अगर फेर तोहर घर वापस आ जाउँ, त मान-इज्जत रहत तो? हमर पति के बुद्धि भ्रष्ट हो गेल ह, त कीऽ हमहुँ बुद्धि भ्रष्ट कर लेउँ? हम अपने गोड़ पर खड़ा होके ई दुन्नु बुतरू के पालम-पोसम। एकरा से हमर पति के कुल-रक्षा होवत। हमर चिन्ता छोड़ऽ।

हमर बेटी के ई तरह के दुःसाहस दोसर लड़कियन के मन में जागे, अइसन हम कभियो नञ् चाहऽ हूँ। ओहे से जे चिट्ठी के बारे हमरा सन्देह होवऽ हके, ओकरा बिना पढ़ले कभियो डाक में नञ् छोड़ऽ हूँ। दोसर के चिट्ठी पढ़ना अच्छा बात नञ् हइ, ई हम मानऽ हूँ। लेकिन खुफिया विभाग के कर्मचारी अइसन चिट्ठी कइसे पढ़ऽ हका? 

हमर आदत से अपने अच्छा तरह से अवगत हो गेलथिन होत। पहले रस्ता में पड़ल लिफाफा, पोसकाड आदि जामा करे के जे बुरा आदत हलइ, ऊ अभी तक गेलइ नञ्। वस्तुतः ई तरह के पोसकाड, लिफाफा आदि हम कभियो जामा करऽ हूँ आउ चाह तैयार करे में ओकर इस्तेमाल करऽ हूँ। चाह तैयार करे बखत शंकाहा पत्र के खोलके हम पढ़ लेल करऽ हूँ।  

हम तो ई क्षेत्र में काफी महर्रत हासिल कर लेलूँ ह। ओहे से सन्देह के परिसर के अन्दर आवे वला चिट्ठी  के हम कभियो नञ् छोड़ऽ हूँ। एकर ई मतलब नञ् कि वास्तविक प्रेम के विरुद्ध हम अड़ँगा लगावऽ हिअइ। वस्तुतः जाहाँ सच्चा प्रेम रहऽ हइ, हुआँ हम दुन्नु प्रेमी के विवाहसूत्र में आबद्ध करे के चेष्टा करऽ हिअइ। जाहाँ ई तरह के प्रेम के अभाव देखऽ हूँ, हुआँ हम खाली लिफाफा भेजके दुन्नु प्रेमी के बीच कड़वाहट पैदा करऽ हिअइ ताकि ओकन्हीं के बियाह नञ् हो पावे।

ई तरह से बहुत दिन गुजर गेल। कोय पत्रप्रेषक अपन गन्तव्य स्थान में नञ् पहुँचे के डाक विभाग में शिकायत कइलके हल। ऊ शिकायत के अर्जी पर छानबीन कइल गेलइ। हम आपिस (ऑफिस) में लिफाफा जलाके चाह बनावऽ हिअइ - ई बहुत लोग के सहन नञ् हो पावऽ हलइ। ऊ सब जाँच अफसर के हमरा विरुद्ध कह देलकइ।

बहुत कर्मचारी बतइलकइ कि हमर बेटी के जीवन नष्ट हो गेला के बाद हमर सिर फिर गेले ह। हम मानऽ हिअइ, हम दोषी हकिइ। जवाब में हम बहुत सारा चिट्ठी ऊपर के हाकिम के सामने पेश करबइ। ऊ बखत हम मालूम करा देइ कि जे अफसर हमरा अपराधी साबित कइलका ह, ओकर बेटि के मिथ्याप्रेम के फन्दा से हम बचइलि ह। ऊ लड़की सर्वनाश के मुख से रक्षा पा गेले ह। असर के जब ई बात मालूम होतइ, ऊ बखत ऊ मन ही मन हमरा पर कृतज्ञता प्रकट करतइ।  

अपने पूछ सकऽ हथिन कि हम ऊ लड़की के बचइलि, एकर कीऽ प्रमाण हइ? अरे बाबू, अपने जानऽ हथिन कि ई मिथ्याप्रेमी केऽ हइ? जे धूर्त बदमाश हमर बेटी के फँसाके ओकर जिनगी बरबाद कर देलकइ, ओहे फेर ई अफसर के बेटी के अपन फन्दा में फँसावे के कोरसिस कर रहले ह।

बेचारी अब कीऽ कर रहले होत? अजी साहब, अब हमर लड़की के केकरो सहानुभूति के जरूरत नञ्। अपन बापे के तरह ओहो डाक विभाग में सॉर्टरके रूप में काम चालू कर देलके ह।

 

[उड़िया मासिक पत्रिका ‘पौरुष, मार्च 1981, पृ॰73-78 से साभार]

 

 


Monday, August 28, 2023

मगह के तीन टेढ़


 मगह के तीन टेढ़

प्राचार्य राम बुझावन सिंह

(ललित निबन्ध)

मगह के बारे में एगो कहावत प्रचलित हे कि मगह में तीन टेढ़ — राह टेढ़, आदमी टेढ़, आउ बोली टेढ़। ऊपर से देखे में लगे हे कि ई कहावत मगह ला अपमानजनक हे, काहे कि कोई के टेढ़ कह देवल अशिष्ट नियर बुझा हे। पर सच पूछीं तऽ कहावत ऐसही न बने, खूब सोच समझ के बने हे, जेकरा में बहुत कुछ सचाई रहऽ हे। ई कहावत एकर अपवाद न हे।

सबसे पहिले राह टेढ़ के बात लीं। कहीं के राह के भी घना सम्बन्ध उहाँ के धरती, पानी, यानी भूगोल के बनावट से रहे हे। जइसन जहाँ के हवा-पानी आ माटी रहत, वइसने उहाँ के सब कुछ बन जायत - राह-बाट, लोग-बाग, आ सभ्यता-संस्कृति। एकरे जयशंकर प्रसाद जी अपन नाटक ‘विशाख’ के ‘परिचय’ में कहलन हे कि —”हमें हमारी गिरी दशा से उठाने के लिए हमारे जलवायु के अनुकूल जो हमारी अतीत सभ्यता है, उससे बढ़कर उपयुक्त और कोई भी आदर्श हमारे अनुकूल होगा कि नहीं, इसमें मुझे पूर्ण सन्देह है।” ई कथन में ‘हमारे जलवायु के अनुकूल हमारी सभ्यता’ पर ध्यान देवे के हे। हमर सभ्यता हमर देश के जलवायु के अनुकूल ही बनत। तऽ राह-बाट अपन माटी-पानी से बचके कइसे रहत! ई मगह के भौगोलिक तथ्य हे कि एकर माटी धूसर, बलुआही आ मरल न हे, जे पानी के तुरत धरती सोख ले हे। बहुत जगह के माटी बलुआही पावल जाहे, जे बरखा के पानी के तुरत सोख ले हे। बरखा छुटला पर पांव झाड़ दीं, सब धूल झड़ जायत, आ चप्पल-जूता पहिन के तुरत चले लगीं। तनिको माटी न लगत। उहाँ के लोग अपन माटी के ई खूबी मानऽ हथ, कि बरसात में भी उहाँ जूता-चप्पल चले हे। उनकर ई खूबी उनका मुबारक! खूब जूता-चप्पल उहाँ चले, एकरा में हमरा का एतराज?

पर मगह के माटी के ई रिवाज न हे। इहाँ के माटी जादेतर काली माटी, केवाल माटी हे, जेकर खूबी हे कि पानी न पड़त, तऽ सूख के ऊ अइसन कड़ा हो जायत कि ओकरा आगे पत्थर भी मात खा जायत। ठेसे लगला पर ओकर कड़ाई बुझाऽत। पर अगर थोड़ा पानी के संसर्ग ओकरा भेंट जायत, तऽ ऊ एतना लसगर हो जायत कि अपने के गोड़ न छोड़त। ई धूरि न हे, जेकरा झार के अपने चल देब। ई हमर माटी के सनेह हे, जे गीला होला पर अइसन पकड़ ले हे कि छोड़ावल मुस्किल होवऽ हे। सनेह अइसने बरियार होवऽ हे। सनेह के आगे केकर जोर चलल हे भला?

एहिसे, जब मगह के धरती बरखा में डूब जाहे, तऽ बड़ा घूम-घुमाव के राह बने हे। लगत कि पावे भर पर जाय ला हे। पर जाय लगब, तऽ राह लम्बा हो जायत। कवि के बात याद आ जाहे — ‘चलता-चलता जुग गया, पाव कोस पर गाँव’। चलनिहार के मगहे से पाला पड़ल होत। लम्बा राह टेढ़ा हो ही जात। ओहू में सनेह से भींगल, चिक्कन, लथपथ।

जे गुन मगही राह के, ओही मगहियन आदमी के भी। इहाँ भी धरती-माटी के ही असर काम करऽ हे। पहिले आदमी के माने आदमी के देह से लीं। मगह के माटी में खेसाड़ी खूब उपजे हे, जेकर उपयोग जानवर से लेके आदमी तक खूब करऽ हथ। जहिया से खेसाड़ी में टूसा निकले हे, ओहिए से ओकर साग चले लगे हे। देहात तो देहात, सहर के लोग के भी ओकरा ला प्रान छछनइत रहे हे। अपन देहाती कुल-कुटुम्ब पहिले ही सनेस देतन कि गंगा नहाय अइहऽ तऽ खेसाड़ी के साग लावेला न भूलिहऽ। खेसाड़ी के साग में एतना स्वाद हे। मगर ओकर दाल? ओकरा बारे में डाक्टर लोग कहऽ हथ कि बहुत दिन तक लगातार ओकर दाल खाय से पांव में गठिया हो जाय के डर रहऽ हे। ई बात में सचाई हो सके हे। खेसाड़ी के दाल सबसे सस्ता होवे हे। गरीब-गुरबा ओकरा खूब खा हथ। खेतिहर मजदूर के भी खेसाड़िये मजूरी में देवल जा हे। ईसे अक्सर जन-मजूर के पाँव गठिया पकड़ के लांगड़ हो जाय, टेढ़ हो जाय, तो कउन अचरज?

अब टेढ़ के मतलब आदमी के देह से नऽ, सुभाव से लेल जाय। वहाँ फिर हम मगह के धरती-माटी के याद दिलाएब। ओकरा अगर सनेह से भिगाईं, तऽ ऊ एतना चिकना हो जायत, कि अपने फिसल जाएब। देह से, आ मन से भी। पर अगर ओकरा से सुखले बतियाएब, बिना सनेह दरसवले, त ऊ पत्थर नियर कठोर हो जायत। एकरे टेढ़ भी कह सकऽ ही। पर सच पूछीं त, एकरे आदमी के स्वाभिमान भी कहल जाहे, जे मगहियन में कूट-कूट के भरल हे। एही ओकर खूबी हे। इहाँ हम फिर पोथी-पुरान के याद दिलाएब। धनुहा-भंग के बाद जब परसुराम फरसा तानले जनकपुर पहुँचलन त सब कोई तो सटक सीताराम। पर लछुमन के त्योरी चढ़ गेल। उनकर नहला पर ई दहला कसे लगलन — अइसन-अइसन तीरकमान आ फरसा हम ढेर देखले ही। परशुराम के जरइत आग में घी पड़ गेल। ऊ फरसा के धार पर अँगुरी फेरे लगलन। एहि बीच राम आके उनका सांत कयलन  — महाराज, अगर अपने खाली मुनिवेश में अइतीं, त लछुमन अपने के पाँव पर गिर जायत हल। पर अपने के तीरकमान आ फरसा देखके ओकर छत्रियाँव भड़क उठल। एकरा में ओकर दोष नऽ।

[*22] अब इहाँ बुझीं, कि लछुमन में ई तेवर कहाँ से आयल? हमर बात के बकवास न मानल जाय, तऽ हम निवेदन करब कि लछुमन में ई तेवर उनकर ननिहाल के धरती-माटी से आयल हल, जे मगह के गया छेत्र में हल। आज भी उनकर ननिहाल के गाँव रामपुर चांई के नाम से मौजूद हे, जेकरे पास आज भी मसहूर सूर्य-मन्दिर देकुड़-देवकुण्ड हे। कहल जाहे कि राम जब पिता के पिण्डदान ला गया जाइत हलन, तऽ एक रात ओही ननिहाल में ठहर के विश्राम कएलन हल, जेकर याद में आज भी ऊ गाँव रामपुर कहला रहल हे।

तऽ जइसे लछुमन के स्वाभिमान कोई के ठोकर बर्दासत न कयलक, ओइसहीं मगहियन भी कड़ाई के साथ पेस आवेवाला के साथ कड़ा बन जा हथ। एहिसे लोग कह दे हथ कि मगह के आदमी टेढ़। लोग हमरा टेढ़ कहथ या सोझ, हम तो अपन धरती-माटी से लाचार ही। हाँ, जरा सनेह देखला के तो देखीं, कि हम केतना नरम हो जाही? केवाले माटी से तो आखिर हमर तनमन बनल हे। गोसाईं बाबा भी टेढ़ से काफी घबरा हलन – ‘टेढ़ जानि संका सब काहू’। लगे हे कि उनका कोई मगहिया से पाला पड़ गेल होयत। एहिसे ओहू भी मगह के गरियाबे में बाज न अयलन — गया मगह महँ तीरथ जैसे। हमरा से कोई के शंका — डर-भय — न होय, एहिसे हम पूर्नमासी के चाँद बन जाईं, जेकरा हर कोई राहू दबोच दे? हम वक्र चन्द्रमा रहब से कबूल पर कोई राहू के ग्रास न बनब, न बनब। बनब तऽ ‘नगद दमाद अभिमानी के’। 

रह गेल बोली टेढ़ के बात। ‘निज कवित्त केहि लाग न नीका’ न्याय से सोचीं, तऽ बात अपने आप खुलासा हो जाहे। पर अपना से तटस्थ होके जरा सोचऽ ही, तऽ ई मान लेबे पड़ऽ हे कि मगहियन के जुबान पर अड़ोस-पड़ोस के बोली जल्दी चढ़ जाहे। पर हमर पड़ोसी के जुबान पर मगही बहुत कम चढ़े हे। आमतौर पर मगहियन भोजपुरी आ मैथिली धड़ल्ले से बोल ले हथ। पर एही बात गैर-मगहियन के साथ न पावल जाहे। चाहे जउन कारन से हो, ऊ लोग के साथ स्वकीयापन जादे चले हे। अपन-अपन रीतरिवाज संस्कार हे। एकर अलावे, हमरा तो बुझा हे, कि ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल’ के मरम ऊ हमरा से पहिले आउ जादे समझ गेलन हे, ओकर स्वाद खूब बूझ गेलन हे। आज के दुनिया के दौड़ में आगे निकल जाय ला ई बहुत कारगर नुस्खा हे।

भाषा विज्ञान के नजर से देखला पर सचमुच अइसन परतीत हो हे कि मगही बोली आसानी से न साधल जा सके हे। ‘तीन कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी’ जेतना मगह में पावल जाहे, ओतना सायद ही कहीं दूसर जगह। पटना, गया, नालन्दा, औरंगाबाद, पलामू, हजारीबाग, राँची के मगही बोली सोझ न बुझाय, गैर-मगहियन ला ई बोली टेढ़ लगे, तो कउन अचरज? खूब ठेकाने से मगही बोली जुबान पर चढ़ जाय, एकरा ला कुछ साधना करे के जरूरत हे। गैर-मगही भाई एकरा टेढ़ कहथ या सोझ, पर हम तो एहि कहब कि - ‘आती है मगही जुबां आते आते’।

जे ई मगही के मरम समझ जैतन, ऊ बुद्ध बन जैतन। सिद्धार्थ के ढेर संगी-साथी अपना-अपना नियर उनका प्रबोध के हार गेलन, पर पार न पावलन। आखिर निरंजना के कगार पर से एगो बोल फूटल — बीना के तार नियर मन के साधऽ। न जादे तानऽ, न जादे ढीला छोड़ दऽ । के न जाने कि सिद्धार्थ ई मरम बोल के साधलन, त बुद्ध बन गेलन। आझ भी जे मगही के मरम बूझ लेतन, ऊ प्रबुद्ध बन जयतन। न बूझेवाला के तो ई टेढ़ा बुझएबे करत।

 

साभारः आचार्य केसरी कुमार (प्रधान संपा॰) - “निरंजना”, मगही अकादमी, बिहार, पटना-13; कुल x+106+ii पृष्ठ। उपर्युक्त निबन्ध पृ॰21-22 पर छपले ह।

Saturday, August 26, 2023

मगही साहित्य को प्रो॰ रामबुझावन सिंह की देन

 

मगही साहित्य को प्रो॰ रामबुझावन सिंह की देन

प्रो॰ सुखित वर्मा

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् एवं बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के पूर्व निदेशक प्रो॰ रामबुझावन सिंह हिन्दी और मगही के महान साहित्यकार रहे हैं। हिन्दी और मगही की पत्र-पत्रिकाओं के साथ इनका गहरा लगाव रहा है, जिनमें इनकी मौलिक एवं स्तरीय रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं।

प्रो॰ रामबुझावन सिंह ने मगही की अनेक संस्थाओं से जुड़कर मगही भाषा को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मगही के भारतेन्दु डा॰ रामप्रसाद सिंह के तूफानी मगही आन्दोलन में इनका कार्य महत्त्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय रहा है। प्रो॰ रामबुझावन सिंह के कार्य रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक दोनों तरह के रहे हैं। ये आजीवन हिन्दी और मगही साहित्य की सेवा में तत्पर रहे हैं। इसी कारण मगही साहित्य-जगत् में इन्हें ‘मगही का भीष्म पितामह’ कहा जाता है।

ऐसे महान साहित्यकार  प्रो॰ रामबुझावन सिंह का जन्म अप्रैल उन्नीस सौ बीस (01.04.1920) को पटना (बिहार) जिला के मसौढ़ी थाना (अब अनुमंडल भी) अन्तर्गत सतपरसा गाँव में एक किसान परिवार में हुआ। लौंगी देवी और बनवारी सिंह इनके माता-पिता थे। इनकी  प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में हुई। इन्होंने हजरत साईं (मसौढ़ी) से मिडिल स्कूल की और जहानाबाद से उच्च विद्यालय की शिक्षा पूरी की। इन्होंने 1936 ई॰ में मैट्रिक की परीक्षा द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद 1937 ई॰ में पटना स्थित बी॰एन॰ कॉलेज में इन्टरमीडिएट में नामांकन कराया। सन् 1939 ई॰ में इन्टर की परीक्षा द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण होने के बाद उसी कॉलेज से 1941 ई॰ में स्नातक की परीक्षा विशिष्टता (डिस्टिंक्शन) के साथ उत्तीर्ण की। पुनः 1943 ई॰ में पटना विश्वविद्यालय, पटना से एम॰ए॰ (हिन्दी में) प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। तब प्रबुद्ध लोगों का ध्यान इनकी ओर आकृष्ट हुआ। 

स्नातकोत्तर (एम॰ए॰) उत्तीर्ण करने के बाद 1945 ई॰ में चन्द्रधारी मिथिला (सी॰एम॰) कॉलेज, दरभंगा (बिहार) में हिन्दी के व्याख्याता के पद [*97] पर इनकी नियुक्ति हुई। लगभग तीन वर्षों तक यहाँ इन्होंने इस पद को सुशोभित करने के बाद सन् 1948 ई॰ में पटना के बी॰एन॰ कॉलेज में हिन्दी व्याख्याता के पद पर योगदान किया। यहीं रीडर बनकर इस महाविद्यालय का गौरव बढ़ाते रहे। सन् 1980 ई॰ में वहाँ से अवकाश ग्रहण करने के बाद अप्रैल 1980 से अप्रैल 1982 ई॰ तक वे द्वारिकानाथ महाविद्यालय मसौढ़ी (पटना) में प्रधानाचार्य रहे।

 

प्रो॰ सिंह के साहित्यिक अवदान:

प्रो॰ रामबुझावन सिंह को बी॰एन॰ कॉलेज, पटना की साहित्यिक पत्रिका ‘भारती’ का जन्मदाता सम्पादक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसका प्रथम प्रकाशन सन् 1948 ई॰ में हुआ था। समय-समय पर इस पत्रिका के कई विशेषांक प्रकाशित हुए। निराला विशेषांक की काफी चर्चा हुई थी। इस कॉलेज से ‘सूत्र’ पत्र का प्रकाशन हुआ था, जिसमें साप्ताहिक ‘शोषित’ (पटना), साप्ताहिक ‘अर्जक’ (लखनऊ), ‘शंबूक’ (पटना), ‘कूर्मांचल’ (पटना), ‘कूर्मोदय’ (पटना), ‘शोषित मुक्ति’ (पटना), ‘कूर्मी-क्षत्रिय जागरण’ (पटना) आदि से सम्बद्ध रहे। ‘नवशक्ति’ (पटना), दैनिक ‘राष्ट्रवाणी’ (पटना) में सह-सम्पादक का कार्य इन्होंने 1945 से 1948 तक किया। इनके अलावे ‘निराला: जीवन और साहित्य’, ‘रेणु: व्यक्तित्व और श्रद्धांजलि’, ‘गद्य विहार’ का सम्पादन भी इन्होंने किया था।

 

निबंध:

जब से मगही आन्दोलन की शुरुआत हुई, प्रो॰ रामबुझावन सिंह इस आन्दोलन में सक्रिय रहे। ढेर सारी संस्थाओं के सदस्य और अध्यक्ष बने। मगही की पत्र-पत्रिकाओं में इनके निबंध छपते रहे। इनके कुछ प्रमुख निबंध निम्नलिखित हैं -

(i)            कपिलदेव बाबू (मगही लोक, 1978)

(ii)          मगह के तीन टेढ़ (निरंजना स्मारिका, 1983)

(iii)         मगही उपन्यास आउ आम आदमी (मगही के मानक रूप, 1987)

(iv)         मगह आउ जरासंध (गौतम, 1987)

(v)          सबहिं नचावत राम गोसाईं (अलका मागधी, 1999)   

[*98]

(vi)         बैल के दूध (अलका मागधी, 1997)

(vii)        मंगलं पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीक स्मरण (अलका मागधी, 1999)

‘कपिलदेव बाबू’ नामक निबंध भूतपूर्व प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, बी॰एन॰ कॉलेज, पटना के स्मरण के रूप में लिखा गया हे। अपने परम प्रिय मित्र कपिलदेव बाबू की याद में लिखा गया यह निबंध/ स्मरण काफी मर्मस्पर्शी है।

मगही उपन्यास आउ आम आदमी’ में आम आदमी के जीवन का व्यापक चित्रण है।

मगह के तीन टेढ़’ एक सुप्रसिद्ध मगही कहावत है जिसमें मगह क्षेत्र की तीन वस्तुओं की वक्रता को दर्शाया गया है। ये तीन चीजें हैं – रास्ता, आदमी और बोली। इन तीन चीजों की वक्रता और उनकी विशेषता का मरम समझ जैतन, ऊ बुद्ध बन जैतन। सिद्धार्थ के ढेर संगी-साथी अपना-अपना नियर उनका प्रबोध के हार गेलन, पर पार न पावलन। आखिर निरंजना के कगार पर से एगो बोल फूटल - “वीणा के तार नियन मन के साधऽ। न जादे तानऽ, न जादे ढीला छोड़ दऽ। न जाने कि मगही के मरम बूझ लेतन ऊ प्रबुद्ध बन जैतन। न बुझे वाला के तो ई टेढ़ बुझयबे करत।”

मगह आउ जरासंध’ में पौराणिक पात्र जरासंध के मगध क्षेत्र में निभायी भूमिका का व्यापक वर्णन किया गया है।

सबहिं नचावत राम गोसाईं’ में प्रमुखता से संसार के संचालन की व्याख्या है।

बैल के दूध’ हास्य निबंध है जो काफी बेजोड़ है।

ठेठ मगही के ठाठ-बाठ प्रो॰ सिंह के निबंधों में देखने को मिलता है। जगह-जगह मगही की कहावतें इनके निबंधों में चार चाँद लगा देते हैं। प्रो॰ सिंह के गद्य की भाषा काव्यानन्द की अनुभूति से ओत-प्रोत है। विषयानुसार भावाभिव्यक्ति में काफी कुशल हैं।

 

कहानियाँ:

जयशंकर प्रसाद की तरह प्रो॰ रामबुझावन सिंह भी लोक-संस्कृति के ध्वजवाहक के रूप में मगही साहित्य में अमिट रहेंगे। डॉ॰ (प्रो॰) अभिमन्यु [*99] प्रसाद मौर्य और डॉ॰ (प्रो॰) दिलीप कुमार द्वारा सम्पादित ‘मगही कथा सरोवर’ में प्रो॰ रामबुझावन सिंह की एक सुप्रसिद्ध कहानी ‘एक पर चढ़ जा तीन-तीन’ प्रचलित कथा रूपक पर आधारित है। अपनी लेखनी से खाँटी मगही कहानी का रूप देने में प्रो॰ सिंह के प्रयत्न एकदम सफल एवं सराहनीय हैं। कहानी की भाषा भाव की अनुगामिनी है। कहानी में लय और ताल के मणि-कांचन संयोग से संगीत और संगीत के आराधक तत्त्व दोनों की रक्षा हुई है। ‘धिक-धिना’, ‘तिक-तिना’ और ‘धिक-धिन’ की बोल पर ‘एक पर चढ़ जा तीन-तीन’ की गुहार बिल्कुल सार्थक है। इस कहानी की समीक्षा करते हुए डॉ॰ दिलीप कुमार ने लिखा हे - “लयदार लेखन के तालदार तेवर रखने वाले प्रो॰ रामबुझावन सिंह शोषण की सीमा समाप्त करके जीवन की अनबुझ पहेली को बिल्कुल सुलझाकर रख देते हैं जिससे मुट्ठी भर शोषक समाज को हमेशा लूटते रहते हैं। भय रूपी भूत को भगाकर प्रो॰ सिंह ने सचमुच बहुत बड़ा सामाजिक कल्याण किया है।” इस कहानी को प्रतीकवादी कहानी की कोटि में यदि रखा जाय तो किसी को आपत्ति न होगी। शिल्प और भाव की दृष्टि से यह कहानी बिल्कुल सटीक और सफल है। इस कहानी में संवाद कम, मुद्दा, नाटकीयता, सजीवता और स्वाभाविकता अधिक है।

लोककथा का वैज्ञानिक अनुशीलन भारत में अभी बहुत कम हुआ है। लोककथा में लोक विश्वास की अभिव्यक्ति होती है। वह विश्वास को एक निश्चित और स्थिर रूप प्रदान करके समाज में उसका सम्मान बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है। अतः प्रो॰ रामबुझावन सिंह की यह कहानी लोककथा के वैज्ञानिक अध्ययन, अनुशीलन और चिन्तन-मनन में सहायक सिद्ध होगी।

 

शब्दचित्र मगही में:

प्रो॰ रामबुझावन सिंह ने कई शब्दचित्रों की भी रचना की है। यहाँ मैं उनके द्वारा लिखित एक सुप्रसिद्ध ‘सनिचरा’ की चर्चा करना चाहूँगा। यह शब्दचित्र डॉ॰ अभिमन्यु प्रसाद मौर्य द्वारा सम्पादित मासिक मगही पत्रिका ‘अलका मागधी’ के जुलाई 1999 के अंक में प्रकाशित हुआ था। तत्त्व, शैली और भाषा आदि की दृष्टि से ‘सनिचरा’ शब्दचित्र एकदम सही है। शैली कथात्मक, वर्णनात्मक और चित्रात्मक है। शब्द-चयन, छोटे-छोटे वाक्य, कहीं-कहीं स्वाभाविक संवाद और भावावेश के साथ सहज-सरल चित्रण है। [*100] इस शब्दचित्र की भाषा में चित्रात्मकता, सहजता, सरलता, कहावतों एवं मुहावरों के प्रयोग के साथ स्थानीय मगही भाषा के खाँटी शब्दों का प्रयोग सहज बोधगम्य है।

‘सनिचरा’ शब्दचित्र कल्पनाश्रित यथार्थ से जुड़ा हुआ है। इसमें वर्णनात्मकता भी है। शब्दचित्रकार जब बाहर से भीतर की ओर विषय में प्रवेश करता है तब वह गहराई में न जाकर अपने शब्दचित्र की स्थूलता को पुष्ट करने के लिए वर्णनात्मक ही अधिक रहता है। कहीं-कहीं दया, करुणा, ममता, प्रेम, अहिंसा जैसे रागात्मक पक्ष का उद्घाटन भी करता है तो वह उद्घाटन विषयगत न होकर स्थितिजन्य हो जाता है। वर्णनात्मक दृष्टिकोण से ‘सनिचरा’ शब्दचित्र एकदम सफल है।

प्रत्येक साहित्यिक विधा में साहित्यिकता के गुण उसके प्रारूप, शैली और उपादान पर निर्भर करते हैं। ठीक उसी प्रकार शब्दचित्र की साहित्यिकता भी उसकी तात्त्विक अन्विति और शैली विशेष पर निर्भर करती है। कल्पना और यथार्थ के संयोग से जिस स्थल को शब्दचित्रकार अधिक गम्भीरता में उतारना चाहता है, उस साहित्यिक उपादान में बिम्ब, अलंकार, अप्रस्तुत विधान आदि का सहारा ले सकता है। वह जन-जीवन में प्रचलित मुहावरों, कहावतों और प्रतीक के माध्यम से ज्यादा व्यंजक बना सकता है। कलात्मकता की दृष्टि से प्रो॰ रामबुझावन सिंह का शब्दचित्र ‘सनिचरा’ पूर्णतः सफल है। भाषा में चित्रात्मकता , सहजता, सरलता, साधारण जनता के चलन में आने वाले कहावतों-मुहावरों के प्रयोग और स्थानीय मगही भाषा के खाँटी शब्दों के प्रयोग से ‘सनिचरा’ शब्दचित्र कली की भाँति खिल उठता है।

 

संस्थाओं के सदस्य और अध्यक्ष के रूप में:

प्रो॰ रामबुझावन सिंह सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं से जुड़े रहे थे। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के तत्कालीन निदेशक डा॰ कुमार विमल के समय प्रो॰ सिंह परिषद् के संचालक समिति के सदस्य बनाये गये थे। हिन्दी प्रगति समिति, राजभाषा विभाग, बिहार सरकार, पटना के सदस्य भी रहे थे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग और रेलवे हिन्दी सलाहकार समिति, नयी दिल्ली के सदस्य भी रहे थे। मगही भाषा-साहित्य के विकास के लिए ये काफी प्रयत्नशील रहते थे। फलतः बिहार मगही अकादमी, पटना के अध्यक्ष भी नियुक्त किये गये थे। कई वर्षों तक ये इस पद पर रहकर मगही भाषा और [*101] साहित्य की सेवा करते रहे। उक्त अवधि में मगही अकादमी, पटना की ओर से प्रो॰ सिंह ने ‘निरंजना’ नामक स्मारिका का प्रकाशन किया। मगही के विकास के लिए ये काफी समर्पित थे।

सन् 2005 ई॰ में श्री नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हीं के निर्देश पर बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् और बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के निदेशक बनाये गये। छह वर्षों तक लगातार वे निदेशक पद पर रहते हुए हिन्दी की जो सेवा की, वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। विगत 31 मई 2013 ई॰ को उन्होंने अवकाश ग्रहण किया। मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने उनको सम्मानित कर उनके गुरु-ऋण से मुक्त होने का प्रयास किया। प्रो॰ रामबुझावन सिंह को ‘गुरुओं का गुरु’ कहा जाता है। उपर्युक्त दोनों संस्थाओं से अवकाश ग्रहण करने के 25वें दिन अर्थात् 25 जून 2013 ई॰ को उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छानुसार गंगा किनारे रहते हुए भी उनका दाह-संस्कार पैतृक गाँव सतपरसा (मसौढ़ी), पटना में हुआ।

पटना की साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय सहभागिता रहती। साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक समारोहों में विशिष्ट अतिथि या मुख्य अतिथि या लोकार्पणकर्त्ता के रूप में वे हमेशा आमंत्रित किये जाते थे।

8वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयार्क (अमेरिका) में वे प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के रूप में गये थे।

प्रो॰ रामबुझावन सिंह के साथ मेरी कई स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। यद्यपि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, फिर भी उनका सरल और अजातशत्रु वाले व्यवहार का मैं कायल हूँ। अंत में मैं उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ।

 

व्याख्याता, हिन्दी विभाग

पी॰एन॰के॰ महाविद्यालय

पालीगंज, पटना-801110 (बिहार)


स्थायी पता : 

ग्राम - वादीपुर, पत्रा॰ - चिरौरा 

नौबतपुर, जिला - पटना-801109


साभार: डा॰ गनौरी महतो (प्रधान संपा॰) एवं आलोक कुमार सिन्हा (संपा॰) - “हिन्दी साहित्य के अजातशत्रु - प्रो॰ रामबुझावन सिंह”, प्राञ्जलि प्रकाशन, पटना-3; 9 अगस्त 2014; कुल x+157 पृष्ठ। उपर्युक्त लेख इस पुस्तक के पृ॰ 96-101 में छपा है।